मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

शनिवार, 20 जून 2015

पितृ दिवस पर -- मेरे पापा !

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                              वैसे माँ पापा क्या किसी एक दिन ही याद किये जाते हैं लेकिन हाँ इस बहाने अपने जनक से सबको रूबरू करा सकते हैं।...
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मंगलवार, 16 जून 2015

धीमा जहर हम ले रहे हैं !

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                                          हम धीमा जहर खा रहे हैं, ये बात हम लोगों को पता भी है और नहीं भी है क्योंकि अपनी जिव्हा के स्वाद क...
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मंगलवार, 2 जून 2015

पंचायतें और अँधा न्याय !

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                                            पंचायती राज का सपना जिस रूप में दशकों पूर्व देखा गया था , मुझे नहीं लगता कि वह साकार हो सका है।...
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सोमवार, 11 मई 2015

पहला और आखिरी मदर्स डे !

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मैं और मेरी माँ ( पिछला मदर्स डे )                       माँ  पहला शब्द होता है जो बच्चा बोलता है और जिसका पहला अहसास बच्चा करता है  व...
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शुक्रवार, 8 मई 2015

अभिव्यक्ति की अवसर !

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                                             कुछ दिन पहले हमने पढ़ा था कि एक लडके ने अपनी आत्महत्या का लाइव वीडियो अपनी गर्ल फ्रेंड को भेजा ...
शुक्रवार, 1 मई 2015

मज़दूर दिवस ! (आज कानपुर के मजदूरों के नाम)

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                 आज का दिन  कितने नाम से पुकारा जाता है ? मई दिवस , मजदूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस।  अगर विश्व के दृष्टिकोण  देखें तो मज...
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

अक्षय तृतीया !

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          अक्षय तृतीया हम बचपन में तभी जानते थे जब माँ लोग कहती थीं ये बिना पूछी शादी की साइत होती है और कुछ दान पुण्य के काम किये जाते थे।...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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