शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

जरा याद उन्हें भी कर लो ...!

1957 की क्रांति की कानपुर की वीरांगनाएँ !


                        हमारा देश सिर्फ वीरों का ही नहीं अपितु वीरांगनाओं की भी कर्मस्थली रहा है । उसने माँ बनकर, बेटी बनकर, शासक बनकर और वीरांगना बनकर प्रत्येक क्षेत्र में विजय पताका  फहराई है। अगर विजयश्री न पा सकीं तो संघर्ष करते करते अपने को मातृभूमि पर न्योछावर करके इतिहास में पृष्ठों पर अपना नाम  अंकित कर गयीं। नव जागरण काल से लेकर संघर्ष की पूरी स्वातंत्र्य अवधि में भारतीय नारियाँ सुधी एवं मनीषी पुरुषों के दिग्दर्शन में उनके कंधे से कन्धा मिलाकर देश की गुलामी के विरुद्ध लड़ती रहीं.
                          कुछ  ऐसी वीरांगनाएं भी हैं, जिन्हें हम आमतौर पर अपने अब तक के अध्ययन में किसी भी विषय के पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ सके हैं और यह कार्य यदि शोध की दृष्टि से न किया गया होता तो शायद आज भी मैं अनभिज्ञ होती. हम लोगों में कुछ कुछ इतिहासकारों को इसका ज्ञान अवश्य ही होगा क्योंकि जिनका ये शोध विषय रहा है - वे मनीषी ही इस दिशा में मुझे वहाँ तक पहुँचने में सहायक सिद्ध हुए.
                         इस दिशा में पहल करने के लिए १८५७ की क्रांति में महारानी लक्ष्मी बाई का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा है । उन पर कुछ भी लिखना कुछ नया नहीं होगा. वे स्वयं इतिहास है. इस क्रांति का सूत्रपात जब १८५७ में मेरठ में हुआ तब मेरठ छावनी में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग करने के लिए दिए गए कारतूसों के प्रयोग को लेकर हुए विरोध पर ८५ सैनिकों का कोर्ट मार्शल हुआ और उनको १०-१० वर्ष का कठोर कारावास हुआ। उन्हें बेड़ियाँ डालकर कारगर में बंद कर दिया गया. उसी शाम कुछ सैनिक मेरठ बाजार में घूमने गए तो मेरठ की महिलाओं ने उनको इस शब्दों में धिक्कारा - आपके भाई जेल में है। आप यहाँ मक्खी मार रहे हैं. आपके जीने को धिक्कार है." ( इन शब्दों का प्रयोग एक अंग्रेज ने अपनी डायरी में किया था.) ये गुमनाम किन्तु देशभक्ति  से भरी नारियाँ इस क्रांति कि एक सुलगती हुई चिंगारी थीं.
                          इस काल की कुछ वीरांगनाओं की, जो उत्तर प्रदेश से ही थीं, भूमिका प्रस्तुत करने कि इच्छा है। अगर इस विषय को आप लोगों ने सार्थक समझा तो इससे जुड़े और गुमनाम व्यक्तित्वों  से परिचय अवश्य कराऊंगी  अन्यथा फिर कभी प्रस्तुत करूंगी।

                                         
कुमारी मैना बाई


                     स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं में नाना साहब की अल्पवयस्क दत्तक पुत्री मैना को भी नहीं भुलाया जा सकता है. चिता में जिन्दा जल जाने के बावजूद उसने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया और बिना चिल्लाये स्वतंत्रता की वेदी पर बलि चढ़ गयी।
                      मैना शरणागतों को लेकर और एक अंगरक्षक माधव को लेकर गंगातट पर पहुँची , जहाँ उसे खबर मिली कि अंग्रेज कानपुर में महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ कर रहे हैं और दुधमुंहे बच्चों तक को नहीं बक्श रहे हैं.  मैना का यह सुनकर खून खौल उठा , वह फिरंगियों से बदला लेने की सोचती ही रहती थी। उसको अपने पिता का ये आदेश कि 'शरणागतों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना है.' याद आ गया। वह कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहती थी और वे फिरंगियों कि परवाह किये बिना अपने काम को अंजाम देने में लगी रही। इस बात की खबर अंग्रेजों को भी लग गयी और अंग्रेज भी वहाँ पंहुच गए। अंग्रेजों ने मैना के अंगरक्षक माधव को मारकर मैना को गिरफ्तार कर लिया। उनको  मैना  से  स्वतंत्रता  सेनानियों  के  बारे  में  जानकारी  चाहिए थी। इसके लिए उसे पेड़ से बाँध कर भीषण यातनाएँ  दी गयीं। लेकिन मैना को देश के साथ जीने और मरने की शहादत याद थी और पिता की हिदायत भी। जब अंग्रेज इससे संतुष्ट न हुए तो  उसको उन्होंने  जिन्दा चिता में जलाया और अधजला शरीर  निकाल कर फिर पूछताछ की लेकिन भारत माँ की  उस पुत्री ने अपना मुँह नहीं खोला और उसको पूरा ही जल दिया गया।
                        मैना चिता में जल गयी लेकिन अंग्रेजों को ये सबक सिखा गयी कि भारतीय युवतियाँ भी किसी से पीछे नहीं है। भारत को इस बहादुर बेटी पर सदा गर्व रहेगा।


 महारानी तपस्विनी


                  महारानी लक्ष्मी बाई की भतीजी  और उनके  एक सरदार पेशवा नारायण राव की पुत्री महारानी तपस्विनी का भी योगदान अविस्मरनीय है.   उन्होंने सांसारिक मोहमाया का त्याग कर पूजापाठ में लीन रहने वालों को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रेरित  किया और उनके हाथ में अस्त्र-शस्त्र पकडाए।
                 बाल विधवा होने के बावजूद उन्होंने योगासन के साथ साथ शस्त्र  चालन , घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण लिया. पेशवा खानदान की होने के कारण ही उनको देशप्रेम विरासत में मिला था। अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की इच्छा  ने उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण बनाया।
                        अंग्रेजों को धोखा देने के लिए वे संत गौरीशंकर की शिष्या बन गयीं और शांति और प्रेम के भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ साथ देशभक्ति का उपदेश भी दिया करती थी। उन्होंने विद्रोह का प्रतीक लाल कमल दे कर क्रांतिकारी साधुओं का दल बनाया। इन्होंने लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति करने के लिए सोयी हुई भावनाओं  को जगाने का कार्य सम्पन्न करना शुरू कर दिया। ये साधु दल अस्त्र शस्त्रों से पूरी तरह से लैस होते थे । युद्ध के समय  तपस्विनी घोड़े पर सवार होकर मुठभेड़ों से जूझते हुए सारी व्यवस्था का निरीक्षण  स्वयं ही देखती थीं। अंग्रेजों की योजनायें जब असफल होने लगीं तो अंग्रेज हाथ धोकर महारानी के पीछे पड़  गए। वह नाना साहेब के साथ नेपाल चली गयीं लेकिन वे वहाँ भी निष्क्रिय नहीं रहीं और वहाँ भी अंग्रेजों के खिलाफ देशप्रेम की भावना पैदा की और वहाँ पर  'महाकाली पाठशाला' खोल दी । वहीं से स्वतन्त्रता यज्ञ आरम्भ किया। जब तक जीवित रहीं क्रांति योजना की बार बार असफलता के बावजूद इसे जारी रखे रहीं। १८५७ की क्रांति असफल होने के बाद भी क्रांति के ज्वाला जलाये रखने वाली महारानी तपस्विनी का नाम भारत की वीरांगनाओं  में अग्रणी रहेगा.


                                                         *अजीज़न बाई*


                   जैसा इस नाम से अनुमान लगाया जा सकता है कि ये नाम किसी नाचने वाली से सम्बन्ध रखता होगा। घुंघरुओं की झंकार  से  लेकर  तलवार  की  खनक  तक अजीज़न का जीवन इस प्रकार का रहा जो अपने आप में देशभक्ति और राष्ट्र की स्वतंत्रता का एक बहुत बड़ा पथ है।
                  जब कानपुर पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया तो कानपुर की  हिन्दू और मुस्लिम महिलायें अपने घरों से निकल कर गोला बारूद इधर से उधर ले जाने  और सैनिकों को भोजन पहुँचने एवं और भी प्रकार की  सहायता का काम ठीक अंग्रेजी किले की  दीवार के नीचे कर रहीं थीं। इन सब स्त्रियों में कानपुर की महान स्वतंत्रता सेनानी, कूटनीतिज्ञ   एवं समर दक्ष अजीज़न ने वीर महिलाओं का एक दल संगठित किया और वीरांगनाओं की इस टुकड़ी का नेतृत्व किया। वीरांगना अजीज़न का यह संगठित दल मरदाने वेश में हाथ में तलवार लेकर घोड़े  पर सवार होकर नगर में लोगों को क्रांति का सन्देश सुनाता  हुआ घूमता  था। युद्ध के समय यह दल अपने सिपहियों को दूध , फल, मेवा, मिठाई  बांटता, घायलों की  सेवा करता था, समय पड़ने पर यह दल अपने साथियों को हथियार , गोला बारूद पहुंचता था। अजीज़न सैनिक वेशभूषा में तथा हाथ में पिस्तौल लिए अंग्रेजी सैनिकों को रौंदती चली जाती थी। उनके वीरत्व के कारण ही कानपुर की महिलाओं में चेतना जाग्रत हुई।
                    नाना साहब की  पराजय का समाचार पाते ही अजीज़न प्रतिशोध की  भावना से प्रेरित होकर मोहम्मद के होटल से ५ कातिल ले आई और बीबीघर  के अंग्रेज कैदियों को मारकर कुँए में डलवा दिया। यह कुआँ आज नाना राव पार्क में तात्या टोपे की प्रतिमा के समक्ष वृत्ताकार चबूतरा बना  हुआ है। अजीज़न इस कांड से शांत नहीं बैठी वरन उसने अंग्रेजी सेना से अपनी टुकड़ी और क्रांतिकारी सेना के साथ मिलकर छापामार युद्ध आरम्भ कर दिया।
                   एक बार हैरी और वाटसन नामक सैनिक इस लड़ाई में अपनी टुकड़ी से बिछुड़ कर  पानी की  खोज में जंगल में भटक गए थे और एक कुँए की  ओर बढे। इधर अजीज़न  भी इनकी ताक  में पिस्तौल लिए पेड़ की  आड़ में खड़ी थी. इन दोनों को बढ़ता देखकर उसने गोली चलाई  परन्तु गोली चलते ही दोनों जमीं पर लेट गए और अजीज़न की  गोलियां बेकार गयी. हैरी और वाटसन शस्त्रास्त्रों से लैस थे और उन्होंने इन सैनिकों को पकड़ना चाहा। आदमी समझ कर धर दबोचा उससे अजीज़न की  पिस्तौल दूर जा गिरी, सिर का साफा  खुल गया और वह जमीन पर गिर पड़ी। तब वे समझे कि जिसे वे युवक समझ रहे थे वह तो वीरांगना नारी अजीज़न है। अजीज़न ने जमीन से उठने का प्रयास किया तो पुनः गिर पड़, किन्तु पिस्तौल उनके हाथ में आ गयी। हैरी पानी पीने गया था। अजीज़न वाटसन के सीने में गोली उतार दी। हैरी जब तक कुछ समझे तब दूसरी गोली उसके सीने में उतार दी और वह परलोक सिधार गया.
                  अजीज़न निश्चिन्त होकर आगे बढ़ना चाह रही थी किन्तु वह सैनिकों से घिर चुकी थी। इस पर भी उसने साहस का परिचय दिया और एक सैनिक की बन्दूक छीन कर उस पर कुंदों से प्रहार कर दिया, किन्तु इतने सैनिकों से निपटना आसन नहीं था। अतः पकड़ी  गयीं फिर हैवलाक  के पास लाई गयीं। हैवलाक  ने अजीज़न से कहा कि क्षमा मांग लो तो तुम्हारे प्राणों कि रक्षा हो  सकती  है। अजीज़न  ने  उत्तर  दिया  - "अत्याचारी  से  क्षमा  माँगने के लिए मैं तैयार नहीं ।"
फिर हैवलाक ने पूछा - "तुम क्या चाहती हो?"
उसने कहा कि "अंग्रेजी राज्य का विनाश।" इस पर हैवलाक के संकेत पर एक गोली उसके सीने पर जा लगी और गोली लगते ही वह "नाना साहब की जय" चिल्ला उठी। गोलियां चलती रहीं और वह अंतिम साँस तक नाना साहब की जय बोलती रहीं और अंत में वीरगति को प्राप्त हुई।

शनिवार, 10 अगस्त 2019

कहाँ आ गये हम ?

                       सदियों से चली आ रही सृष्टि और उसकी संस्कृति  को हम बरकरार  न रख पाए। हमने छोड़ते छोड़ते सब छोड़ दिया पर दिखाई किसी को न दिया।  आज जब खाली हाथ इंसान जानवर से भी बदतर होकर इंसानियत और खून  रिश्तों का लिहाज भी भूल गया। क्या बहन , क्या बेटी और क्या माँ ? सिर्फ और सिर्फ एक औरत उसमें दिखलाए देने लगी है। और उसकी सोच रोज किसी न किसी बेटी को दुष्कर्म का शिकार बना डालता है और हम बार बार सिर मारते हुए सोचते है कि इसमें गलत कहाँ हुआ ? इंसानी सोच अब उम्र  की मुहताज नहीं रही है। अपनी नानी दादियों के मुँह से सुना था  कि जब बाप बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने लगेगा और इंसान इंसान को खाने लगेगा तब घोर कलयुग समझना कि आ गया । सब कुछ हो रहा है लेकिन कहीं कलयुग की पराकाष्ठा को देखा है और प्रकृति  सका ह्रास हम देख रहे हैं । अब प्रलय में क्या शेष है ? हर साल प्रकृति अपना भयावह रूप दिखा देती है । 

        हमारे बुजुर्गों में जो संस्कार और संस्कृति थी , उसमें सिर्फ और सिर्फ मानवता थी , तब हर इंसान चाहे गरीब हो , चाहे अमीर हों -- एक सम्मान , एक अदब और एक रिश्ते का नाम दिया गया था।  सारा गाँव एक परिवार था क्योंकि तब हम गाँव में ही बसते थे।  उससे आगे आने वाली पीढ़ी घर से बाहर निकली शिक्षा के लिए और ज्ञान के लिए।  वह तो उन्होंने ग्रहण की लेकिन वो अपनी संस्कृति से दूर होते गए और उन्होंने उन संस्कारों को अपनी सहूलियत के अनुसार ग्रहण किया।  सब कुछ न ले पाए क्योंकि उनमें कुछ शिक्षित हुए तो उन्हें वे संस्कार बेमानी लगने लगे। हमारे घर में काम करें और हमसे ही पैसे लेकर गुजारा करें और हम उन्हें काका और बाबा का दर्जा दें। ये तो नयी सभ्यता ने सिखाया ही नहीं है।  बुजुर्गों को दुःख हुआ कि ये नयी पीढ़ी हमारे बनाये संस्कारों को छोड़ती जा रही है लेकिन उन पर बस किसी का भी नहीं चल सकता है।
                            वह  पीढ़ी शहर में आ बसी और गाँव आती रही क्योंकि अभी संस्कारों का असर बाकी था और तीज त्यौहार घर और गाँव में ही मनाने का मन बना रहता था क्योंकि उनकी दूरी गाँव से बहुत अधिक दूर तक न बन पायी थी ,  लेकिन  आधुनिकता के रंग में रंगी यह पीढ़ी गाँव वालों को भी प्रभावित करती रही। वे शिक्षा के लिए गाँव से दूर हुए थे और नए बच्चों ने उनकी चमक धमक से प्रभावित होकर शहर का रुख कर लिया।  शहर में कुछ तो काम करने को मिलने लगा और शहर की ओर दौड़ लगने लगी संस्कारों की कमी क्या हुई ? वहां भी रिश्तों की गरिमा ख़त्म होने लगी।  जब ऊपर की पीढ़ी विदा होने लगी तो कुछ ही घरों पर छतें रह गयी बाकि ढह गयी और कुछ सालों बाद वो खंडहर बन बिकने लगे। जो संस्कार गाँवों से लाये थे वे चुकने लगे थे।  शिक्षा की चमक दमक ने संस्कारों पर कुठाराघात किया और उनकी आने वाली पीढ़ी डैड और ममी वाली रह गयी। सारे  रिश्ते अंकल और आंटी में सिमट गए।  मामा , मामी , बुआ , चाचा चाची दादी बाबा सब ख़त्म हो गए।  नयी पीढ़ी के हाथ क्या आया ? फ़िल्टर किये हुए संस्कार और रिश्ते और वे भी इतना कम थे कि अगली पीढ़ी को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं था और क्या पता सृष्टि इन्हीं के लिए आगे चलकर दम तोड़ देगी ।
               यौन विकृतियों ने किशोर , युवा , वयस्क और प्रौढ़ों तक को अपनी गिरफ्त में ले लिया । कन्या शब्द खत्म हो चुका है क्योंकि इन लोगों को सिर्फ औरत और भोग्या नजर आने लगी ।
            माँएंं चिंतित हैंं कि बेटियों को कैसे बचायें ? बेटे को इस हवा से कैसे बचायें ? अबशिक्षित माँँओंंं की यही चिंता है । आओ मंथन करें और खोजें संस्कृति के पुनर्स्थापन की राह । तभी बच सकेगी ये सृष्टि, अन्यथा बिना प्रलय के नाश निश्चित है ।

शुक्रवार, 14 जून 2019

मौत के सौदागर !



            वह कथोक्ति है न कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है ईश्वर उनके लिए खाई खोद कर तैयार कर देता है, लेकिन  ये कहावतें त्रेता , द्वापर या सतयुग में चरितार्थ होती होंगी। अब तो दूसरों को मौत बेचने वाले किसी जेल में नहीं बल्कि मखमली सेजों पर सोते हैं । उनपर हाथ डालने की हिम्मत किसी नहीं है । बड़े बड़े व्यापारी , ठेकेदार , इंजीनियर , विधायक और सांसद आदि इसमें आते है ।
            ..ये मौत के सौदागर कैसे है ? कहीं पुल गिरते हैं , कहीं फ्लाईओवर बनने से पहले ढह जाते हैं। उनमें होने वाली मौतों से प्रभावित लोग उन्हें दुआ तो नहीं देते होंगे । बड़े बड़े ठेके दिये जाते हैं । टेण्डर निकलने से पहले सौदेबाजी हो जाती है और भुगतान से पहले अलग चढ़ौती चढ़ानी पड़ती है । ठेकेदार मिलावट नहीं करेगा तो बच्चों को क्या खिलायेगा ? लेकिन ये कितने जीवन ले जाता है कोई नहीं जानता है ।
अब आते हैं खाने वाली चीजों में होने वाली मिलावट पर और फल और सब्जियों में प्रयोग होने वाले रसायनों पर ।
                         कुछ दिन पहले पढ़ा कि CSIR के एक अधिकारी की मृत्यु  लौकी का रस पीने से हो गयी । ये आयुर्वेद चिकित्सा की औषधि है और इसमें गलत कुछ भी नहीं है,  हाँ कुछ ऐसी मानसिकता वाले लोगों ने इसे दूषित करने की कसम खाई है.  जो प्राकृतिक चिकित्सा की औषधियों को भी जहर बना रहे हैं ।
                      कानपुर में गाँव से दूध वालों के डिब्बों  को पकड़ा गया तो सब डिब्बे  छोड़ कर भाग गए क्योंकि उस दूध में यूरिया, सर्फ और फार्मोलीन   मिला हुआ होता है, जो किसी विष से कम घातक नहीं है । ये भी मौत परोस रहे है। दूध वाले जानवरों को ऑक्सोटोसिन इंजेक्शन लगा कर दूध की एक एक बूँद निचोड़ लेते है तो क्या उस दूध को प्रयोग करने वाले  उस रसायन का दुष्प्रभाव से बचे रहेंगे ।
       हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि हरी सब्जियों में विशेष रूप से लौकी, तरोई , खीरा, तरबूज, और खरबूजे में किसान ऑक्सीटोसिन  के इंजेक्शन लगाकर रातोंरात बड़ा करके  बाजार में लाकर बेच लेते हैं। ये ऑक्सोटोसिन भी जहर ही है। हरी  और मुलायम सब्जियां सबको आकर्षित करती हैं और हम  सभी उस जहर को जज्ब करते रहते हैं और फिर एक दिन  -

*बहुत दिनों से पेट में दर्द की शिकायत थी , पता चला की कैंसर है।

*भूख नहीं लगती थी, पेट भारी रहता था लीवर सिरोसिस निकला।

*इसी से पीलिया, आँतों में सूजन और पता नहीं कितनी घातक बीमारियाँ एकदम प्रकट होती है. फिर
उनका अंजाम कुछ भी होता है ।

                  सिर्फ यही क्यों? परवल , भिण्डी हरे रंग से रंगे हुए मिलते है । मसालों में बराबर मिलावट पकड़ी जाती है । आटा , तेल , घी , खोया जैसे खाद्य पदार्थों में मिलावट  एक आम बात हो चुकी है और उसको जहरीला बनाने वाले लोग हम में से ही तो होते हैं। सिर्फ धनवान बनने की चाहत में जहर बो रहे हैं और इन  चीजों से दूर रहने  वाला आम आदमी इस जहर को अपने शरीर में उतार रहा है और उसके दुष्परिणामों को भी झेल रहा है .
           फलों की बात करें त़ो केले , आम कार्बाइड से पका कर बेचने की जल्दी किसी के लिए मौत जल्दी बुला देते हैं । सेब को अधिक ताजा दिखाने के लिए मोम की परत चढ़ा कर चमकीला और ताजा दिखाया जाता है । उसको आम इंसान ही खाता है और फिर धीरे धीरे अपनी रोगों से लड़ने की क्षमता खोने लगता है । मैं स्वयं इसको देख चुकी हूँ - एक तरबूज लेकर आयी और घर में उसको काटा तो उसमें से लाल की बजाय सफेद पानी निकल रहा था और तरबूज से बदबू आ रही थी , इंसान तो क्या जानवर को भी देने लायक नहीं था?
                       वे जो ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगा कर जानवरों से दूध निकाल  रहे हैं या सब्जियां उगा रहे हैं , फलों को जल्दी बड़ा करके बाजार में ला रहे हैं। वे इस ख्याल में हैं कि  अपनी चीजों को प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन यह भूल जाते हैं कि सारी वस्तुएं वे ही नहीं बना सकते हैं और उनके भाई बन्धु उनके लिए भी जहर परोस रहे हैं ,  जिसको  वे निगल रहे हैं। इस बात से अनजान  तो नहीं हो सकते हैं, फिर क्यों मानव जाति के दुश्मन अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ये जहर  खा और खिला रहा है। वह क्या सोचते हैं कि  इस जहर से बच जायेंगे? क्या धनवान बनने से  वे दूसरों के खिलाये जा रहे जहर से ग्रसित होकर खून की उल्टियाँ नहीं करेंगे?
क्या वे  कैंसर से ग्रसित नहीं होंगे?
पक्षाघात या हृदयाघात का शिकार नहीं होंगे?
हमारे बच्चे क्या इसकी पीड़ा नहीं झेलेंगे?
                      अगर वे इस बात से इनकार कर रहे हैं या अनजान हैं तो कोई बात नहीं. लेकिन ऐसा कोई भी चोर नहीं होता कि अपने किये अपराध की सजा न जानता हो. जब तक नजर से बचा हैं तो सफेदपोश और जिस दिन ये भ्रम टूट गया तो इससे बच वे भी नहीं सकते .हाँ ये हो सकता है कि पैसे के बल पर वे इन रोगों से लड़ सकते हैं लेकिन उस पीड़ा को उनकी तिजोरियों में रखा हुआ धन नहीं झेलेगा और क्या पता वह भी मौत से हार जाये और आप खुद अपने ही हाथों मौत परोस कर खुद ही उसके शिकार हो जाएँ.
                    इस जहर से कोई नहीं बच सकता है. अगर हम नहीं बचेंगे तो ये मौत के सौदागर भी नहीं बचेंगे.

मंगलवार, 4 जून 2019

विश्व पर्यावरण दिवस !

विश्व पर्यावरण दिवस !

   विश्व पर्यावरण दिवस की आवश्यकता संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस की और इसी लिए प्रतिवर्ष 5 जून को इस दिवस को मनाने के लिए निश्चित किया गया । विश्व में लगभग 100 देश विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं । धरती से हरियाली के स्थान पर बड़ी बड़ी बहुमंजिली इमारतें दिखाई दे रहीं हैं ।
         नेशनल हाईवे के निर्माण के नाम पर मीलों लंबे रास्ते एक कतरा छाँव से रहित है। पथिक पहले तो पैदल ही चलते थे पेड़ों के नीचे सुस्ताकर कुँए का शीतल जल पीकर आगे की रास्ता लेते थे । अब तो कुछ शेष नहीं तो अगर हम उन्हें नहीं रहने देंगे तो वह हमें कैसे जीने देंगे?

      *मानव सुख की कीमत*

                               दिन पर दिन बढ़ती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं, लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं। हाँ हम ही घोल रहे हैं। प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं, लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं। सभी तो एसी नहीं लगवा  सकते हैं। लेकिन इससे उत्सर्जित होने वाली गैसें दूर दूर तक लगे पोधों को सुखाने के लिए बहुत है । पेड़ों पर शरण न मिली तो पक्षी कहाँ जायेंगे । इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं।

   *खेतों का व्यावसायिक प्रयोग*

    जिन खेतों में लहलहाती फसलें ,
     अब उन पर इमारतें उग रही हैं ।
                                   - अज्ञात
          ये पंक्तिया हमें आइना दिखा रही हैं ।
                        हम  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनते चले आ रहे हैं और सरकार भी प्रकृति को बचाने के लिए मीटिंग करती है , लम्बे चौड़े प्लान बनाती है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं।  अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें. कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं , कभी कभी तो एक फ्लैट में दो से लेकर चार तक एएसी होते हैं । उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है । हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है। उन्हें गर्मी से दो चार नहीं होना पड़ता है क्योंकि घर में एसी , कार में एसी और फिर ऑफिस में भी एसी । गर्मी से बचने के लिए वे ठंडक खरीद सकते हैं लेकिन एक गर्मी से मरते हुए प्राणी को जीवन नहीं दे सकते हैं ।
               
    *मोबाइल टावर*

         मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है . इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है।

      *जैविक चिकित्सकीय कचरा :-*     
          पर्यावरण को दूषित करने वाला आज सर्वाधिक जैविक चिकित्सकीय कचरा बन रहा है । जिस तेजी से नर्सिंग होम खुलते चले जा रहे है , उतना ही कचरे का निष्कासन बढ़ रहा है । उसके निस्तारण के प्रति कोई भी सजग नहीं है । सिर्फ कुछ सौ रूपयों के पीछे ये कचरा निस्तारण करने वाली संस्थाओं को न देकर अस्पतालों के पीछे या थोड़ी दूर पर फेंक दिया जाता है । इसमें घातक बीमारियों के फैलाने वाले तत्व भी होते हैं । जानवर इनको इधर उधर फैला देते हैं और वह वाहनों में फँस कर मीलों तक फैला होता है ।

                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है .
* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में ए सी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .
*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं .
* अगर संभव है तो सौर ऊर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय, जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है।
* फल और सब्जी के छिलकों को बाहृर सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा .
* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोक जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी .
* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं .
          इस पर्यावरण दिवस को सार्धक बनाने के लिए जल संरक्षण दिवस , पृथ्वी दिवस , प्राकृतिक संपदा संरक्षण , वृक्षारोपण , कृषि योग्य भूमि की बिक्री निषेध को भी अपनाना होगा ।

गुरुवार, 30 मई 2019

आपदा प्रबंधन !

                            सूरत में घटी कोचिंग में लगी आग के कारण २० बच्चों का उसे हादसे में मौत के मुंह में चला जाना कोई हंसी खेल नहीं है।  भले ही वह मानवीय भूल नहीं थी लेकिन मानवीय लापरवाही तो थी ही और उस लापरवाही की कीमत चुकाई उन माता-पिता ने जिनके घर का चिराग बुझ गया और माँ की गोद सूनी हो गयी।  लोग खड़े वीडिओ बनाते रहे , शायद उन्हें मासूमों की चीखें नहीं सुनाई दे रही थीं या फिर वे बहरे हो चुके थे क्योंकि उन तड़पते हुए बच्चों में उनका कोई अपना बच्चा नहीं था। जो जरा से भी संवेदनशील थे उन्होंने प्रयास किया और बचाया भी।  अपनी जान की परवाह न करते हुए युवाओं ने उनको बचाया।  उस वक्त थोड़ी दूर पर स्थित फायर ब्रिग्रेड को आने में इतना समय लग गया और फिर  अधूरे साधनों के साथ आ पहुंचे। आपदा के लिए उनका चयन किया गया है और क्या आपदा में सिर्फ आग को बुझाना ही होता है , उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने के लिए कोई दूसरी वैकल्पिक  व्यवस्था भी होनी चाहिए।

आपदा प्रबंधन कहां पर हो ? :- जब हम एक तरह की आपदा से दो-चार होते हैं चारों तरफ चर्चा आरंभ हो जाती है कि आपदा प्रबंधन की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है,  लेकिन अगर इसको स्कूल या विश्वविद्यालय स्तर पर रखा जाता है तो इसका ज्ञान प्राप्त करने वाले सिर्फ वही लोग होंगे जो वहां पर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।  मेरे अनुसार आपदा प्रबंधन की शिक्षा समय-समय पर सरकार के द्वारा या फिर जन सेवार्थ काम करने वालों वाली संस्थाओं के द्वारा हर जगह दी जानी चाहिए क्योंकि हादसे कब कैसे हो जाए यह कोई नहीं जानता। पहले हम सुनामी आने पर बहुत जोर शोर से इस बात की चर्चा कर रहे थे कि आपदा प्रबंधन हर स्तर पर होनी चाहिए। उसके चंद दिन बाद ही हम यह भूल गए। आपदा प्रबंधन की आवश्यकता सुनामी, केदारनाथ आपदा , भूकंप , बाढ़ के बाद ही नहीं होती बल्कि यह कभी भी और किसी भी स्थान पर हो सकती है.
                      सूरत की घटना आम आदमी आपदा प्रबंधन से किसी न किसी तरीके से उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने का सामूहिक प्रयास कर सकते थे और जो हादसे में जीवन गए हैं उनमें से पूरे नहीं तो कुछ और को भी बचाया जा सकता जबकि हमारी सरकारी सेवाएं फायर बिग्रेड अपनी  आवश्यक चीजों में लंबी सीढ़ी आपातकालीन साधन लेकर नहीं चलती। उनको सिर्फ आग नहीं बुझाना होता है बल्कि जीवन बचाना भी होता है ।
मानकों की अनदेखी :- शहरों में ऊंची ऊंची इमारतें तो बनाई जा रही है , चाहे होटल , क्लब , ऑफिस , मॉल या रहने के लिए बने भवन हों।  न अग्निशमन के साधनों का पूरी तरह से नियोजन किया जाता है और न ही वहाँ आग बुझाने के साधन होते हैं।  इस घटना के बाद सभी शहरों में ध्यान दिया जाना चाहिए।  ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर जहाँ कि जन समूह इकठ्ठा होता हो।  कहीं कहीं तो अग्नि शमन यन्त्र लगे होते हैं लेकिन वहां के कर्मचारी उनको प्रयोग करना नहीं जानते हैं या फिर उनका प्रयोग कभी करने की नौबत नहीं आयी हो तो वे जाम हो जाते हैं और आपदा के वक्त वह कार्य ही नहीं करते हैं।
आपदा प्रबंधन की शिक्षा :- आपदा प्रबंधन की शिक्षा भी शिक्षा के स्तर के अनुरूप देनी चाहिए । आपदा से प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को अवगत कराया जाना चाहिए । फिर धीरे धीरे कक्षाओं के अनुरूप विस्तार से उनके पाठ्यक्रम में समाहित करना चाहिए । समय और पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण के कारण कौन सी आपदा कब आ सकती है इसका कोई निश्चित समय नहीं रहा । आज सर्दी तो नाममात्र के लिए दिनों में सिमट गई हैं और शेष भीषण गर्मी में झुलसती पृथ्वी किसी भी आपदा के लिए हमें पूर्व संकेत दे रही है ।
         .      पाठ्यक्रम में आकर इसे एक विषय का रूप दिया गया है लेकिन ये हमारी औपचारिक शिक्षा है । जनसामान्य को इससे अवगत होना चाहिए। समय समय पय प्रशिक्षण कैंप लगा कर शिक्षित किया जाना चाहिए । प्राथमिक जानकारी बचाव के लिए सहायक होगी ।
बहुमंजिली इमारतों के मानक :-  बहुमंजिली इमारतों के लिए निश्चित मानकों का सख्ती से पालन होना चाहिए । इंसान भेड़ बकरी नहीं है कि उन्हें रहने की जगह देकर जीवन को जोखिम में डाल दिया जाता है । हम खुद भी दोषी हैं जो आश्वासनों के ऊपर रहने चले जाते हैं , वह भी अपने जीवन की पूँजी लगाकर । इन इमारतों में रहने के लिए अधिकृत करने से पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र संबंधित विभाग को जारी करना चाहिए ।
             हम विदेशों के चलन का अनुकरण तो करने लगे हैं लेकिन इस दिशा में उनके उपकरणों और तरीकों के प्रति सदैव उदासीन रहे हैं । हमारी ये उदासीनता लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का कारण बन जाता है ।
              भविष्य के लिए हमें स्वरक्षा और पररक्षा दोनों के लिए प्रशिक्षित होना चाहिए ताकि सूरत जैसी दूसरी घटनाएं न हों । हम नेट के प्रयोग का काला पक्ष बहुत जल्दी सर्च करके दुरुपयोग करने लगते हैं लेकिन कभी उसके सदुपयोग को भी सीखें तो बहुत सारी आपदाओं से बचने का रास्ता जान सकते हैं । हमारी जानकारी हमारी ही नहीं बल्कि और कितनों का जीवन बचा सकती है । हमें स्वयं सीख कर मानवता की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे ।

मंगलवार, 14 मई 2019

विश्व परिवार दिवस !

परिवार के स्वरूप :                   
                  
          परिवार संस्था आदिकाल से चली रही है और उसके अतीत को देखें तो दो और चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थीपारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता थाउनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भीधीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गयाजब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे। वे वापस गाँव जाना या और रहना या खेती करना पसंद नहीं करते , परिणाम कि घर वालों के बीच में दूरियां आनी शुरू हो गयीं और परिवार के विखंडन की प्रक्रिया यही से शुरू हो गयी।  आरम्भ में ये सब बहुत अच्छा लगा नयी पीढ़ी को लेकिन बाद में या कहें आज जब एकल परिवार के परिणाम सामने आने लगे हैं।
टूटते परिवार :
                 आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढती महत्वाकांक्षाएं, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है। वह भी आज कल भय के साये में जी रहा है।  बच्चों को लेकर माता पिता निश्चिन्त नहीं हैं। आज अधिकांश दंपत्ति दोनों ही लोग नौकरी करते हैं और इस जगह पर  बच्चे या तो आया के साथ रहते या  फिर किसी 'डे केअर सेंटर' में.छोटे बच्चे इसी लिए माता-पिता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं रह जाते हैं।  वे नौकर और आया के द्वारा शोषण के शिकार भीकिये जाते हैं और कभी कभी तो माता पिता की स्थिति के अनुसार अपहरण तक की साजिशें तक रच दी जाती हैं।  
 एकाकी परिवार में भय :
                इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे  और बच्चे उनकी अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघट की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं . बच्चे भी स्वयं को असुरक्षा की भावना में घिरे जी रहे हैं। एक तो बच्चों को परिवार का सम्पूर्ण संरक्षण मिल पता है और साथ ही वह पढाई के लिए बराबर माता-पिता के द्वारा दबाव बनाया जाता है क्योंकि वे अच्छे स्कूल में भारी भरकम फीस भर कर पढ़ाते हैं और उनसे पैसे के भार के अनुसार अपेक्षाएं भी रखते हैं। 

विखंडित परिवार का परिणाम :
                   एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहेंइससे बेहतर है कि मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '                           आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैंआत्मनिर्भर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे                 एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर करने की भावना से ग्रस्त हो जाता हैदूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं हैजब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?                   परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने लगेगाऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक कि  उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है।  अगर अपनी सोच को विकसित करें और उसको परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा    इसके लिए हमें अपनी सोच को 'मैं' से निकल कर 'हम' पर लाना होगाये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी
'
मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'
'
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें? '           तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक हैइसके लिए प्रौढ़ और युवा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगाघर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहेवैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उन्हें बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजियेयही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैंदो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नमक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा


          कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थींआज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा हैफिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैंइसको बचाने में ही सभ्यता , संस्कृति और समाज की भलाई है।