मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

रविवार, 5 जून 2016

खोयी बच्चियाँ या त्यागी या फिर अपहृत ?

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      इधर विभिन्न स्रोतों से देख रही हूँ  कि कई बार बच्चियों की  तस्वीरें फेसबुक ,  व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल मीडिया पर दिखलाई दे रही हैं और ...
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गुरुवार, 2 जून 2016

पाठ्यक्रम : नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य !

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                             नयी सरकार और नयी शिक्षा नीति का निर्माण पर कार्य आरम्भ होने जा रहा है । पाठ्यक्रम निश्चित किया जाने वाला है।  ...
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शनिवार, 2 अप्रैल 2016

विश्व ऑटिज्म दिवस !

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                           2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस के नाम से जाना जा रहा है।  कभी हमने सोचा है कि हमें   विश्व ऑटिज्म दिवस की आवश्...
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गुरुवार, 10 मार्च 2016

"रुटीन चेकअप डे !"

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                      जीवन की बढ़ती  आपाधापी और दूर-दूर  फैले कार्यक्षेत्र में लगने वाले समय और खाने पीने की नयी-नयी सुविधाओं ने जीवन  सहज ब...
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रविवार, 22 नवंबर 2015

आखिर कब तक सहें ?

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                कई बार अख़बार की खबरें सामने से गुजर जाती हैं और उन्हें कभी पूरा पूरा पढ़ने का मन भी नहीं करता है लेकिन कोई खबर आग का गोल बन...
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सोमवार, 21 सितंबर 2015

ब्लॉग के सात साल !

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                              लिखना तो वर्षों से चलता चला आ रहा है लेकिन ब्लॉग से मेरा परिचय जब हुआ तो वो सितम्बर २००८ से।  इसमें काम कैसे ...
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बुधवार, 19 अगस्त 2015

बेटियों का दंश (४) !

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                         मेरी पाँचों बेटियां             बड़ी बेटी के नौकरी में जाते ही उससे छोटी वाली बेटी का भी एम सी ए पूरा हो गया ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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