मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

शनिवार, 18 मई 2013

उत्तर प्रदेश राजनीति के दांव पेंच !

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                                      उत्तर प्रदेश की राजनीति से पूरा देश प्रभावित  है क्योंकि केंद्र में सबसे अधिक सांसद उत्तर प्रदेश से  ...
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मंगलवार, 14 मई 2013

परिवार दिवस !

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                          चित्र गूगल के साभार ( संयुक्त परिवार )                           आज एक वाकया याद आ गया . मेरे एक आत्मीय हैं ...
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सोमवार, 13 मई 2013

अक्षय तृतीया : कल और आज !

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            समय के साथ इंसान की प्रवृत्तियों में  परिवर्तन आ चुका  है और इस परिवर्तन का ही प्रभाव है कि समाज में हर कोई कुछ प्राप्त क...
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सोमवार, 6 मई 2013

मुलाकात - सुधा भार्गव जी से!

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सुधा भार्गव                           एक ऐसी मुलाकात जो अविस्मरणीय ही कहूँगी . सुधा जी से पहले से ही परिचित हूँ उनकी लघु कथाओं के सहारे...
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गुरुवार, 2 मई 2013

विश्व जल संकट !

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                        पानी चाहिए और एक नल                  पानी मानव जीवन की सबसे बड़ी  जरूरत है जिसे वह प्रकृति से लेने के लिए बा...
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बुधवार, 1 मई 2013

आज मजदूर दिवस है!

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आज मजदूर दिवस है और मजदूर अपने दिवस को कैसे मना रहे हैं ? सरकारी मजदूरों की बात नहीं करेंगे , बड़े बड़े कारखानों के मजदूरों की भी बात न...
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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

जिम्मेदार हम भी हैं !

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                   रोज रोज की घटनाएँ हमें क्या दिखा रही हैं? हमारी ही तस्वीर , जिसे हम खुद गढ़ रहे हैं . दोष अगर हम अपने बच्चों को  दें तो ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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