रविवार, 15 जून 2014

पितृ दिवस !

                            आज के दिन सब लोग पितृ दिवस के रूप में अपने अपने पिताओं को याद कर रहे हैं और वे भाग्यशाली पिता हैं जिनके बच्चे उन्हें श्रद्धा और सम्मान से याद करते हैं और आज का दिन उनके लिए यादगार  बना देते हैं।  
                            वैसे मौका तो नहीं है लेकिन हम सिक्के का दूसरा पहलू भी देखते चलें या फिर हो सकता है कि पढने वालों में कितनों के लिए ये आइना ही हो।  ये तो नहीं कह सकती कि  इसके पढने के बाद  कोई बदल सकता  हो अपने आपको।  कानपूर अपने बुजुर्गों  प्रताड़ित करने वाले लोगों को पालने वाला भारत का दूसरा शहर है , बताते चलें कि मदुरै का स्थान पहला है।  
                         एक बार का वाकया याद कर रही हूँ।   मेरे बहुत करीबी रिश्तेदार हैं , जीवन में बहुत ईमानदारी से नौकरी की और अपनी मेहनत से सब कुछ अर्जित किया बच्चों को पॉश एरिया में में रहने के लिए एक तीन मंजिला मकान  बनवाया।  गाड़ी खरीदी और सारी  सुख सुविधाएँ उनके लिए जुटाई।  वो सब कुछ दिया जो संभव था लेकिन खुद सदैव सीधी सादी जिंदगी जी।   उनकी जिंदगी को मैंने उस समय से जाना जब वे एक कमरे के मकान  में रहते थे।   सुख सुविधा देने के बाद वे निश्चिन्त हो गए कि अब बच्चे सब कुछ चला ही लेंगे।  लेकिन पैसे की चकाचौंध ने बेटों को अँधा बना दिया और माँ की शह ने उन्हें बर्बाद कर दिया। 
कोई भी दुर्व्यसन से वे अधूरे न रहे और फिर शुरू हुआ बरबादी का दौर -  पिता ने रिटायर होने पर सारा पैसा अपने और बेटे के नाम जमा कर दिया। 
                          एक बेटा असमय नशेबाजी के चलते गुजर गया और दूसरा उनको आत्महत्या की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगा।  सब कुछ बिक गया।  इतना उधार ले कर उड़ाया कि लोग तगादे के लिए दरवाजे खटखटाने लगे।  पिता मुंह नहीं दिखा पाते।  
                            एक दिन मैं उनके घर में बैठी थी और बेटा पता नहीं किस लिए बेचने के लिए माँ से गले  की जंजीर मांग रहा था।  पिता ने सुना तो वह अंदर आये और बेटे को डांटने लगे और नशे में धुत बेटे ने एक तलवार लेकर अपनी माँ के ऊपर रख दी कि मुझे डांटा कैसे ? कान पकड़ कर उठक बैठक लगाओ नहीं तो किसी की गर्दन काट दूंगा।  मैंने ऐसा अपनी जिंदगी  देखा ही नहीं था और वो रिश्ते में मेरे जेठ होते थे।  एक व्यक्तित्व  के तौर पर वे अनुकरणीय थे मेरे लिए।  उन्होंने मजबूर होकर उठक बैठक लगायी  और मुझसे ये सहन नहीं हुआ और  मैं वहां से रोती हुई तुरंत चली आई लेकिन एक बार यही कहूँगी की ऐसे बेटों से बेऔलाद होना ज्यादा अच्छा होगा।  

सोमवार, 9 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (18)

                 कोई कोई वाकया और कभी कभी तो यादगार पल कितना याद आते हैं ? अब भले  मूर्खता पर हंस लें लेकिन उस समय माँ की कही बात वेदवाक्य होती थी। ऐसे लोभ देकर काम भी करवा लिए जाते थे और हम करते रहते थे।  वो भूले हुए पल माँ से जुड़ कर और भावुक कर जाते हैं।  अपनी एक याद के  साथ हैं : प्रतिभा सक्सेना !


                                          



सौ का नोट !

                     तब मैं बहुत छोटी थी।   बात 1947 से और द्वितीय विश्व युद्ध  से भी पहले की है , जब ४० - ५० रुपये की आय में  ३ -४ बच्चों वाली गृहस्थी आराम से चल जाया करती  थी.  दो रुपये में एक सेर घी मिलता था ,  जीवन बहुत सीधा सादा  था तब।
                      घर पर हमें माँ ही पढ़ाती थी।  उस ज़माने में हमारी माँ हाई स्कूल पास थी।  प्रायः ही रसोई में बिठा लेती और अपने काम करते करते हमारा काम देखती जाती। हमारा दिमाग इधर उधर भागा कि  फौरन चपत रसीद।  अंग्रेजी के मीनिंग तो याद  हो जाते ,  हिंदी   अपनी भाषा लिखना , पढ़ना, याद करना कभी मुश्किल नहीं लगा , पर गणित के सवालों से बड़ी घबड़ाहट  लगती   थी।
                      ' मन लगाकर करोगे तो कुछ भी कठिन नहीं लगेगा। ' उनका ये कहना था की जितने सवाल ठीक आएंगे हर सवाल पर पैसा मिलेगा। हिसाब खुद रखना पड़ता था - बाकायदा कॉपी पर लिख कर और कुछ पैसे इकट्ठे हो जाते  तो उधार कर देती कहती - 'मेरे संदूक में सौ रुपये का नोट है तुड़ाऊँगी तो दूँगी .' 
                         उस सौ के नोट ने हमें ऐसा लुभा रखा था कि  हम अपने मन को समेट  कर पाठ पूरा करने में पूरा ध्यान लगा देते।  उनके संदूक  खोलने पर हम  मंडराते रहते कि सौ का नोट निकले शायद ? इतनी छोटी रकम के लिए इत्ता बड़ा नोट चढ़ाएं , कुछ और इकठ्ठा हो जाने दो पहले  ……….  इतना भारी  नोट निकालना ठीक नहीं , बंद करके रखना पड़ता है चलते फिरते कोई देख ले तो ? 
                         मुझसे दो साल छोटा भाई विष्णु और मैं कितने पैसे हो गए जोड़ कर ही मगन रहते थे।  कभी कभार खुश होने पर कुछ पैसे पकड़ा भी देती थीं।  जिनसे हम लेमनचूस ( तब यही कहते थे ) और बर्फ के गोले  खा लेते ,  लेकिन हाँ ठीक ठीक पूरा हिसाब  रखना जरूरी था। 
                         हमारी पुरानी कापियां , किताबें उनहोने कभी नहीं  बेचीं , हम अच्छे तरह से पास हुए तो कीमत वसूल हो गयी।  (मैथ्स में अंत तक मेरे बढ़िया नंबर आते रहे ) अब यही किताबें किसी गरीब बच्चे के काम आएं।  वह हिसाब की कॉपी  इधर उधर होगयी और कितने पैसे इकट्ठे  यह भी भूल भाल गए। 
                        आज के बच्चे इतने मूर्ख  न ऐसे बहुमूल्य नोट संदूकों में  धरे जाते हैं।  अपनी आँखों से देखा नहीं कभी , पर माँ की उस मोहमयी मुद्रा और सौ  के नोट की याद कभी कभी बहुत आती है।  





रविवार, 8 जून 2014

क्या आपका दान सार्थक है ?



                   हमने अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से दान देना एक श्रेष्ठ कार्य बतलाया गया है और  किसी न किसी रूप में विभिन्न अवसरों पर दान देते हैं।  भिक्षा भी इसी का एक रूप माना गया हैऔर हम अपने तर्कों  आधार पर भिक्षा के लिए पत्र वृद्ध , अपाहिज , अक्षम , अंधों को मान लेते हैं और जो किसी न किसी तरह से असहाय हों उन्हें को देने से मन को संतुष्टि मिलती है।  आज एक कहानी पढ़ कर आखें खुली की खुली रह गयीं।                         
                               नेत्रहीन से भीख मंगवाकर बनी करोड़पति


जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। भीख में एक दिन में छह हजार रुपये की कमाई भले ही अविश्वसनीय लगे, किंतु एक नेत्रहीन युवक की यंत्रणा भरी दास्तां सुनकर कोई भी चौंक पड़ता है। इतना ही नहीं, अस्सी साल की वृद्धा ने उसे भीख मांगने के एक से बढ़कर एक गुर सिखाए और खुद करोड़ों की मालकिन बन बैठी। भीख की कमाई से वृद्धा ने अपनी बेटियों के लिए कानपुर में तीन आलीशान मकान भी बनवा रखे हैं, जबकि खुद यहां एक झोपड़ी में रहती है। इस वृद्धा के जुल्म-सितम सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
यह दास्तां सीतापुर के 18 वर्षीय नेत्रहीन व अपाहिज रमेश की है, जो पिछले चार वर्षो से 80 वर्षीय कमला नामक वृद्धा के चंगुल में फंसकर भीख मांगने का काम कर रहा था। रमेश की बातों पर यकीन करें तो उसे प्रतिदिन छह हजार रुपये का टारगेट दिया जाता था। इससे कम रकम लाने पर बदले में उसे मिलती थी नमक की एक सूखी रोटी। भीख मांगने में ना-नुकुर करने पर तेज आवाज में गाने बजाकर वृद्धा अपने नातियों से उसकी पिटाई कराती थी। रमेश के अनुसार, उसे बाकायदा भीख मांगने गुर भी बताए जाते थे।
नेत्रहीन रमेश सीतापुर में अपनी मां शर्मिता और भाई कमलेश व प्रकाश के साथ रहता था। वर्ष 2010 में सीतापुर में रहने वाले तीन पड़ोसी राम अवतार, विपिन और टिंकू नौकरी लगवाने के बहाने से उसे लेकर आ गए थे। तीनों ने उसे लाकर नया गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया था। वहीं, रेलवे स्टेशन के पास झुग्गी में रहने वाली वृद्धा कमला की उस पर नजर पड़ी और आश्रय दिया। बाद में रमेश से भीख मंगवाने का धंधा शुरू कर दिया।
रमेश के अपहरण का मुकदमा सीतापुर में दर्ज हैं।
 

रमेश अपनी माँ के साथ
                            
                                           
 
                    भीख मंगवाने वाले गिरोहों की  कमी नहीं है।  बच्चों को अगवा , नौकरी का लालच लेकर , किसी और तरीके लालच में बरगला कर लाने वालों की कमी  नहीं है।  ये गिरोह  न सिर्फ बच्चों को ट्रैंड करते हैं बल्कि इनके चारों तरफ रह कर निगाह भी रखते हैं।  मजदूरों की तरह से शाम को उनकी कमाई की गिनती होती है और सुबह उनहन टारगेटदिया जाता है कि दिन में इतने पैसे उनको भीख से कमा कर लाना होगा।  कम होने पर उनको भूखा रखना , मार पीट कर यंत्रणा देना आम बात होती है।  इस अंधे बच्चे को १८ घंटे तक भीख मांगनी होती थी जिसमें दिन और रात का कोई बंधन नहीं।  उसे रात ३ बजे  से स्टेशान पर बैठा दिया जाता था क्योंकि उस समय न बाजार न मंदिर कहीं भी आवाजाही नहीं होती है. स्टेशन पूरी रात गुलजार रहता है।  फिर सुबह के ९ बजे मंदिर के सामने बैठ कर भीख मांगनी पड़ती थी और फिर शाम से रात १० बजे तक स्टेशन गेट पर।  ये उसके ड्यूटी ऑवर होते थे।  शायद एक  रात दिन काम करने वाला अफसर भी ६ हजार रुपये प्रतिदिन नहीं कम पता होगा , जब कि इन भिखारियों का टारगेट ६ हजार रुपये प्रतिदिन रहता है और वे उसको हासिल भी कर लेते हैं।  बाकि धार्मिक पर्वों जैसे रमजान के माह , नवरात्रि आदि में तो यह कमाई दस हजार रुपये से ऊपर निकल जाती है . ये उनका सफेद धन है और हमारी खून पसीने की कमाई है जिसे हम किसी असहाय पर तरस खाकर देते हैं।   
                     देश के नौनिहालों के साथ होने वाला ये धंधा सुनकर क्या हमें आश्चर्य में नहीं  डाल देता है ?  क्या इन बच्चों के सहारे कार्यवाही करके ऐसे  गिरोहों का पर्दाफाश नहीं होना चाहिए?  इन पर हाथ डालना आसान नहीं होता लेकिन इन  गुप्त दृष्टि से नजर रखते हुए पकड़ा जा सकता है।  कितने घरों के बच्चे इनमें फंसे होंगे और माता पिता अपने बच्चे को खो कर बेहाल होंगे। अगर हम लोग इस दिशा में कुछ कर सकें और इसकी सूचना पुलिस को दी सके तो मानवता की दृष्टि से एक बहुत महान काम होगा।

गुरुवार, 5 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (17)


              माँ को हम सबसे अधिक ज्ञानी , अनुभवी और प्यार देने वाली समझते हैं और ऐसा होता भी है लेकिन कई बार ऐसी बातें होती हैं जिनके बारे में  हम जानते है और न उसकी जरूरत समझते हैं।  फिर अचानक कुछ ऐसा पता चले तो सहसा उसके लिए विश्वास नहीं कर पाते  हैं और वास्तविकता जानने के बाद भी विश्वास नहीं होता।  ऐसे  ही अपने विश्वास को चुनौती देते हुए सबसे सवाल कर रहे हैं : रवीन्द्र प्रभात जी।  







मेरी माँ, अनपढ़ कैसे हो सकती है.....?
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मेरी माँ !

जी हाँ  मेरी माँ अनपढ़ है । यह जानने में मुझे मेरा बचपन गुजर गया। सच कहूँ तो मुझे मेरी माँ ने कभी आभास ही नहीं होने दिया कि वह अनपढ़ है। जब मैं बाल्यावस्था में था और गोधुलि के समय खेलकर जैसे ही घर आता, एक सख्त आवाज़ कान में आती । इतनी देर तक खेलोगे तो पढ़ोगे कब? ऑफिस से आने दो तुम्हारे बाबूजी को कहकर ऐसी डांट खिलाउंगी कि खेलना ही भूल जाओगे।

फिर मैं मिन्नतें करता कि बाबूजी से मत कहना, कल से लेट नहीं करूंगा। इतना सुनते  ही वह मन ही मन मुसकुराती और कहती ठीक है जल्दी से हाथ-मुंह धो लो और बैठ जाओ पढ़ने। जो न समझ में आए पूछ लेना। फिर कहती आज मास्टर साब ने कुछ होम वर्क दिया है तो पहले उसे कर लो तब तक तुम्हारे बाबूजी आ जाएँगे तो उनसे गणित हल करा लेना। इतना कहकर वह रसोई में चली जाती और वहीं से पूछती कि अभी क्या कर रहे हो। मैं कहता फार्मूले याद कर रहा हूँ। तो वह रसोई से ही चिल्लाकर कहती कि ज़ोर-ज़ोर से पढ़ो ताकि गलत पढ़ने पर मैं टोक सकूँ।

हालांकि ऐसी नौबत कभी नही आयी कि माँ को टोकना पड़े। कभी मुझे हिन्दी के तो कभी अँग्रेजी के अखवार थमा देती और कहती कि इसका मेन-मेन न्यूज पढ़ो। मैं जैसे ही पढ़ना शुरू करता मेरी बड़ी बहन यानि शैल दीदी को हिदायत देकर किसी न किसी काम में उलझ जाती कि यह जितनी बार गलत उच्चारण करे मुझे बताना। इसको ऐसी सजा दूँगी कि जीवन भर याद रखेगा।

सुबह में नियमित रूप से 4 बजे जगा देती और कहती यह ब्रह्म बेला है, इस समय जो भी याद करोगे जीवन में कभी नही भूलोगे। मेरी माँ को रामचरित मानस की कतिपय चौपाइयाँ सहित पंचतंत्र की असीम कहानियाँ कंठस्थ है। उनके इस ईश्वरप्रदत याददाश्त के कारण ही हम सभी भाई-बहनों का यह भ्रम हमेशा बना रहता था कि माँ बहुत पढ़ी लिखी हैं, उनके सामने कभी गलत उच्चारण नही करना। नहीं तो बहुत मार पड़ेगी।

           मैं हाई स्कूल कर गया और नही जान पाया कि मेरी माँ अनपढ़ है और जब जाना तो कई दिनों तक यह विश्वास हुआ ही नहीं कि मेरी माँ सचमुच अनपढ़ है?

बात उन दिनों की है जब हम सपरिवार सीतामढ़ी के रमनगरा लॉज में एक किराए के मकान में रहते थे। बाबूजी ने शहर के ही इंदिरा नगर में एक प्लॉट खरीद रखा था और दो कमरे बनवा रखे थे। किन्तु जगह रहने लायक न होने के कारण वे परिवार को वहाँ शिफ्ट करने के पक्ष में नही थे। मैं हाई स्कूल करने के बाद वहाँ अकेले रहने की इच्छा जताई। बाबूजी राजी हो गए इस शर्त पर कि सुबह-शाम खाने के समय तुम परिवार के साथ गुज़रोगे बाकी समय वहाँ रहकर पढ़ाई कर सकते हो। मैं तैयार हो गया।
  
          एक बार की बात है कि मैं रात के करीब नौ बजे घर से खाना खाकर निकाला और रास्ते में लखनदेई पुल पर अचानक मेरा पैर फिसल गया और मैं पुल से लगभग बीस फीट नीचे बड़े-बड़े नुकीले पत्थरों पर जा गिरा। फिर मुझे कुछ याद नही, आंखे खुली तो सदर अस्पताल के जनरल वार्ड में अपने आपको पाया। सामने बैठे परिवार के लोगों की आंखे नाम थी। मेरा दाहिना घुटने में फैक्चर हो गया था और पूरा शरीर जख्मी। खैर तीन-चार दिनों के बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई और घर आ गया। घर पर इलाज के दौरान डॉक्टर ने माँ को समझाया कि कब-कब कौन सी दवा देनी है और वह अपना सिर हिलाती रही। डॉक्टर ने यह भी कहा कि सब कुछ इस पर्चे में लिखा है, न समझ में आए तो पढ़कर समझ लीजिएगा।

               बाबू जी ऑफिस चले गए, दीदी स्कूल चली गई हमेशा की तरह माँ सारा काम छोडकर मेरी सेवा में लग गयी। अचानक मेरे घुटने का दर्द बढ़ गया और मैं दर्द से कराहने लगा। मेरी सेवा में इतना मशगूल थी कि दर्द में कौन सी दवा देनी है वह अचानक भूल गई। उसे कुछ भी समझ में नहीं आया तो वह मेरी ओर पर्चा बढ़ाते हुये पूछी कि देखकर बताओ कि इस समय तुम्हें कौन से दवा लेनी है। दर्द ज्यादा होने के कारण मैंने झल्लाकर कहा कि तुम खुद पढ़कर क्यों नही देख लेती कि मुझे कौन सी दवा लेनी है?
इतना सुनते ही वह फफक-फफक कर रोने लगी। उसे रोते देख मुझसे रहा नही गया और मैंने जब रोने का कारण जानना चाहा तो सुनकर हतप्रभ रह गया कि मेरी माँ को पढ़ना-लिखना नहीं आता।
        खैर उस दिन के बाद से आज तक मुझे विश्वास नही हुआ कि अपने चार बच्चों को उत्कृष्ट तालीम देने वाली मेरी माँ अनपढ़ कैसे हो सकती है?    
       हमारे जीवन की सभी संभावनाओं के मूल में असीम प्यार, त्याग, महान सेवाएं देने वाली मेरी माँ अनपढ़ कैसे हो सकती है?

        यदि आपके पास इस प्रश्न का उत्तर हो तो बताएं, क्योंकि यह प्रश्न मेरे जेहन में आज भी अनुत्तरित है।

मंगलवार, 3 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (16)





                क्या स्मृतियों में सजी बसी माँ को ऐसे ही कवि कविता में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।  ये ही स्मृति शेष कही जाती हैं।  आज इस विषय में क्या कहा जाय स्वयं संजीव वर्मा "सलिल " जीने सब कुछ कह दिया है।  


Sanjiv Verma 'salil'


स्मृति-गीत माँ के प्रति: संजीव * 
अक्षरों ने तुम्हें ही किया है नमन 
शब्द ममता का करते रहे आचमन
 वाक्य वात्सल्य पाकर मुखर हो उठे-
 हर अनुच्छेद स्नेहिल हुआ अंजुमन

 गीत के बंद में छंद लोरी मृदुल 
और मुखड़ा तुम्हारा ही आँचल धवल
 हर अलंकार माथे की बिंदी हुआ-
 रस भजन-भाव जैसे लिए चिर नवल 

 ले अधर से हँसी मुक्त मुक्तक हँसा
 मौन दोहा हृदय-स्मृति ले बसा
 गीत की प्रीत पावन धरोहर हुई-
 मुक्तिका ने विमोहा भुजा में गसा 

लय विलय हो तुम्हीं सी सभी में दिखी
 भोर से रात तक गति रही अनदिखी 
यति कहाँ कब रही कौन कैसे कहे-
 पीर ने धीर धर लघुकथा नित लिखी

 लिपि पिता, पृष्ठ तुम, है समीक्षा बहन
 थिर कथानक अनुज, कथ्य तुमको नमन 
रुक! सखा चिन्ह कहते- 'न संजीव थक'
 स्नेह माँ की विरासत हुलस कर ग्रहण

 साधना माँ की पूनम बने रात हर 
वन्दना ओम नादित रहे हर प्रहर 
प्रार्थना हो कृपा नित्य हनुमान की 
अर्चना कृष्ण गुंजित करें वेणु-स्वर 

माँ थी पुष्पा चमन, माँ थी आशा-किरण
 माँ की सुषमा थी राजीव सी आमरण 
माँ के माथे पे बिंदी रही सूर्य सी- 
माँ ही जीवन में जीवन का है अवतरण *

सोमवार, 2 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (15)

                               बच्चे कच्ची मिटटी के लौंदे की तरह होते हैं और किसी कुम्भार की तरह माँ उसको आकर देती हैं।  तभी तो कहा जाता है  कि माँ से क्या सीखा है ? वह भी चाहती है कि मेरे बच्चे ऐसे बने किसी को ये शब्द कहने का मौका  न मिले।  तभी तो अपने संस्मरण में लिख रही हैं : आशा लता सक्सेना जी।

                                                                   



बात बहुत पुरानी है पर जब कि मैं खुद नानी दादी हो गयी हूँ आज भी भूल नहीं पाती |वह ऐसा समय था जब बच्चे माँ की आँखों से डरते थे |उनकी हर बात समझते थे व कहना मानते थे |हमारे पड़ोस में एक आंटी रहतीं थीं

उनके यहाँ का निमंत्रण आया |सब तैयार होने लगे |जब जाने के लिए निकल रहे थे मम्मी ने समझाया “वहा जा कर चुपचाप बैठना |जब तक मैं न कहूँ किसी चीज को हाथ न लगाना |”मैंने सर हिला कर अपनी स्वीकृति दे दी |

तब मुश्किल से मेरी उम्र ४ वर्ष की रही होगी |

    वहाँ सभी बड़े लोग आपस में बातों में व्यस्त हो गए |सारे बच्चे खेलने लगे पर मैं गुमसुम गुडिया सी मम्मी के पास चिपकी बैठी थी |आंटी ने २-३ बार कहा जाओ तुम भी जा कर खेलो |पर मैं मम्मी की और देखती रही |आंटी को लगा मुझे भूख लगी होगी तभी नहीं खेल्र रही |वे एक प्लेट में कुछ खाने के लिए ले आईं |

   मैं भूल गयी कि मम्मी ने क्या कहा था? चट से खाने बैठ गई |वहाँ तो वे कुछ नहीं बोलीं पर घर आते ही एक तमाचा पड़ा गाल पर |मैं जोर जोर से रोने लगी तब वे बोलीं “क्या घर में खाने की कमी थी जो वहाँ फैल कर बैठ गयी | “ उसदिन के बाद उनकी हर बात  मानने की जैसे मैंने कसम खाली | जब बड़ी हुई तब भी सदा उनके कहने में चली इसी कारण आज भी उनकी हर छोटी शिक्षा भी याद आती है |माँ ही बच्चों की प्रथम गुरू है उन्हें समाज में विचरण के तरीके सिखाती है | माँ के अनुशासित व्यवहार के कारण ही मेरा व्यक्तित्व निखर पाया |

आज जो भी हूँ उ़नके कारण हूँ |