शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डॉक्टर्स डे !

                        आज डॉक्टर्स डे है और वाकई डॉक्टर्स जो भगवान का रूप है इसी दुनियां में हैं।  उनका एक ही धर्म होता है और वह है मानव सेवा।  कभी कभी तो वह अपने पास से पैसे भी देकर सेवा कर जाते हैं।  आज का दिन वाकई ऐसे ही लोगों के लिए नमन का दिन है।  आज के दिन मैं एक डॉक्टर के साथ अपने अनुभव को साझा कर रहे है।
                              कितने लोगों को किस तरह से वो सेवा करते रहे मैं नहीं जानती लेकिन वो मेरे लिए मेरे बहनोई भी थे और डॉक्टर भी।  स्व. डॉ अमित सक्सेना के प्रति किसी के अनुभव जो भी रहे हों लेकिन मेरे अनुभव बहुत ही यादगार रहे हैं।आज के दिन मैं  श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हूँ।

 
                                मेरे जीवन की दो यादगार घटनाएं ये साबित करने के लिए पर्याप्त है  , जिनसे मैं उस डॉक्टर के अहसान कभी भूल ही नहीं सकती हूँ।  मेरे ससुर को कैंसर था और उस समय उनको १५ दिनों में बहुत तेज बुखार आना शुरू हो चूका था।  जो उनको बराबर कमजोर करता चला जा रहा था और हमारे लिए भी कष्ट कारक था।  पता मैं नहीं जानती कि उन्होंने कौन सी दवा दी थी कि अंतिम समय तक जब कि  वह करीब १० महीने जिन्दा रहे  उनको बुखार नहीं आया।
                       साल तो मुझे याद नहीं है लेकिन मेरी छोटी बेटी प्रियंका एक दिन सुबह उठी तो उसको कोल्ड स्ट्रोक हुआ और आँखों से दिखना बंद हो गया था और पूरा शरीर उसका शिथिल हो  चूका था. उसने उठने की कोशिश की तो  तुरंत गिर पड़ी।  कितना मुश्किल था उस क्षण को एक माँ बाप के लिए झेलना लेकिन मेरे हर समस्या का समाधान अमित के पास होगा ऐसा हम विश्वास रखते थे।
                     तुरंत हमने अमित को फ़ोन किया और वह उस भयंकर सर्द  सुबह में जितनी भी दवाएं उस समय घर पर थीं , अमित  बाइक से चल कर १५ किमी दूर मेरे घर आ गए।  फिर शुरू हुआ उनका दवा देने का सिलसिला  और धीरे धीरे बेटी की हालत में सुधार शुरू हुआ।  करीब दो घंटे तक उपचार करने पर उसकी हालत में सुधार हुआ और जब वो उठकर खुद चलने लगी और उसको आँखों से भी दिखना शुरू हो चूका था।  तब अमित वहां से निकले।  मैं चिर ऋणी हूँ उनकी।
                      सिर्फ यही नहीं बल्कि हमारी किसी भी तकलीफ का इलाज उनके पास था।  सिर्फ एक फ़ोन की जरूरत होती थी और वह  पूरे लक्षण जान कर दवा लिखवा देते थे और हम उससे वाकई आराम पा जाते थे लेकिन ऐसे लोग अब दुनियां में बचे कितने हैं ?   उनके अकस्मात् और असामयिक निधन ने हमें  कमजोर कर दिया है लेकिन अगर ऐसे डॉक्टर इस धरती पर हों तो उनका भगवान नाम सार्थक है।  

रविवार, 5 जून 2016

खोयी बच्चियाँ या त्यागी या फिर अपहृत ?

      इधर विभिन्न स्रोतों से देख रही हूँ  कि कई बार बच्चियों की  तस्वीरें फेसबुक ,  व्हाट्स ऐप और अन्य सोशल मीडिया पर दिखलाई दे रही हैं और आज कल कुछ ज्यादा नजर आने लगी हैं। कभी तो ये विचार आकर सोचने पर मजबूर कर देता है कि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो क्यों हो रहा है ? हाँ मैं इस बात को स्वीकार करती हूँ कि मैं भी ऐसी सूचनाओं को शेयर करती हूँ ताकि ये बच्चे अपने माँ बाप तक पहुंच जाएँ। 
                       
              इस चित्र ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि वास्तव में हो क्या रहा है ? ये चित्र कई बार घूम घूम कर आया और ये नागपुर स्टेशन का है।  फिर अचानक ये चित्र जिसमें महिला सिपाही नहीं थी फिर मेरे पास आया कि ये बच्ची चंडीगढ़ स्टेशन पर मिली है। इसके पीछे क्या चल रहा है ? 
                     ये मिलने वाली बच्ची इतनी छोटी भी नहीं है कि वह अपने शहर या गाँव का नाम न बता सके या फिर पापा मम्मी का नाम न बता सके।  अगर मान भी लें कि बच्ची नहीं बता सकती तो इसके माता पिता कैसे हैं कि उनकी इतनी बड़ी बच्ची स्टैशन पर छूट गयी और उनको खबर तक नहीं और जब भी उन्हें याद आया उन्हें पुलिस को खबर करनी चाहिए।  रेलवे अपने संपर्क से तुरंत ही पता कर लेती हैं और स्टेशन पर मिले बच्चे तो उनके संरक्षण में रहते हैं।  कहीं भी पुलिस को खबर करें वो संभावित जगहों पर जरूर खोजती है और पता चल ही जाता है। 
                      पिछले कई बार ये बच्चे ट्रैन या स्टेशन पर ही पाए गए।  किसी के दिमाग में ये सवाल उठा कि नहीं, मै नहीं जानती कि हम ये मान सकते हैं कि बच्चे दहशत में बदहवास हो जाते हैं और वह बोल नहीं पाते हैं।  इस के पीछे के कारणों पर नजर जाती ही है कि इस तरह से बच्चियों का पाया जाना किस बात का द्योतक है --

* क्या लड़की होने के कारण या फिर अधिक बच्चे होने के कारण ये बच्चियां जानबूझ कर छोड़ी गईं है ?

*क्या इन बच्चियों का ट्रैन से अपहरण किया गया है और किसी तरह से पकड़ने की आशंका से इसको वहीँ छोड़ दिया गया है ?

*क्या गलती से छूट जाने पर माता पिता ने इसकी रिपोर्ट रेलवे थाने या अन्य किसी थाने में दर्ज कराई भी है या नहीं ?

*क्या ये अपरहण के बाद लेकर छोड़ी गईं या किसी और मंशा से उठाई गईं थी ?

     इतने कारणों के बाद भी मैं इनके माता पिता की गलती और लापरवाही को ही इंगित करूंगी क्योंकि अपनी संतान के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों करेगा कोई ? क्या इस लिए कि वह लड़की है और उससे वे निजात पाना चाहते हैं। अगर तुरंत सूचना दें तो बच्ची मिल सकती है। अगर नहीं ही रखना चाहते हैं तो सामाजिक संगठन इस दिशा में बहुत काम कर रहे हैं।  लड़कियों को संरक्षण दे रहे हैं फिर हिम्मत कीजिये और खुद छोड़ कर आइये। बेटे की चाह में आई हुईं बेटियां खुद दोषी नहीं हैं बल्कि आपका पूर्वाग्रह दोषी है। 
             एक बात और है कि जो ऐसी घटनाओं को सोशल मीडिया के जरिये फैलाते हैं , जरूरी नहीं की वह हर व्यक्ति के लिए उतना ही सोच का सबब बन जाए।  अधिकतर एक स्टेटस की तरह पढ़ कर लाइक  या शेयर करके आगे बढ़ जाते हैं।  लेकिन कुछ संवेदनशील मन उन मासूम चेहरों को भूल नहीं पाते हैं।  ये प्रश्न सदैव मन में कौंधता रहता है कि  पता नहीं वह बच्चा अपने घर वालों को मिला या नहीं। इस लिए इस तरह के स्टेटस अपने को बहुत जिम्मेदार दिखाने  के लिए न डालें और अगर आप वाकई जिम्मेदार है तो पहली बार इसको डालने वाला तह तक जाए और खबर रखे कि वह बच्चा कहाँ गया ? अगर आप इसकी सूचना देने के लिए जिम्मेदार हैं तो आगे भी इस जिम्मेदारी को निभाने का कार्य करें।  
                  किसी बच्चे के जीवन का प्रश्न स्टेटस मात्र नहीं हो सकता है।

गुरुवार, 2 जून 2016

पाठ्यक्रम : नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य !

                      शिक्षा मानव जीवन की ऐसी नींव डालता है , जो उसके मनो-मष्तिष्क में गहरे पैठ जाती है और इसके कारण ही बच्चों के जीवन में संस्कार या फिर अपने समाज , देश और परिवार के प्रति एक अवधारणा बन जाती है।  चाहे घर हो , स्कूल हो या फिर उसका अपना दायरा - उसके चरित्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।  आज के सन्दर्भ में जब कि चरित्र और संस्कार का निरन्तर ह्रास होता चला जा रहा है और हम इसकी जिम्मेदारी बच्चों की संगति , टीवी , संचार के बढ़ते हुए साधनों को देने लगे हैं।  ऐसा नहीं है कि  ये जिम्मेदार नहीं है लेकिन जब घर की नींव ही कच्ची रखेंगे तो ऊपर की दीवारों के स्थायित्व की आशा कैसे कर सकते हैं ? फिर दोष आधुनिक शिक्षा पद्धति और शिक्षकों के पढ़ाने पर भी ऊँगली उठने लगते हैं लेकिन ये शिक्षक भी तो वहीँ सब और वहीँ से पढ़ कर  आ रहे हैं , जहाँ आज की पीढ़ी प्रवेश लेकर पढ़ने जा रही है।
                   देश का एक ही इतिहास और एक ही संस्कृति होती है।  उसको हम शिक्षा के द्वारा ही तो हस्तांतरित करते चले आ रहे हैं लेकिन उससे कट कर हम अपने आपको संचित नहीं कर पाएंगे।  हम जहाँ रहते हैं और जिस भारत भूमि पर रहते हैं , उसकी संस्कृति और इतिहास सबसे प्राचीन माना जाता है बल्कि कहें कि वह प्रमाण के साथ उपलब्ध भी है। लेकिन हम धीरे धीरे नए आविष्कारों के नाम पर पाठ्यक्रम को विस्तृत करते चले जा रहे हैं और उसमें नवीन विषयवस्तु को शामिल भी करते जा रहे हैं।  शिक्षा के जितने भी संगठन है उनका अपना अलग अलग पाठ्यक्रम है और उस पाठ्यक्रम को निर्धारित करने वाले सुधी और विद्वान हैं लेकिन उनकी अपनी सोच के अनुसार वह समय समय पर पुनरीक्षित होता भी है।  पुराने प्रसंगों को कालातीत समझ कर हटा दिया जाता है और नयी उपलब्धियों को इसमें शामिल कर लिया जाता है। इसमें ऐसे भी विचारक हैं जिनकी सोच अलग अलग विचारधाराओं से प्रभावित होती है।  उसके अनुसार देश का इतिहास बदल जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के चरित्रों को अपने अपने ढंग से परिभाषित किया जाने लगा है।  हमारी आज की पीढ़ी अपने शिक्षकों से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है और शिक्षक भी वही पढ़ाता है जो किताबों में लिखा होता है।
                  पाठ्यक्रम में शामिल विकृतियों को समय समय  इंगित किया  जाता रहा है और इस संक्रमण काल में जब सामाजिक और नैतिक मूल्यों का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है जरूरी है कि पाठ्यक्रम को संशोधित किया जाय। वो महापुरुष और देश के गौरव व्यक्तित्व, जिन्हें उपेक्षित किया जाने लगा है और उनके आचरण आज भी सामयिक है , पुनः पाठ्यक्रम में शामिल  जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि समाज में और देश के महत्वपूर्ण और जागरूक संगठनों में  जागरूकता नहीं है , वो है और उसके लिए बराबर प्रयास किये जा रहे हैं।  इसका सबसे महत्वपूर्ण उदहारण है --
                  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की हाल में ही हुई २७-२९ मई २०१६ को  "राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला " जो रयत -बाहर , पोपद कैंपस (पंजाब में संपन्न हुई। इसमें जो प्रस्ताव रख गया वह समीचीन है और राष्ट्रीय स्तर इसको स्वीकार किया जाना चाहिए।

                  "पाठ्यक्रम में परिवर्तन सामयिक आवश्यकता है।  पाठ्यक्रम में निहित विकृतियों को लेकर शिक्षा बचाओ आंदोलन के द्वारा राष्ट्रव्यापी आंदोलन आरम्भ किया गया था।  परिणाम स्वरूप इन विकृतियों को हटाने के लिए सरकार को विवश होना पड़ा था।  माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने शिक्षा बचाव आंदोलन की याचिका पर पुस्तकों में संशोधन के लिए २००८ में ऐतिहासिक निर्णय दिया था - 'भारत वसुंधरा रत्नगर्भा है।  समय -समय पर ऐसे महापुरुषों ने जन्मा लिया हकि जिन्होंने  विनाश कर समाज को सुव्यवस्थित किया है।  प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक महापुरुषों की असंख्य श्रृंखला है।  नयी पीढ़ी में भारतीयता का बोध और गौरब भाव जगाने के लिए ऐसी विभूतियों के जीवन -प्रसंग अत्यन्त प्रेरणादायी है।'
                             इस दृष्टि से नई  शिक्षा नीति के अन्तर्गत संपन्न परिचर्चाओं में अनेक सकारात्मक  सुझाव आये हैं.  शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास सबंधित संस्थाओं यथा - NCERT , CBSE , ICSE तथा अन्य राज्य स्तरीय बोर्ड उच्च शिक्षा संस्थाओं  आदि से आह्वान करती है कि  सकारात्मक  एवं प्रेरणादायी सुझावों को लागू करने हेतु शीघ्र प्रयास आरम्भ करे और पाठ्यक्रम को यथोचित सशोधन एवं परिवर्तन करें।
                          प्राथमिक शिक्षा से नैतिक मूल्यों एवं एवं अनुकरणीय चरित्रों का समावेश होना आवश्यक है।  फिर शिक्षा के स्तर के बढ़ने के साथ साथ ही  और  विस्तार से जानकारियों का समावेश करते जाना होगा। नैतिक मूल्यों  से पढ़ने और समझने से भटकती हुई युवा पीढ़ी  संभालने में  सहायक होंगे।

                            

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

विश्व ऑटिज्म दिवस !

                        2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस के नाम से जाना जा रहा है।  कभी हमने सोचा है कि हमें   विश्व ऑटिज्म दिवस की आवश्यकता क्यों पड़ी ? आज जिस गति से जीवन निरन्तर आगे बढ़ता चला जा रहा है ,वैसे ही हम रोगों की दिशा में भी प्रगति कर रहे हैं।  आज विश्व में ऑटिज्म ऐसी मानसिक स्थिति बन चुकी है कि इसको एक पृथक दिवस के रूप में लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए स्थान दिया जाने लगा है। सीडीसी की रिपोर्ट के अनुसार ६८ बच्चों में एक बच्चा ऑटिज्म का शिकार है और लड़कियों की अपेक्षा ये लड़कों में हर ४५ बच्चों में एक बच्चे का औसत है। 
                            जीवन की गति जितनी तेजी से बढ़ रही है कि हमारे पास कुछ सोचने  वक़्त ही नहीं रहा।  बच्चे को हम जन्म से यह ज्ञात कर ही नहीं सकते हैं कि बच्चा ऑटिज्म से ग्रसित है। लेकिन ये मानसिक या शारीरिक कहें स्थिति बच्चे को एक सामान्य जीवन से अलग खड़ा कर देती है।  आम तौर पर तो इसके बारे में इतनी व्यापक जानकारी हमारे यहाँ चिकित्सा की शिक्षा के दौरान किस  स्तर तक प्राप्त होती है या फिर बाल रोग में विशेषज्ञता करने पर ही वे  जान पाते हैं , इसके बारे में कोई चिकित्सक ही बता सकता है।  
                             आज जब कि एकल और लघु परिवार को प्राथमिकता दी जाने लगी है तब इस स्थिति के शिकार बच्चों के माता पिता के लिए कष्टदायी स्थिति और क्या हो सकती है ? इसके कारणों के विषय में तो अभी तक कोई विशेष शोध नहीं प्राप्त हुआ है क्योंकि इसका ज्ञान बच्चे के बड़े होने के साथ साथ ही पता चलता है।  हाँ इसके कुछ लक्षण अवश्य हैं , जिनके प्रकट होने पर बच्चे की प्रगति के बारे में डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है। 
ऑटिज्म के लक्षण :  
             कुछ ऐसे  लक्षण है जो कि माता पिता के द्वारा ही जाने  जा सकते है। 

1 . बच्चों का 6  महीने तक न  मुस्कराना और न ही कोई प्रतिक्रिया करना। 
2 .  नौ महीने की आयु तक बच्चे का माता पिता के साथ कोई भी सम्प्रेषण न होना।  उनके बुलाने पर , हंसने पर या फिर किसी भी तरह से कोई प्रतिक्रिया न देना। 
3 . एक साल की आयु तक किसी चीज की और इशारा करना , माँगना या फिर उठाने की कोशिश नहीं करता है तो उसके प्रति सचेत हो जाना चाहिए। 
4 . 16  महीने की आयु तक एक शब्द भी न बोलना और 2 वर्ष की आयु तक दो शब्दों को मिला कर बोलन आरम्भ न करना। 
5. उसका का नाम लेकर बुलाने पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर न करना।  (  इसके लिए अपवाद भी हो सकता है कि अगर बच्चा मूक - बधिर होगा तो भी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करेगा ). 
6. आँखों का न मिलाना।  
7. किसी एक खिलौने से विशेष लगाव रखना। 
8. एक ही क्रिया को बार बार दुहराना। 
9 . अपने हमउम्र बच्चों से मिलने , उनके साथ खेलने या मिलने पर मुस्करा कर प्रतिक्रिया जाहिर न करना।

                          ऑटिज्म के बच्चों का जितनी जल्दी पता चल जाता है उनमें उतनी ही सुधार की सम्भावना अधिक रहती है , बहुत बड़ी उम्र पर ज्ञात होने पर उनकी आदतों और क्रियाओं में कुछ सुधर तो संभव है लेकिन परिणाम उतने संतोषजनक नहीं होते हैं। इसके विषय में  लोगों के मध्य जागरूकता फैले यही उद्देश्य होना चाहिए ताकि वे बच्चे भी एक सामान्य जीवन के करीब आ सकें। 
                         आपकी अंतरा --  यह एक TV सीरियल आया था, जिसमें की बच्ची को 'स्पेक्ट्रम डिसआर्डर   ' का शिकार दिखाया गया . इसमें जो भी क्रिया होती है वह दोनों ही रूपों में हो सकती है. जैसे कि अंतरा  बिल्कुल चुप और निष्क्रिय  रहती थी और कभी बच्चा इसके ठीक विपरीत अतिसक्रिय भी हो सकता है जैसे कि वह सारे घर में दौड़ता ही रहे या फिर बहुत शोर मचने वाला भी हो सकता है. इन बच्चों को यदि कहा जाय कि ये बिल्कुल ठीक हो सकते हैं ऐसी संभावना बहुत कम होती है लेकिन इनको संयमित किया जा सकता है और इनके व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकता है.
                     

गुरुवार, 10 मार्च 2016

"रूटीन चेकअप डे !"

                     जीवन की बढ़ती  आपाधापी और दूर दूर फैले कार्यक्षेत्र में लगने वाले समय ने और खाने पीने की नयी नयी सुविधाओं ने जीवन  सहज बना दिया है लेकिन शरीर को जल्दी ही दवाओं पर निर्भर भी बनाता जा रहा है। 
                     हम रोज ही किसी न किसी रोग को लेकर 'दिवस ' मनाते है किसलिए ? सिर्फ लोगों में उसके प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए। कभी कैंसर , कभी टीबी और कभी एड्स आदि कई रोगों को घातक जानते हुए ये कदम उठाये जाते हैं। विभिन्न गोष्ठियाँ , चर्चाएं आयोजित की जाती हैं  और अखबार आदि सभी में आलेख प्रकाशित किये जाते हैं।  फिर भी क्या लोग इससे कुछ सबक लेते हैं ?  कम पढ़े लिखे लोगों की जाने दीजिये , शिक्षित और जागरूक लोग भी क्या इस और कितना ध्यान देते हैं ? कोई भी इस बारे में गंभीरता से विचार करता है क्या ? सामान्य जीवन में शरीर की थोड़ी सी असामान्यता इंसान नजरअंदाज कर देता है और फिर  कभी गहन परीक्षण  के दौरान किसी विस्फोट की तरह गंभीर समस्या सामने आ जाती है। 
                                पढ़कर  लगेगा कि ये उपदेशीय प्रवृत्ति की यहाँ कोई जरूरत नहीं है लेकिन आज कोई भी चीजें शुद्ध नहीं है और धीरे धीरे उनकी अशुद्धि की मात्र से अनभिज्ञ हम सब कुछ भोज्य पदार्थों के साथ ग्रहण करते रहते हैं।  कितना ही बचें फिर भी कुछ केमिकल हमारे भोजन में सम्मिलित होकर अंदर पहुँच ही रहे हैं।  शरीर में उनका दुष्प्रभाव  छोटे से लेकर बड़ों तक कभी जल्दी या कभी देर से उभर कर सामने आ ही जाता है  और फिर कहते सुना जाता है -- 'अच्छे खासे थे , खाते पीते थे लेकिन अचानक पेट में दर्द हुआ तो इस का पता चला ( ये 'इसका' में कुछ भी हो सकता है - ट्यूमर , कैंसर , स्टोन या कोई और व्याधि  ) . क्यों न हम इस स्थिति के आने से पहले थोड़ी सी सतर्कता बरतें तो जीवन सुचारू रूप से चलता रहेगा और हम स्वस्थ रहेंगे।  इस कामना पूर्ण करने के लिए कुछ प्रयास तो करने ही होंगे।  हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना होगा। 
                                  आज  सभी को ३५-४० की उम्र से हर छह महीने में रूटीन चेकअप कराना चाहिए।  जिससे  भी असामान्य नजर आता तो उसका समय से उपचार हो सकता है और भविष्य में किसी गंभीर बीमारी के अचानक प्रकट होने से बचा जा सकता है। सामान्य कहीं जाने वाली घातक बीमारियाँ - डायबिटीज , ब्लड प्रेशर , थायराइड या फिर ह्रदय से सम्बंधित कोई भी बीमारी को आरम्भ में ज्ञात  में किया जा सकता है।  उसके प्रति सावधानी बरती जा  सकती है। 
                                   जीवन के लिए शरीर का हर अंग महत्वपूर्ण होता है , फिर भी हम उसके लिए लापरवाही करते हैं। हम रोज किसी न किसी रोग के लिए 'दिवस' मानते हैं लेकिन कभी ये नहीं सोचते हैं कि अगर 'रूटीन चैकअप डे ' हर महीने एक बार मनाएं और उससे  कुछ लोग भी जागरूक होते हैं तो बढ़ते रोगों की सम्भावना पर समय से पूर्व अंकुश लगाया जा सकता है।अब तो विभिन्न कंपनी इसको पूरे चैकअप के लिए पैकेज के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं और अलग अलग जाकर जहमत भी उठाने की जरूरत नहीं है बल्कि अब तो बैंक और अन्य व्यक्तिगत व्यावसायिक कंपनी अपने कर्मचारियों को इसके लिए मेडिकल में सुविधा प्रदान करने लगी हैं। 
        जीवन आपका है और उसे स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। 

रविवार, 22 नवंबर 2015

आखिर कब तक सहें ?

                कई बार अख़बार की खबरें सामने से गुजर जाती हैं और उन्हें कभी पूरा पूरा पढ़ने का मन भी नहीं करता है लेकिन कोई खबर आग का गोल बनकर अंदर तक खाक कर जाती है। व्यवस्था , क़ानून और न्याय सब एक मजाक लगता है। इंसान ने दिमागी असंतुलन की और जाते हुए वीभत्सता की सारी हदें लांघ ली है और पुलिस के वहाँ तक पहुँचते पहुँचते गरीब की बेटी तो चली ही जाती है , उसके साथ ही उनकी हिम्मत तोड़ देती है क्योंकि कहीं कहीं कानून की रक्षा करते करते पुलिस भी कटघरे में खड़ी होती है और उसकी लापरवाही किसी की जान की ग्राहक बन जाती है। 
                                         आज दुष्कर्म लूटपाट की घटनाओं की तरह से आम घटना बन चुकी है और पुलिस कभी सीमा विवाद , कभी गरीब की बेटी , कहीं रसूख वालों के बेटे को बचाने के लिए लीपा पोती करके अपराध को अलग दिशा में मोड़ देते हैं और अपराध का स्वरूप ही बदल लेते हैं। जिससे बिगड़े हुए नवाबों और नसेड़ी और भंगेड़ी अपने काम पर शर्मिंदा होना तो दूर मुस्कराते हुए घूमते रहते हैं।
                                अगर दुष्कर्म किशोरों के द्वारा किया गया है तो उसे हमारा क़ानून सुधारने का मौका देता है। उसके लिए कोई बड़े दंड का प्राविधान ही नहीं है लेकिन वह पीड़िता का जीवन तमाशा या मौत। पीड़िता चाहे अबोध बालिका हो या फिर नाबालिग लड़की या फिर किसी भी उम्र की महिला।  कोई विशेष दंड है क्या ?

                                       दुष्कर्म की एक ही सजा है न , चाहे वो किसी के साथ भी और किसी  भी उम्र के व्यक्ति द्वारा किया गया हो। यही दुष्कर्म अगर एक अबोध बालिका के साथ किया गया हो तो उसको हम उसे एक अमानुषिक कृत्य घोषित करके अलग दंड निर्धारण की जरूरत नहीं समझते  है। आज के अखबार में प्रकाशित ये घटना क्या कहेंगे ? बच्ची को दो नशेड़ियों में अगवा किया और उसके चिल्लाने पर उसको पत्थर मार कर मार दिया और उसके बाद दोनों ने उसके शव से दुष्कर्म किया।  दूसरे दिन उसी जगह पर जाकर उस शव को पुनः पत्थरों से कुचला और बच्ची के घर वालों के साथ उसे ढूंढने का नाटक करते रहे।  ये किस श्रेणी का दुष्कर्म है रेयर टू रेयरेस्ट की परिभाषा के अंतर्गत आता है या नहीं लेकिन मैं ये जानती हूँ कि ऐसे दरिंदों को जो चाहे नाबालिग हों  एकमात्र मृत्युदंड की सजा मिलनी चाहिए। 
                                     अब बताये क़ानून कि क्यों बेटियों गर्भ में मार दी जाती हैं कारण  कुछ भी हो लेकिन ये कारण भी तो कल को  बन रहा है।  कहाँ तक बच्चों को अपने गर्भ में माँ संभाले रहेगी , कभी तो जन् देगी फिर वह चाहे एक , दो , तीन या पांच वर्ष की क्यों न हो ? दरिंदों को तो उसमें एक औरत ही नजर आती है , एक देह मात्र जो उनके भोगने के लिए बनी है।  फिर जन्म दे ही क्यों माँ ? अगर दरिंदों के द्वारा उसको मारना है तो फिर माँ क्यों सह प्रसव पीड़ा और क्यों उसको जन्म देकर मोह बढ़ाये ? उसको पहले ही मार दिया जाय। माँ अपने बच्चे को जन्म देने का पूरा पूरा अधिकार रखती है। अगर नहीं तो एक बेटी माँ होने के नाते कोई तो सोचे कि ऐसे अपराधों की  दिन पर दिन बढ़ती घटनाओं के साथ क़ानून भी बदलना होगा  नहीं तो लड़कियों का जन्म अपराध बन जाएगा।  समाज भुगतेगा इस का परिणाम। या तो फिर से बेटियों  को बचपन में ही किसी को सौंप दिया जाय या फिर उनको फिर से  इतने परदे में रखा जाय कि बाहर की  हवा तक उनको छू न पाये। अगर ये समाज अपने स्वरूप को बदल नहीं सकता या हम अपने घर और समाज के माहौल को इस बदतर स्थिति से सुधार कर सुसंस्कारित  नहीं बना सकते हैं तो फिर क्यों सोचें कि बेटियों को जन्म दिया जाय ? अगर समाज का संतुलन सही रखना है और बेटियों को सृष्टि को आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित रखना है तो पुराने सडे गले क़ानून को भूल कर आज बढ़ रहे दुष्कर्म के अपराधों को नियंत्रित करने के लिए उनका नवीनीकरण करना होगा। आज से ३० साल पहले समाज का स्वरूप कुछ और था , गाँव , मोहल्ले की बेटी बड़ों और युवाओं के लिए  बेटी और बहन हुआ करती थी और मजाल है कि कोई बाहर का इंसान उनके साथ बदतमीजी तक कर जाए।  ऐसे काम तो तब सुनाने में ही नहीं आते थे। तब ये क़ानून कारगर थे लेकिन  अब जब कि अंधाधुंध बढ़ रहे सोशल साइट्स पर उपलब्ध सामग्री ने बच्चों को वक़्त से पहले युवा बना दिया और फिर अंजाम सामने है।  
                    संयुक्त परिवार के विघटन ने और माता पिता  दोनों के कामकाजी होने से उनकी दिशा बदल रही है और अभिभावकों को उन पर नजर रखने का समय नहीं है। समय हो भी तो वे साये की तरह  साथ नहीं रह सकते हैं।  फिर सामाजिक लांछनों का भय , बेटी के बदनाम होने के भय ने उनके पैरों में बेड़ियां डाल रखी हैं। ये सब बिगड़े नवाबों को और शह देते हैं। ऐसा नहीं है लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं है।  घर में अकेले रहने वाली , स्कूल जाने वाली , टैक्सी या ऑटो जाने वाली , रात को अपनी नौकरी से वापस आने वाली।  गाँव में तो इसके और भी कारण मुंह बाए खड़े होते हैं
                       मेरे अपने विचारों के अनुसारकारगर  कुछ ऐसे सोचा जा सकता है  ---

१. अबोध बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने वाला सामान्य व्यक्ति तो नहीं हो सकता है , क़ानून ऐसे  लोगों के लिए किये गए अपराध को बिना सोचे रेयर से रेयरेस्ट की परिभाषा को बदलना होगा। ऐसे लोगों का अपराध अक्षम्य होना चाहिए। 
२. किशोर की सीमा में आने वाले दुष्कर्मियों को सुधारने के लिए तीन साल के लिए नहीं बल्कि दस साल  की सजा का प्रावधान होना चाहिए। ऐसे लोगों को सुधार गृह में नहीं बल्कि अलग से जेल में रखना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग सुधार गृह में रहने वाले और  बच्चों के लिए खतरा बन सकते हैं।  
३. ऐसे मामलों में चश्मदीद गवाह जैसे शब्द को प्रयोग ही नहीं होने चाहिए।  चाहे अदालत हो या फिर आम आदमी जानता है कि ऐसे मामलों को सड़क पर अंजाम नहीं दिया जाता है और ये प्रश्न जरूर उठता है.  कैसा क़ानून है ?
४. यहाँ पर कोई भी जनप्रतिनिधि ऐसा मामलों को नजरअंदाज करने के लिए सिफारिश  करते हों , उन्हें कटघरे में खड़ा करने  का अधिकार चाहिए।  
 ५. संविधान में दिया गया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग करने वालों के बयानों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए।  नारी के नाम पर कीचड उछाल कर फिर माफी मांग लेने वालों का अपराध क्षम्य तो नहीं होना चाहिए।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

ब्लॉग के सात साल !

                             लिखना तो वर्षों से चलता चला आ रहा है लेकिन ब्लॉग से मेरा परिचय जब हुआ तो वो सितम्बर २००८ से।  इसमें काम कैसे किया जाय ? ये तो मैंने अपने ऑरकुट मित्रों से सीखा क्योंकि तब फेसबुक थी नहीं और हम लंच टाइम में अपने मित्रों से चैट कर  लेते थे।  
                              नियमित लेखन और प्रकाशन तो शादी के बाद ही बाधित हो चुका था लेकिन कलम तो मानती नहीं सो डायरी में लिख लिख कर इकठ्ठा होता रहा और फिर ब्लॉग के माध्यम मिलते ही सारा कुछ उस पर डालने लगी। हाँ जब तक ऑफिस में रहती थी , मेरा लंच टाइम मेरे लिए ब्लॉग टाइम होता था। उस समय रोज एक पोस्ट चली जाती थी।  फिर हमारी संगीता स्वरूप जी ने सलाह दी कि एक पोस्ट के बीच इतना अंतराल होना चाहिए कि  पढ़ने वाले उसे ठीक से पढ़ तो लें।  
                              मेरा पहला ब्लॉग कविता के लिए बना था.
 hindigen फिर लगा कि गद्य के लिए अलग होना चाहिए और फिर कुछ और अपने अपने उद्देश्य लेकर बनायें।
 "यथार्थ" बना जीवन की कुछः कटु सत्य को उजागर करती हुई घटनाएँ। "मेरा सरोकार " सामाजिक , आर्थिक , मनोवैज्ञानिक आदि विषयों से जुडी समस्याओं  से जुडा ब्लॉग।
 "मेरी सोच " मैं मेरे अपने विचार विशेष विषयों पर किस तरह व्यक्त करने हैं वह रखा गया। 
 "कथा सागर " कहानियों के ब्लॉग। 
                              पिछले दो सालों से अपने ब्लॉग के साथ पूर्ण न्याय  नहीं कर पा रही हूँ , यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है।  फिर भी आठवे वर्ष में प्रवेश करते हुए संकल्प लेती हूँ कि पूरा पूरा न्याय करने की कोशिश करूंगी। वैसे दोष हमारा भी नहीं है , वो हर चीज जो ब्लॉग पर आती थी।  चट पट फेसबुक और समूह पर डाल देने की आदत से हमारे ब्लॉग को पाठकों की कमी खलने लगी और सभी फेसबुक पर ज्यादा नजर आ रहे हैं सो वहीँ  डाला और सब ने तुरंत पढ़ डाला।  यद्यपि ये अपने साथ ही अन्याय है क्योंकि ब्लॉग जो संग्रह करके रखेगा वो फेसबुक नहीं। लेकिन वक़्त के साथ बह लिए थे।  वापस किनारे लगने की कोशिश जारी है। 
                              चलिए आप सब से यही इल्तिजा है ब्लॉग को उपेक्षित न होने दें चाहे लिखने  के लिए हो  पढने को लेकर।  सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए अपेक्षा के साथ।