शनिवार, 18 मई 2013

उत्तर प्रदेश राजनीति के दांव पेंच !

                                     उत्तर प्रदेश की राजनीति से पूरा देश प्रभावित  है क्योंकि केंद्र में सबसे अधिक सांसद उत्तर प्रदेश से  (८० ) होते हैं तो फिर अगर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी केंद्र पर काबिज होने का ख़्वाब देखे तो कोई गलत तो नहीं है . उसके लिए जैसा कि उत्तर प्रदेश वासियों में सोचा था कि  नयी उम्र का मुख्यमंत्री और प्रबुद्ध माने जाने वाला इंसान प्रदेश के लिए कुछ ऐसा करेगा जिसमें प्रदेश का भला नजर आएगा लेकिन यहाँ तो वही समझ आया कि सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं . सबकी नजर आगामी  लोकसभा चुनाव पर लगी है. 
                                  युवाओं को रिझाने के लिए चुनाव पूर्व किये गए वादे बेरोजगारी भत्ते को देकर पूरा किया जा रहा है . ( पैसे पार्टी के फंड से थोड़े ही देने हैं ) कुछ वाकई उसके सुपात्र थे और कुछ तो बेईमानी से ले भागे ( वैसे मुफ्त में माल मिले तो किसको परेशानी होगी ? )  जिन्हें मिल गया वो समझे कि इनका वोट तो पक्का हो गया . फिर आगे चले इससे सिर्फ काम चलने वाला नहीं है तो कुछ और पिछड़ी जातियों को आरक्षित कर दिया आखिर अधिकार जो है और फिर उससे आगे और बढे सरकारी कर्मचारियों को बहुत काम करना पड़ता है तो उनका भी तो ध्यान रखना ही पड़ेगा . एक तीर से दो शिकार हो गए . राज्य सरकार की छुट्टियों में एक और ५ अप्रैल की छुट्टी का इजाफा किया गया क्योंकि इस दिन महर्षि कश्यप और महाराजा निषाद राज  जयंती थी . ठीक उसी तरह जैसे पिछली सरकार ने कांशीराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की थी और दूसरी सरकार ने आकर उसको निरस्त कर दिया और अपने लाभ के लिए दूसरों की जयंती पर अवकाश घोषित कर दिया . बात कुछ भी हो वो सारी जातियां जिन्होंने इस अवकाश की मांग की थी , सरकार की मुरीद हो गयी और आगे इनके वोट भी पक्के ही समझिये . 
                       ये पिछले महीने की बात है और फिर ब्राह्मणों को रिझाने के लिए परशुराम जयंती जोर शोर के साथ मनाई गयी . जिसमें संकल्प लिया गया कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल को हटा कर इनको ही लाना है . एक समारोह से पूरा वर्ग सध गया और फिर आगे बढे . 
                        फिर उनको अल्पसंख्यकों की भी याद आ ही गयी कि  उनको कौन सा चारा डाला जाय ताकि उनको अपने हित में मोड़ा जा सके . हम मतदाता भी इतने भोले होते हैं कि लॉलिपोप दिखा कर कुछ भी करवा लीजिये . हाँ तो सरकार को याद आ गयी कि ख्वाजा के उर्स पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया जाय  जिससे कि एक वर्ग और अपने कब्जे में आ जाय  . खैर सब खुश हो गए और मिठाई बाँट डाली कि छुट्टी की घोषणा कर दी गयी है. एक तो सरकारी कार्यालयों में वैसे भी काम करने वाले अपने को सरकारी दामाद समझते ही हैं ऊपर से जब सार्वजनिक अवकाश मिल जाए तो क्या कहना ? सरकार के गुणगान करेंगे और उसके प्रति वफादार भी तो रहना होगा . 
                         इस समय उत्तर प्रदेश में 32 सार्वजनिक अवकाश और 18 निबंधित अवकाश घोषित हो चुके हैं . 52 रविवार होते हैं . पांच दिवसीय कार्य दिवस होने पर 52 शनिवार भी अवकाश दिवस हो गए और जहाँ ऐसा नहीं है वहां पर 12 द्वितीय शनिवार की छुट्टी होती है . इस तरह से वर्ष के 365 दिन में 154 /114 दिन अवकाश के हुए . 
                         अभी कितने और महापुरषों को इसमें शामिल किया जा सकता है क्योंकि अगर वर्ग विशेष को अपने काम के लिए आरक्षित करना है तो कुछ न कुछ लगातार ऐसा करना होगा की वे आपके प्रति वफादार रह सकें और केंद्र चुनाव में आपको ही चुनें . 
                          नयी उम्र के बच्चों को अपने पक्ष में करने के लिए (क्योंकि उन्हें तो चुनाव और सरकार के कामों से अधिक मतलब नहीं होता है बल्कि उनके व्यक्तिगत हित का काम करने वाला उनका सर्वाधिक प्रिय बन जाता है.) अभी मार्च माह में लखनऊ में लैपटॉप का वितरण हुआ और जितनी कीमत के लैपटॉप वितरित किये गए उससे कहीं अधिक धनराशि  उस समारोह को आयोजित करने में खर्च कर दी गयी  . हजारों की संख्या में लैपटॉप अभी भी स्कूलों में धूल खा रहे हैं क्योंकि आयोजन की तिथि निश्चित नहीं हो सकी है.  
       फिर लाखों रुपयों का वितरण के बहाने चूना राजकोष में लगने वाला है. फिर चाहे जिन्हें ये लैपटॉप दिए हैं वे उसको संचालित करने के लिए नेट की सुविधा भी हासिल करने में समर्थ न हों और फिर अगर वे समर्थ भी हैं तो फिर इस नयी उम्र की पौध के लिए नेट का प्रयोग कितना घातक  बनता जा रहा है इस बात को सरकार  को समझने की जरूरत होगी . 
                    हमें ये देखने की जरूरत है कि जहाँ सरकार विकास और जनहित के नाम पर राजकोष को उदारता के साथ खर्च कर रही है क्या उसका प्रयोग बेरोजगारी भत्ते की जगह नियमित रोजगार चाहे वह कम ही वेतन का होता , कम से कम उन्हें नियमित काम तो मिला होता और नियमित निश्चित धनराशि  मिल पाती जो उनके जीवनयापन में या फिर उनको आगे कुछ् करने में सहायता दे पाती . इस भीषण गर्मी में पीने के पानी की सार्वजनिक रूप से व्यवस्था हो पाती तो अधिक जनहित में होता और वह काम वाकई लोगों को एक जनहित को महत्व देने वाली सरकार का समर्थन कर रहे होते . ऐसा नहीं कि इन्हें नहीं मालूम में कि प्रदेश में बिजली  सड़कें , आवास और सफाई की कितनी अधिक जरूरत है और राजकोष को अगर इस दिशा में खर्च कर दिया जाता तो प्रदेश का हर व्यक्ति शुक्रगुजार होता . लेकिन नहीं सत्ता का इतना उपयोग तो कर ही सकते हैं कि  हम वह करें जिसमें आम आदमी लाभान्वित  हो सके . तभी उनको यहां से कुछ मिलने की उम्मीद करनी चहिए. राजकोष की बरबादी को आम आदमी भी समझता है और उसके ही पैसे को अपनी मर्जी से खर्च कर देने भर से अच्छी सरकार नहीं कहला  सकती है. 

मंगलवार, 14 मई 2013

परिवार दिवस !

                         
चित्र गूगल के साभार ( संयुक्त परिवार )

                          आज एक वाकया याद आ गया . मेरे एक आत्मीय हैं - उनके अपने ७ भाई हैं और उनके अपने अपने परिवार है . मानी  हुई बात है कि  सब अब अलग अलग रह रहे हैं . ये सबसे छोटे हैं - खुद भी अच्छी स्थिति में हैं और सारे भाई भी सम्पन्न है . विवाद हुआ कि पैतृक  मकान को लेकर इनकी इच्छा थी कि  पिताजी के नाम को रहने दिया जाय और सारे  भाई बाजार भाव पर ये मकान उन्हें दे दें ताकि वे उसमें पिता के नाम से कोई  स्वयंसेवी संस्था बना दें और पिताजी का नाम चलता रहे . लेकिन भाई को कोई नहीं दे पाया। मकान किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिया गया और पैसे बाँट लिए  . जब इस भाई की बेटी की शादी हुई तो कोई भाई शादी में शामिल तक नहीं हुआ. उन्होंने शादी के कार्ड में अपने सभी भाइयों के नाम लिखवाये थे . हाँ एक भाई ने किसी दूसरे आदमी से एक लिफाफे में कुछ रुपये रख कर भेज दिए  जिसे इनके बेटे ने वापस कर दिया कि पैसे हमारे पास भी हैं . शादी में अपने की उपस्थिति मायने रखती है . इसमें एक साथ रहने की बात छोडिये सुख और दुःख में शामिल होने का अर्थ भी  खो गया . वे भाई जो कभी एक साथ बैठ कर खाना खाते थे , खेलते थे और सोते भी थे . अब किसी के कुछ न रह गए थे. परिचितों के परिधि से भी बाहर क्योंकि विवाह समारोह में तो सभी शामिल होते है. 
           हमारे देश में परिवार संस्था का जो स्वरूप है वह देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत ही गर्व की दृष्टि से देखा जाता है . परिवार सामाजिक संगठन की एक महत्वपूर्ण इकाई है और समाज का निर्माण भी बहुत सारे परिवारों  से ही होता है . परिवार दिवस की अवधारणा  भी हमें पश्चिम से ही मिला लेकिन हम इसके मुहताज क्यों हुए ? हम तो वृहत परिवार के सदस्य होते रहे हैं और सभी उसमें एक परिवार के सदस्य होकर जीते रहे हैं और कहीं कहीं आज भी जी रहे है . विवाह और सन्तति के क्रम से ही इसका निर्माण हुआ और फिर इसी क्रम में यह आगे बढ़ता चला जा रहा है. समय के साथ इसमें परिवर्तन अवश्य ही हुआ है . कभी परिवार बड़े बाबा और बड़ी दादी से शुरू होता था और घर में एक बड़ी  सास के रहते हुए सारी बहुएँ ही रहती थी और घर के सरे निर्णय पर घर के सबसे बुजुर्ग द्वारा ही लिए जाते थे और वो सबके लिए शिरोधार्य होती थी क्योंकि आर्थिक आधार वही बड़ा माना जाता था . धीरे धीरे घर में बगावत करने वाले भी लोग होने लगे और इस आधार की नींव से ही दीवार दरकने लगी फिर एक विशाल भवन में दीवारें खड़ी  होने लगी और एक से दो परिवार बंटने  लगे. फिर भी माता -पिता के लिए उनका घर शेष था . उनके लिए अपने घर में अधिकार से रहने का जज्बा भी शेष था .
                              धीरे धीरे परिवार का आकर छोटा होने लगा क्योंकि हमारी प्रगति ने हमें और अधिक सुविधा और सुख से भरपूर जीवन जीने के लिए ऐसा करने पर मजबूर कर दिया . हमारे माता - पिता ने अपने ४ बच्चे अपने सीमित साधनों में पाले और फिर उनको सक्षम भी बनाया .  परिवार में अब उनको कोई जगह नहीं दी जा रही है . अब परिवार का मतलब है पति पत्नी और बच्चे . यानि की एकल परिवार की नींव पड़  चुकी है और यही कारण  है पारिवारिक तनावों के निरन्तर बढ़ाते जाना . उन परिवारों का भी दिन व दिन टूटते जाना . विवाह संस्था जो इस परिवार की नींव होती है , धीरे धीरे वह भी ख़त्म हो रही है . लिव इन रिलेशन ने परिवार को सबसे बड़ा झटका दिया है . बिना किसी बंधन और जिम्मेदारी के जीवन बिताना शायद आज के लोगों को ज्यादा सहज लगने लगा है.
                                  वैसे तो   रोज ही होना चाहिए क्योंकि इस जीवन को दिशा  देने वाले परिवार  के लिए हम सिर्फ एक दिन कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं ? लेकिन ये हमने अपने देश से नहीं बल्कि पश्चिमी संस्कृति से ग्रहण किया है . हम पश्चिम से क्या क्या ले चुके हैं लेकिन उसमें कितना सार्थक ले रहे हैं और कितना पूर्ण ग्रहण कर रहे हैं और कितना आंशिक ? अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार हम ग्रहण कर रहे है . हमने वहां के देखा देखी एकल परिवार की भूमिका को सहज और सरल समझ कर अपना लिया . अपनी माता पिता के प्रति जिम्मेदारी से मुक्त भी हुए और पत्नी भी खुश . फिर ये नहीं सोचा कि हमारी माता -पिता  आर्थिक रूप से आत्मनिभर है भी या नहीं . पश्चिम में तो बुजुर्गों के लिए पेंशन का प्रावधान है और वे उससे अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते हैं . वे अपने बच्चों पर आश्रित नहीं होते हैं .हमने आधे अधूरे स्वरूप को अपनी सुविधानुसार अपना लिया . 

                           वहां के लोग  अपने घर को छोड़ देते हैं तो फिर वे जिम्मेदारी उठाने वाली बात समझते ही नहीं है. उनको अपने  माता पिता से कितना लगाव होता है ? क्योंकि वे बड़े होते ही अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने लगते हैं . हम तो अपने पैरों पर खड़े होने तक माता - पिता पर आश्रित होते हैं और अपने पैरों पर खड़े होते ही खुद मुख्तार बन जाते है . फिर हमें परिवार के स्तर  अपने से कम नजर आने लगता है . विवाह सम्बन्ध भी अपने वर्तमान स्तर के अनुसार करके उस पुराने परिवार को छोड़ कर नया परिवार बसा लेते हैं .
                        अब परिवार की परिभाषा अलग तरीके से गढ़ ली गयी है ,  जिसमें प्रेम और सामंजस्य का पूर्ण अभाव मिलता है.  वैसे तो हम वसुधैव कुटुम्बकं  की बात करते हैं लेकिन अपने ही परिवार में क्या हो रहा है ? की हम भाई बहनों की बात छोडिये अपने माता -पिता तक को नहीं रख पा  रहे हैं बल्कि परिवार की परिभाषा अब पति पत्नी और बच्चों में सिमट गयी है. क्या धीरे धीरे ये भी ख़त्म हो जाएगा ? अगर हमने न सोचा तो फिर ये भी दिन आएगा  . लोग होंगे , परिवार को बढाने  के सारे  प्रयत्न होंगे  लेकिन एक बंधन जो है वो परिवार में बंधे न होंगे . 

सोमवार, 13 मई 2013

अक्षय तृतीया : कल और आज !

 


          समय के साथ इंसान की प्रवृत्तियों में  परिवर्तन आ चुका  है और इस परिवर्तन का ही प्रभाव है कि समाज में हर कोई कुछ प्राप्त करना चाहता है लेकिन देने का भाव उनमें कहीं भी नहीं है. कहाँ से और कैसे अर्जित किया जाय इसके लिए रस्ते खोजने में मनुष्य सदैव प्रयासरत  रहता  है ? अपने परिश्रम की बदौलत हासिल किये गए धन से संतुष्टि नहीं होती बल्कि अन्य तरीकों से हासिल की हुई चीज से बहुत संतुष्टि मिलती है. हम निज स्वार्थ पूर्ति के लिए हर तरीके से प्रकृति , पशु और स्वयं  मनुष्य का दोहन कर रहे है . प्रकृति के गोद में चाहे एक पौधा  न लगाया हो लेकिन अगर कहीं सड़क किनारे ग्रीन बेल्ट में फूल  लगे मिल गए तो थैले भर कर पूजा में चढ़ाये जाते है . पालतू पशुओं को कभी एक रोटी न डाली हो लेकिन उसके दूध के लिए न जाने कैसे कैसे जतन  करके उसके खून से भी दूध निकल कर बेच रहे हैं . मनुष्य अगर उससे हम काम लेते हैं तो शायद ही लोग उनको उनके वेतन के अतिरिक्त शायद ही कभी कुछ दे रहे होंगे ( मैं अपवादों की बात नहीं कर रही हूँ ). उनके परिश्रम से हम जितना काम लेते हैं उससे कुछ कम ही पैसे देते होंगे और कहीं कहीं तो उनके वेतन को महीने पूरे होने के बाद भी कुछ अधिक दिन होने पर ही दिया जाता है. 
                         हमारे अन्दर परोपकार की भावना का ह्रास हो रहा है और निजी स्वार्थ की भावना बलवती होती चली जा रही है . सिर्फ हम आत्मनिरीक्षण करके देखें तो इनमें से कुछ खूबियाँ हमारे अपने अन्दर ही मिल जायेंगी .   भावनाओं के चलते हुए हमारे ऋषि - मुनियों ने वर्ष में कुछ ऐसे दिन रखे हैं जिनमें हम अपने संचित से कुछ दान कर पुण्य कमाते हैं . वैसे तो जरूरतमदों की सहायता करने के लिए किसी भी तिथि या पर्व की जरूरत नहीं होती है , निस्वार्थ भाव से किया गया दान और उस दान के सुपात्र का होना सबसे बड़ा पुण्य है. 
ऐसे ही पर्वों में वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया  को अक्षय तृतीया  कहा गया है और इस दिन दान , जप - तप , हवन और तीर्थ स्थानों पर जाने का अक्षय फल देने वाला पर्व कहा गया है . 
                    ग्रीष्म ऋतु  में पड़ने वाले इस पर्व पर दान का विशेष  महत्व है लेकिन इस पर्व पर शास्त्रों में वे वस्तुएं दान योग्य बताई गयीं है जिनसे मनुष्य पशु पक्षी गरमी से प्रकोप से बच सकें . इस दिन धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग सड़क के किनारे पानी के लिए प्याऊ लगवाते हैं . पक्षियों के लिए पेड़ की डाल पर मिटटी के बर्तनों में पानी भर कर टांग दिया जाता है . ग्रीष्म ऋतु  में सर्वप्रथम आवश्यकता पानी और उसके बाद सत्तू को महत्व दिया गया है. इस तृतीया से ठीक पहले अमावस्या को सत्तू का सेवन आवश्यक माना  गया है (उनके लिए जो इस बात को मानते हों ) वैसे  बच्चे आज कल पिज़्ज़ा , बर्गर , चाउमीन को ही जानते हैं . ये देशी फ़ास्ट फ़ूड है जो सदियों से चलता चला आ रहा है . इस दिन सत्तू के दान का भी बहुत महत्व है क्योंकि सत्तू की स्वभाव ठंडा होता  है और इसको पानी शक्कर या गुड के साथ घोल कर खाने से भूख के साथ गर्मी भी शांत होती है. 
इसके अतिरिक्त छाता , चप्पल , सुराही आदि गर्मी से बचाने  वाले जितने भी साधन होते हैं विशेष रूप से दान करने का विशेष पुण्य मिलता है और पुण्य न भी मिले एक मानव होते के नाते इस भीषण गर्मी में नंगे पैर धूप  में चलने वाले को चप्पल या छाता  मिल जाए तो उसकी जान को तो एक राहत  मिलेगी और यही राहत किसी गरीब की आत्मा से निकले हुए भाव, उस दानकर्ता की मानवता को एक प्रणाम है .
                          इस अक्षय तृतीया का महत्व इसी  रूप में जाना जाता है कि इस दिन किया गया दान , जप - ताप सभी अक्षय होता है और इससे प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता  है लेकिन समय के साथ और मानव की बढती हुई लालसा ने इसके स्वरूप को समय के अनुसार बदल लिया और आज चाहे इसे हम मार्केटिंग का एक तरीका कहें कि बड़े बड़े विज्ञापनों द्वारा जन सामान्य को इस दिन सोने की खरीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस दिन विशेष छूट और लाभ का लालच देकर स्वयं के लिए संग्रह करने की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहन  दिया जाने लगा है और भाव अभी वही है कि  जो इस दिन जिस वास्तु का क्रय करेगा वह भी उसके लिए अक्षय बनी रहेगी .सोना खरीदो तो वह सदैव अक्षय रहेगा लेकिन अब ये औरों के लिए नहीं बल्कि अपनी जरूरत और अपनी संपत्ति को अक्षय रखने के लिए लिया जाता है. अपनी संपत्ति या स्वर्ण आभूषणों को अक्षय अवश्य रखिये लेकिन उस धन से कुछ प्रतिशत दान के लिए भी रखा जाय तो इसका अर्थ और भाव सार्थक होता नजर आयेगा . लेकिन इस पर्व का भाव और अर्थ कल और आज बदले है लेकिन वह व्यक्ति की बढाती हुई आर्थिक उपलब्धियों के अनुसार - एक सामान्य व्यक्ति आपको दान करता मिल जाएगा लेकिन एक संपन्न व्यक्ति बड़ी बड़ी कारों में ज्वेलर्स के यहाँ आभूषण खरीदते हुए मिल जाएंगे .

सोमवार, 6 मई 2013

मुलाकात - सुधा भार्गव जी से!

सुधा भार्गव 
                         एक ऐसी मुलाकात जो अविस्मरणीय ही कहूँगी . सुधा जी से पहले से ही परिचित हूँ उनकी लघु कथाओं के सहारे जो मुझे बहुत ही अच्छी लगती हैं . उन्होंने मुझे पहले ही लिखा था कि  वे कानपूर आती रहती हैं और जब भी आएँगी तो मुझसे मुलाकात करना चाहेंगी .
                          इस बार के कानपूर प्रवास में उन्होंने आते ही मुझे मेल की कि वे कानपूर आ गयी हैं और मिलना चाहती हैं . फिर उनके घर की लोकेशन और बेटी और दामाद के बारे में बताया तो पता चला कि  मेरे पतिदेव उनकी बेटी और दामाद से परिचित हैं फिर क्या था ?  मुझे भी जाने में कोई संकोच नहीं हुआ . 
                           हम ऐसे मिले जैसे कि पहली बार नहीं बहुत बार मिल चुके हों . उनकी आत्मीयता और सब कुछ बाँट लेने की हसरत ने हम दोनों को जितने समय मौका मिला .हम अपनी अपनी बातें शेयर करते  रहे .
उनका कानपुर  प्रवास में कानपुर  के और ब्लॉगर और लिखने वालों से मिलने की बात से लगा की वे कितनी मिलनसार है  . वैसे तो मैं सबसे चुपचाप मिल लेती हूँ और  खुद में  में ही शेयर कर लेती हूँ लेकिन कुछ ऐसा मिला उनसे कि  मन हुआ सबसे इसको शेयर करूं . वैसे मैं मुलाकात को अपना व्यक्तिगत मामला मानती हूँ  इसी लिए मैं कोई कैमरा लेकर नहीं गयी थी कि  अपने उन क्षणों  को कैद करके सब लोगों के साथ बाँट सकती लेकिन वो पल मेरे मन में संचित हैं और फिर अपनी  मुलाकात इसी प्रवास में फिर से  करने वाली हूँ और वह भी अपने और ब्लॉगर साथियों के साथ . 
                           सुधा जी ने मुझे अपनी ४ किताबें भी भेंट की - जो उनकी लेखनी और भावों से परिचित करने के लिए पर्याप्त हैं .उनके काव्य संग्रह "रोशनी की तलाश में "  ने मुझे उनकी काव्य विधा से परिचित कराया . जिसमें उनकी कलम ने अगर गीत लिखे तो अंतस के भावों को जीवन के हर पहलू को दिखाने वाले हैं . लेकिन सिर्फ एक पक्ष नहीं बल्कि इस संग्रह में उन्होंने कई खण्डों में कविता को इस तरह से विभाजित किया कि  अगर प्रेम और दायित्वों में उलझी हुई नारी लिख रही है तो फिर समाज से जुड़े देश से जुड़े समसामयिक विषयों पर भी उनकी कलम बेबाक चली है. मुझे इस समय उनकी ये पंक्तियाँ बहुत समसामयिक लग रही हैं जब की ये पंक्तियाँ उन्होंने वर्षों पहले लिखी थी .
                   किसी की जिन्दगी पर दागी गोली चली , 
                   मेरे सीने में नजर आती है 
                   किसी की  आँख से ढुलके आंसू , 
                    बाढ़ मेरे घर में आती है. 
            
                  नारी मन के हर पक्ष को भी इसमें प्रस्तुत किया , उसके जीवन के विभिन्न पक्ष इस तरह रखे कि संवेदनशील कवि  हृदय सब कुछ कह देना चाह रहा हो. 

                           मैं सपने देखती हूँ 
                           दिखाती हूँ 
                            पर बेचा नहीं करती . 

         और 

                               आशा की दीपशिखा 
                                हाथ में प्रज्ज्वलित किये 
                                पूर्णता की धुन में 
                                आगे बढती रही .

                               पत्थर से पाँव छिले 
                               काँटों से घाव रिसे 
                                शून्य को ताकती  
                                आगे बढती रही . 

   और फिर भारतीय नारी को व्यंग्य में इस तरह से परिभाषित  कर गयीं .

                                भारतीय नारी 
                                 लौह सदृश्य भूमिका में थी 
                                लहू से लथपथ 
                                पति-पथ गामिनी . 

                    मैं उस पुस्तक की विवेचना नहीं कर रही लेकिन जब उसको पढ़ा तो उसमें इतना सारा था कि  हर पंक्ति को उद्धृत करने का मन करने लगा . लेकिन इतनी हिम्मत तो नहीं है कि  उसे पूरा का पूरा उठा कर रख सकूँ लेकिन उस कलम के प्रति नमित हूँ .तीन पुस्तकें उनकी बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानीयों की हैं सो मेरे पड़ोस में रहने वाले बच्चों ने मेरे आते ही कब्ज़ा कर लिया - 'दादू पहले हम पढेंगे ' .

 वे मुझसे बहुत बड़ी हैं लेकिन उनके स्नेह और अपनत्व को देख कर लगता है कि  हम पता नहीं कब से एक दूसरे को जानते हैं .

गुरुवार, 2 मई 2013

विश्व जल संकट !

                       


पानी चाहिए और एक नल 
                पानी मानव जीवन की सबसे बड़ी  जरूरत है जिसे वह प्रकृति से लेने के लिए बाध्य है किन्तु अब शायद वह अपने को इतना समर्थ समझने लगा है कि विशेषज्ञों की चेतावनी , प्रकृति के संकेत के बाद भी भू जल दोहन से बाज नहीं आता है. वह तो हमें धरती के गर्भ से मिलेगा ही लेकिन उसको प्रदूषित करने में हम जो भूमिका निभा रहे हैं कि  गंगा , यमुना , गोमती किसी भी बड़ी नदी को देख लें - क्या उनका पानी पीने की बात तो दूर नहाने के काबिल तक बचा है . इसके जिम्मेदार हम ही हैं - बगलें झांक कर हम अगर कहना  चाहें कि ये  तो उनका काम है , जिनके पास रहने को घर नहीं और जो अपने काम इन स्रोतों से ही चलाते हैं . हम तो नदी में कपडे धोने नहीं जाते , हम तो नहरों में नहाने नहीं जाते फिर हम क्यों ? 
                      वैसे भी समरथ  को नहि दोष गुसाईं  - दोष तो उनका है जो सड़क पर लगे नालों पर अपनी अपनी बाल्टियों और डिब्बों की क़तार लगा कर घंटों खड़े रहते हैं और तब उनको पानी नसीब होता है. हम घरों में बैठ कर सबमर्सिबल लगा कर तेज धार पानी को यूं ही चला देते हैं और ऊपर रखी टंकी भरने के बाद भी वह कितनी देर तक बहता रहता है क्योंकि हम उसको चला कर भूल जाते है . वह पानी नालियों में चला जाता है . हमारे कूलर कितना पानी पी जाते हैं क्योंकि हमें कुछ तो ठंडक में रहने का हक है.  
                      अब जब कि  धरती के अन्दर का पानी भी बड़ी बड़ी फैक्ट्री और टेनरियों से निकले रासायनिक पदार्थों के समाने  से प्रदूषित हो चुका  है . जब इनके चलते गंगा भी एक गन्दा  नाला बन कर रह गयी है. हमें पीने के लायक पानी कहाँ से मिलेगा ? इसी पानी के पीने से , नहाने से कितने संक्रमण और चर्म रोगों से लोग ग्रसित हो रहे हैं क्योंकि उनके पास पानी प्राप्त करने के साधन सीमित और यही बचे है . 
                        हम घर में वाटर प्यूरीफायर लगा चुके हैं क्योंकि हमें प्रदूषित पानी पीने से कोई बीमारी न हो जाए क्योंकि अधिकतर संक्रमण दूषित पानी के कारण  ही होते है . लेकिन हम कभी इस विषय में नहीं सोच पाए कि  एक लीटर आर ओ से निकले हुए पानी से तीन लीटर प्रदूषित पानी नाली में बह जाता है . वैसे तो मैंने भी इस तरफ काफी दिन तक ध्यान नहीं दिया लेकिन पिछले दिनों  से मैं उस पानी को नापने की सोची और उस ट्यूब को एक बाल्टी में डाल  दिया तब पता चला कि  उससे एक लीटर पानी लेने पर तीन लीटर पानी बह जाता है . मेरे अनुमान से करीब पचास प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरीके से इसको प्रयोग कर रही है तो हम कितना पानी बहा भी रहे हैं और कुछ लोग गन्दा बदबूदार पीने के लिए मजबूर है . 
                        फिर क्या सोचा आपने  इस पानी की बर्बादी को रोकने के लिए - वही मेरी तरह से उस पानी को एक बाल्टी में संचित कर लीजिये और अगर अपने गमले रखे हुए हैं तो उसमें डालने के लिए सीधे नल का पानी न डाल  कर इस पानी को डाल  कर उसका सदुपयोग कर सकते है . उससे घर की धुलाई के लिए प्रयोग कर सकते हैं . लेकिन उस पानी को यूँ ही नाली में मत बहने दीजिए . ये अवश्य है कि  इसके लिए आपको कुछ तो प्रयास करने होंगे . कहाँ कहाँ हम पानी को बहाने से रोक सकते हैं इस पर ध्यान देना जरूरी है क्योंकि अगर कभी हम ऐसे हालत में फँस जाते हैं तो हमें अपने घर के इस बहते हुए पानी की बहुत याद आती है .
                        हालत पर गौर कीजिये और फिर सोचिए कि अगर एक इंसान इस पर ध्यान दे और इसके प्रति जागरूक हो तो फिर कितने  लीटर पानी का सदुपयोग हो सकता है. कृपया ध्यान दें और भविष्य में आने वाले जल संकट से विश्व को बचाने में अपना सहयोग करें . .

बुधवार, 1 मई 2013

आज मजदूर दिवस है!





आज मजदूर दिवस है और मजदूर अपने दिवस को कैसे मना रहे हैं ? सरकारी मजदूरों की बात नहीं करेंगे , बड़े बड़े कारखानों के मजदूरों की भी बात नहीं होगी क्योंकि वे वहां के कर्मचारी के रूप में जाने जाते है . वास्तव में मजदूर वे हैं जो इस समय खेतों में फसल काट रहे हैं और वे हैं जो सड़क निर्माण में लगे हैं . जिन्हें एक कतरा  छाँव का नसीब नहीं है .
                           मेरे घर के सामने सड़क और नालियों का निर्माण हो रहा है , जहाँ पर चालीस डिग्री तापमान में बेचारे मजदूर आज भी काम करने आये हैं . काम करवाने वाला ठेकेदार परिचित होने के नाते घर में आकर चाय और ठंडा पानी पीकर छाँव में बैठे रहते हैं और वे अपने काम में लगे रहते हैं . ईमानदारी से कहूं मैं उन लोगों के लिए ठन्डे पानी की बोतल अतिरिक्त लगा कर रखती हूँ और जब वे खाना खाने के लिए जाते हैं तो हमसे पानी ले लेते हैं सिर्फ इतना ही तो कर सकती हूँ उनके हिस्से का काम तो नहीं कर सकती .
                          आज भी शर्मा जी सुबह आ गये क्योंकि निर्माण सामग्री भी उन्होंने सुरक्षा की दृष्टि से मेरे घर में रखवा  दी है . चाय पीते हुए शर्मा जी से मैंने सवाल किया - क्या आज आप मजदूरों को छुट्टी नहीं दे सके ? '
'काहे की छुट्टी  भाभी ?'
'आज श्रमिक दिवस है , एक दिन उन्हें भी छुट्टी का अधिकार होना चाहिए .'
'छुट्टी कर लेंगे तो खायेंगे क्या? '
'आज उन्हें सवेतन छुट्टी दे दीजिये .'
'क्यों मजाक करती हैं , हम तो बरबाद हो जायेंगे . आप कहेंगी कि  काम पूरा नहीं हो रहा है . फिर वे हमारे स्थायी मजदूर तो हैं नहीं  , हम तो रोज बाजार से जाकर ले आते हैं .'
' एक दिन में कितना काम रुक जाएगा ?'
'ये सब व्यवहार में नहीं होता - ये कलम की बातें है . बतलाइये आज कौन सी फैक्ट्री बंद रहती है . सरकारी की बात नहीं कहूँगा .'
'मतलब ये मजदूर दिवस कागजी है , इसमें मजदूरों का कुछ लेना देना  नहीं है .' 
                    रुकिए मैं अभी काम देखकर आता हूँ , कहते हुए शर्मा जी वहां से जान छुड़ा कर भागे लेकिन अपने पीछे कितने सारे  प्रश्न छोड़ गए . ये सिर्फ एक शर्मा जी से जुड़े नहीं हैं बल्कि खुद हम सब से जुड़े हैं . 
छोटे स्तर  पर काम करने वाले ढेरों लोग हैं , जिन्हें एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती है. कुछ पैसे उन्हें जरूरत पर दे कर हम उनका शोषण करने से पीछे नहीं हटते हैं . कभी हम एक दिन की छुट्टी देकर उन्हें ये अहसास करवा सकते हैं कि वे भी इंसान हैं और उनसे काम लेने वाले भी सिर्फ व्यापारी नहीं बल्कि इंसान ही है . एक दिन की छुट्टी जो उन्हें बिना किसी बीमारी , घर के काम या फिर मजबूरी के बदले न लेनी पड़े बल्कि हम उन्हें खुद दे सके . आज के दिन अपने घर में काम करने वालों को छुट्टी देकर देखिये कितनी तसल्ली मिलती है और उनके चेहरे पर कितने  सुकून के भाव नजर आते है .  बस एक ही दिन की तो बात है.