बुधवार, 21 सितंबर 2016

आठ वर्ष ब्लॉगिंग के !

         आज मुझे अपने ब्लॉग को शुरु किये हुए आठ वर्ष हो गये । बहुत कुछ सीखा और अपने पाँच ब्लॉग बनाये हैं , अलग अलग उद्देश्य से । ईमानदारी से कहूँगी कि कुछ वर्षों तक तो उनके साथ न्याय कर पायी फिर कुछ  अन्य कार्यों में व्यस्तता और सामाजिक सरोकार में वृद्धि से समय कम दे पायी । 
                    .इस बीच ब्लॉगिंग में भी गुटबाजी का असर देखा और लंबी लंबी कमेंट वाली लड़ाई भी देखी । हम कभी बोले जहाँ देखा कि बोलना जरूरी है । बहुत सहयोगी ब्लॉगर साथी हैं सभी । मैंने कई परिचर्चायें आयोजित की और सबसे बहुत सहयोग मिला । किसी ने ये नहीं सोचा कि नयी हूँ तो अपने विचार क्यों दें? लेकिन समकक्ष मानकर सबने जो साथ दिया अभिभूत हुई ।
                    एक कटु अनुभव भी रहा -- एक सामूहिक ब्लॉग ने मुझे अध्यक्ष बनाया और शायद सोचा था कि एक रबड़ स्टाम्प मिल गया  । मैं पहले से उसकी सदस्य थी और फिर कुछ साथियों ने मना किया कि मैं इस पद को स्वीकार न करूँ क्योकि संस्थापक ही सर्वोपरि हैं । फिर भी मैंने चुनौती स्वीकार की और उस ब्लॉग के अतीत को देखते हुए सबसे पहले एक आचार संहिता बना कर ब्लॉग पर डाली और सबको मानने का अनुरोध भी था । कुछ दिन चला फिर वही वैमनस्य बुढ़ाने वाली पोस्ट आने लगी और आचार संहिता ताक पर । क ई बार विनम्र अनुरोध के बाद भी कुछ रुका नहीं और मैंने पूरी तरह त्यागपत्र दे दिया ।
              फेसबुक के जलवे बढ़ने के साथ ब्लॉग के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ और त्वरित प्रतिक्रिया को देखने के लालच ने सब कुछ वहीं केन्द्रित कर दिया । ब्लॉग सूने हो गये । हम सभी दोषी हैं इसके लिए और नवें वर्ष में प्रवेश के साथ ही रोज न सही लेकिन ब्लॉग पर निरन्तर लिखने के लिए प्रतिबद्धता स्वीकार करती हूँ और सभी ब्लॉग पर जाकर पढ़ने का भी प्रयास करूँगी । हम ही एक दूसरे के हौसले को बढ़ाने का काम करेंगे ।

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

यादों के झरोखे से ःः जन्माष्टमी !

   जीवन के तमाम पर्वों में एक जन्माष्टमी सबसे ज्यादा उत्साह से मनाते थे । इसका कारण यह था कि इसकी झाँकी सजाने का सारा दारोमदार बच्चों पर ही होता था । हर घर में तब झाँकी सजाई जाती थी . थोड़ी तैयारी करके सहेली के घर जाकर देख आते और नये आइडिया लेकर आ जाते ।
       रक्षा बंधन में जो पैसे मिलते थे , उनसे छोटे छोटे खिलौने जैसे बस , हवाई जहाज खरीद लाते थे । माँ से सजाने के लिए साड़ियाँ ली जाती और फिर दरबार बनता । गिट्टियाँ इकट्ठा करके पहाड़ बनाये जाते और उन पर डालियाँ लगा कर पेड़ बनाते और छोटे छोटे चमकीले लट्टू लगाते । बालू रंग कर सड़कें बना कर बस रखी जाती थी । परात में पानी भर कर उसमें वसुदेव सिर पर टोकरी में कृष्ण को लिए होते । चोकर रंग कर रंगोली बनायी जाती , तब आज की तरह कलात्मक रंगोली नहीं बना पाते थे । परम्परागत चौक को ही सजाया जाता था ।
          सब भाई बहन अपने अपने आइडिया देते और हैड होते थे भाई साहब । यही एक त्योहार होता था जिसमें हमारी मर्जी चलती थी । तैयार होने पर पड़ोसियों की झाँकी से तुलना होती थी । हम आज के बच्चों की तरह पढ़ाई के बोझ तले न दबे थे । हर पर्व का पूरा मजा उठाते थे ।
       आज हम अकेले ही सारी तैयारी करते हैं , प्रसाद से लेकर मंदिर सजाने तक और व्रत भी होते हैं । अब सिर्फ परम्परा भर रह गयी है क्योंकि पर्व तो बच्चों से होता है । आज मैं ही नहीं बल्कि बच्चों के घर से निकलते ही सबकी यही कहानी रह जाती है । चलो चलें पूजा के लिए समय हो रहा है ।


आश्रम और गृह : समाज सेवा या आर्थिक स्रोत !



आश्रम या गृह- समाज सेवा का प्रतीक माने जाते हैं  जैसे -- सरकारी नारी कल्याण केंद्र , वृद्धाश्रम , बाल सुधार केंद्र या बालिका सुधार गृह , अनाथालय , संवासिनी गृह और बाल संरक्षण गृह का नाम सुनकर ये ही लगता है।  लेकिन इनको चलाने वाले एनजीओ में होने वाली गतिविधियों से यही समझ आता है कि कुछ लोग जोड़ तोड़ कर सरकारी सहायता प्राप्त कर दुनियां का दिखावा करके एनजीओ खोल लेते हैं और फिर उसे बना लेते हैं अपनी मोटी आमदनी का एक साधन। सब कुछ कागजों पर चलता रहता है , जब तक कि कोई बड़ी वारदात सामने नहीं आती है।  उसके पीछे का खेल एक दिन सामने आता है।एक एनजीओ को तो मैं भी अपने ही देखते देखते करोड़पति होने की साक्षी हूँ बल्कि कहें हमारे घर से दो किमी की दूरी पर है। वर्षों में उसी के सामने से ऑफिस जाती रही हूँ और वह सिर्फ ईंटों से बने स्कूल के मालिक ने कुछ ही सालों में इंटर कॉलेज , फिर डिग्री कॉलेज और साथ ही संवासिनी आवास तक बना डाले और फिर जब संवासिनी की मौत हुई और उसपर की गयी लीपापोती ने सब कुछ सामने ला दिया।
                           ये सिर्फ एक एनजीओ की कहानी नहीं है बल्कि ऐसे कितने ही और मिलेंगे। ,ये तो निजी आश्रम तो बनाये ही इसी लिए जा रहे हैं कि  वह इनके नाम पर सरकारी अनुदान लेने की नीयत होती है।  साम दाम दंड भेद सब  अपना कर पैसे वाले बनने का काम बहुत तेजी से चल निकला है। इन तथाकथित समाज सेवकों के दोनों हाथ में लड्डू होते हैं , समाज में प्रतिष्ठा , प्रशासन में हनक और हर महकमें में पैठ।  धन आने के रास्ते खुद बा खुद खुलते चले जाते हैं। इन पर सरकार का कोई अंकुश नहीं होता है क्योंकि मिलने वाले अनुदान में सरकारी विभागों का भी हिस्सा होता है और फिर कौन किससे हिसाब माँगेगा या फिर निरीक्षण करने आएगा।  सारी खाना पूरी कागजों पर होती रहती है।

सामर्थ्य का परिचायक 
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                            वृद्धाश्रम के नाम पर लोग अनुदान  देते हैं और  खुद समर्थ वृद्ध अपना खर्च खुद उठाते हैं।  लेकिन क्या सभी जगह उन्हें वह माहौल मिलता है, जो कि पाने के लिए वह वहां जाते है।  इनका खोलना किसी साधारण व्यक्ति के वश का काम नहीं होता है , इसके लिए पहुँच , पैसा और मानव शक्ति का होना बहुत जरूरी है।  कई जगह देखा है दूसरों की जमीन पर कब्ज़ा करके भवन निर्माण होने लगा और  पहुँच रहित और एक आम आदमी उनसे लड़ने की ताकत नहीं रखता है, वह थाने के चक्कर ही लगता रहेगा। उसकी जमीन पर भवन बना कोई आश्रम खोल दिया गया।  पहुँच से अनुदान मिल गया - भवन अनुदान , वृद्धों के लिए सरकारी सहायता , दान दाताओं से अनुदान।  इतने काम करने वाले पर पुलिस भी जल्दी हाथ नहीं डाल पाती है और जिसकी जमीन है वह लगाता रहे थाने के चक्कर उसकी एफ आई आर तक दर्ज नहीं होती है। सब तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला ही तो देखने को मिलता है।

अनुदान के बाद निरीक्षण 
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                           बाल संरक्षण गृह के नाम पर भी लोग अपना व्यवसाय चला रहे हैं। इसमें सभी शक के दायरे में नहीं आते हैं, लेकिन इन संरक्षण गृहो का जीवन अगर अंदर झांक कर कोई देखना चाहे तो संभव नहीं है और इसके लिए सहायक महिला आयोग , मानव संसाधन मंत्रालय , मानवाधिकार आयोग सब कहाँ सोते रहते हैं ? किसी की कोई भी जिम्मेदारी नहीं बनती है।  अगर संरक्षण गृह खोले गए हैं तो उनका  निरीक्षण भी उनका ही दायित्व बनता है।  एक दिन न सही महीनों और सालों में तो उन पर दृष्टिपात करना ही चाहिए।  वह हो इस लिए नहीं पाता  है क्योंकि पहुँच ही सारी कार्यवाही कागजों पर पूरी करवा देती है और फिर ये संरक्षण गृह यातना गृह बने होते हैं। इनका रख रखाव और साफ सफाई , खाना पीना सब कुछ ऐसा कि जिसे आम आदमी के खाने काबिल भी न हो।     

 सरकार का दायित्व 
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        बीमार कर देने वाला वातावरण और बदबू और सीलन से भरे हुए कमरे जिनमें वह बच्चे कैसे जीते हैं ? ये जानने की कोई भी जरूरत नहीं समझता है। निजी एनजीओ की बात तो हम बाद में करेंगे पहले हम सरकारी सरंक्षण ग्रहों की बात कर लें।  इनमें से आये दिन संवासनियां मौका मिलते ही भाग जाती हैं।  बाल संरक्षण गृहों से भी बच्चों के भागने की खबर मिलती रहती है।  अगर यहाँ पर उन्हें वह वातावरण मिलता है जिसके लिए उनको भेजा गया है तो वे अनाथ या संरक्षणहीन बच्चे  क्यों भागेंगे ? सब जगह ऐसा होता हो ये मैं नहीं कह सकती लेकिन अव्यवस्था और विवादित रखरखाव् पर सरकार को दृष्टि तो रखनी ही चाहिए।  किसी को तो ये सब चीजें संज्ञान में रख कर इनके प्रति जिम्मेदार होना चाहिए।

दाग पर दाग और बेदाग 
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                  रसूखदार लोगों के चल रहे बाल गृह एक धंधा मात्र है सरकारी पैसे को हड़पने का और अपने काले धन को सफेद बनाने का।  अभी  जून २०१६ को कानपु र के निकट रनियां में एक बाल संरक्षण गृह शांति देवी मेमोरियल  संस्था द्वारा संचालित  शिशु गृह एवं बाल गृह में से शिशु गृह में ५ बच्चियों की कुपोषण के कारण मौत हो गयी थी और तब उसको बंद करने का आदेश दिया गया था और बच्चियों को दूसरी जगह भेज दिया गया था।

                    बाल गृह में भी २३ अगस्त को ७ वर्षीय मासूम की मौत हो गयी।   यहाँ पर पालने वाले बच्चों के प्रति कौन जिम्मेदार होता है ? ये केंद्र बगैर निरीक्षण के कैसे चलते रहते हैं ? राज्य की भी कोई जिम्मेदारी होती है या नहीं। कितने आयोग चल रहे हैं ? मानव संसाधन मंत्रालय , महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और भी कई परियोजनाओं के अन्तर्गत इस तरह की संस्थाएं को अनुदान मिलता है लेकिन इसके बाद क्या कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है कि वे जाने इन में पालने वाले या संरक्षित किये जाने वाले बच्चों का हाल क्या है ? उनके रहने , खाने और चिकित्सा व्यवस्था कैसी है ? एक टीम को इसके लिए नियुक्त किया जाना चाहिए जो समय समय पर इनका निरीक्षण करे। बशर्ते कि  वे भी इन संस्थाओं की तरह पैसा बनाने का काम न करते हों.
                      कुछ साल पहले इलाहबाद के बालिका संरक्षण गृह में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण की बात सामने आयी थी और उसके पीछे भी बहुत सारे प्रश्न खड़े हो गए थे लेकिन फिर आगे क्या हुआ ? इसके बारे में कोई भी पता नहीं है।  वहां की वार्डेन अपने घर में रहती थी और बच्चियां पुरुष नौकरों के सहारे छोड़ दी जाती थीं। सरकारी संस्थाओं में ये हाल है कि वार्डेन के पद पर काम करने वाली महिला संरक्षण गृह से दूर अपने घर में सो रही है और बच्चियां पुरुषों के हवाले करके।  जिम्मेदार लोगों को सिर्फ और सिर्फ अपने वेतन से मतलब होता है। शायद  उनकी संवेदनाएं भी मर चुकी होती हैं।  प्रश्न यह है कि बच्चियों की संरक्षा का दायित्व महिलाओं को क्यों नहीं सौप गया था ?
                   इतनी सारी अनियमितताओं के बाद भी किसी की नींद खुलती नहीं है।  सरकारें आती और जाती रहती हैं लेकिन ये सब उसी तरह से चलती रहती हैं क्योंकि सरकार इस बात से अवगत ही नहीं है कि  कहाँ कहाँ और कितना अनुदान जा रहा है।  विभागों में सब कुछ निश्चित है कि  कितने अनुदान पर कितने प्रतिशत देना होगा।  वहां से चेक जारी ही तब होता है जब आप अग्रिम राशि के रूप में उन्हें चेक दे दें.


शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डॉक्टर्स डे !

                        आज डॉक्टर्स डे है और वाकई डॉक्टर्स जो भगवान का रूप है इसी दुनियां में हैं।  उनका एक ही धर्म होता है और वह है मानव सेवा।  कभी कभी तो वह अपने पास से पैसे भी देकर सेवा कर जाते हैं।  आज का दिन वाकई ऐसे ही लोगों के लिए नमन का दिन है।  आज के दिन मैं एक डॉक्टर के साथ अपने अनुभव को साझा कर रहे है।
                              कितने लोगों को किस तरह से वो सेवा करते रहे मैं नहीं जानती लेकिन वो मेरे लिए मेरे बहनोई भी थे और डॉक्टर भी।  स्व. डॉ अमित सक्सेना के प्रति किसी के अनुभव जो भी रहे हों लेकिन मेरे अनुभव बहुत ही यादगार रहे हैं।आज के दिन मैं  श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हूँ।

 
                                मेरे जीवन की दो यादगार घटनाएं ये साबित करने के लिए पर्याप्त है  , जिनसे मैं उस डॉक्टर के अहसान कभी भूल ही नहीं सकती हूँ।  मेरे ससुर को कैंसर था और उस समय उनको १५ दिनों में बहुत तेज बुखार आना शुरू हो चूका था।  जो उनको बराबर कमजोर करता चला जा रहा था और हमारे लिए भी कष्ट कारक था।  पता मैं नहीं जानती कि उन्होंने कौन सी दवा दी थी कि अंतिम समय तक जब कि  वह करीब १० महीने जिन्दा रहे  उनको बुखार नहीं आया।
                       साल तो मुझे याद नहीं है लेकिन मेरी छोटी बेटी प्रियंका एक दिन सुबह उठी तो उसको कोल्ड स्ट्रोक हुआ और आँखों से दिखना बंद हो गया था और पूरा शरीर उसका शिथिल हो  चूका था. उसने उठने की कोशिश की तो  तुरंत गिर पड़ी।  कितना मुश्किल था उस क्षण को एक माँ बाप के लिए झेलना लेकिन मेरे हर समस्या का समाधान अमित के पास होगा ऐसा हम विश्वास रखते थे।
                     तुरंत हमने अमित को फ़ोन किया और वह उस भयंकर सर्द  सुबह में जितनी भी दवाएं उस समय घर पर थीं , अमित  बाइक से चल कर १५ किमी दूर मेरे घर आ गए।  फिर शुरू हुआ उनका दवा देने का सिलसिला  और धीरे धीरे बेटी की हालत में सुधार शुरू हुआ।  करीब दो घंटे तक उपचार करने पर उसकी हालत में सुधार हुआ और जब वो उठकर खुद चलने लगी और उसको आँखों से भी दिखना शुरू हो चूका था।  तब अमित वहां से निकले।  मैं चिर ऋणी हूँ उनकी।
                      सिर्फ यही नहीं बल्कि हमारी किसी भी तकलीफ का इलाज उनके पास था।  सिर्फ एक फ़ोन की जरूरत होती थी और वह  पूरे लक्षण जान कर दवा लिखवा देते थे और हम उससे वाकई आराम पा जाते थे लेकिन ऐसे लोग अब दुनियां में बचे कितने हैं ?   उनके अकस्मात् और असामयिक निधन ने हमें  कमजोर कर दिया है लेकिन अगर ऐसे डॉक्टर इस धरती पर हों तो उनका भगवान नाम सार्थक है।  

रविवार, 5 जून 2016

खोयी बच्चियाँ या त्यागी या फिर अपहृत ?

      इधर विभिन्न स्रोतों से देख रही हूँ  कि कई बार बच्चियों की  तस्वीरें फेसबुक ,  व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल मीडिया पर दिखलाई दे रही हैं और आज कल कुछ ज्यादा नजर आने लगी हैं। कभी तो ये विचार आकर सोचने पर मजबूर कर देता है कि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो क्यों हो रहा है ? हाँ मैं इस बात को स्वीकार करती हूँ कि मैं भी ऐसी सूचनाओं को शेयर करती हूँ ताकि ये बच्चे अपने माँ बाप तक पहुंच जाएँ। 
                       
              इस चित्र ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि वास्तव में हो क्या रहा है ? ये चित्र कई बार घूम घूम कर आया और ये नागपुर स्टेशन का है।  फिर अचानक ये चित्र जिसमें महिला सिपाही नहीं थी फिर मेरे पास आया कि ये बच्ची चंडीगढ़ स्टेशन पर मिली है। इसके पीछे क्या चल रहा है ? 
                     ये मिलने वाली बच्ची इतनी छोटी भी नहीं है कि वह अपने शहर या गाँव का नाम न बता सके या फिर पापा मम्मी का नाम न बता सके।  अगर मान भी लें कि बच्ची नहीं बता सकती तो इसके माता पिता कैसे हैं कि उनकी इतनी बड़ी बच्ची स्टैशन पर छूट गयी और उनको खबर तक नहीं और जब भी उन्हें याद आया उन्हें पुलिस को खबर करनी चाहिए।  रेलवे अपने संपर्क से तुरंत ही पता कर लेती हैं और स्टेशन पर मिले बच्चे तो उनके संरक्षण में रहते हैं।  कहीं भी पुलिस को खबर करें वो संभावित जगहों पर जरूर खोजती है और पता चल ही जाता है। 
                      पिछले कई बार ये बच्चे ट्रैन या स्टेशन पर ही पाए गए।  किसी के दिमाग में ये सवाल उठा कि नहीं, मै नहीं जानती कि हम ये मान सकते हैं कि बच्चे दहशत में बदहवास हो जाते हैं और वह बोल नहीं पाते हैं।  इस के पीछे के कारणों पर नजर जाती ही है कि इस तरह से बच्चियों का पाया जाना किस बात का द्योतक है --

* क्या लड़की होने के कारण या फिर अधिक बच्चे होने के कारण ये बच्चियां जानबूझ कर छोड़ी गईं है ?

*क्या इन बच्चियों का ट्रैन से अपहरण किया गया है और किसी तरह से पकड़ने की आशंका से इसको वहीँ छोड़ दिया गया है ?

*क्या गलती से छूट जाने पर माता पिता ने इसकी रिपोर्ट रेलवे थाने या अन्य किसी थाने में दर्ज कराई भी है या नहीं ?

*क्या ये अपरहण के बाद लेकर छोड़ी गईं या किसी और मंशा से उठाई गईं थी ?

     इतने कारणों के बाद भी मैं इनके माता पिता की गलती और लापरवाही को ही इंगित करूंगी क्योंकि अपनी संतान के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों करेगा कोई ? क्या इस लिए कि वह लड़की है और उससे वे निजात पाना चाहते हैं। अगर तुरंत सूचना दें तो बच्ची मिल सकती है। अगर नहीं ही रखना चाहते हैं तो सामाजिक संगठन इस दिशा में बहुत काम कर रहे हैं।  लड़कियों को संरक्षण दे रहे हैं फिर हिम्मत कीजिये और खुद छोड़ कर आइये। बेटे की चाह में आई हुईं बेटियां खुद दोषी नहीं हैं बल्कि आपका पूर्वाग्रह दोषी है। 
             एक बात और है कि जो ऐसी घटनाओं को सोशल मीडिया के जरिये फैलाते हैं , जरूरी नहीं की वह हर व्यक्ति के लिए उतना ही सोच का सबब बन जाए।  अधिकतर एक स्टेटस की तरह पढ़ कर लाइक  या शेयर करके आगे बढ़ जाते हैं।  लेकिन कुछ संवेदनशील मन उन मासूम चेहरों को भूल नहीं पाते हैं।  ये प्रश्न सदैव मन में कौंधता रहता है कि  पता नहीं वह बच्चा अपने घर वालों को मिला या नहीं। इस लिए इस तरह के स्टेटस अपने को बहुत जिम्मेदार दिखाने  के लिए न डालें और अगर आप वाकई जिम्मेदार है तो पहली बार इसको डालने वाला तह तक जाए और खबर रखे कि वह बच्चा कहाँ गया ? अगर आप इसकी सूचना देने के लिए जिम्मेदार हैं तो आगे भी इस जिम्मेदारी को निभाने का कार्य करें।  
                  किसी बच्चे के जीवन का प्रश्न स्टेटस मात्र नहीं हो सकता है।

गुरुवार, 2 जून 2016

पाठ्यक्रम : नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य !

                      शिक्षा मानव जीवन की ऐसी नींव डालता है , जो उसके मनो-मष्तिष्क में गहरे पैठ जाती है और इसके कारण ही बच्चों के जीवन में संस्कार या फिर अपने समाज , देश और परिवार के प्रति एक अवधारणा बन जाती है।  चाहे घर हो , स्कूल हो या फिर उसका अपना दायरा - उसके चरित्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।  आज के सन्दर्भ में जब कि चरित्र और संस्कार का निरन्तर ह्रास होता चला जा रहा है और हम इसकी जिम्मेदारी बच्चों की संगति , टीवी , संचार के बढ़ते हुए साधनों को देने लगे हैं।  ऐसा नहीं है कि  ये जिम्मेदार नहीं है लेकिन जब घर की नींव ही कच्ची रखेंगे तो ऊपर की दीवारों के स्थायित्व की आशा कैसे कर सकते हैं ? फिर दोष आधुनिक शिक्षा पद्धति और शिक्षकों के पढ़ाने पर भी ऊँगली उठने लगते हैं लेकिन ये शिक्षक भी तो वहीँ सब और वहीँ से पढ़ कर  आ रहे हैं , जहाँ आज की पीढ़ी प्रवेश लेकर पढ़ने जा रही है।
                   देश का एक ही इतिहास और एक ही संस्कृति होती है।  उसको हम शिक्षा के द्वारा ही तो हस्तांतरित करते चले आ रहे हैं लेकिन उससे कट कर हम अपने आपको संचित नहीं कर पाएंगे।  हम जहाँ रहते हैं और जिस भारत भूमि पर रहते हैं , उसकी संस्कृति और इतिहास सबसे प्राचीन माना जाता है बल्कि कहें कि वह प्रमाण के साथ उपलब्ध भी है। लेकिन हम धीरे धीरे नए आविष्कारों के नाम पर पाठ्यक्रम को विस्तृत करते चले जा रहे हैं और उसमें नवीन विषयवस्तु को शामिल भी करते जा रहे हैं।  शिक्षा के जितने भी संगठन है उनका अपना अलग अलग पाठ्यक्रम है और उस पाठ्यक्रम को निर्धारित करने वाले सुधी और विद्वान हैं लेकिन उनकी अपनी सोच के अनुसार वह समय समय पर पुनरीक्षित होता भी है।  पुराने प्रसंगों को कालातीत समझ कर हटा दिया जाता है और नयी उपलब्धियों को इसमें शामिल कर लिया जाता है। इसमें ऐसे भी विचारक हैं जिनकी सोच अलग अलग विचारधाराओं से प्रभावित होती है।  उसके अनुसार देश का इतिहास बदल जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के चरित्रों को अपने अपने ढंग से परिभाषित किया जाने लगा है।  हमारी आज की पीढ़ी अपने शिक्षकों से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है और शिक्षक भी वही पढ़ाता है जो किताबों में लिखा होता है।
                  पाठ्यक्रम में शामिल विकृतियों को समय समय  इंगित किया  जाता रहा है और इस संक्रमण काल में जब सामाजिक और नैतिक मूल्यों का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है जरूरी है कि पाठ्यक्रम को संशोधित किया जाय। वो महापुरुष और देश के गौरव व्यक्तित्व, जिन्हें उपेक्षित किया जाने लगा है और उनके आचरण आज भी सामयिक है , पुनः पाठ्यक्रम में शामिल  जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि समाज में और देश के महत्वपूर्ण और जागरूक संगठनों में  जागरूकता नहीं है , वो है और उसके लिए बराबर प्रयास किये जा रहे हैं।  इसका सबसे महत्वपूर्ण उदहारण है --
                  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की हाल में ही हुई २७-२९ मई २०१६ को  "राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला " जो रयत -बाहर , पोपद कैंपस (पंजाब में संपन्न हुई। इसमें जो प्रस्ताव रख गया वह समीचीन है और राष्ट्रीय स्तर इसको स्वीकार किया जाना चाहिए।

                  "पाठ्यक्रम में परिवर्तन सामयिक आवश्यकता है।  पाठ्यक्रम में निहित विकृतियों को लेकर शिक्षा बचाओ आंदोलन के द्वारा राष्ट्रव्यापी आंदोलन आरम्भ किया गया था।  परिणाम स्वरूप इन विकृतियों को हटाने के लिए सरकार को विवश होना पड़ा था।  माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने शिक्षा बचाव आंदोलन की याचिका पर पुस्तकों में संशोधन के लिए २००८ में ऐतिहासिक निर्णय दिया था - 'भारत वसुंधरा रत्नगर्भा है।  समय -समय पर ऐसे महापुरुषों ने जन्मा लिया हकि जिन्होंने  विनाश कर समाज को सुव्यवस्थित किया है।  प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक महापुरुषों की असंख्य श्रृंखला है।  नयी पीढ़ी में भारतीयता का बोध और गौरब भाव जगाने के लिए ऐसी विभूतियों के जीवन -प्रसंग अत्यन्त प्रेरणादायी है।'
                             इस दृष्टि से नई  शिक्षा नीति के अन्तर्गत संपन्न परिचर्चाओं में अनेक सकारात्मक  सुझाव आये हैं.  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास सबंधित संस्थाओं यथा - NCERT , CBSE , ICSE तथा अन्य राज्य स्तरीय बोर्ड उच्च शिक्षा संस्थाओं  आदि से आह्वान करती है कि  सकारात्मक  एवं प्रेरणादायी सुझावों को लागू करने हेतु शीघ्र प्रयास आरम्भ करे और पाठ्यक्रम को यथोचित सशोधन एवं परिवर्तन करें।
                          प्राथमिक शिक्षा से नैतिक मूल्यों एवं एवं अनुकरणीय चरित्रों का समावेश होना आवश्यक है।  फिर शिक्षा के स्तर के बढ़ने के साथ साथ ही  और  विस्तार से जानकारियों का समावेश करते जाना होगा। नैतिक मूल्यों  से पढ़ने और समझने से भटकती हुई युवा पीढ़ी  संभालने में  सहायक होंगे।

                            

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

विश्व ऑटिज्म दिवस !

                        2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस के नाम से जाना जा रहा है।  कभी हमने सोचा है कि हमें   विश्व ऑटिज्म दिवस की आवश्यकता क्यों पड़ी ? आज जिस गति से जीवन निरन्तर आगे बढ़ता चला जा रहा है ,वैसे ही हम रोगों की दिशा में भी प्रगति कर रहे हैं।  आज विश्व में ऑटिज्म ऐसी मानसिक स्थिति बन चुकी है कि इसको एक पृथक दिवस के रूप में लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए स्थान दिया जाने लगा है। सीडीसी की रिपोर्ट के अनुसार ६८ बच्चों में एक बच्चा ऑटिज्म का शिकार है और लड़कियों की अपेक्षा ये लड़कों में हर ४५ बच्चों में एक बच्चे का औसत है। 
                            जीवन की गति जितनी तेजी से बढ़ रही है कि हमारे पास कुछ सोचने  वक़्त ही नहीं रहा।  बच्चे को हम जन्म से यह ज्ञात कर ही नहीं सकते हैं कि बच्चा ऑटिज्म से ग्रसित है। लेकिन ये मानसिक या शारीरिक कहें स्थिति बच्चे को एक सामान्य जीवन से अलग खड़ा कर देती है।  आम तौर पर तो इसके बारे में इतनी व्यापक जानकारी हमारे यहाँ चिकित्सा की शिक्षा के दौरान किस  स्तर तक प्राप्त होती है या फिर बाल रोग में विशेषज्ञता करने पर ही वे  जान पाते हैं , इसके बारे में कोई चिकित्सक ही बता सकता है।  
                             आज जब कि एकल और लघु परिवार को प्राथमिकता दी जाने लगी है तब इस स्थिति के शिकार बच्चों के माता पिता के लिए कष्टदायी स्थिति और क्या हो सकती है ? इसके कारणों के विषय में तो अभी तक कोई विशेष शोध नहीं प्राप्त हुआ है क्योंकि इसका ज्ञान बच्चे के बड़े होने के साथ साथ ही पता चलता है।  हाँ इसके कुछ लक्षण अवश्य हैं , जिनके प्रकट होने पर बच्चे की प्रगति के बारे में डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है। 
ऑटिज्म के लक्षण :  
             कुछ ऐसे  लक्षण है जो कि माता पिता के द्वारा ही जाने  जा सकते है। 

1 . बच्चों का 6  महीने तक न  मुस्कराना और न ही कोई प्रतिक्रिया करना। 
2 .  नौ महीने की आयु तक बच्चे का माता पिता के साथ कोई भी सम्प्रेषण न होना।  उनके बुलाने पर , हंसने पर या फिर किसी भी तरह से कोई प्रतिक्रिया न देना। 
3 . एक साल की आयु तक किसी चीज की और इशारा करना , माँगना या फिर उठाने की कोशिश नहीं करता है तो उसके प्रति सचेत हो जाना चाहिए। 
4 . 16  महीने की आयु तक एक शब्द भी न बोलना और 2 वर्ष की आयु तक दो शब्दों को मिला कर बोलन आरम्भ न करना। 
5. उसका का नाम लेकर बुलाने पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर न करना।  (  इसके लिए अपवाद भी हो सकता है कि अगर बच्चा मूक - बधिर होगा तो भी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करेगा ). 
6. आँखों का न मिलाना।  
7. किसी एक खिलौने से विशेष लगाव रखना। 
8. एक ही क्रिया को बार बार दुहराना। 
9 . अपने हमउम्र बच्चों से मिलने , उनके साथ खेलने या मिलने पर मुस्करा कर प्रतिक्रिया जाहिर न करना।

                          ऑटिज्म के बच्चों का जितनी जल्दी पता चल जाता है उनमें उतनी ही सुधार की सम्भावना अधिक रहती है , बहुत बड़ी उम्र पर ज्ञात होने पर उनकी आदतों और क्रियाओं में कुछ सुधर तो संभव है लेकिन परिणाम उतने संतोषजनक नहीं होते हैं। इसके विषय में  लोगों के मध्य जागरूकता फैले यही उद्देश्य होना चाहिए ताकि वे बच्चे भी एक सामान्य जीवन के करीब आ सकें। 
                         आपकी अंतरा --  यह एक TV सीरियल आया था, जिसमें की बच्ची को 'स्पेक्ट्रम डिसआर्डर   ' का शिकार दिखाया गया . इसमें जो भी क्रिया होती है वह दोनों ही रूपों में हो सकती है. जैसे कि अंतरा  बिल्कुल चुप और निष्क्रिय  रहती थी और कभी बच्चा इसके ठीक विपरीत अतिसक्रिय भी हो सकता है जैसे कि वह सारे घर में दौड़ता ही रहे या फिर बहुत शोर मचने वाला भी हो सकता है. इन बच्चों को यदि कहा जाय कि ये बिल्कुल ठीक हो सकते हैं ऐसी संभावना बहुत कम होती है लेकिन इनको संयमित किया जा सकता है और इनके व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकता है.