मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

बुधवार, 21 सितंबर 2016

आठ वर्ष ब्लॉगिंग के !

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         आज मुझे अपने ब्लॉग को शुरु किये हुए आठ वर्ष हो गये । बहुत कुछ सीखा और अपने पाँच ब्लॉग बनाये हैं , अलग अलग उद्देश्य से । ईमानदारी स...
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गुरुवार, 25 अगस्त 2016

यादों के झरोखे से ःः जन्माष्टमी !

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   जीवन के तमाम पर्वों में एक जन्माष्टमी सबसे ज्यादा उत्साह से मनाते थे । इसका कारण यह था कि इसकी झाँकी सजाने का सारा दारोमदार बच्चों पर ही...
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आश्रम और गृह : समाज सेवा या आर्थिक स्रोत !

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                                     मुज्जफरपुर आश्रय गृह के बाद , अपने इतिहास को दुहराता देवरिया आश्रय गृह का लड़कि...
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डॉक्टर्स डे !

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                        आज डॉक्टर्स डे है और वाकई डॉक्टर्स जो भगवान का रूप है इसी दुनियां में हैं।  उनका एक ही धर्म होता है और वह है मानव स...
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रविवार, 5 जून 2016

खोयी बच्चियाँ या त्यागी या फिर अपहृत ?

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      इधर विभिन्न स्रोतों से देख रही हूँ  कि कई बार बच्चियों की  तस्वीरें फेसबुक ,  व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल मीडिया पर दिखलाई दे रही हैं और ...
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गुरुवार, 2 जून 2016

पाठ्यक्रम : नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य !

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                             नयी सरकार और नयी शिक्षा नीति का निर्माण पर कार्य आरम्भ होने जा रहा है । पाठ्यक्रम निश्चित किया जाने वाला है।  ...
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शनिवार, 2 अप्रैल 2016

विश्व ऑटिज्म दिवस !

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                           2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस के नाम से जाना जा रहा है।  कभी हमने सोचा है कि हमें   विश्व ऑटिज्म दिवस की आवश्...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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