मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

शनिवार, 26 जनवरी 2013

संशोधन चाहता है संविधान !.

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                        हम देश के गणतंत्र दिवस का बहिष्कार कर रहे हैं है आखिर क्यों ? ये संविधान किसके लिए बनाया गया था? इस देश के रहने वा...
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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

दुष्कर्म : महामारी !

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                    हम अगर अपने समाज के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पायेंगे कि  जब हमारा चिकित्सा विज्ञानं इतना उन्नत नहीं था तो देश में ...
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रविवार, 9 दिसंबर 2012

विश्व मानवाधिकार दिवस !

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                            चित्र गूगल के साभार               आज 10  दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में जाना जाता है . इस दि...
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बुधवार, 5 दिसंबर 2012

दफन होने का अधिकार !

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                      हमारे देश के संविधान में सभी को कुछ मौलिक अधिकार मिले हैं, जिनमें जीवन में होने वाली सभी जरूरतों को शामिल किया गया है...
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मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ये कैसे सुधारगृह ?

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एक संरक्षा गृह (चित्र गूगल के साभार )                                          करीब करीब हर शहर में नारी सुधार  गृह , नारी निकेतन , ...
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शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

जागरण की संस्कारशाला !

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                    आज के परिवेश में जब आज की पीढी को देखते हैं या फिर आज की नयी पौध को देख कर यही कहते हुए सुनते हैं कि  पता नहीं कैसे सं...
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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

राजकोष से राजनीति !

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                   आज एक हैडिंग पढ़ी - "वादे सुनकर फूल गए , सरकार बनी तो भूल गए "  ऐसा तब होता है जब की जल्दी ही दुबारा मत के लिए ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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