मंगलवार, 21 जुलाई 2015

बेटियों का दंश !

                             बेटियों होना माँ बाप के लिए कम और लोगों के लिए बोझ दिखना सिर्फ आज से नहीं बल्कि सदियों से चला आ रहा है और उन सदियों की स्थिति को हम इतिहास में पढ़ते आ रहे हैं।  दशकों से तो हम खुद ही इसको महसूस करते आ रहे हैं लेकिन आज लिखने का साहस मैं तब जुटा पायी जब कि मेरी बेटियों को अपना बोझ समझने वाले लोगों को दिखा दिया कि हमने अपनी पाँचों बेटियाँ को`वांछित करियर में सफल होने के बाद सुयोग्य वरों के सुपुर्द करने का कार्य पूर्ण कर लिया है।
                           जब अपने माता - पिता के घर में चार बहनें थे हम और एक बड़े भाई साहब। ये तो अच्छा था कि एक भाई था तो माँ का चार बेटियों की माँ होने का गुनाह माफ था। पापा तीन भाई और संयुक्त परिवार में तीनों भाइयों में नौ बेटियां और चार बेटे थे लेकिन सबके पास एक बेटा तो था ही। बहनों का ढकौना होने के कारण उन लोगों की सामाजिक स्थिति सम्मानीय रही थी , ज्यादा बेटियां होने का ताना तो सुना उन्होंने  भी लेकिन एक बेटा होने का गौरव प्राप्त था उन्हें सो सौ खून माफ।
                            जब मेरी शादी हुई तो जेठजी की दो बेटियां थीं। लेकिन घर में कई पीढ़ियों के बाद बेटियां हुई थी तो घर वालों को कोई मलाल न था। जब मैं पहली बार माँ बनने वाली थी तो घर में ही नहीं बल्कि बाहर वालों को पूरी उम्मीद थी कि इस बार घर में बेटा होगा। लेकिन मैं तटस्थ थी क्योंकि बचपन से ही मैं अतीत को कभी ढोती नहीं , वर्तमान को रोती नहीं और भविष्य को बोती नहीं। लेकिन घर वालों ने कुछ और सोच रखा था। उस दिन पतिदेव टूर पर थे और घर वाले मुझे हॉस्पिटल लेकर गए। कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। मैं तो अपनी बेटी को देख कर सारी पीड़ा भूल गयी।
                          पतिदेव रात ग्यारह बजे लौटे तो पता चला कि बेटी हुई है। अस्पताल घर से बहुत दूर था। घर वाले बोले - 'अब रात में जाने की क्या जरूरत ? लड़की ही तो हुई है सुबह जाना। "लड़की ही तो हुई है " जैसे कि बेटी हाड मांस की न होकर कोई बेजान गुड़िया हो। मुझे नौ महीने की पीड़ा नहीं सहनी पड़ी बल्कि कहीं सड़क पर पड़ी मिल गयी हो।
                          बेटी हो या बेटा माँ बाप के लिए सिर्फ अपना अंश होता है और जान से ज्यादा प्यारा भी। फिर रात में ही इन्होने अपना स्कूटर उठाया और साढ़े बारह बजे हॉस्पिटल पहुंचे तो मुझे बताया कि घर में ये कहा जा   रहा था।मुझे लगा कि  मेरी पीड़ा और ख़ुशी से किसी का कोई वास्ता नहीं है। 
सबसे बड़ा दुःख तो तब लगा जब सुबह कैंपस में भी किसी ने इन्हें बेटी होने की बधाई नहीं दी। इनका का पूरे कैंपस में बहुत अच्छा व्यवहार था। आज की ही तरह सबके सुख दुःख में साथ देना। अरे बेटी हमारे घर में हुई थी न किसी ने मिठाई मांगी और न बधाई दी क्योंकि बाबूजी के घर में तीसरी पोती हुई थी।


 
 (क्रमशः)

शनिवार, 4 जुलाई 2015

अन्धविश्वास और किवदंतियां !

                          वर्षों पहले जब हमारी माँ ने अपने बच्चों को जन्म दिया था , तब की काल , परिस्थितियाँ और शिक्षा का परिदृश्य कुछ और था। लेकिन रोज रोज सामने आने वाली स्थितियाँ और घटनाएँ हमें फिर सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या हम वाकई एक तरफ चाँद से बातें कर रहे हैं और दूसरी तरफ अन्धविश्वास के दलदल से अभी तक बाहर नहीं आ पा रहे हैं। 
                           वर्षों पहले जब हम भाई बहनों का जन्म हुआ था तो मेरी माँ को विटामिन 'ए ' की कमी से रतौंधी (रात में रोगी को दिखाई नहीं देता ) आती थी। कम उम्र , संयुक्त परिवार के काम खान पान वही सब की तरह कोई विशेष परवाह नहीं। चूल्हे पर रोटियां सेकते वक़्त दिखाई न देने के कारण कितनी बार अंगुलियां रोटी पलटने में तवे पर पड  जाती और जल जाती। एक 17 - 18 साल की लड़की कुछ बोलने के लायक तो वैसे भी नहीं होती थी। घर की बड़ी बुजुर्ग कहती 'बच्चा गुनाह होता है ' इसी लिए रतौधी आने लगती है जब बच्चा हो जाएगा तो ठीक हो जायेगी। परिणाम जब तक हम लोगों का जन्म हुआ हम पहले तीन भाई बहन दूर दृष्टि के कमजोर होने के शिकार हो गए। लेकिन तब इस बात से हम भी वाकिफ न थे। सोचते रहे कि जैसा हमको दिखता है वैसा ही सबको दिखता होगा। हम माँ के प्रति पल रहे अन्धविश्वास की कीमत जीवन भर चुकाते रहे। 
                             वो जमाना और था न शिक्षा थी न गर्भिणी के प्रति जागरूकता। लेकिन जब हम शिक्षित हो गए तब भी इस अन्धविश्वास से मुक्त कहाँ हो पाये ? मैं जिस घर में ब्याह कर आई थी उसमें चिकित्सा जगत से जुड़े लोग थे लेकिन अपनी देख रेख के प्रति जागरूक बराबर रहे , पूरा पूरा उचित संरक्षण मिला , समय से टीकाकरण और मेडिकल चेक अप सब कुछ होता रहा । लेकिन अन्धविश्वास यहाँ भी कम न हुआ। मेरी जिठानी को एक बच्चे के जन्म के समय घुटनों में दर्द की शिकायत रहने लगी। सारी दवाएं उपलब्ध थीं लेकिन वह कम नहीं हो रहा था। आस पास की अनुभवी महिलायें वही जुमला सुनाने लगीं - जब बच्चा होगा तो सब ठीक हो जाएगा। नौ महीने तक इन्तजार किया। बच्चा हुआ और भयंकर पीलिया का शिकार , चंद दिनों में चल बसा। दर्द फिर भी ठीक न हुआ। तब एक्सरे और बाकी  टेस्टिंग कराई गयी तो पता चला कि उनको बोन टी बी है और पीलिया भी। फिर एक साल तक बिस्तर पर। ये मध्य काल था। लेकिन अन्धविश्वास और किवदंतियों का प्रभाव कहीं भी कम नहीं था। 
                              इसके बाद आज की बात कर सकती हूँ -मेरे एक बहुत करीबी की बेटी जो एक कंपनी में सेक्रेटरी थी। पति ने प्रसव  के कुछ महीने पहले अपनी माँ के पास भेज दिया। माँ स्वयं स्कूल में प्रिंसिपल उच्च शिक्षित और प्रगतिशील विचारों वाली लेकिन बहू के मामले में अन्धविश्वास और किवदन्तियों से ग्रस्त दिखाई दीं। उनके घर की स्थिति ऐसी है कि वहां धूप बिलकुल भी नहीं आती। सारे दिन बिजली जला कर रखी जाती। सर्दियों के समय में हीटर या ब्लोअर चला कर रखती। धीरे धीरे उसको विटामिन 'डी '  की कमी होने लगी और उसको कमर में दर्द होने लगा और एक समय ऐसा भी आया कि वह उठने बैठने के लिए लाचार हो गयी। जब वह अपनी समस्या सास से कहती तो वह कहती -अरे बच्चा गुनाह होता है , इतनी पीरें तो आती ही हैं। चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। जब सहन शक्ति से बाहर हो गया तो उसने पति को बाहर से बुलाया और उसके साथ डॉक्टर के पास गयी। तब तक बच्चे का पूर्ण विकास हो चुका था। डॉक्टर ने पति को डांटा कि आप लोग कैसे पढ़े लिखे हैं ? इसको विटामिन डी की बहुत कमी है , इसको धूप  मिलना बहुत जरूरी है। उसको विटामिन डी की हाई डोज दी। तब उसको आराम मिला लेकिन बच्चा होने के बाद जब उसने चलना शुरू किया तो पता चला कि उसमें भी विटामिन डी की कमी के कारण पैरों में कुछ कमजोरी है। 
                                 ये तीन पीढ़ियों की सच्ची घटनाएँ मैंने इसलिए लिखी ताकि चिकित्सा सम्बन्धी कमियों को अन्धविश्वास और किवदंतियों की बलि चढ़ कर माताओं को कोई शारीरिक और मानसिक कष्ट न झेलना पड़े। 

**इस लेख का प्रेरक बना वंदना अवस्थी दुबे का आज का स्टेटस  "तांत्रिक के कहने पर बेटे को मार कर पी गयी खून। "