
सतीश सक्सेना :
जिन्दगी का एक ये भी पहलू होता है और अपने दर्द को या अपने संघर्ष को हम कितने काम शब्दों में और कितनी गहराई से बयान कर सकते हें और बस सतीश जी ने चंद शब्दों में कही है लेकिन इसके पीछे छुपे संघर्ष के दर्द को हम गहराई से महसूस किया जा सकता है। आज जानिए सतीश जी को :
चुनौती जिंदगी की....
जीवन में शायद ही कोई होगा जिसे चुनौती न मिली हो ! आर्थिक,शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट जीवन के आवश्यक अध्याय हैं !
बचपन में ही माता पिता को खो बैठा, मेरे जीवन रक्षा के लिए विवाहिता बड़ी बहिन अपने पास ले गयीं वहाँ परवरिश और शिक्षा के दौरान स्नेह और प्यार के लिए इधर उधर भटकता रहता था !
उम्र के वे कच्चे दिन बहुत तकलीफ देह थे ...स्नेह के नाम पर केवल दया ही मिलती थी और बाहरी लोग तो तो लगभग उपेक्षा ही दिखाते ...
मुझे याद है एक नौकर के शब्द कि धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का ...
मेरी एक शिकायत पर उस नौकर को बहुत पीटा जाता मगर मैंने किसी से कुछ न कहा ...
केवल आंसुओं को पी लिया...
काश मेरे भी पिता होते और मुझे किसी और घर में न पलना पड़ता ...
बस जीवन का यह गहरा मज़ाक, जो मेरे बचपन को छीन ले गया , कष्टदायक रहा !





