मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

बुधवार, 29 सितंबर 2010

इतिहास की पुनरावृत्ति !

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                        क्या हमें फिर से अतीत के इतिहास को दुहराने का जरूरत आ पड़ी है. इस विषय को नहीं छूना चाह रही थी लेकिन आज की इस घटना ने...
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सोमवार, 27 सितंबर 2010

लगेंगे हर बरस मेले (शहीद भगत सिंह )!

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           आजादी जिनके सिर पर जूनून बन कर बोली , वे उसकी तमन्ना में फाँसी पर झूल गए  और फिर गुलामी की  कड़ियों को एक के बाद एक शहीद अपनी शहाद...
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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति (३) !

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                   मनोरोग और मानसिक अपंगता दोनों अलग अलग व्याधियां है. इनके बारे में हम सामान्य व्यक्ति नहीं जान पाते हैं और हम इसके इलाज ...
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सोमवार, 20 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति ! (२)

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                    बच्चे के जन्म की सूचना हमें उसके रोने से ही मिलती है क्योंकि उस समय हम सब तो बाहर ही होते हैं .बच्चे के इस रोने के कारण...
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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति !

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                सबसे पहले मैं ये बता दूं कि ये मेरा क्षेत्र बिल्कुल भी नहीं है लेकिन जब घर के सदस्य इससे जुड़े होते हैं तो कलम उसमें दखल जरू...
10 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 15 सितंबर 2010

अच्छा है विकल्प !

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                   आज के अख़बार में एक कॉलम में ऐसी विज्ञप्ति देखी, जो कम से कम इससे पूर्व मेरी दृष्टि से कभी नहीं गुजरी थी. लोकतंत्र के लिए...
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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

हार्दिक शुभकामनाएँ !

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                                                                                   ईद                                                   ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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