मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

रविवार, 15 जून 2014

पितृ दिवस !

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                             आज के दिन सब लोग पितृ दिवस के रूप में अपने अपने पिताओं को याद कर रहे हैं और वे भाग्यशाली पिता हैं जिनके बच्चे ...
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सोमवार, 9 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (18)

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                 कोई कोई वाकया और कभी कभी तो यादगार पल कितना याद आते हैं ? अब भले  मूर्खता पर हंस लें लेकिन उस समय माँ की कही बात वेदवाक्य ...
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रविवार, 8 जून 2014

क्या आपका दान सार्थक है ?

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                   हमने अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से दान देना एक श्रेष्ठ कार्य बतलाया गया है और  किसी न किसी रूप में विभिन्न अवसरो...
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गुरुवार, 5 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (17)

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              माँ को हम सबसे अधिक ज्ञानी , अनुभवी और प्यार देने वाली समझते हैं और ऐसा होता भी है लेकिन कई बार ऐसी बातें होती हैं जिनके बा...
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मंगलवार, 3 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (16)

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                क्या स्मृतियों में सजी बसी माँ को ऐसे ही कवि कविता में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।  ये ही स्मृति शेष कही जाती हैं।  आज ...
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सोमवार, 2 जून 2014

माँ तुझे सलाम ! (15)

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                               बच्चे कच्ची मिटटी के लौंदे की तरह होते हैं और किसी कुम्भार की तरह माँ उसको आकर देती हैं।  तभी तो कहा जाता ह...
4 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 30 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (14)

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                                 माँ हर इंसान की एक ही होती है , वह होती है एक आम औरत जो अपने जीवन में तमाम रिश्ते और नामों को लेकर चलती र...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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