मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

शनिवार, 30 सितंबर 2017

एक नयी दिशा की ओर :कन्या भोज .!

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                            इस वर्ष नवरात्रि के दिनों में हमेशा की तरह कन्यायें खिलानी थी और इसके लिए मेरी मानस पुत्री रंजना यादव   ने मु...
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गुरुवार, 21 सितंबर 2017

ब्लॉगिंग के 9 वर्ष !

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                                                             ब्लॉगिंग के ९ वर्ष !                                                         ...
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रविवार, 10 सितंबर 2017

आ अब लौट चलें ! ( विश्व ग्रैंड पेरेंट्स डे )

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                                          एक समय था जब कि घर की धुरी दादा दादी ही हुआ करते थे या उनके भी बुजुर्ग होते थे तो उनकी हर काम में...
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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद - 6

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          मशीन अनुवाद का सफर कुछ अधिक लम्बा हो चुका है फिर भी बहुत कुछ शेष है. यह एक अंतहीन सफर ही तो है जिसको मैं अपने कार्यकारी समूह के...
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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद - 5

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              मशीन अनुवाद सिर्फ सीधे सीधे वाक्यों के अतिरिक्त भी होता है. अगर हम किसी भी शासकीय पत्र को लें तो उसके लिखने का तरीका और...
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बुधवार, 9 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद - 4.

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               मशीन अनुवाद की दृष्टि से हमारे अनुवाद के क्षेत्र का इतना विस्तृत दायरा है कि उसके अनुरुप इसको सक्षम बनाने  का कार्य सतत ही...
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रविवार, 6 अगस्त 2017

मशीन अनुवाद -- 3

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मशीन अनुवाद की प्रक्रिया जटिल ज़रूर है लेकिन उपयोग करने वाले के लिए बहुत ही सहज है. अगर हम आलोचना करने पर उतर आयें तो फिर हर चीज़ कि आलोचना ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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