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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सांसदों की वेतन वृद्धि : कितना उचित?

                          सांसदों के वेतन और भत्ते में वृद्धि - एक अहम् मुद्दा जिसे संसद में फिलहाल टाल दिया गया है. बाकी मुद्दे पीछे हैं, कोई एक मत नहीं हो पाटा  है. बहिर्गमन, निष्कासन और बहुत सारे कार्य होते हैं , जिससे हमारी संसद सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी चर्चित हो जाती है. यह एक  ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरी संसद एकमत है. आखिर ऐसा क्यों? न पक्ष और न विपक्ष का कोई असहयोग क्योंकि इससे सभी लाभान्वित होने वाले हैं. तब देश के सारे मुद्दे एक किनारे हो जाते हैं. चोर चोर मौसेरे भाई.
                     
                           उन्हें रहना, फ़ोन, बिजली यात्रा सभी सुविधाएँ मुफ्त प्राप्त होती हैं. उनका वेतन और दैनिक भत्ता  इतना होता है कि उनके लिए कम तो नहीं कहा जाएगा. इस पर भी कल ये दलील पेश की गयी कि -- क्या वाकई सांसदों के वेतन और भत्ते इतने काम हैं की  उनको अपने सार्वजनिक जीवन और जन संपर्क के कार्यों में पूरा  नहीं पड़ पाता है.  
'सांसदों से ईमानदारी की अपेक्षा करना जितना जरूरी है, उतना ही व्यवहारिक बातों पर ध्यान देना भी. जिस तरह से मंहगाई बढ़ रही है, उसमें सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाना बिल्कुल जायज है.'     
                            ये सांसद कितने प्रतिशत एक बार चुनाव जीतने के बाद अपने चुनाव क्षेत्र में जाते हैं. इनको संसद सत्र के अतिरिक्त कभी भी समय नहीं होता है. संसद में प्रश्न पूछने के लिए उन्हें अपने ही क्षेत्र से घूस चाहिए तब वे संसद में मुद्दे उठाएंगे क्योंकि उनका खर्च पूरा नहीं पड़ रहा है. कोई सांसद राज्य सभा में चुनाव के लिए अपने मत की  कीमत १ करोड़ रुपये लगाता  है और कोई ५० हजार. ये कमाई के अतिरिक्त साधन हैं जो कि उनको एक सांसद होने के नाते प्राप्त हैं. 
                      अगर उनके इतर खर्चों पर निगाह डालें तो पता चलता है कि ये कुछ विधायक और सांसद जब तक दो चार हत्याकांड में वांछित  न हों उनका दबदबा कम ही रहता है और इस दबदबे के लिए कई कई गुर्गों को पालने का खर्चा भी तो होता है.  उसको भी शामिल किया जाना चाहिए .
                       कभी इन सांसदों ने सोचा है कि अपने क्षेत्र कि समस्याओं  पर भी इसमें से कुछ खर्च कर दिया जाय. सांसद निधि से वे क्या करवाते हैं? दो मीटर सड़क बनवा दी और एक बड़ा सा पत्थर प्रमाण के लिए लगवा दिया गया चाहे उससे जुड़ी सड़क पानी और कीचड से भरी ही क्यों न पड़ी हो? इसके लिए भी उनके चमचों को पहुँच होती है. नहीं तो ये सांसद आम आदमी कि समस्याओं से दो चार कब होते हैं? हाँ ये जरूर सुनने को मिल जाता है कि इस बार आप हमें जिताइये  हम आपकी ये सड़क पक्की करवा देंगे और नाली पानी की  व्यवस्था जरूर सही करवा देंगे और फिर सब चमचों का राज. 
                       इस जगह एक ऐसे सांसद का उल्लेख मैं जरूरी समझती हूँ जो कि इटावा के जसवंत नगर  क्षेत्र से सांसद थे . अपने कार्यों और  जन सेवा के बल पर सांसद बने. अपना सम्पुर्ण जीवन सेवा कार्य में लगाया . अपने परिवार के लिए इतना भी नहीं कर पाए कि उनके बाद पत्नी को कार्य न करना पड़े. उनकी पत्नी आज भी कपड़ों पर  प्रेस करके अपना जीवन यापन कर रही हैं. (दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के आधार पर.) 
                       कभी इन्होने ये सोचा है कि ६०-७० कि उम्र में काम करके पेट पालने वाले पुरुषों और महिलाओं के लिए ऐसे कार्य संचालित करवा सकें के वे घर में बैठ कर खाना खा सकें. इस उम्र में दूसरों के घर में जाकर काम करने की सामर्थ्य न होने पर भी वे मजबूर हैं. इस उम्र के बुजुर्ग रिक्शा खींच कर अपना और पत्नी का पेट पाल रहे हैं. उनका कोई वेतन नहीं होता और कोई भी भत्ता नहीं होता. अगर रिक्शा नहीं चलाएंगे तो रोती  नहीं खा सकेंगे .
                          ये हमारे जन प्रतिनिधि हैं और सिर्फ अपना और अपना ही हित सोचते हैं जिन्हें अपने वेतन और भत्तों की चिंता है आम इंसां की नहीं.

सोमवार, 26 जुलाई 2010

क़ानून और हम!

        बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मुकदमे के फैसले में अपना फैसला दिया कि "शादी का झूठा वादा  करके यौन सम्बन्ध बनाना  बलात्कार नहीं है." और उस आरोपी को बरी कर दिया गया.
                       अब हमारा न्याय इस बात को स्पष्ट करे कि  यह अपराध किस श्रेणी में रखा जाय और अगर वह किसी भी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है तो फिर हमारे मूल्यों को कौन बचाएगा या फिर उनको फिर से परिभाषित किया जाय? क्या इस श्रेणी में वह लड़की अपराधी बनती है जो इस झांसे में आकर अपना भावात्मक और यौन शोषण करवाती रही. इस का परिणाम कुछ भी हो सकता है , वह लड़की गर्भवती हो सकती है, वह इस धोखे से धोखा खाकर आत्महत्या कर सकती है या फिर विक्षिप्त हो सकती है. तब हमारे कानून को बताना चाहिए कि इस हालात में उस बच्चे का क्या होगा? इस लड़की का भविष्य क्या होगा? बरी किया गया व्यक्ति तो पाकसाफ दमन लेकर समाज में सिर उठाये घूम रहा है और वह लड़की  जो जिन्दगी जियेगी ये हम सब को पता है.
                         अब जरूरत इस बात की है कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों को परिमार्जित करके फिर से परिभाषित किया जाय क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति के समागम से हमारे मूल्यों का ह्रास हो चुका  है और हमारे विधि शास्त्र  को भी नवीन स्वरूप की आवश्यकता आन पड़ी है. लिव इन रिलेशनशिप  को मान्यता दी जा चुकी है बगैर ये जाने कि ये सुविधा और सुख की वजह से सामजिक मूल्यों का विघटन हो रहा है और इन संबंधों को प्रयोग के तौर पर मानने वालों के लिए तो कुछ भी नहीं है लेकिन इसमें भावात्मक रूप से जुड़े होने वाले के लिए शेष जीवन का स्वरूप ही बदल जाएगा.
                    हमारी क़ानून व्यवस्था किसी एक न्यायाधीश के द्वारा दिए गए निर्णय से थरथरा जाती है और फिर आम आदमी उसमें सिर मारता रह जाता है. हम अपने क़ानून व्यवस्था के सदियों पुराने कानूनों को आजतक बदल नहीं पाए हैं और वे बेमानी क़ानून हमें ही मुँह चिढा रहे हैं. आधे अधूरे क़ानून न्याय को सुलभ  नहीं दुर्लभ और दुष्कर बना देते हैं. इतने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट रोज कानून के पांसों से खेलते  है लेकिन फिर भी कुछ खोटे और कालातीत सिक्के अब भी क्यों चलाये जा रहे हैं? क्यों नहीं सोचा जाता कि इनको बदला जाय. इन्हीं के बीच में फंसा इन्साफ पाने वाला दम तोड़ देता है और उसको इन्साफ नहीं मिलता है.

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

मेरा सफरनामा (नासिक) !

               अब हमारी बारी थी नासिक को घूमने की. हमारी पहली ही यात्रा थी तो यहाँ के दर्शनीय स्थलों  से हम अधिक परिचित न थे लेकिन हमारे टैक्सी  वाले ने बताया कि   यहाँ  पर भी बहुत सारे स्थान देखने काबिल हैं. नासिक रोड से एक घंटा लगता है नासिक जाने में. रामायण कालीन  बहुत सारे स्थल हैं - जो आज भी उस काल के इतिहास के साक्षी माने जाते हैं. एक खास बात मुझे वहाँ जाने पर यह पता लगी कि  यहाँ नासिक नाम पड़ने के पीछे भी एक कथोक्ति है कि  यहाँ पर लक्ष्मण जी ने रावण की बहन सूर्पनखा की नाक काटी थी इसी लिए इसका नाम नासिक पड़ा. हम लोग उस स्थान को भी देखने गए जहाँ पर ये घटना घटित हुई थी. वहाँ एक कुटिया जैसे स्थान पर सूर्पनखा की क्षत विक्षत नाक वाली प्रतिमा और साथ ही लक्ष्मण  जी की प्रतिमा बनी हुई थी.                         यहाँ पर पंचवटी नामक स्थान विशेष उल्लेखनीय है. वैसे तो पंचवटी तो श्री राम की महत्वपूर्ण कार्यस्थली कही गयी है जहाँ पर वे अपने वनवास काल में रहे. उनके जीवन काल की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े स्थल अपनी अपनी कहानी कह रहे थे. वह अगस्त्य मुनि का आश्रम जहाँ पर राम को उपदेश दिए थे और उनकी पत्नी ने सीता को.. वह कुटिया जहाँ तीनों ने निवास किया था. 

                       सीता की स्मृतियों से जुड़ी हुई सीता गुफा है, जिसमें कहा जाता है की सीता जी ने निवास किया था. उस स्थल को देखने वालों की भीड़ देखते बनती थी. और वे सभी  एक विशाल लाइन  में खड़े थे. जब कि  उस गुफा में सिर्फ एक व्यक्ति ही प्रवेश कर आगे बढ़ सकता था और वह भी बैठे बैठे ही आगे बढ़ सकता था. एक लम्बी सुरंग की तरह वह गुफा सीता के निवास की कहानी कह रही थी.
                  वहाँ  से हम उस स्थान पर गए जहाँ पर कपिल मुनि ने तपस्या करके कपिला नामक नदी को प्रकट किया था और उस स्थान पर कपिला और गोदावरी नदी का संगम स्थल है. छोटी बड़ी पहाड़ियों के बीच में ये संगम स्थल है और चित्र में वही स्थल देखा जा सकता है.

                 इसी स्थान par  पहाड़ के ऊपर राम लक्ष्मण और सीता की  बड़ी बड़ी सी  मूर्तियाँ कहें या मैटल से  बनायीं गयी प्रतिमाएं जिन्हें पत्थर की ही नाव पर दिखाया गया है. चित्र में इनका आकाश की पृष्ठभूमि में दिखाई देना मुझे बहुत ही आकर्षक लगा था.


                 सीता का रावण द्वारा किये गए हरण के समय जिस कुटिया में सीता थी और लक्ष्मण द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा का स्थल भी चिन्हांकित किया गया है.
                रावण के पुत्र मेघनाद का वध करने के लिए लक्ष्मण ने जिस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी , उसको भी विशेषरूप से चिन्हांकित किया गया है. इतने वर्ष बाद भी उस वृक्ष के अस्तित्व के विषय में शंका तो होती है लेकिन इतने साक्ष्य के बीच अविश्वास दब जाता है.
               नासिक की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है, इस पूरे स्थान को धार्मिक दृष्टि से देखें तो अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान है. यहाँ पर सिंहस्थ कुम्भ पड़ने वाला स्थल भी हमने देखा. गोदावरी के किनारे उस स्थल की तस्वीर भी ली. यद्यपि गोदावरी का पानी इस स्थान पर कानपुर कि गंगा से कम गन्दा न था, फिर भी लोग उसमें डुबकी लगा कर नहा रहे थे. चारों ओर पालीथीन तैर रहीं थी.

                एक विशेष बात मुझको यह लगी कि यही गोदावरी के किनारे ही बने बड़े बड़े बरामदों के ऊपर नगरपालिका द्वारा निर्मित भवन है , जिसमें पर्यटक अपना सामान जमा करके पूरा नासिक घूम सकते हैं और चलते समय कुछ शुल्क देकर सामान लेकर जाएँ. न सामान ढोने का चक्कर और न ही कुछ घंटों के लिए होटल का चक्कर क्योंकि स्टेशन नासिक रोड पर है जो कि यहाँ से बहुत दूर है.
               गोदावरी के गंदे पानी को छूने का मन नहीं कर रहा था , वही गोदावरी के किनारे ही एक चौमुखी सिंह की प्रतिमा थी जिसके चारों मुख से पानी निकल रहा था और वह पानी एकदम साफ था. लोग उसको गंगाजल की तरह से बोतल में भरकर ले जा रहे थे.
              संगम थल के पास ही एक भव्य मंदिर कपालेश्वर का मंदिर था. जिसके बारे में कहा गया है कि सम्पूर्ण भारत में यही एक मंदिर ऐसा है जहाँ पर शिवलिंग के साथ नंदी की प्रतिमा नहीं है. इस स्थान पर नंदी को गुरु मानकर स्थापित नहीं किया गया है . इस मंदिर के दर्शन से सम्पूर्ण बारह ज्योतिर्लिंगों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. काफी ऊंचाईपर बना यह मंदिर काफी बड़ा और सीढ़ियों के बीच बीच में  और भी मंदिर बने हुए हैं.
                  इसके अतिरिक्त यहाँ पर गोराराम, कालाराम के मंदिर भी हैं . जिनमें राम की काली और गोरी प्रतिमाएं हैं. काले पत्थर से बने ये विशाल मंदिर पुलिस के नियंत्रण में भी हैं. यहाँ पर कैमरा ले जाना निषिद्ध हैं . उन मंदिरों कि स्थापत्य काला देखते बनती है. ये कितने प्राचीन हैं .इसके बारे में उनके पत्थरों   और उनपर उत्कीर्ण कृतियों से ही लगाया जा सकता है.
                 इन मंदिरों के बाहर बने बरामदों में बुजुर्ग महिलायें रुई की  बत्तियां बना रही होती हैं और लेने वालों को पैसे देकर बेचती भी हैं. यहाँ न बुढापा एक समस्या  न वक्त काटना. कई महिलाओं के समूह आपस में बातें करते हुए काम कर रही होती हैं. जो आत्मनिर्भरता का एक साधन भी है .                     
                   नासिक में विशुद्ध  महाराष्ट्रीय  संस्कृति के दर्शन हुए. पुरुष सिर पर गाँधी टोपी लगाये हुए. पहले लगा कि ये सब राजनीति से प्रेरित हैं क्या? लेकिन नहीं ये वहाँ की संस्कृति है. औरतें  लांगदार  धोती पहने हुए मिलेंगी और पुरुष धोती कमीज और टोपी में नजर आयेंगे.

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

ये मौत के सौदागर!

            वह कथोक्ति है न कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है ईश्वर उनके लिए खाई खोद कर तैयार कर देता है. लेकिन  ये कहावतें त्रेता , द्वापर या सतयुग में चिरतार्थ होती होंगी. अब तो दूसरों को मौत बेचने वाले किसी जेल में नहीं बल्कि मखमली सेजों पर सोते हैं. उनपर हाथ डालने की हिम्मत किसी नहीं है.
                         कुछ दिन पहले पढ़ा कि CSIR के एक अधिकारी की मृत्यु  लौकी का रस पीने से हो गयी. ये आयुर्वेद चिकित्सा की औषधि है और इसमें गलत कुछ भी नहीं है. हाँ कुछ ऐसी मानसिकता वाले लोगों ने इसे दूषित करने की कसम खाई है.  जो प्रकृतिका चिकित्सा कि औषधियों को भी जहर बना रहे हैं.
                      कानपुर में गाँव से दूध वालों के डिब्बों  को पकड़ा गया तो सब डिब्बे  छोड़ कर भाग गए क्योंकि उस दूध में यूरिया और फार्मोलीन   मिला हुआ होता  है जो किसी विष से कम घातक नहीं है. ये भी मौत परोस रहे है. हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि हरी सब्जियों में विशेषरूप से लौकी, खीर, तरबूज, और खरबूजे में किसान ऑक्सीटोसिन  के injection लगाकर रातोंरात बड़ा करके  बाजार में लाकर बेच लेते हैं. ये oxytocin भी जहर ही है. हरी  और मुलायम सब्जियां सबको आकर्षित करती हैं और हम  सभी उस जहर को जज्ब करते रहते हैं और फिर एक दिन  -
*बहुत दिनों से पेट में दर्द की शिकायत थी , पता चला की कैंसर है.
*भूख नहीं लगाती थी, पेट भारी रहता था लीवर सिरोसिस निकला.
*इसी पीलिया, आँतों में सूजन और पता नहीं कितनी घातक बीमारियाँ एकदम प्रकट होती है. फिर
उनका अंजाम कुछ    भी होता है.
                          सिर्फ यही क्यों? सभी खाद्य पदार्थों में मिलावट एक आम बात हो चुकी है और उसको जहरीला बनाने वाले लोग हम में से ही तो होते हैं. सिर्फ धनवान बनने की चाहत में जहर बो रहे हैं और इन  चीजों से दूर रहने  वाला आम आदमी इस जहर को अपने शरीर में उतार रहा है और उसके दुष्परिणामों को भी झेल रहा है .
                       वे जो ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगा कर जानवरों से दूध निकाल  रहे हैं या सब्जियां उगा रहे हैं वे इस ख्याल में हैं कि  वे अपनी चीजों को प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन यह भूल जाते हैं कि सारी वस्तुएं वे ही नहीं बना सकते हैं और उनके भाई बन्धु उनके लिए भी जहर परोस रहे हैं  जिसको  वे निगल रहे हैं.  इस बात से अनजान  तो नहीं हो सकते हैं फिर क्यों मानवजाति के दुश्मन अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ये जहर  खा और खिला रहा है. वह क्या सोचते हैं कि  इस जहर से बच जायेंगे? क्या धनवान बनने से  वे दूसरों के खिलाये जा रहे जहर से ग्रसित होकर खून की उल्टियाँ नहीं करेंगे?
क्या वे  कैंसर से ग्रसित नहीं होंगे?
पक्षाघात या हृदयाघात का शिकार नहीं होंगे?
हमारे बच्चे क्या इसकी पीड़ा नहीं झेलेंगे?
                      अगर वे इस बात से इनकार कर रहे हैं या अनजान हैं तो कोई बात नहीं. लेकिन ऐसा कोई भी चोर नहीं होता कि अपने किये अपराध की सजा न जानता हो. जब तक नजर से बचा हैं तो सफेदपोश और जिस दिन ये भ्रम टूट गया तो इससे बच वे भी नहीं सकते .हाँ ये हो सकता है कि पैसे के बल पर वे इन रोगों से लड़ सकते हैं लेकिन उस पीड़ा को उनकी तिजोरियों में रखा हुआ धन नहीं झेलेगा और क्या पता वह भी मौत से हार जाये और आप खुद अपने ही हाथों मौत परोस कर खुद ही उसके शिकार हो जाएँ.
                    इस जहर से कोई नहीं बच सकता है. अगर हम नहीं बचेंगे तो ये मौत के सौदागर भी नहीं बचेंगे.

                   

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

मेरा सफरनामा (शनि शिंगुनापुर)

               त्रयम्बकेश्वर से चल कर हम अपनी नयी मंजिल की ओर बढे तो चले वापस नासिक रोड और वहाँ से टैक्सी  करके चल दिए अहमदनगर के सीमा में पड़ने वाले शनि देव के प्रसिद्द स्थल शिंगुनापुर के लिए.  जब  हम  होटल  से  चलने  वाले  थे  तो हमने एक टैक्सी की. वहाँ से करीब १६० किमी है. मेरी बेटी को रोड यात्रा बिल्कुल भी सूट नहीं करती. वह और उसके सहेली ( मेरी मानस पुत्री ) दोनों ही कहने लगी तो ये तो जा नहीं सकती. ५ किमी तक में इसकी हालात ख़राब हो जाती है. अपने इतनी लम्बी जर्नी के लिए कैसे सोच लिया?
                                  पतिदेव भी गुस्से में आ गए कोई नहीं जाएगा. सब होटल में ही रुको और वापस चलो.  मेरा बहुत मन था कि यहाँ तक आयी हूँ तो दर्शन कर ही लूं. पापा की गुस्सा से दोनों ही बेटियां चलने के लिए बेमन से तैयार हुईं. टैक्सी की गयी और जब मैं होटल की सीढियां उतर रही थी तो मैंने मन ही मन कामना की -ये मेरी आस्था की परीक्षा है, मेरी बेटी को मंदिर तक सकुशल ही ले जाना चाहती हूँ और आपकी कृपा भी चाहती हूँ. " . बहुत दूर था मंदिर और बाई रोड ही जाना था. नासिक से शिंगुनापुर  जाने वाले रास्ते में एक खास चीज यह भी देखी की थोड़ी - थोड़ी दूर पर टेंट लगा कर कुर्सियां डाल कर दुकाने सजी थीं और वहाँ पर कोल्हू में जुटा हुआ बैल शांत खड़ा था शायद ग्राहकों के आने की प्रतीक्षा कर रहा था की कब आयें और उसको गन्ने का रस निकालने के लिए आदेश मिले. अभी तक तो मैंने मशीनों से रस निकलते हुए ही देखा था. यह मेरा पहला अनुभव था कि दुकान में बैल को कोल्हू में जोत कर रह निकल रहे थे.

                          मंदिर के अन्दर शनि देव की शिला जो की पूजन के लिए स्थापित है.

मंदिर के अन्दर तस्वीरें लेने के लिए अनुमति नहीं थी. फिर भी सिर्फ एक तस्वीर किसी तरह से ली और फिर शेष मंदिर के परिसर में ली गयीं.

इस स्थान पर हम पहली बार गए थे बस सुना भर था कि इसका हिन्दू धर्म में बड़ा ही महात्म्य है. आज इस समय जब कि हम १६० किमी की यात्रा करके आये और मेरी बेटी कि हालात वैसे ही सामान्य थी जैसे कि ट्रेन से यात्रा करने में होती है. मेरी आस्था  और दृढ हो चुकी थी   क्योंकि सब कुछ अच्छा लग रहा  था. ऐसा होने की तो मेरी बेटी कल्पना ही नहीं कर सकती थी और इस समय वह भी उस अज्ञात शक्ति के लिए नतमस्तक थी.
शनिवार के दिन यहाँ पर बहुत अधिक भीड़ होती है. चारों तरफ कारों, टैक्सियों और बसों का ताँता लगा था.. यहाँ पर शनिदेव की शिला का पूजन सिर्फ पुरुष ही करते हैं और वह भी वहीं प्रसाद कि दुकानों से मिलने वाले नारंगी रंग के एक वस्त्र धोती में. जिसको पहन कर नहा कर गीले वस्त्र में ही पूजन करने जाते हैं. चारों तरफ पुरुष तो नारंगी रंग के वस्त्रों में थे ही साथ ही नन्हे बटुक भी उसी वेशभूषा में बहुत प्यारे लग रहे थे. स्त्रियाँ मंदिर  प्रांगन में ही दर्शन कर सकती हैं. शिला स्पर्श करने का विधान वहाँ नहीं था. अपार भीड़ के बाद भी वहाँ पर कोई धक्का मुक्की नहीं थी. मंदिर के परिसर में सरसों का तेल चढाने के कारण चारों तरफ फिसलन थी. और शिला वाले चबूतरे पर तो तेल का तालाब ही बना हुआ था.
बस अगर सबसे खलने वाली बात थी तो ये थी यहाँ पर प्रसाद की दुकानों पर बड़ी लूट मची हुई थी. - एक प्रसाद की डलिया जिसमें मुश्किल से ३० या ३५ रुपये का सामान होगा उसकी कीमत उन लोगों ने ३५१ रुपये वसूल की. जब कि मंदिर जाने से पहले २५१ बताया था और लौट कर आने पर जब पेमेंट किया तो १०० रुपये बढ़ा कर लिए और बोले कि नहीं  इतना ही होता है. इसके साथ ही टैक्सी वालों का कमीशन भी ये लोग देते हैं कि भक्तो को उनके यहाँ लाने पर इतना मिलेगा. खैर ये तो सभी तीर्थ स्थानों पर होता है लेकिन इस तरह से नहीं. जब कि ये मान्यता है और सिर्फ मान्यता ही  नहीं बल्कि सत्य भी है कि यहाँ पर घरों में या दुकानों में आज भी ताले नहीं डाले जाते हैं. घर खुले ही रहते हैं और यहाँ पर चोरी जैसे घटनाएँ घटित नहीं होती. इसके बाद हम उसी टैक्सी से वापस नासिक रोड होटल में लौट कर आये कुल ३२० किमी यात्रा करने के बाद भी सभी लोग खुश थे और खास तौर पर मैं कि मेरी बिटिया रानी बिल्कुल नॉर्मल थीं और आज मैंने अपनी आस्था और विश्वास को पूरी तरह से फलीभूत होते देखा था.  
                

बुधवार, 30 जून 2010

मेरा एक सफरनामा (त्रयम्बकेश्वर मंदिर) !

                                              ऐसी सफर और सैर मैंने परिवार और कुछ आत्मीय लोगों के साथ शायद पहली बार की और उसको पूरा पूरा एन्जॉय किया. बस दुःख इस बात का रहा कि मेरी छोटी बेटी अपने exam के कारण इसमें शामिल नहीं हो पायी. इसमें अलग अलग राज्यों के मौसम से परिचय भी हुआ और उसका सुखद अनुभव भी अविस्मरणीय रहा.
                                             वैसे तो मेरा पड़ाव पहले नासिक ही रहा लेकिन मैंने सबसे पहले त्रयम्बकेश्वर  से ही अपनी यात्रा आरम्भ करती हूँ. नासिक रोड स्टेशन से लगभग २८ किलोमीटर कि दूरी पर पहाड़ियों के बीच में स्थित है. यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है.

इस स्थान का विहंगम दृश्य देख कर ही पता चलता है कि इसकी सुन्दरता तो  अद्भुत ही है, साथ ही इसके लिए हिन्दू धर्म में जो आस्था जुड़ी है उसने इसको और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है. भारत भूमि पर स्थित १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक यहाँ पर है. यहाँ पर दर्शन के लिए लाइन में लगे लोगों को देख कर ही वहाँ के लोग बता देते हैं कि अभी ४ घंटे की लाइन लगी है. यहाँ पर सिर्फ त्रयम्बकेश्वर का ही महत्व नहीं हैं बल्कि गोदावरी नदी और ब्रह्मगिरी पर्वत को भी उतना ही महत्वपूर्ण मना जाता है.
त्रयम्बकेश्वर मंदिर का निर्माण नासिक  के  समीप  त्रयम्बक नामक  स्थान पर  श्रीमंत बालाजी बाजीराव उर्फ नानासाहिब  पेशवा द्वारा १७५५ में आरम्भ किया गया था और १९८६  में इसका कार्य पूर्ण हुआ था. . उस समय इस मंदिर के निर्माण में १६ लाख मुद्रा और ३१ वर्ष का समय लगा था. 
इसमें जो ३ लिंग स्थापित है , वे ब्रह्मा (सृष्टि के सृजक), विष्णु ( सृष्टि के पालक ) और महेश (सृष्टि के संहारक) के प्रतीक माने जाते हैं. शेष ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ भगवान शिव के लिंग को ही देखा जा सकता है.  ये लिंग प्राकृतिक हैं और गंगा का पवित्र जल शिवलिंग के ऊपर बहता है. ये लिंग जल के नीचे ही रहते हैं. पुजारी यहाँ पर दिन में तीन बार पूजा करते हैं और इसके लिए उनको १००० रुपये का प्रतिदिन का अनुदान प्राप्त होता है. प्रदोष काल  में विशेष पूजा का प्रावधान है. 

इस मंदिर कि वास्तु काला और प्राचीन स्थापत्य काल को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पत्थरों पर की गयी उत्कीर्णन का कार्य कितना उत्कृष्ट और अनुपम होता था. सदियों से खड़ा ये मंदिर आज भी अपनी  कथा स्वयं कह रहा है . 

मंदिर  की स्थापत्य  काला  का  नमूना यहीं  देख  सकते  हैं .
  
त्रयम्बक में स्थित ये कुण्ड गोदावरी नदी के उद्गम से बना स्थल मान  जाता है. गोदावरी नदी का उद्गम ब्रहाम्गिरी पर्वत से ही माना जाता है और इसको गंगा की  तरह ही पवित्रतम नदी माना जाता है. रामायण युग में सीता के इस गोदावरी में स्नान के लिए विशेष प्रेम की कथाएं सुनने को मिलती हैं. 
इस बारे में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अगर देर रात्रि नासिक से त्रयम्बक पहुंचना हो तो वहाँ के रास्ते इतने सुनसान हैं कि किसी भी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है. चारों ओर पहाड़ियों के बीच होने के कारण वहाँ पर जन जीवन भी बहुत अधिक नहीं है. वहाँ पर पूजा और धार्मिक संस्कारों से जुड़े कार्यों के लिए विशेष महत्व का स्थान माना जाता है.

सोमवार, 21 जून 2010

उ. प्र. में बी टी सी का यथार्थ !

                            
आजकल मैं भी और माँओं  की तरह से वर की खोज करने में लगी हूँ और जब भी अखबार का matrimonial देखती हूँ. तो खासतौर पर हिंदी पेपर में आज कल लड़की की योग्यता में एक लाइन अक्सर देखने को मिल जाती है  - 'विशिष्ट बी टी सी को प्राथमिकता' .
                          सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि ये विशिष्ट बी टी सी है क्या? उ. प्र. में बी. एड . करने वालों की संख्या इतनी हो चुकी थी कि उनको जॉब नहीं मिल पा रही थी तो यहाँ की सरकार ने सब बी. एड. डिग्री धारियों को एक अल्प प्रशिक्षण के बाद विशिष्ट बी. टी. सी. का नाम लेकर प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्त करने का प्रावधान किया है. अब ये बी एड धारी गाँव में पढ़ाने के उद्देश्य से तो पढ़े नहीं थे और न ही इसके इच्छुक होते हैं लेकिन फिर भी सरकारी नौकरी के मजे तो सभी को पता हैं और फिर क्यों इधर उधर भटकें सो इसी में लाइन में लग जाओ . आज नहीं तो कल नौकरी पक्की हैं.
                         इनमें से अधिकतर लोग जुगाड़ वाले होते हैं और फिर अगर जुगाड़ न चली तो और रास्ते खोज लेते हैं. जिसकी पोस्टिंग हो गयी जाकर वहाँ ज्वाइन जरूर कर लेंगे और फिर शुरू होती हैं इसकी हकीकत से दो चार होना.
                          इस बार बी टी सी के आवेदन पत्र भरने वालों में २० प्रतिशत वे हैं जो कि एम बी ए, एम सी ए. , बी एम एस, बी ए एम एस और बी टेक हैं. ये आंकड़े क्या दर्शाते हैं कि हमारे यहाँ शिक्षा का व्यापारीकरण इतना हो चुका है कि कुकुरमुत्तों कि तरह खुलते जा रहे इंजीनियरिंग कॉलेज, मैनेजमेंट  कॉलेज, मेडिकल कॉलेज ने शिक्षा कि उपयोगिता पर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं.
                          हम इस दिशा से आ रहे बी टी सी करने वाले लोगों से क्या ये अपेक्षा कर सकते हैं कि वे गाँव में जाकर गरीब बच्चों को पढ़ाएंगे और सही शिक्षा दे पायेंगे. कभी नहीं, वे सिर्फ सरकारी नौकरी के लालच में ऐसा करने के लिए इच्छुक हैं. जहाँ कोई पुरसाहाल नहीं होता, आप हफ्तों स्कूल न जाएँ - चाहे जब चले जाएँ या न जाएँ  - हाँ जब निरीक्षण हो तो आप उपस्थित हो जाएँ आपका रिकार्ड एकदम सही रहेगा.
और हम ऐसे शिक्षकों से आशा भी क्या कर सकते हैं?
कितने पैसे भर कर उन्होंने प्राइवेट संस्थायों से ये उपाधियाँ ली होंगी?
कितने सपने इतने  सालों तक उनके मन में सजे रहे होंगे? लम्बे पॅकेज और बढ़िया कंपनी में जाने का सपना, किसी बड़े शहर में रहकर नौकरी करने का सपना, दो चार साल के बाद विदेश जाने का सपना, बढ़िया कार और बंगले में रहने का सपना.
                   एकाएक सब छोड़ कर बी टी सी करके नौकरी करने का निर्णय - जिसमें न पढ़ने वालों का कोई स्तर और न स्कूल का. हाँ एक सुरक्षित भविष्य का सपना जरूर है. चाहे जाएँ या न जाएँ हर महीने मोटी पगार तो बैंक में जाने वाली है.
                   इस उपाधियों के लेने के लिए उन्होंने बड़े शहर में रह कर ही पढ़ाई की होगी , फिर अब  गाँव और वह भी कभी कभी तो एकदम सड़क से बहुत दूर , जहाँ पर सवारी भी उपलब्ध नहीं है , नौकरी करने क्यों जायेंगे? कैसे तैयार कर रहे हैं उस काम के लिए. क्योंकि  उनको यह पता है कि बस पोस्टिंग लेनी हैं बस फिर सब अपनी मर्जी.
                   कुछ उदाहरण - मेरी एक बहुत खास बी एस सी और कंप्यूटर में डिप्लोमा के बाद अचानक बी टी सी करने चली जाती हैं क्योंकि उनके ससुर उसी इलाके में मास्टर साहब हैं और फिर नियुक्ति भी मास्टर साहब के अनुकूल ही मिल गयी. ये सर्वविदित हो गया कि ये मास्टर साहब की बहू हैं आये या न आयें उपस्थिति तो लग ही जानी हैं . फिर कभी कभी जाना पड़े तो शहर की रहने वाली लड़की कैसे गाँव  की नौकरी पर समय से पहुंचे. उनके पतिदेव स्कूल पहुँच कर प्रार्थना करवा देते हैं और बच्चों को बिठा देते हैं और वे बाद में तैयार होकर पहुँच जाती तो पतिदेव घर आ जाते.
                         दूसरे महिला भी मेरे बहुत करीब लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि ये पोल मैं ही खोलने वाली हूँ. वे पति के साथ पुणे में रहती हैं और नौकरी उनकी यहाँ चल रही है. कैसे? उन्होंने अपनी जगह एक बेकार युवती को नियुक्त कर दिया है और उसको २-३ हजार रुपये हर महीने दे देती हैं . खुद महीने में एक बार आकर पूरे महीने के हस्ताक्षर करके चली जाती हैं. हाँ बाकी काम वह लड़की संभाल  लेती हैं. इनकी तरह से एक नहीं कईयों लड़कियाँ और लड़के हैं जो ठेके पर अपना काम करवा रहे हैं और खुद वेतन उठा रहे हैं. सौदा क्या बुरा है? २-३ हजार दे भी दिए तब भी १५ तो अपनी जेब में आ ही रहे हैं. कुछ जरूरत हुई तो विभाग में खिला पिला दिए.
                         अब हर जगह ये किसी तरह से बी टी सी में हो जाये, फिर तो भविष्य सुरक्षित. लेकिन ये सुरक्षित भविष्य क्या देश के भावी भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहा है. ये यथार्थ है उ. प्र. कि बी टी सी की.