शनिवार, 16 जून 2012

करत करत अभ्यास ते ........!

                       आज पितृ दिवस पर अपने पापा की यह सीख फिर से दुहरा कर बता  हूँ कि  कभी कभी हमारे बड़े एक दिव्य उपदेश दे जाते हैं कि  वह जीवन की दिशा को बदल कर रख देता है।       
                     मैं हाई स्कूल में थी और मैंने तबला एक विषय के रूप में ले लिया .  बहुत सम्पन्न हम न थे और पांच भाई बहन पढ़ने वाले थे। स्कूल में संगीत का कोई  टीचर  नहीं था  . बाकी  लड़कियों ने संगीत स्कूल ज्वाइन कर लिया या फिर  घर पर टीचर रख लिया। मैं ऐसा कर पाने की स्थिति में न थी . बोर्ड के प्रेक्टिकल के समय मेरा कोई शिक्षक न था जिसके साथ संगत  करने का मेरा अभ्यास हो। मैं प्रक्टिकल देने बैठी तो  संगत कर पाने का कोई सवाल ही न था।  परीक्षक ने मुझे 17/50 अंक देकर पास कर दिया और थ्योरी में मेरे 45/50 थे। जब रिजल्ट देखा तो मैं बहुत रोई - इस समय न मैं अपने न कर पाने पर दुखी थी न अपने लिए टीचर के न होने पर। बस बुरा लगा कि  मुझे इतने कम अंक मिलेऔर मेरी परसेंटेज ख़राब हो गयी । 
                     पापा ने मुझे एक कार्ड बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में --
         करत करत अभ्यास ते जड़मत होत सुजान , रस्सी आवत जात ते सिल पर होत  निशान .

लिख कर मुझे दिया और बोले कि  तुम इंटर में भी तबला लोगी। बाकी  चीजें मैं घर पर लाकर देता हूँ . इसे अपने सामने रखो और अभ्यास करो। उन्होंने मुझे एक तबला लाकर दिया और एक किताब भी। मैं उनकी बात को मान कर चलने लगी। बोर्ड के एक्जाम में मैंने अपना जो डेमो ताल रखा था वह सबसे अलग था . मैंने अपने बाहर  से आये हुए परीक्षक को बता दिया कि  मेरा कोई टीचर नहीं है और मैं जो भी बजाने  जा रही हूँ  हो सकता है कि संगत  ठीक ठीक नहो सके लेकिन फिर भी आप जिसे समझे मेरे साथ संगत  के लिए बैठा सकते हैं। वह परीक्षक अंधे थे और उनका एक शिष्य साथ में आया था . उन्होंने कहा कि  आप शुरू कीजिये और अपने शिष्य से कहा कि इनके संगत करने के लिए हारमोनियम बजाइए। 
                     मेरा प्रेक्टिकल कैसा हुआ? इसको तो वही अच्छी तरह से बता सकता है , जो और संगीत शिक्षक वहां थे,  जो हमारे दूसरे सहपाठियों के सिखाने वाले थे . वह यह मानने  को तैयार न थे कि  मैंने बिना किसी शिक्षक के ये तैयार किया है। मुझे इंटर में 45/50 प्रक्टिकल में मिले थे और कुल विशेष योग्यता के मानक से बहुत आगे। 
                       इन पंक्तियों ने प्रेरणा बनाने का काम जीवन भर किया और आज भी कर रही हैं। जब मैंने आई आई टी ज्वाइन किया तो मुझे सिर्फ  और सिर्फ मेरे लेखन के बारे में जानने वाले लोगों के कारण मानविकी से कंप्यूटर साइंस में लिया गया। कंप्यूटर जिसे कभी देखा न था और छूना  तो बहुत दूर की बात थी। की बोर्ड पर हाथ रखने के लिए पहले कभी टाइपिंग जैसी कोई चीज नहीं जानती थी। लेकिन वहां के प्रोफेसर  , जिनके साथ मैं काम कर रही थी , उन्होंने मुझे उसमें पड़े हुए टाइपिंग के सॉफ्टवेर से अवगत कराया। फिर इन्हीं पंक्तियों को सामने रख कर उसके हाथ की बोर्ड पर रखने से लेकर उसके लेशन  करने शुरू  किये तो एक महीने में मेरी स्पीड बहुत अच्छी हो चुकी थी। 
                  पापा को याद सिर्फ किसी मौके पर नहीं किया जाता लेकिन मेरे जीवन के हर मोड़ पर उनकी शिक्षाएं मेरा संबल बनी रहीं और बनी रहेंगी।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सच है उनकी दी गयी शिक्षा जीवन भर हमें हिम्मत देती है , राह सुझाती है |

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छा बाप आपको मिला , यह बड़ी खुशनसीबी है.

    देखें-
    "बाबुल तेरे देश में"
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/06/masik-dharm.html

    उत्तर देंहटाएं
  3. यही तो होती है पिता की सीख जिसे बच्चे कभी नही भूलते।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छा प्रेरक संस्मरण!
    पितृदिवस की शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. पिता की सीख निश्चय हा बड़े काम की है, किसी भी कार्य में मनोयोग के साथ अभ्यास का हठ हो हमारा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छा प्रेरक संस्मरण!

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर संस्मरण ...
    पिता एक वटवृक्ष तो होते ही हैं

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपका विश्वास और लगन सराहनीय हैं 1

    उत्तर देंहटाएं
  9. रेखा जी जीवन में ऐसे मार्गदर्शकों से ही हम सफलता पाते हैं। आप भाग्‍यशाली हैं जो आपको ऐसे पिता मिले।

    उत्तर देंहटाएं

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.