मंगलवार, 9 सितंबर 2014

घरेलू आतंकवाद : अनदेखा क्यों ?

वे हमारी जड़ों में तीखा जहर बो रहे हैं ,
और हम हैं  कि जाग कर भी सो रहे हैं .
दूसरों को अंगुली दिखा कर बनते हैं  होशियार
अपने नाक के तले बसे चोरों से हों ख़बरदार
                              हम और हमारे नेता सभी कहते फिरते हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पाठशाला है और वहाँ पर विभिन्न संगठनों को शरण दी जा रही हैवहाँ की सरकार उनको संरक्षण दे रही हैहम खुद क्या कर रहे हैं ? अपने गिरेबान में झांक कर देखने कि फुरसत किसे है?
                                  हम अपने घर में पलने वाले और पाले  जाने वाले आतंकियों की ओर नजर ही नहीं डाल पा रहे हें . हम आतंकवादी शब्द  पुनर्परिभाषित करने की सोचें क्या ? देश में दहशत फैलाने वालों को हम नक्सली , उग्रवादी , अलगाववादी, माफिया  और दबंग कहते हैं , क्या ये  किसी न किसी तरीके से आम नागरिक के जीवन में मुश्किल पैदा नहीं करते हैं। नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में वे खुले आम घोषणा करते हैं कि हमें हर परिवार  सदस्य अपनी विद्रोही सेना में बढ़ोत्तरी करने  लिए चाहिए।  हमने कभी सोचा है कि उन परिवारों में कितनी दहशत फैली होगी।  हमें आतंक के चेहरे से इतने मुखौटे हटा कर सिर्फ एक नाम देना है और  उससे निबटना भी बहुत जरूरी है क्योंकि आतंक सिर्फ एक होता है और उसका सहारा लेकर---- 
  • जो दहशत फैलाये , 
  • लोगों का जीवन मुश्किल कर दे , 
  • उनका शोषण करे ,
  •  उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर उन्हें अपनी मर्जी  अनुसार जीने को विवश करे।  
  •  आम आदमी के घर की बहू और बेटियां जहाँ सुरक्षित न हों।  बहू बेटियां तो बड़ी हो जाती हैं , यहाँ  दुधमुंही बच्चियों से लेकर बचपन के आगोश में बेखबर बच्चियों का जीवन तक सुरक्षित न हो , 
  • बलात श्रम करवाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोगों को हम किस श्रेणी में रख सकते हैं। 
  • माफिया चाहे वे किसी भी क्षेत्र के क्यों न हों ? 
 ये सभी तो अपने दबदबे को प्रयोग करके लोगों को आतंकित कर रहे हैं।  फिर इसको भी हमें  आतंकवादी  की श्रेणी में क्यों नहीं रखना चाहिए ? 
                               आम तौर पर तो हम देश की सीमाओं में बलात घुस कर आने वाले पडोसी देशों या एक विचारधारा विशेष के शिकार लोग, क़ानून भंग  करके लोगों में दहशत फैलाने वालों,  को  ही आतंकवादी कहते आ रहे हैं।  इस अलगाववादी विचारधारा वाले लोग देश के नागरिकों को भी बरगला कर अपने कामों को अंजाम देने के लिए मजबूर करने वाले , या फिर नयी पीढ़ी को धन का लालच देकर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले , उनका ब्रेन वाश करके अपने घर के विरुद्ध खड़े करने वाले भी इसी श्रेणी में आते हैं लेकिन वे धर्म विशेष से जुड़े हुए लोग हैं , जो सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि अपनी अलग क़ानून व्यवस्था को स्थापित करने के लिए दूसरे देशों में भी सक्रिय हैं।  
                                 उनसे निपटने के लिए हमारी सेना है ,  हमारी खुफिया एजेंसी हैं जो हमें इसके आगमन और इसके बुरे इरादे से अवगत करा कर सतर्क करती हैं।  कई बार हम बच जाते हैं और इन आतंकवादियों के मंसूबे ध्वस्त कर देते हैं और कई बार हमारे जवान इनकी चालों का शिकार होकर शहीद हो जाते हैं।
                            हमारे अपने देशवासी , इसी जमीन पर जन्मे , पले और जीवन जीने वाले जब उपरिलिखित कामों को अंजाम देते हैं तो उन्हें आतंकवादी क्यों न कहा जाय ?  उनके लिए ही सजा मुक़र्रर क्यों न की जाय ? देश के इन आतंकवादियों को बचाने के लिए - राजनैतिक हस्तियां , दबंग , बड़े बड़े पैसे वाले और रसूख वाले खड़े होते हैं।  उन्हें सजा तो क्या बाइज्जत बरी तक दिया जाता है।  खतरा हमें बाहर के दुश्मनों से जितना है उससे कहीं अधिक देश में फैले हुए सफेदपोश आतंकवादियों से है।  उनको बेनकाब करने का काम न पुलिस कर पाती है और न ही मीडिया। क्योंकि इन लोगों के शरणदाता  रसूखवाले होते हैं।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

पितृ पक्ष : वर्तमान में औचित्य !

               सिर्फ हिन्दू धर्म में ही वर्ष  में १५ दिन पूर्वजों को समर्पित होते हैं  इन दिनों में हम अपने पूर्वजों को पूर्ण श्रद्धा से स्मरण करते हुए तर्पण और श्राद्ध करते हैं . हमारे पूर्वजों को इन दिनों किये गए हमारे कार्यों (  तर्पण , श्राद्ध भोज आदि ) संतुष्टि और तृप्ति प्राप्त होती है।  हम भी अपने पितृ ऋण से मुक्त होने का संतोष अनुभव करते हैं।  हम अपनी संस्कृति और मान्यताओं का सम्मान करते हैं और अपने दायित्वों को पूर्ण करते हैं। 


                            वैसे श्राद्ध कर्म का मुख्य तत्व् है श्रद्धा।  श्राद्ध कर्म में पिंडदान और तर्पण करने से अधिक आवश्यक है कि हमारे मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा हो।  जो आज का चलन हो चुका है कि जीते जी माता पिता को इज्जत न दो क्योंकि ये मानी हुई बात है बेटा पिता से कुछ अच्छे और संपन्न जीवन जीने योग्य बना दिया जाता है ( इसका पूर्ण श्रेय पिता को ही जाना चाहिए किन्तु ??) फिर पिता अपने स्तर से नीचे के नजर आने लगते हैं।  उनके लिए ऊपर या पीछे  कहीं एक कमरा बना होता है।  बेटा ऑफिस से थका हुआ लौटता है तो उसके पास अपने बच्चों और पत्नी के लिए ही समय होता है।  
                           यही बच्चे पिता के श्राद्ध को बड़े ही सम्मान के साथ करना चाहते हैं। इस अवसर पर एक कहानी याद आ रही है - पिता के श्राद्ध के कारण खाने पीने में देर हो रही थी और कमरे  अपाहिज माँ खाना मांग रही थी लेकिन बहू - 'आपको अभी खाना कैसे दे दें ? अभी पंडित जी श्राद्ध करवाने आने वाले हैं उसके बाद मिलेगा। ' ऐसे बहू और बेटे जिन्हें जीवित माँ को खाना देने के लिए एक बहाना मिल गया।  मरने के बाद उनकी भी श्राद्ध करेंगे।  ऐसे श्राद्ध से क्या फायदा ? क्या पितर हमारे ही घर में एक जीवित आत्मा को भूख से परेशान देख कर हमारे द्वारा किये जा रहे पिंडदान से संतुष्ट और तृप्त हो रहे होंगे।  मुझे तो ऐसा नहीं लगता है।  आप जीवित बुजुर्गों के लिए कुछ और खाने की व्यवस्था करके दे सकते हैं  लेकिन ऐसे उत्तर देकर आप अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते हैं। 
                            पितरों को भी जैसा कि  हम मानते हैं , इन दिनों अपने वंशजों से कुछ आशाएं होती हैं लेकिन वे ये कभी नहीं चाहते कि  उनके पड़पोते उनके नाम पर जीवित लोगों के प्रति निष्ठुर व्यवहार करें।  सबसे पहले होता है कि आपके मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए।  कर्मकांड और दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है।  पूर्वज तभी प्रसन्न होने जब आप उनके वंशजों को भी खुश रखेंगे।  उनसे आशीष की आशा भी तभी कर सकते हैं।  इस कार्य को बोझ समझ कर न ढोयें बल्कि श्रद्धा के साथ तिल युक्त जल की तिलांजलि देकर भी आप अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं।जीवित आत्माओं को संतुष्ट रखेंगे तभी मृत आत्माएं या हमारे पूर्वज संतुष्ट रहेंगे।  
                           

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

यादें : शिक्षकों की !

                       आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों जो मुझे प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक मिले या कार्य स्थल पर मुझे शिक्षित करते रहे  सबको नमन करती हूँ और उनमें से कुछ के साथ जुडी यादें भी स्मरण कर रही हूँ। मुझे वो अपने सारे शिक्षक अच्छे तरह से याद हैं। 

                        मेरी प्राथमिक शिक्षा सनातन धर्म स्कूल , उरई में हुई।  स्कूल  शिक्षक तो नहीं लेकिन  मुझे घर पर उसी स्कूल में चपरासी का काम करने वाले गुप्ता जी पढ़ाने आते थे।  उस समय शिक्षकों को भाई साहब और शिक्षिकाओं को बहनजी कहा जाता था।  गुप्ता जी ने हमारी नींव मजबूत की थी और जब वे स्कूल में क्लास में चाक और डस्टर रखने आते थे तो मैं उठ कर खड़ी हो जाती थी।  एक दिन उन्होंने समझाया कि क्लास में खड़े मत हुआ करो।  मैं घर का टीचर हूँ न।  मुझे उनकी बात आज भी याद है। 
                         मेरी इण्टर तक की शिक्षा आर्य कन्या इण्टर कॉलेज , उरई में हुई।   हाईस्कूल तक की शिक्षा में मेरी क्लास टीचर और होम साइंस टीचर प्रवेश प्रभाकर ने मुझे बहुत प्रभावित किया और यही नहीं मेरी अभिव्यक्ति की क्षमता  को उन्होंने ही पहचाना था।  उनका प्रयास रहता कि मैं क्लास के पढाई से इतर कामों में भी सक्रीय रहूँ।  इत्तेफाक से वे हमारे घर के बगल वाले घर में रहती थी।  उनके पापा सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर थे।  मेरी आज भी इच्छा है कि वे मुझे मिल जाएँ तो मैं उनसे कहूँ - 'मैं वह बन चुकी हूँ , जो वह चाहती थीं। ' 
                         मेरी इण्टर कॉलेज की प्रिंसिपल प्रेम भार्गव भी मुझे हमेशा याद रहेंगी। वैसे तो मैं जिस कॉलेज में जिस स्तर तक पढ़ी , शिक्षक और कॉलेज में शक्ल और नाम से सब जानते थे।  एक कड़क टीचर थी वो।  मैं उन्हें हमेशा याद रही।  शादी के बाद भी कभी भाई साहब से उनका मिलना होता तो पूछती 'रेखा कहाँ है ? क्या कर रही है ?' अफ़सोस की वो अब नहीं हैं।  
                            डिग्री स्तर पर -को-एजुकेशन वाला था और छोटी जगह का माहौल सीधे  कॉलेज जाना और वापस आना।  हाँ उस समय तक मैंने लिखना और स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित होना शुरू कर दिया था।  फिर भी किसी विशेष शिक्षक के बारे में इस स्तर पर उल्लिखित नहीं कर सकती।  
                              शादी के बाद मैंने बी एड किया और वहां की शिक्षिकाएं सभी अच्छी थी लेकिन सिर्फ एक मुझे प्रिय थी और उन्हें मैं  डॉ प्रीती श्रीवास्तव ( दुर्भाग्य से वो अब नहीं रहीं। ) और वहां की प्रिंसिपल डॉ अमर कुमार हमेशा याद रहेंगी क्योंकि मैंने एम एड भी उसी कॉलेज से किया था।  वहां भी मेरी अपनी एक पहचान बनी हुई थी। कॉलेज छोड़ने के बाद जब मैंने पी एच डी के लिए रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो आखिरी शिक्षण संस्थान के प्रमुख के साइन होना चाहिए।  मैं नहीं गयी मेरे  पतिदेव अपने  प्रो. मित्र के साथ गए तो उन्होंने  साइन करने से मना कर दिया।  बोली रेखा को भेजो। 
                                 जब मैं गयी तो बोली - 'मैं अपनी स्टूडेंट को देखना चाहती थी , नहीं तो साइन की कोई बात नहीं थी। ' बस वो कड़क छवि वाली मेरी शिक्षिका फिर कुछ ही वर्ष बाद कैंसर से चल बसी। 
                             
                                   इसके बाद मैंने कानपूर विश्वविद्यालय से  'डिप्लोमा इन कंप्यूटर साइंस ' का कोर्स किया।  बस मौज मौज में नहीं तो आई आई टी में जॉब कर रही थी और सब कुछ जो पढ़ाया जाना था मुझे पहले से आता था।  फिर पढ़ाने वाली सारी  फैकल्टी आई आई टी की ही थी। क्लास में बैठ कर उनसे पढ़ती और आई आई टी में उनके साथ गप्पें भी मारा करती थी।  फिर भी मेरे शिक्षकों में वाई डी एस आर्य , निर्मल रोबर्ट , रजत मूना ,  बी एम शुक्ला  और सुषमा तिवारी बहुत अच्छे थे।  इनमें से कुछ तो सेवानिवृत्त हो कर चले गए और कुछ अभी भी हैं लेकिन वे उम्र में हमसे छोटे हैं और तारीफ की बात उन्होंने मुझे क्लास हो या आई आई टी हमेशा रेखाजी से ही सम्बोधित किया।  
                                     सबसे अंत में और श्रद्धा से जिन्हें मैं याद करती हूँ वे हैं मेरे कार्य स्थल और मेरे कंप्यूटर साइंस  के प्रोजेक्ट मशीन ट्रांसलेशन के मुख्य दिग्दर्शक  डॉ विनीत चैतन्य - जिन्होंने हमें कंप्यूटर पर हाथ रखने से लेकर उसकी सारी प्रक्रिया बहुत धैर्य के साथ सिखाई , कभी गुस्सा नहीं किया क्योंकि हम तो कला क्षेत्र के लोग थे लेकिन हमारी अच्छी हिंदी और लेखन क्षमता के कारण ही हमें चुना गया था।  सो डेस्कटॉप से लेकर नेट के साथ काम करने  शिक्षा उनसे ही ग्रहण की।  मैं उनकी चिर ऋणी रहूंगी और ऐसे गुरु को हमेशा और सभी नमन करते हैं।  
                                         आज मेरे सभी शिक्षको को मेरा शत शत नमन।