मंगलवार, 15 सितंबर 2020

हिंदी दिवस और हमारे इरादे !

     
 
                      हमने आज तक देखा कि हिंदी के प्रति बड़ी बड़ी बातें , बड़े बड़े संगठनों और फिर दम तोड़ते उनके इरादे , वादे और हौसले।  हिंदी की नींव  गीतों , कविताओं और कहानियों पर नहीं टिकी  है।  उसको अगर    हम भाषा की जड़ों में खाद पानी देने का कार्य आरम्भ करने की सोचे तो  सिर्फ एक वर्ग विशेष के नारे लगाने से हित  नहीं हो सकता है। हमें अलग तरीके से पहल नहीं करनी होगी।  पहले तो पूरे देश में हिंदी को लागू करने से पहले सभी भारतीय भाषाओँ का सम्मान और उनको समझने और समझाने की पहल करनी होगी।  हम सिर्फ हिंदी की ही बात क्यों करते हैं ? हमें अन्य भारतीय भाषाओँ को आत्मसात करने की बात करनी चाहिए और तभी देश के सभी कोनों से हिंदी , संस्कृत और अन्य भाषाओँ के प्रति रूचि नजर आएगी।
                          हिंदी सिर्फ वर्ग विशेष या सरकार  प्रयास नहीं हो ,   बल्कि इसके सभी के सहयोग की जरूरत है।  इस देश में रहने वाले क्यों भाषाई लकीरों को खिंच कर अपने अपने पाले बनायें।  सब एक साथ आएं और सबके पुनर्जीवन का प्रयास करें. चाहे वह आंचलिक भाषाएँ हों या फिर हिंदी।  आंचलिक भाषाओँ को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा और तभी सभी हिंदी को आत्मसात कर पाएंगे। जब अपने स्तर पर ही सही विदेशों में बसे भारतीय हिंदी को स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं तो फिर देश में ही प्रशासनिक स्तर पर इतनी उदासीनता क्यों दिखलाई देती है ? निम्न माधयम आय वर्ग के लोग बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने के लिए जी जान लगा रहे हैं।  अपना पेट काट रहे हैं , ओवरटाइम कर रहे हैं लेकिन बच्चे को वहीँ पढ़ाना  है।  आखिर कब तक ? जब वे बड़ी कक्षाओं में पहुँचते हैं तो उनकी जरूरतों और बढ़ने लगती हैं
                        इसमें सर्वप्रथम समस्त भाषाओँ के व्याकरण के समन्वयन से कार्य आरभ्य हुआ  और इसके लिए स्वर, व्यंजन , अंक प्रणाली से कार्य आरम्भ किया गया।  हम भूल चुके बारहखड़ी की प्रासंगिकता इस समय सिद्ध हुई की दक्षिण की भाषाएँ जो देव नागरी लिपि में नहीं है , उनकी मात्रा प्रणाली से हमारा परिचय इसी माध्यम से हो सकेगा। 
                      हम पूरे देश में हिंदी थोपने की बात नहीं कर रहे है और न अंग्रेजी को भागने की बल्कि सभी को हम साथ लेकर चलें तो देश में सर्वाधिक प्रयोग होने वाली हिंदी स्वतः आगे बढ़ जाएगी और स्वीकार की जायेगी।  हो सकता है कि इसमें समय लगे लेकिन आजादी से लेकर आज तक जो समय हम खो चुके हैं उससे कम समय में हम हिंदी पर गर्व कर रहे होंगे। 
                             हर बार सवाल उठता है कि दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध होता है लेकिन ऐसा नहीं है , कई बार मैंने भी दक्षिण भारतीय लोगों के साथ काम किया है और वे सब टूटी फूटी ही सही हिंदी बोलते हैं और  अपनी बात समझा सकते हैं।  हाँ इस मुद्दे को राजनैतिक रंग लेकर भाषाई विवाद को हमेशा के लिए जिन्दा रखने वाले पूरे देश को एक होता हुआ देखां ही नहीं चाहते हैं।  हमें पूरे देश में हिंदी के प्रति प्रेम और ग्राह्यता  लाने के लिए पाठ्यक्रम में पूरे देश में हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने के लिए प्राथमिक स्तर  से ही कदम उठाना होगा और एक भारतीय भाषा की अनिवार्यता भी रखनी होगी ताकि पूरे देश में ये भाव पैदा हो कि उसके साथ ही शेष भाषाओँ को भी प्राथमिकता दी जा रही है और वे हिंदी को बेझिझक अपना सकेंगे।
                  एक बार हाथ तो बढ़ाएँ पूरा देश एकसूत्र में बँधा होगा ।
 
 

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

रास्ते खुद बनाने पड़ते हैं !

 #रास्ते_खुद_बनाने_पड़ते_हैं !


सच कहूँ अभी Surekha Gupta जी की आपबीती पढ़ी तो अपनी यादें भी फुदकने लगी और मन आया कि जिंदगी वक्त नहीं देगी , चल छीन लेते है और आज तो लिखना ही है ।

          

        पैदा उरई जैसे कस्बे में हुई और अपने घर में तो सब शेर होते हैं । हमारा इण्टर कॉलेज और डिग्री कॉलेज ठीक घर के सामने तो कदम उतने ही चले । लड़कियाँ अकेली कहीं नहीं जाती थीं , बाजार जाना है तो माँ के साथ या छोटी बहन के साथ । बाकी घर में पढ़ाई और लिखाई ।

   

         शादी हुई कानपुर में और ससुराल रही कानपुर विश्वविद्यालय का परिसर । एक तो विश्वविद्यालय ही शहर से दूर जंगल में बसा था । जीटी रोड तक अंदर से पैदल आओ । वैसे इनके पास दोपहिया वाहन था। पर जब कदम बाहर निकलने को हुए तो हम सड़क पर खड़े थे । बी.एड. में एडमीशन हुआ , हमें तो कॉलेज मालूम नहीं था । प्रवेश प्रक्रिया तो बगैर जाये पूरी हो गयी ।


            जिस दिन से कक्षाएँ शुरू होनी थी , इनका टूर था , अब नक्शा बनाकर दे गये GPS  कहेंगे 1981 का । विश्वविद्यालय गेट से टैम्पो ली तो नक्शे के अनुसार चुन्नीगंज उतरे और तीर के अनुसार बाईं ओर मुड़कर सीधे जाना , जब तक दायीं ओर डीडब्ल्यूटी कॉलेज न दिख जाय । चलते चलते थक गये तब कॉलेज मिला और फिर तो रोज का रुटीन हो गया लेकिन ज्यादा दिन नहीं चल सका क्योंकि बी.एड. तो हमको करना ही नहीं था , नहीं तो उरई में मेरिट में नाम आने के बाद भी मैंने नहीं किया था । बेटी दो महीने की थी , जाना और आना पूरा दिन लग जाता । तय रहा कि वही पास में अस्थायी निवास खोजा जाय ताकि समय न लगे । 

    

          विक्टोरिया मिल के पास मिल मजदूरों के बीच एक कमरा बरामदा मिला , सासु माँ मेरे साथ चली और जेठ जी ससुर जी के पास विश्वविद्यालय निवास पर रहे । लंच टाइम में लम्बे लम्बे डग भर कर घर आती बेटी को फीड कराती और तुरंत वापस कॉलेज । लंबा रास्ता छोड़कर शॉर्टकट खोजा और घर जल्दी आ जाती ।


        इसके बाद 1984 में हम इंदिरा नगर शिफ्ट हो गये और वह भी जीटी रोड से काफी दूर । कल्यानपुर तक पैदल आइये  फिर शहर की ओर टैम्पो मिलता था ।  फिर नौकरी मिली जुहारी देवी गर्ल्स डिग्री कॉलेज में । पहले दिन फिर पतिदेव की मीटिंग नक्शा थमा कर चले गये । उस तरफ कभी जाना भी नहीं हुआ था । चल दिये GPS के साथ पूछते पाछते पहुँच ही गये । 


                छः महीने बाद ही आईआईटी में नौकरी मिल गयी । वह काफी पास था और सीधे गेट तक टैम्पो और फिर रिक्शा । तो जिंदगी में सारे रास्ते खुद ही खोजने पड़ते हैं , चाहे जितनी भीड़ हो । 


          मंजिलें तो सबको मिलती हैं , कभी हथेली पर रखी और कभी पीछा करते करते छाले पड़ जाते हैं । हौसले बुलंद हों तो  हार नहीं होती । 





रविवार, 26 जुलाई 2020


कारगिल विजय दिवस !      

                   भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले युद्धों की शृंखला में 1965, 1971 के युद्धों में मुँह की खाने के बाद भी वह अपनी आतंकी गतिविधियों से बाज नहीं आया । घुसपैठ के नाम पर पाकिस्तान की नापाक गतिविधियां हमेशा चलती रहती हैं लेकिन शांति का छद्म आवरण ओढ़कर दोनों देशों के बीच फरवरी 1999 में लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गये , जिसमें कश्मीर मुद्दे को दोनों पक्षों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का वादा किया गया था ।
          इसके बाद भी पाकिस्तान हर बार की तरह वादा खिलाफी करके अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया और उसने चोरी छुपे अपने सैनिकों को नियंत्रण रेखा के पार भेजने का दुस्साहस भी करने लगा और अपने इस काम को उन्होंने "ऑपरेशन बद्र" नाम दिया । उनका इस कार्य के पीछे की मंशा कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और सियाचिन ग्लेशियर से भारतीय सेना से हटा कर खुद कब्जा करने के बाद एक और विवाद खड़ा करके इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की थी ।
            भारत ने इसे साधारण घुसपैठ मानकर सोचा कि इन्हें कुछ दिनों में ही पीछे धकेल दिया जायगा । जब नियंत्रण रेखा पर पहुँचने के बाद पता चला कि उनकी सीमा में साधारण घुसपैठ नहीं थी बल्कि एक बड़े युद्ध की तैयारी कर रखी थी । वास्तविकता से वाकिफ होने के बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय नाम से 2,00,000 सैनिकों को भेजा गया ।
         कारगिल युद्ध मई 1999 को आरम्भ हुआ और लगभग दो महीने बाद 26 जुलाई 1999 को हमारे लगभग 527  सैनिकों की शहादत और 1300 जवानों को घायल करने के बाद समाप्त हुआ । इन जवानों में सब नवयुवा सैनिक थे , जिन्होंने जीवन के छोटे सी अवधि में इतना सब कर  डाला कि सम्पूर्ण विश्व में तारीफ की गई । इन सभी शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य या बलिदान की सदियों से चली आ रही परम्परा को कायम रखा , जिसकी सौगंध हर जवान वर्दी पहन कर राष्ट्रीय ध्वज के समक्ष लेता है । एक जुनून होता है इन वीरों में । जब दुश्मन इनके सामने होता है तो इनको सिर्फ करो या मारो की घुन सवार होती है और सिर पर कफन बाँध कर ही चलते हैं।  सभी का जज्बा देखने काबिल होता है।
               इन सभी जवानों के सरहद पर जाने से पहले अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी बच्चों से जल्दी ही आने का वादा किया होगा , और वापस आये भी लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए , जिसकी रक्षा करने हुए वे बलिदान हुए और नाम भारत के इतिहास में लिखवा कर अमर हो गये । हर भारतीय का रोम रोम उनका कर्जदार है और हमेशा रहेगा।

 श्रीमद्भगवद गीता के द्वितीय अध्याय के 37 वे श्लोक में  कृष्ण का अर्जुन को दिया गया सन्देश :

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।


(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)

गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था।
      यह विजय दिवस उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का है,  जो अपना जीवन को दाँव पर लगा कर  मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। हिमालय से ऊँचा था साहस उनका हम उनको शत शत नमन करते हैं।  कुछ उन वीरों के विषय में संक्षिप्त में जान लेते हैं , जिन्होंने अपने को न्योछावर कर अपने परिवार, बटालियन , देश का नाम ऊँचा किया।

कैप्टेन मनोज कुमार पांडेय :
जन्म : 25 जून 1975, सीतापुर, उत्तर प्रदेश
शहीद हुए : 3 जुलाई 1999 (24 वर्षीय)
यूनिट : 11 गोरखा राइफल की पहली बटालियन (1/11 जीआर)
मरणोपरांत परम वीर चक्र
शौर्य गाथा:

 1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए।

           कारगिल युद्ध के दौरान 11 जून को उन्होंने बटालिक सेक्टर से दुश्मन सैनिकों को खदेड़ दिया। उनके नेतृत्व में सैनिकों ने जुबार टॉप पर कब्जा किया। वहां दुश्मन की गोलीबारी के बीच भी आगे बढ़ते रहे। कंधे और पैर में गोली लगने के बावजूद दुश्मन के पहले बंकर में घुसे। हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट में दो दुश्मनों को मार गिराया और पहला बंकर नष्ट किया। उनके साहस से प्रभावित होकर सैनिकों ने दुश्मन पर धावा बोल दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना वे एक बंकर से दूसरे बंकर में हमला करते गए।

                      गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।


राइफलमैन संजय कुमार 
जन्म: 3 मार्च, 1976 को विलासपुर हिमाचल
यूनिट :13 JAK RIF
परमवीर चक्र
राइफलमैन संजय कुमार का जन्म 3 मार्च, 1976 को विलासपुर हिमाचल प्रदेश के एक गांव में हुआ था। मैट्रिक पास करने के तुरंत बाद वह 26 जुलाई 1996 को फौज में शामिल हो गए। कारगिल युद्ध के दाैरान संजय 4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप प्वाइंट 4875 की ओर कूच करने के लिए राइफल मैन संजय ने इच्छा जताई की कि वह अपनी टुकड़ी के साथ अगली पंक्ति में रहेंगे।
संजय जब हमले के लिए आगे बढ़े तो एक जगह से दुश्मन ओटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी और टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसे में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संजय ने तय किया कि उस ठि
राइफल मैन इस मुठभेड़ में खुद भी लहूलुहान हो गए थे, लेकिन अपनी ओर से बेपरवाह वह दुश्मन पर टूट पड़े। इस आकस्मिक आक्रमण से दुश्मन बौखला कर भाग खड़ा हुआ और इस भगदड़ में दुश्मन अपनी यूनीवर्सल मशीनगन भी छोड़ गया। संजय कुमार ने वह गन भी हथियाई और उससे दुश्मन का ही सफाया शुरू कर दिया।
संजय के इस चमत्कारिक कारनामे को देखकर उसकी टुकड़ी के दूसरे जवान बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने बेहद फुर्ती से दुश्मन के दूसरे ठिकानों पर धावा बोल दिया। इस दौर में संजय कुमार खून से लथपथ हो गए थे लेकिन वह रण छोड़ने को तैयार नहीं थे और वह तब तक दुश्मन से जूझते रहे थे, जब तक वह प्वाइंट फ्लैट टॉप दुश्मन से पूरी तरह खाली नहीं हो गया। इस तरह राइफल मैन संजय कुमार ने अपने अभियान में जीत हासिल की।
ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव 
जन्म: 10 मई 1980, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर
यूनिट : 18वीं ग्रेनेडियर्स
ग्रेनेडियर, बाद में सूबेदार मेजर
परमवीर चक्र
सबसे कम आयु में ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाले इस वीर योद्धा योगेंद्र सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के औरंगाबाद अहीर गांव में 10 मई, 1980 को हुआ था। 27 दिसंबर, 1996 को सेना की 18 ग्रेनेडियर बटालियन में भर्ती हुए योगेंद्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सेना की ही रही है, जिसके चलते वो इस ओर तत्पर हुए। उनके पिता भी करन सिंह यादव भी भूतपूर्व सैनिक थे वह कुमायूं रेजिमेंट से जुड़े हुए थे और 1965 तथा 1971 की लड़ाइयों में हिस्सा लिया था।
कारगिल युद्ध में योगेंद्र का बड़ा योगदान है। उनकी कमांडो प्लाटून 'घटक' कहलाती थी। उसके पास टाइगर हिल पर कब्जा करने के क्रम में लक्ष्य यह था कि वह ऊपरी चोटी पर बने दुश्मन के तीन बंकर काबू करके अपने कब्जे में ले। इस काम को अंजाम देने के लिए 16,500 फीट ऊंची बर्फ से ढकी, सीधी चढ़ाई वाली चोटी पार करना जरूरी था।
इस बहादुरी और जोखिम भरे काम को करने का जिम्मा स्वेच्छापूर्णक योगेंद्र ने लिया और अपना रस्सा उठाकर अभियान पर चल पड़े। वह आधी ऊंचाई पर ही पहुंचे थे कि दुश्मन के बंकर से मशीनगन गोलियां उगलने लगीं और उनके दागे गए राकेट से भारत की इस टुकड़ी का प्लाटून कमांडर तथा उनके दो साथी मारे गए। स्थिति की गंभीरता को समझकर योगेंद्र ने जिम्मा संभाला और आगे बढ़ते बढ़ते चले गए। दुश्मन की गोलाबारी जारी थी। योगेंद्र लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहे थे कि तभी एक गोली उनके कंधे पर और दो गोलियां जांघ व पेट के पास लगीं लेकिन वह रुके नहीं और बढ़ते ही रहे। उनके सामने अभी खड़ी ऊंचाई के साठ फीट और बचे थे।
उन्होंने हिम्मत करके वह चढ़ाई पूरी की और दुश्मन के बंकर की ओर रेंगकर गए और एक ग्रेनेड फेंक कर उनके चार सैनिकों को वहीं ढेर कर दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना यादव ने दूसरे बंकर की ओर रुख किया और उधर भी ग्रेनेड फेंक दिया। उस निशाने पर भी पाकिस्तान के तीन जवान आए और उनका काम तमाम हो गया। तभी उनके पीछे आ रही टुकड़ी उनसे आकर मिल गई।
आमने-सामने की मुठभेड़ शुरू हो चुकी थी और उस मुठभेड़ में बचे-खुचे जवान भी टाइगर हिल की भेंट चढ़ गए। टाइगर हिल फतह हो गया था और उसमें योगेंद्र सिंह का बड़ा योगदान था। अपनी वीरता के लिए ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह ने परमजजवीर चक्र का सम्मान पाया और वह अपने प्राण देश के भविष्य के लिए भी बचा कर रखने में सफल हुए यह उनका ही नहीं देश का भी सौभाग्य है।

कैप्टन विक्रम बत्रा
जन्म: 9 सितंबर, 1974, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
शहीद हुए : 7 जुलाई, 1999 (24 वर्ष)
यूनिट : 13 जेएंडके राइफल
परम वीर चक्र
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पासआउट होने के बाद 6 दिसंबर, 1997 को लेफ्टिनेंट के तौर पर सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बटालियन 13 जम्मू एंड कश्मीर रायफल 6 जून को द्रास पहुंची। 19 जून को कैप्टन बत्रा को प्वाइंट 5140 को फिर से अपने कब्जे में लेने का निदेश मिला। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन के लगातार हमलों के बावजूद उन्होंने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए और पोजीशन पर कब्जा किया। उनका अगला अभियान था 17,000 फीट की ऊंचाई पर प्वाइंट 4875 पर कब्जा करना। पाकिस्तानी फौज 16,000 फीट की ऊंचाई पर थीं और बर्फ से ढ़कीं चट्टानें 80 डिग्री के कोण पर तिरछी थीं।
7 जुलाई की रात वे और उनके सिपाहियों ने चढ़ाई शुरू की। अब तक वे दुश्मन खेमे में भी शेरशाह के नाम से मशहूर हो गए थे। साथी अफसर अनुज नायर के साथ हमला किया। एक जूनियर की मदद को आगे आने पर दुश्मनों ने उनपर गोलियां चलाईं, उन्होंने ग्रेनेड फेंककर पांच को मार गिराया लेकिन एक गोली आकर सीधा उनके सीने में लगी। अगली सुबह तक 4875 चोटी पर भारत का झंडा फहरा रहा था। इसे विक्रम बत्रा टॉप नाम दिया गया। उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन अनुज नायर
जन्म : 28 अगस्त, 1975 दिल्ली
शहीद हुए : 7 जुलाई, 1999 (24 वर्ष)
यूनिट : 17 जाट रेजीमेंट
मरणोपरांत महावीर चक्र
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पासआउट होने के बाद जून, 1997 में जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उनका पहला अभियान था प्वाइंट 4875 पर कब्जा करना। यह चोटी टाइगर हिल की पश्चिमी ओर थी और सामरिक लिहाज से बेहद जरूरी। इसपर कब्जा करना भारतीय सेना की प्राथमिकता थी। अभियान की शुरुआत में ही नैयर के कंपनी कमांडर जख्मी हो गए। हमलावर दस्ते को दो भागों में बांटा गया। एक का नेतृत्व कैप्टन विक्रम बत्रा ने किया और दूसरे का कैप्टन अनुज ने। कैप्टन अनुज की टीम में सात सैनिक थे, जिनके साथ मिलकर उन्होंने दुश्मन पर चौतरफा वार किया।
कैप्टन अनुज ने अकेले नौ पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और तीन दुश्मन बंकर ध्वस्त किए। चौथे बंकर पर हमला करते समय दुश्मन ने उनकी तरफ रॉकेट से चलने वाली ग्रेनेड फेंका जो सीधा उनपर गिरा। बुरी तरह जख्मी होने के बाद भी वे बचे हुए सैनिकों का नेतृत्व करते रहे। शहीद होने से पहले उन्होंने आखिरी बंकर को भी तबाह कर दिया। दो दिन बाद दुश्मन सेना ने फिर से चोटी पर हमला किया जिसका जवाब कैप्टन विक्रम बत्रा की टीम ने दिया। कैप्टन नायर को मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया।

कैप्टन नीकेजाकुओ कैंगुरूसे
जन्म: 15 जुलाई, 1974 नरहेमा, कोहिमा जिला, नगालैंड
शहीद हुए : 28 जून, 1999
यूनिट : 2 राजपूताना राइफल
मरणोपरांत महावीर चक्र
शौर्य गाथा: 12 दिसंबर, 1998 में सेना में भर्ती हुए। जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, वे राजपूताना रायफल बटालियन में जूनियर कमांडर थे। उनकी दृढ़ता और दिलेरी के कारण उन्हें अपनी बटालियन के घातक प्लाटून का नेतृत्व सौंपा गया। 28 जून की रात कैप्टन कैंगुरूसे के प्लाटून को ब्लैक रॉक नामक टीले से दुश्मन को खदेड़ने की जिम्मेदारी मिली। टीले पर चढ़ाई के दौरान ऊपर से दुश्मन के लगातार हमले में कई सैनिक शहीद हुए और खुद कैप्टन को कमर में गोली लगी, लेकिन वे रुके नहीं।
ऊपर पहुंचकर वे एक पत्थर की आड़ में टीले के किनारे लटके रहे। 16,000 फीट ऊंचाई और -10 डिग्री तापमान में बर्फ पर लगातार उनके जूते फिसल रहे थे। लौटकर नीचे आना ज्यादा आसान था, लेकिन वे अपने जूते उतारकर नंगे पैर टीले पर चढ़े और आरपीजी रॉकेट लांचर से सात पाकिस्तानी बंकरों पर हमला किया। दो दुश्मनों को कमांडो चाकू से मार गिराया और दो को अपनी रायफल से। दुश्मनों की गोलियों से छलनी होकर वे टीले से नीचे आ गिरे, लेकिन इतना कर गए कि उनके प्लाटून ने टीले पर कब्जा कर लिया। इस दिलेरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा
जन्म: 22 मई, 1963 कोटा, राजस्थान
शहीद हुए : 27 मई 1999
यूनिट : गोल्डन ऐरोज, स्क्वाड्रन नंबर 17
मरणोपरांत वीर चक्र
शौर्य गाथा: नेशनल डिफेंस एकेडमी से पासआउट होने के बाद 14 जून, 1985 को फाइटर पायलट के तौर पर भारतीय वायु सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान नियंत्रण रेखा के इस तरफ की स्थिति का जायजा लेने के लिए ऑपरेशन सफेद सागर लांच किया गया। इसमें शामिल फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता के मिग-27एल विमान के इंजन में आग लगने के बाद वह उसमें से बाहर कूदे।
स्क्वाड्रन लीडर आहूजा अपने मिग-21एमएफ विमान में दुश्मन की पोजीशन के ऊपर उड़ान भरते रहे ताकि बचाव दल को नचिकेता की लोकेशन की जानकारी देते रहें। उन्हें अच्छी तरह पता था कि दुश्मन कभी भी उन पर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल दाग सकता है। हुआ भी ऐसा ही, कुछ ही देर में उनके विमान पर एमआइएम-92 स्ट्रिंगर से वार हुआ। वे अपने विमान से बाहर कूदे। अब वायु सेना को एक नहीं दो बचाव अभियानों को अंजाम देना था। लेकिन वायु सेना को उनकी लोकेशन की जानकारी नहीं मिली। पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें बंदी बनाकर बेरहमी से उनकी हत्या कर दी। उनके पार्थिव शरीर पर कई गंभीर घावों के निशान दिखे। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

हवलदार यश वीर सिंह तोमर
जन्म: 04 जनवरी, 1960 सिरसाली, उत्तर प्रदेश
शहीद हुए : 13 जून, 1999
यूनिट : 2 राजपूताना राइफल
मरणोपरांत वीर चक्र
शौर्य गाथा: कारगिल युद्ध के दौरान 18 ग्रेनेडियर्स को तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का निर्देश मिला। ग्रेनेडियर्स के कई विफल प्रयासों के बाद राजपूताना रायफल की दूसरी बटालियन को हमले के लिए आगे किया गया। ग्रेनेडियर्स ने तीन प्वाइंट से राजपूताना को कवर दिया। मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में 90 सैनिक अंतिम हमले के लिए आगे बढ़े। इसी पलटन में यश वीर भी शामिल थे। यह पलटन प्वाइंट 4950 को अपने कब्जे में लेने के आखिरी चरण में थी।
12 जून को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलाबारी के बीच जब भारतीय सैनिक एक एक कर शहीद हो रहे थे, तो हवलदार यश वीर सिंह ने ग्रेनेड लेकर पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोला। उन्होंने बंकरों पर 18 ग्रेनेड फेंके और दुश्मनों को मार गिराया। उनके साहस को देखकर दुश्मनों के छक्के छूट गए। उनके पैर उखड़ने शळ्रू ही हुए थे कि इस दौरान वे गंभीर रूप से जख्मी हुए और शहीद हो गए। जब उनका शरीर मिला तो उसके एक हाथ में रायफल और दूसरे में ग्रेनेड थे। तोलोलिंग फतह करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन सौरभ कालिया
जन्म: 29 जून, 1976 अमृतसर, पंजाब
शहीद हुए : 9 जून, 1999
यूनिट : 4 जाट रेजीमेंट
शौर्य गाथा: कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज के जरिए दिसंबर, 1998 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी में भर्ती हुए। जाट रेजिमेंट की चौथी बटालियन में पहली पोस्टिंग कारगिल में मिली। जनवरी, 1999 में उन्होंने कारगिल में रिपोर्ट किया। मई के शुरुआती दो हफ्तों में कारगिल के ककसर लांग्पा क्षेत्र में गश्त लगाते हुए उन्होंने बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों और विदेशी आतंकियों को एलओसी के इस तरफ देखा।
15 मई को अपने पांच साथियों- सिपाही अर्जुन राम, भंवर लाल बगारिया, भीका राम, मूला राम और नरेश सिंह के साथ लद्दाख की पहाड़ियों पर बजरंग पोस्ट की तरफ गश्त लगाने गए। वहां पाकिस्तानी सेना की तरफ से अंधाधुंध फार्यंरग का जवाब देने के बाद उनके गोला- बारूद खत्म हो गए। इससे पहले की भारतीय सैनिक वहां मदद लेकर पहुंच पाते, पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें बंदी बना लिया। पाकिस्तानी रेडियो स्कार्दू ने खबर चलाई कि कैप्टन सौरभ कालिया को बंदी बना लिया गया है। उन्हें 15 मई से 7 जून (23 दिन) तक बंदी रखा गया और घृणित अमानवीय बर्ताव किया गया। 9 जून को उनके शरीर को भारतीय सेना को सौंपा गया।

मेजर राजेश सिंह अधिकारी
जन्म: 25 दिसंबर, 1970 नैनीताल, उत्तराखंड
शहीद हुए : 30 मई, 1999 (उम्र 28 वर्ष)
यूनिट : 18 ग्रेनेडियर्स
मरणोपरांत वीर चक्र 
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से 11 दिसंबर, 1993 को सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान 30 मई को उनकी यूनिट को 16,000 फीट की ऊंचाई पर तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह पोजीशन भारतीय सेना के लिए बेहद अहम थी क्योंकि यहीं पर भारतीय सेना बंकर बनाकर टाइगर हिल पर बैठे दुश्मनों पर निशाना साध सकती थी। जब मेजर अधिकारी अपने सैनिकों के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे तो दुश्मनों ने दो बंकरों से उनपर हमला करना शुरू किया।
12 जून को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलाबारी के बीच जब भारतीय सैनिक एक एक कर शहीद हो रहे थे, तो हवलदार यश वीर सिंह ने ग्रेनेड लेकर पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोला। उन्होंने बंकरों पर 18 ग्रेनेड फेंके और दुश्मनों को मार गिराया। उनके साहस को देखकर दुश्मनों के छक्के छूट गए। जब उनका शरीर मिला तो उसके एक हाथ में रायफल और दूसरे में ग्रेनेड थे। तोलोलिंग फतह करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 
* शहीदों के विषय में जानकारी का स्रोत गूगल है।


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गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरियाली तीज !


                 



  हरियाली तीज का उत्सव सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह नाग पंचंमी के दो दिन पहले होता है और यह उत्सव भी सावन  के अन्य उत्सवों की तरह से महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी हरी दिखलाई देती है और ऐसे में किसी का भी मन उस प्रकृति के बीच नाचने और गाने का करता है। इसमें स्वभाव के अनुसार महिलायें उल्लसित मन से इस तीज पर सज संवर कर , हाथों और पैरों में मेंहदी सजा कर अधिकतर हरी या रंग बिरंगी साड़ियों में और आभूषणों से सजी पेड़ों पर पड़े झूले पर झूलती हुई आपस में चुहल करती उत्सव को और हास परिहास से पूर्ण बनाती हैं।
                    सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत काफी मायने रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। रिमझिम फुहारों के बीच तन-मन जैसे नृत्य करने लगता है। महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और खुशियां मनाती हैं। इस उत्सव में हर उम्र की महिलायें और लडकियाँ शामिल होती है।  नव विवाहित युवतियां प्रथम सावन में मायके आकर इस हरियाली तीज में सम्मिलित होने की परम्परा है। हर‌ियाली तीज के द‌िन सुहागन स्‍त्र‌ियां हरे रंग का ऋृंगार करती हैं। नवविवाहिता लड़कियां अगर अपने मायके में होती है तो ससुराल से उनके लिए श्रृंगार का सामान , आभूषण , सजे हुए कपड़े और मिठाई आदि भेजी जाती है और अगर वह अपनी ससुराल में होती है तो मायके से उसके लिए यही सब सामान भेजा जाता है , जिसे वह अपनी सास या घर की अन्य बुजुर्ग महिलाओं को देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।  उत्तर प्रदेश में जो सामान वधु या बेटी के लिए भेजा जाता है उसे श्रावणी कहते हैं।             
                               हरियाली  तीज के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान के जयपुर में इसका विशेष महत्त्व है। तीज का आगमन भीषण ग्रीष्म ऋतु के बाद पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो यह और भी स्मरणीय हो उठती है। लोग तीज जुलूस में ठंडी बौछार की कामना करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले - कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से आभ्यंतर आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन  हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है।

रविवार, 21 जून 2020

बालिका संरक्षण गृह क्यों संदिग्ध हैं ?

                    आज फिर वही खेल सामने आया और यह कोई पहली बार नहीं हुआ है । पूरा इतिहास है हमारे सामने  कि बाल संरक्षण गृह में रहने वाली नाबालिग बच्चियों में से 57 कोरोना पॉजिटिव पाई गयीं , ये कहीं जाती नहीं है फिर भी इससे लज्जाजनक बात तो ये है कि उन में से 2 नाबालिग बच्चियाँ  गर्भवती है और इनमें कहा जा रहा है कि दोनों बच्चियाँ आने से पहले से गर्भवती थीं । उनमें एक एच आईवी पॉजिटिव है और दूसरी हेपेटाइटिस सी से ग्रसित है । संबंधित अधिकारी इस विषय में चुप्पी साधे हैं तो एक प्रश्नचिह्न खड़ा है ।
         ये कानपुर की ही घटना है । इन 57 बच्चियों के भी परीक्षण की जरूरत है कि उनमें से कितनी अन्य संक्रमण की शिकार नहीं है ? इनको कहीं भेजा जाता है या फिर उनके शोषण के लिए वहाँ किसी को बुलाया जाता है । कौन कौन शामिल है ?  यहाँ बात कोरोना की ही नहीं है बल्कि इन बच्चियों के शोषण का है । संरक्षण गृह की संरक्षिका,  वहाँ का स्टाफ या फिर रसूख वाले लोगों के दबाव में बच्चियों का.शोषण किया जाता है । सरकारी नियंत्रण का क्या है ?
         अगस्त 2014 में  मुज्जफरपुर आश्रय गृह के बाद , अपने इतिहास को दुहराता  अगस्त , 2018 देवरिया आश्रय गृह का लड़कियों के होते यौन शोषण ने अब प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या ये संवासिनी गृह , अनाथालय , बालिका सुधार गृह , नारी कल्याण केंद्र , वृद्धाश्रम , बाल संरक्षण गृह सब के सब ऐसे यौन शोषण  के ही अड्डे बने हुए हैं।  एक बार हुई घटना के बाद क्यों नहीं सबक लिया जाता है।  क्या गुनाह है उन लड़कियों का , वे सिर्फ अनाथ हैं या किसी जाने अनजाने अपराध में या साजिश में अपराधी घोषित हुईं ,  घर के अत्याचार से तंग आकर घर से भाग आईं  , लेकिन उन्हें इन सबसे कोई सरोकार न था। रसूख के चलते बच्चियों की मेडिकल रिपोर्ट साफ सुथरी दिखाई गयीं ।
                            कुछ साल पहले 2012 का इलाहबाद के बालिका संरक्षण गृह में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण की बात सामने आयी थी और उसके पीछे भी बहुत सारे प्रश्न खड़े हो गए थे लेकिन फिर आगे क्या हुआ ? इसके बारे में कोई भी पता नहीं है।  वहां की  वार्डेन अपने घर में रहती थी और बच्चियां पुरुष नौकरों के सहारे छोड़ दी जाती थीं। सरकारी संस्थाओं में ये हाल है कि वार्डेन के पद पर काम करने वाली महिला संरक्षण गृह से दूर अपने घर में सो रही है और बच्चियां पुरुषों के हवाले करके।  जिम्मेदार लोगों को सिर्फ और सिर्फ अपने वेतन से मतलब होता है। शायद  उनकी संवेदनाएं भी मर चुकी होती हैं।  प्रश्न यह है कि बच्चियों की संरक्षा का दायित्व महिलाओं को क्यों नहीं सौप गया था ? ऐसा किस्सा कानपुर में भी हुआ था , जब संवासिनी आश्रम छोड़ कर भागने लगती हैं तो फिर खलबली मच जाती है।   रसूखदार लोगों के चल रहे बाल गृह एक धंधा मात्र है सरकारी पैसे को हड़पने का और अपने काले धन को सफेद बनाने का।
                                   जून २०१६ को कानपु र के निकट रनियां में एक बाल संरक्षण गृह शांति देवी मेमोरियल  संस्था द्वारा संचालित  शिशु गृह एवं बाल गृह में से शिशु गृह में ५ बच्चियों की कुपोषण के कारण मौत हो गयी थी और तब उसको बंद करने का आदेश दिया गया था और बच्चियों को दूसरी जगह भेज दिया गया था।
                    बाल गृह में भी 23 अगस्त 2016 को 7 वर्षीय मासूम की मौत हो गयी।   यहाँ पर पालने वाले बच्चों के प्रति कौन जिम्मेदार होता है ? ये केंद्र बगैर निरीक्षण के कैसे चलते रहते हैं ? राज्य की भी कोई जिम्मेदारी होती है या नहीं। कितने आयोग चल रहे हैं ? मानव संसाधन मंत्रालय , महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और भी कई परियोजनाओं के अन्तर्गत इस तरह की संस्थाएं को अनुदान मिलता है लेकिन इसके बाद क्या कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता है कि वे जाने इन में पालने वाले या संरक्षित किये जाने वाले बच्चों का हाल क्या है ? उनके रहने , खाने और चिकित्सा व्यवस्था कैसी है ? एक टीम को इसके लिए नियुक्त किया जाना चाहिए जो समय समय पर इनका निरीक्षण करे। बशर्ते कि  वे भी इन संस्थाओं की तरह पैसा बनाने का काम न करते हों।                                                 
कैसा जीवन बिताती हैं ? --
                                   इन संरक्षण गृहों में वे कैसा जीवन बिताती हैं , ये जाने की न कोई महिला आयोग कभी जानने की कोशिश करता है और न ही सरकार का कोई भी विभाग ऐसा है।  उनसे गृहों में साफ सफाई , बाकी घरेलू  काम करवाए जाते हैं  , जबकि सरकार की तरफ से इन गृह संचालकों को एक मोटी रकम मिलती है इनके भरण पोषण के लिए। वह कहाँ जाती है ? इसका कोई हिसाब किताब कहीं माँगा जाता है या फिर रसूख वाले और दबंगों को ये काम दिया जाता है। इस काम में सिर्फ पुरुष ही दोषी हों ऐसा नहीं है बल्कि महिलाये भी ऊपर के अफसरों को खुश करने के लिए और अपनी आमदनी बनाये रखने के लिए लड़कियों को प्रयोग करती हैं।
                                                            आश्रम या गृह- समाज सेवा का प्रतीक माने जाते हैं  जैसे -- सरकारी नारी कल्याण केंद्र , वृद्धाश्रम , बाल सुधार केंद्र या बालिका सुधार गृह , अनाथालय , संवासिनी गृह और बाल संरक्षण गृह का नाम सुनकर ये ही लगता है।  लेकिन इनको चलाने वाले एनजीओ में होने वाली गतिविधियों से यही समझ आता है कि कुछ लोग जोड़ तोड़ कर सरकारी सहायता प्राप्त कर दुनियां का दिखावा करके एनजीओ खोल लेते हैं और फिर उसे बना लेते हैं अपनी मोटी आमदनी का एक साधन। सब कुछ कागजों पर चलता रहता है , जब तक कि कोई बड़ी वारदात सामने नहीं आती है।  उसके पीछे का खेल एक दिन सामने आता है।एक एनजीओ को तो मैं भी अपने ही देखते देखते करोड़पति होने की साक्षी हूँ बल्कि कहें हमारे घर से दो किमी की दूरी पर है। वर्षों में उसी के सामने से ऑफिस जाती रही हूँ और वह सिर्फ ईंटों से बने स्कूल के मालिक ने कुछ ही सालों में इंटर कॉलेज , फिर डिग्री कॉलेज और साथ ही संवासिनी आवास तक बना डाले और फिर जब संवासिनी की मौत हुई और उसपर की गयी लीपापोती ने सब कुछ सामने ला दिया।
                           ये सिर्फ एक एनजीओ की कहानी नहीं है बल्कि ऐसे कितने ही और मिलेंगे। ,ये तो निजी आश्रम तो बनाये ही इसी लिए जा रहे हैं कि  वह इनके नाम पर सरकारी अनुदान लेने की नीयत होती है।  साम दाम दंड भेद सब  अपना कर पैसे वाले बनाने का काम बहुत तेजी से चल निकला है। इन तथाकथित समाज सेवकों के दोनों हाथ में लड्डू होते हैं , समाज में प्रतिष्ठा , प्रशासन में हनक और हर महकमें में पैठ।  धन आने के रास्ते खुद बा खुद खुलते चले जाते हैं। इन पर सरकार का कोई अंकुश नहीं होता है क्योंकि मिलने वाले अनुदान में सरकारी विभागों का भी हिस्सा होता है और फिर कौन किससे हिसाब माँगेगा या फिर निरीक्षण करने आएगा।  सारी खाना पूरी कागजों पर होती रहती है।

अनुदान के बाद निरीक्षण 
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                           बाल संरक्षण गृह के नाम पर भी लोग अपना व्यवसाय चला रहे हैं। इसमें सभी शक के दायरे में नहीं आते हैं, लेकिन इन संरक्षण गृहो का जीवन अगर अंदर झांक कर कोई देखना चाहे तो संभव नहीं है और इसके लिए सहायक महिला आयोग , मानव संसाधन मंत्रालय , मानवाधिकार आयोग सब कहाँ सोते रहते हैं ? किसी की कोई भी जिम्मेदारी नहीं बनती है।  अगर संरक्षण गृह खोले गए हैं तो उनका  निरीक्षण भी उनका ही दायित्व बनता है।  एक दिन न सही महीनों और सालों में तो उन पर दृष्टिपात करना ही चाहिए।  वह हो इस लिए नहीं पाता  है क्योंकि पहुँच ही सारी कार्यवाही कागजों पर पूरी करवा देती है और फिर ये संरक्षण गृह यातना गृह बने होते हैं। इनका रख रखाव और साफ सफाई , खाना पीना सब कुछ ऐसा कि जिसे आम आदमी के खाने काबिल भी न हो। सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार कहा था कि उत्तर प्रदेश में महिला आयोग जैसी कोई चीज है भी या नहीं क्योंकि हर जगह अराजकता के बाद भी इस आयोग को कभी सक्रिय होते नहीं देखा जाता है।  निराश्रितों , संवासिनियों , अबोध बालिकाओं में संरक्षण किसका होता है ? इसके बारे में सिर्फ कागजात साक्षी होते हैं। 

 सरकार का दायित्व 
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        बीमार कर देने वाला वातावरण और बदबू और सीलन से भरे हुए कमरे जिनमें वह बच्चे कैसे जीते हैं ? ये जानने की कोई भी जरूरत नहीं समझता है। निजी एनजीओ की बात तो हम बाद में करेंगे पहले हम सरकारी सरंक्षण ग्रहों की बात कर लें।  इनमें से आये दिन संवासनियां मौका मिलते ही भाग जाती हैं।  बाल संरक्षण गृहों से भी बच्चों के भागने की खबर मिलती रहती है।  अगर यहाँ पर उन्हें वह वातावरण मिलता है जिसके लिए उनको भेजा गया है तो वे अनाथ या संरक्षणहीन बच्चे  क्यों भागेंगे ? सब जगह ऐसा होता हो ये मैं नहीं कह सकती लेकिन अव्यवस्था और विवादित रखरखाव् पर सरकार को दृष्टि तो रखनी ही चाहिए।  किसी को तो ये सब चीजें संज्ञान में रख कर इनके प्रति जिम्मेदार होना चाहिए।               
                   इतनी सारी अनियमितताओं के बाद भी किसी की नींद खुलती नहीं है।  सरकारें आती और जाती रहती हैं लेकिन ये सब उसी तरह से चलती रहती हैं क्योंकि सरकार इस बात से अवगत ही नहीं है कि  कहाँ कहाँ और कितना अनुदान जा रहा है।  विभागों में सब कुछ निश्चित है कि  कितने अनुदान पर कितने प्रतिशत देना होगा।  वहां से चेक जारी ही तब होता है जब आप अग्रिम राशि के रूप में उन्हें चेक दे दें।


शुक्रवार, 12 जून 2020

कभी यही हमारा जीवन था !

        जब से कोरोना वायरस का हमारे देश मेंं प्रवेश हुआ , एक साथ बहुत सारी चीजों के लिए सतर्क हो गए लेकिन हमारे ग्रामीण जीवन में किसी विशेष चीज को करने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि उन सब चीजों को उन्होंने पहले ही अपना रखा है । अपने बचपन में या युवावस्था में अपने घरों में, अपने गाँँवों में यह सब चीजें हमने पहले से ही देखी है । यह चीजें हमारी संस्कृति में शायद हमारे जीवन में शामिल थीं ऋऔर हमारे आचरण को एक अलग दिशा देती थी। इससे हमें किसी और चीज से बचने की परहेज करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, जिसे हम क्वॉरेंटाइन हैं।
        ..     क्वॉरेंटाइन हमारे ग्रामीण जीवन में हमारे माता-पिता के जीवन काल से ही चला आ रहा है :--

         व्यक्तिगत  क्वॉरेंटाइन :--

           हमारे घरों में प्रसव  होने पर ही प्रसूता को सबसे अलग कर दिया जाता था। उसे इस नाम से कभी नहीं समझा जाता था, कहा जाता था कि इस घर में सूतक लगा है । प्रसूता को सबसे अलग रखा जाता था , उसको कोई छू नहीं सकता था , साफ सफाई के लिए साथ ही किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचाने के लिए प्रसूता और बच्चे के कमरे में  बराबर आग जला कर रखी जाती थी । विशेष  कार्य के लिए अगर कोई प्रसूता के पास जाता , उसे छूना होता तो बाहर आकर नहाना होता था।  हम  जानते हैं ये अवधि किसी घर में 12 दिन , किसी घर में सवा महीने तक प्रसूता रसोई या पूजा आदि कार्य नहीं कर सकती थी । ऐसा उसको शारीरिक आराम देने के लिए , उसको किसी संक्रमण से बचाने के लिए पहले से ही ये व्यवस्था बनाई गई थी ।  प्रसूता को गरम जड़ी बूटियों वाला पानी ही दिया जाता था । खाने में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए गरम ड्राई फ्रूट गुड़ के साथ लड्डू और कतली बना कर दिया जाता था ।

 परिवार का होम क्वॉरेंटाइन :-
 
               इसी तरह किसी परिवार में मृत्यु होने पर उस परिवार के घर में खाना पीना बनना वर्जित होता है और आस पड़ोस के लोग उन लोगों के लिए खाने-पीने की सामग्री बनाकर देते थे । इस दिशा में वह लोग उनके घर से कुछ नहीं लेते थे बल्कि उस परिवार के लोग दूसरों के यहाँँ प्रवेश नहीं करते हैं । उस समय भी एक तरह से उस परिवार को क्वॉरेंटाइन कर दिया जाता था। मृत्यु के इस काल को भी सूतक काल कहा जाता है। शांति हवन या तेरहवीं के पश्चात ही वे लोग  सामाजिक जीवन मैं शामिल हो पाते थे । चाहे जहाँँ भी,  चाहे जिस तरह भी मृत्यु क्यों न हुई हो,  घर में पूरी साफ सफाई की जाती थी -  जैसे कोरोना के रोगी को छूने की अनुमति नहीं होती है , उसी तरह दिवंगत के कपड़े , बिस्तर आदि  घर से बाहर फेंक दिया जाता है। घर की लिपाई पुताई शायद इसी उद्देश्य की जाती है कि किसी भी तरह का संक्रमण घर में ना रह जाए। दीवारों को चूने से पुताई की जाती थी और जमीन के कच्चे फर्श को गोबर और मिट्टी मिलाकर पोता जाता था जिससे सफाई बरकरार रहे पक्के मकानो में भी शव के हटते ही घर की धुलाई की जाती है ।

सोशल डिस्टेंसिंग :-

             जो आज के समय में आवश्यक मानी जा रही  है । वह हम सदियों से प्रयोग करते आ रहे  हैं। अजनबी आने वाले व्यक्ति को अभिवादन करके स्वागत करने की प्रथा हमारे यहां थी, लेकिन तब दूर से ही 'राम-राम', पाँय लागूँ , जय राम जी की ' कहकर होता था । फिर नमस्कार, प्रणाम आदि भी दूर से ही किया जाता था । चौपाल पर भी गाँव के लोग दूर दूर ही बैठते थे । ये उनके जीवन चर्या का अंग सदैव रहता था।

व्यक्तिगत सफाई :-

            कोरोना से बचने के लिए घर में घुसते ही सबसे पहले जूते चप्पल बाहर छोड़ना, फिर हाथ पैर मुंह धोना और बाहर की कपड़े उतार कर नहा कर ही अंदर प्रवेश करना जैसे आवश्यक है , उसी तरह से हमारे ग्रामीण परिवेश में आज भी और हमारे जीवन में पारंपरिक तौर पर कहीं से भी आने पर जूते चप्पल बाहर निकालना हाथ पैर मुंह धो के घर के अंदर प्रवेश करना आवश्यक है और इससे हमारी विभिन्न प्रकार के रोगों से बचत होती रही । जब पश्चिमी संस्कृति ने  हमारे जीवन में कदम रखा और हमने अपने को सुशिक्षित और सुसंस्कृत कहलाने के लिए अपनी पुरानी परंपराओं को तोड़ना शुरू कर दिया ताकि हम आधुनिक कहला सकें ।  पैर में चप्पल हर समय रहती है । जबकि पहले चप्पल घर में हर समय पहनना आवश्यक नहीं था । अभिवादन नमस्कार की जगह हाथ मिलाने ने ले लिया । इस प्रकार के कार्य हमने जब करने छोड़ दिए और हम प्रगतिशील कहलाने लगे तभी एक झटका लगा कोरोना के आने से हमको अपनी प्राचीन संस्कृति ग्रामीण संस्कृति याद आने लगी और हम फिर हाथ जोड़कर नमस्कार करें , अपने जूते चप्पल को बाहर छोड़ने हाथ पैर धो कर घर के अंदर प्रवेश करने की परंपरा को अपनाने लगे। हमारे लिए कुछ नया नहीं बल्कि हम तो यह सदियों से देखते और करते चले आ रहे हैं , कभी भी बगैर हाथ पैर धोए खाना खाने के लिए नहीं बैठा जाता और भोजन भी रसोई के पास जमीन में चटाई पर बैठकर , चौकी पर बैठकर खाते थे। तब हमें कभी भी किसी भी निसंक्रमण जरूरत नहीं पड़ी । हम सुरक्षित है और हमारे पूर्वजों की आयु 100 वर्ष तक की होती थी और उन्हें इसी प्रकार की कोई गंभीर बीमारी नहीं देखी गई।
कोरोना के कारण घर में कैद होकर रह गए , क्योंकि जिसे हम सामाजिक जीवन कहते हैं -- पार्टियाँँ , डाँस पार्टी,  होटल और रेस्तरां में जाकर लंच डिनर लेना ।  मॉल में जाकर शॉपिंग करना और शाम को खाना खाते हुए घर आना। बाहर खाना खाते हुए भले ही हम चम्मच से खाएं लेकिन वहाँँ  लोगों को कभी भी हाथ धोकर आते हुए नहीं देखा। टेबल पर अपने ऑर्डर को पूरा करने के लिए बैठे रहते हैं और फिर खाकर ही घर आते हैं । आज के लोगों का जीवन स्तर बन चुका था । लेकिन आज वह अपनों से मिलते हुए भी डरता है , पता नहीं कब क्या हो जाए ?

अंतिम क्रिया :--

              हमारी यह कल्पना हमारा शरीर पांच तत्वों से बना हुआ है और शव के  शवदाह करने से शरीर उन्हें उन्हें पंचतत्व में विलीन हो जाता है और उसकी अस्थियों को जल में प्रवाहित करके अपना कार्य पूर्ण किया जाता था  यह सिर्फ हिंदू संस्कृति की विशेषता और विश्वास था,  लेकिन इसको कोरोना ही नहीं बल्कि मरीजों को के शवदाह करने की बात सामने आई तो जो लोग शवों को दफनाते थे , वे भी सबको शवदाह गृह में जाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं । बल्कि अब तो शव छूने या उसके पास जाने की अनुमति नहीं होती है और कहीं-कहीं तो शव को लेने से इंकार कर देते हैं  यह विडंबना है उन लोगों की जो कि यदि अंतिम संस्कार सनातन धर्म के अनुसार नहीं होती है तो आत्मा भटकती रहती है।

गुरुवार, 4 जून 2020

विश्व पर्यावरण दिवस !

विश्व पर्यावरण दिवस !

   विश्व पर्यावरण दिवस की आवश्यकता संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस की और इसी लिए प्रतिवर्ष 5 जून को इस दिवस को मनाने के लिए निश्चित किया गया । विश्व में लगभग 100 देश विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं । धरती से हरियाली के स्थान पर बड़ी बड़ी बहुमंजिली इमारतें दिखाई दे रहीं हैं ।
         नेशनल हाईवे के निर्माण के नाम पर मीलों लंबे रास्ते एक कतरा छाँव से रहित है। पथिक पहले तो पैदल ही चलते थे पेड़ों के नीचे सुस्ताकर कुँए का शीतल जल पीकर आगे की रास्ता लेते थे । अब तो कुछ शेष नहीं तो अगर हम उन्हें नहीं रहने देंगे तो वह हमें कैसे जीने देंगे?

      *मानव सुख की कीमत*

                               दिन पर दिन बढ़ती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं, लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं। हाँ हम ही घोल रहे हैं। प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं, लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं। सभी तो एसी नहीं लगवा  सकते हैं। लेकिन इससे उत्सर्जित होने वाली गैसें दूर दूर तक लगे पोधों को सुखाने के लिए बहुत है । पेड़ों पर शरण न मिली तो पक्षी कहाँ जायेंगे । इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं।

   खेतों का व्यावसायिक प्रयोग

    जिन खेतों में लहलहाती फसलें ,
     अब उन पर इमारतें उग रही हैं ।
                                   - अज्ञात
     ये पंक्तिया हमें आइना दिखा रही हैं ।
                        हम  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनते चले आ रहे हैं और सरकार भी प्रकृति को बचाने के लिए मीटिंग करती है , लम्बे चौड़े प्लान बनाती है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं।  अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें। कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं , कभी कभी तो एक फ्लैट में दो से लेकर चार तक एसी होते हैं । उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है । हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है। उन्हें गर्मी से दो चार नहीं होना पड़ता है क्योंकि घर में एसी , कार में एसी और फिर ऑफिस में भी एसी । गर्मी से बचने के लिए वे ठंडक खरीद सकते हैं लेकिन एक गर्मी से मरते हुए प्राणी को जीवन नहीं दे सकते हैं ।
               
    मोबाइल टावर

         मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है। इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है।

      जैविक कित्सकीय कचरा :-
   
          पर्यावरण को दूषित करने वाला आज सर्वाधिक जैविक चिकित्सकीय कचरा बन रहा है । जिस तेजी से नर्सिंग होम खुलते चले जा रहे है , उतना ही कचरे का निष्कासन बढ़ रहा है । उसके निस्तारण के प्रति कोई भी सजग नहीं है । सिर्फ कुछ सौ रूपयों के पीछे ये कचरा निस्तारण करने वाली संस्थाओं को न देकर अस्पतालों के पीछे या थोड़ी दूर पर फेंक दिया जाता है । ये जीवन रक्षण केन्द्र या बीमारी फैलाने का स्रोत ? इसमें घातक बीमारियों के फैलाने वाले तत्व भी होते हैं । जानवर इनको इधर उधर फैला देते हैं और वह वाहनों में फँस कर मीलों तक फैलता चला जाता  न है ।

                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है .

* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में एसी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .

*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं .

* अगर संभव है तो सौर ऊर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय, जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है।

* फल और सब्जी के छिलकों को बाहृर सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा .

* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोका जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी .

* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं .
          इस पर्यावरण दिवस को सार्धक बनाने के लिए जल संरक्षण दिवस , पृथ्वी दिवस , प्राकृतिक संपदा संरक्षण , वृक्षारोपण , कृषि योग्य भूमि की बिक्री निषेध को भी अपनाना होगा ।