मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

बुधवार, 30 जून 2010

मेरा एक सफरनामा (त्रयम्बकेश्वर मंदिर) !

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                                              ऐसी सफर और सैर मैंने परिवार और कुछ आत्मीय लोगों के साथ शायद पहली बार की और उसको पूरा पूरा एन्...
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सोमवार, 21 जून 2010

उ. प्र. में बी टी सी का यथार्थ !

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                             आजकल मैं भी और माँओं  की तरह से वर की खोज करने में लगी हूँ और जब भी अखबार का matrimonial देखती हूँ. तो खासतौर ...
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शुक्रवार, 18 जून 2010

दाम्पत्य जीवन में दरार और मनोग्रंथियाँ !

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                      सबसे पहले मैं बता दूं कि मेरी ये लेख आज से २४ साल पहले जुलाई १९८६ में  "सरिता" में प्रकाशित हुआ था. मेरी लेख...
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मंगलवार, 15 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (७)

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                              मैं नेट से जुड़ कर भी  ब्लॉग से परिचित न थी . ऑरकुट पर ब्लॉग का विकल्प देखती और किसी किसी के प्रोफाइल में उस...
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गुरुवार, 10 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (६) !

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                                  आई आई टी में भी सितम्बर माह में हिंदी सप्ताह मनाया जाता है और उसमें विभिन्न प्रतियोगिताएं भी हुआ करती हैं...
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मंगलवार, 8 जून 2010

मेरे लेखन का सफर : स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (५)

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                               खैर शादी के तय होने तक सब सही रहा, मेरे प्रकाशन को सबसे अधिक गति १९७८-७९ में ही मिली. खूब लिख और प्रकाशित भी ...
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शुक्रवार, 4 जून 2010

मेरे लेखन का सफर: स्मृतियाँ कुछ तिक्त कुछ मधुर (४)

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                                       मेरे रोज के लेखन में ऐसी ही समस्याएँ  और उससे जुड़ी कहानियां ही थी. लेकिन ये अवश्य था कि इससे  लोगों...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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