रविवार, 13 अक्तूबर 2019

शरद पूर्णिमा,कोजागरी पूर्णिमा रास पूर्णिमा

         शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन  मास की पूर्णिमा  को कहते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे 'रास पूर्णिमा' भी कहते हैं। ज्योतिष की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन 'कोजागर व्रत' माना गया है। इसी को 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं। रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया है, क्योंकि कहा जाता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन श्री कृष्ण को 'कार्तिक स्नान' करते समय स्वयं (कृष्ण) को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीर हरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरलीवादन करके यमुना के तट पर गोपियों के संग रास रचाया था। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा-पूजन किया जाता है।

कथा

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।[1] दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
                 इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
                  इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

दशहरा !

                               दशहरा या विजयादशमी हमारे देश का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है और साथ ही इसको संस्कृति से जोड़ते हुए समाज को एक सन्देश - बुराई पर भलाई की विजय या सत्य की असत्य पर विजय जाता है।  पूरे  देश में कहीं विजयादशमी का सम्बन्ध सिर्फ रामायण महाकाव्य की लीला से होता है और कहीं पर इसको दुर्गा पूजा के साथ जोड़ कर देखते हैं कि  दुर्गा जी के द्वारा महिषासुर का वध भी शक्ति की विजय दिखता है और दोनों का ही एक ही सन्देश जाता है। हमारे देश में ही दशहरा विभिन्न स्थानों पर अलग अलग तरीके से मनाया जाता है।  सबका उद्देश्य एक ही होता है लेकिन कहीं कहीं पर लोक कथाओं पर आधारित भी है।   

 बंगाल का दशहरा :-- बंगाल में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है, जो कि बंगालियों, ओडिओं तथा असमियों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है।   इसमें  दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसके अन्‍तर्गत स्त्रियाँ द्वारा नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।  देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर खेलती हैं और अंत में सभी देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता  है। उसके बाद दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है। विसर्जन की ये यात्रा महाराष्‍ट्र के गण‍पति-उत्‍सव के गणेश-विसर्जन के समान ही भव्‍य, शोभनीय और दर्शनीय होती है जबकि इस दिन नीलकंठ पक्षी को दर्शन  बहुत शुभ माना जाता है।

कर्नाटक का दशहरा -  मैसूर का दशहरा अंतर्राष्ट्रीय उत्सव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चूका है जिसमे शामिल होने के लिए विदेशो से पर्यटक आते है | इस दिन यहाँ कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है लेकिन सबसे अधिक प्रसिद्ध है 12 हाथियों की इस इस उत्सव में उपस्थिति | इन हाथियों की अपनी अपनी विशेषता होती है | दशहरा उत्सव के अंतिम दिन यहा मैसूर महल से “जम्बो सवारी” का आयोजन किया जाता है जिसमे रंग बिरंगे आभूषण और कपड़ो से सजे हाथी एक साथ शोभायात्रा के रूप में इकट्ठे चलते है और इन सबका नेतृत्व करने वाल विशेष हाथी “अम्बारी ” है जिसकी पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा सहित 750 किलो का “स्वर्ण हौदा” रखा होता है | यह सवारी मैसूर महल से तीन किलोमीटर की दूरी तय करने एक बाद बन्नीमंडप पहुचकर समाप्त होती है | इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीप-मालिकाओं से दुल्‍हन की तरह सजाते हैं। साथ ही शहर में लोग टॉर्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा भी निकालते हैं।

 तमिलनाडू , तेलंगाना , आंध्रप्रदेश का दशहरा :--

इन सभी  राज्यों में दशहरा  नौ दिनों तक मनाते  है ,| यहाँ के लोग दशहरे पर तीनो देवियों लक्ष्मी ,सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते है | अगर कोई भी नया कार्य करना हो तो इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है | इन सभी राज्यों में लक्ष्मी माता की पूजा प्रथम तीन दिनों में की जाती है उसके अगले तीन दिनों में विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है और अंत के तीनो दिनों में शक्ति की देवी माँ दुर्गा का पूजन किया जाता है। |यहाँ नवरात्रि जैसी कोई परिकल्पना नहीं है लेकिन शक्तिपूजा का ही विधान है।

 उत्तर भारत का दशहरा --( उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , बिहार और पंजाब ):--

उत्तर भारत  में दशहरे के पर्व का सम्बन्ध सीधे सीधे असत्य पर सत्य की विजय माना जाता है। इस पर्व को मनाने से पूर्व रामलीला का जगह जगह पर आयोजन होता है।  यहाँ पर रामलीला बहुत लोकप्रिय है , जिसमें रामायण को आधार मान कर उसको नायकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रामलीला इस तरह से आयोजित की जाती है कि दशहरे के दिन रावण वध का प्रसंग आता है और फिर रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े बड़े पुतले बना कर जलाये जाते हैं।   | यहा दशहरे की रौनक देखते ही बनती है | जहाँ  एक ओर रामनगर की लीला विश्वविख्यात है | वही बनारस में घट स्थापना से शुरू हुआ यह उत्सव दस दिन तक चल चलता है | दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, इन सभी राज्यों में दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इन सभी प्रदेशों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। यहां दशहरे को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में दशहरे के दिन नीलकंठ नामक चिड़िया और मछली के दर्शन करना विशेष शुभ माना जाता है।

  कुल्लू का दशहरा:--

                            हिमाचल प्रदेश में स्थित कुल्लू का दशहरा एक अनोखे और भव्य अंदाज में मनाये जाने के कारण विश्वविख्यात है  | कुल्लू का दशहरा पारम्परिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है | यहाँ  इस पर्व को मनाने की परम्परा राजा जगत सिंह के समय से चली आ रही है  |एक लोक कथा के अनुसार राजा जगत सिंह ने एक साधू की सलाह पर कुल्लू में अयोध्या से मंगवा कर भगवान रघुनाथ जी (राम जी ) की प्रतिमा स्थापित की थी | वास्तव में राजा किसी रोगग्रस्त से थे और इसी से मुक्ति पाने के लिए साधू ने उन्हें यह सलाह दी थी | मूर्ति स्थापना के बाद राजा धीरे धीरे स्वस्थ हो गए और  उन्होंने इसी वजह से अपना शेष जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। इस उत्सव के एक दिन पहले एक रथ यात्रा आयोजित की जाती है जिसमे रथ में भगवान रघुनाथ जी ,सीता जी एवं दशहरे की देवी मनाली की हिडिम्बा जी की प्रतिमाओं को रखा जाता है |सातवे दिन रथ से व्यास नदी के किनारे लाया जाता है जहा लंका दहन का आयोजन होता है | इसके बाद रथ पुन: वापस लाकर रघुनाथ जी को उनके मन्दिर में फिर से स्थापित कर दिया जाता है | दशहरे के दिन यहाँ की धूमधाम देखने योग्य होती है |

गुजरात का दशहरा

गुजरात में मिटटी का एक रंगीन घड़े को देवी का प्रतीक माना जाता है जिसको कुंवारी लडकिया अपने सिर पर रखकर गरबा करती है  जो गुजरात की शान है | गुजरात के सभी पुरुष और महिलाये दो डंडो से गरबे के संगीत पर गरबा नाचते है | इस अवसर पर भक्ति और पारम्परिक लोक संगीत का समायोजन भी होता है | आरती हो जाने के बाद यहा पर डांडिया रास का आयोजन होता है जो पूरी रात चलता है | | नवरात्रि  में सोने के गहनों को खरीदना बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है   राजस्थान और गुजरात दोनों एक दुसरे से सटे हुए राज्य है शायद यही कारण है कि यहां पर दशहरे से जुडी एक ही मान्यता को दोनों जगह समान माना जाता है यहां नवरात्रि के 9वें दिन के उपवास के बाद 10वें दिन व्रत को खत्म कर लोग अन्न खातें है। गुजरात में दशहरे के दिन सुबह उठ के लोग जलेबी और फाफडा खा के अपने दिन की शुरुवात करतें हैं।

बस्तर का दशहरा :--

बस्तर के दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय न मानकर लोग इसे माँ दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते है | दंतेश्वरी माँ बस्तर के निवासियों की आराध्य देवी मानी जाती है जो माँ दुर्गा का ही स्वरूप  है | यहाँ पर यह पर्व पूरे 75 दिन तक चलता है जो  दशहरा श्रावण मास की अमावस से लेकर आश्विन मास  की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है | पहले  दिन को काछिन गादी कहते है जिसमे देवी से समारोह आरम्भ की अनुमति ली जाती है | यहाँ पर देवी एक कांटो की शैय्या पर विराजमान होती है जिसे काछिन गादी कहते है | यह कन्या अनुसूचित जाति की है जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति की अनुमति लेते है | यह समारोह लगभग 500 साल पहले 15वी शताब्दी से शुरू हुआ था | इसके बाद जोगी बिठाई होती है | इसके बाद यहाँ पर भीतर रैनी (विजयादशमी) , फिर बाहर रैनी (रथ यात्रा ) और अंत में मुरिया दरबार होता है | इसपर्व का समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाडी पर्व से होता है |

महाराष्ट्र का दशहरा :--

महाराष्ट्र में माँ दुर्गा को नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा जाता है और दसवे दिन माता सरस्वती की पूजा की जाती है | यहा के लोगो का मानना है कि इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से स्कूल में नये नये पढने वाले बच्चो पर माँ का आशीर्वाद रहता है इसलिए इस दिन को विद्या के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है | महाराष्ट्र में लोग नया घर खरीदने के लिए भी इस दिन को बहुत शुभ मानते है | | यहा पर एक सामजिक उत्सव सिलंगण का आयोजन भी इस दिन होता है जिसमे गाँव के सभी लोग नये कपड़े पहनकर गाँव के दुसरी ओर जार्क शमी वृक्ष के पत्तो को अपने गाँव लाते है | एक पौराणिक कथा के अनुसार शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण से जोड़ा गया है | इन शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण के रूप में लोग एक दुसरे को देकर इस पर्व का आनन्द लेते है |

कश्मीर का दशहरा :--

वैसे तो कश्मीर में हिन्दुओ की संख्या बहुत कम है फिर भी यहा पर अल्संख्यक हिन्दू इस पवित्र त्यौहार को अपने अलग ही अंदाज में मनाते है | यहाँ के लोग नवरात्रि के दिनों में केवल पानी पीकर ही उपवास करते है | यहा के हिन्दू परिवार खीर भवानी माता में बहुत आस्था रखते है और इस दिन माता के दर्शन को बहुत शुभ मानते है | यहाँ के लोगो का मानना है कि दशमी के दिन जो तारा उगता है उस समय विजय मुहूर्त माजा जाता है जो सभी कार्यो को सफल करता है इसलिए उस विजय मुहूर्त के तारे के नाम पर इसे विजयादशमी कहते है |
 
इन सबके अतिरिक्त विदेशो में भी विजयादशमी का त्यौहार बड़ी उमंगो और धूमधाम से मनाते है  | नेपाल में नौ दिन तक माँ काली और माँ दुर्गा की पूजा की जाती है और दशहरे वाले दिन राज दरबार में राजा अपनी प्रजा को अबीर ,दही और चावल का तिलक लगाते है  | श्रीलंका ,चीन ,मलेशिया और इंडोनेशिया में भी अपने अपने रीति  रिवाजो से अनुसार यह पर्व मनाने की परम्परा है |
                 

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

संस्कृति का विखंडन !

                                  भारत और भारतीय संस्कृति का जो सम्मान देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी होता है और वहां के लोग भी प्रशंसा करते नहीं अघाते हैं।   उसी संस्कृति का आधार कही जाने वाली समाज , परिवार , विवाह और   संस्कार कही जाने वाली संस्थाएं आज अपने   अस्तित्व को  खोटी  चली जा रही हैं।  कहते हैं कि सौ वर्ष बाद संस्कृति एक नया रूप ले लेती है लेकिन हमारी संस्कृति तो आज भी हमारे परिवारों में शेष है। विखंडित होने की बात हम क्यों कह रहे हैं क्योंकि मनुष्य अब स्वार्थी हो गया है , उसको अपना और सिर्फ अपना सुख दिखलाई देता है। इस सुख ने हमें कुछ दिया है  या सिर्फ दुनियां की होड़ में अपने को खड़ा देख कर हम खुद को संतुष्ट कर रहे हैं।
                  सबसे बड़ा परिवर्तन परिवार संस्था में आया , जब संयुक्त परिवार बंधन लगने लगे । हमारी स्वतंत्रता और स्वछंदता में बाधक बन गये तो हम एकल परिवार का सुख भोगने चल दिए । माँ - बाप तो परिवार का हिस्सा नहीं रहे , हाँ अगर उनके पास कुछ है तो उसमें हिस्सा लेना जन्मजात अधिकार लेना नहीं भूलते हैं । बच्चे असुरक्षित होने लगे , लेकिन माँ - बाप को साथ रखना बंधन लगने लगता है । वृद्धाश्रम की परिकल्पना यहीं से विकसित हुई है । भरे पूरे परिवार में कोई बुज़ुर्गों को जगह नहीं देना चाहता ।
              विवाह संस्था में तेजी से हो रहे परिवर्तन ने सामाजिक और नैतिक मूल्यों को तार तार कर दिया है। विवाह को बंधन समझने वाले लिव इन के हिमायती हो गये । जिम्मेदारियों से मुक्त जीवन पर देश के कानून ने भी मुहर लगाकर और पुख्ता कर दिया  । इससे आगे बढ़े तो अविवाहितों का सरोगेसी से माँ बाप बनने के चलन ने दूसरी ठोकर लगाई है । करियर और स्पर्धा ने विवाह की उम्र को बढ़ा दिया , परिणाम बड़ी उम्र में किया विवाह सामंजस्य स्थापित करने के लिए तैयार नहीं होता है और यहाँ भी विखंडन की स्थिति ।
                                हम ऊँचे ऊँचे फ्लैट में रहने लगे हैं और अपार्टमेंट के गेट पर साब नमस्ते कहने वाला दरबान जब सलाम ठोकता है तो हम अपने को अपार्टमेंट की सबसे ऊँची मंजिल से भी ऊँचा समझने लगते हैं। पिता का बनवाया हुआ घर पुराने ढंग  का लगता है।  खुला खुला हवादार होने से  फर्नीचर ख़राब होने का डर  रहता है और फिर उस घर में निजी जिंदगी के लिए निजता का अभाव होता है।  हम अपना के आगे हमारा का दर्शन बिलकुल ही भूल गए हैं।  ऐसा नहीं है कि  इस मैं और मेरा ने जो खोया है या जो वह खोने वाला है उसका उसको कोई भी अनुमान नहीं है।  जब तक हम उसे चक्रव्यूह में नहीं फंसे हैं तब तक ही सब कुछ सोने सा सुहाना लगता है लेकिन जिस दिन हम उसे चक्र में फँस गए तो हमसे रोते भी नहीं बनेगा।
                             ऐसा नहीं है कि  हम समझ नहीं रहे हैं , समझते हैं लेकिन नासमझ बन कर खुद को अकलमंद समझते हैं।  रोज होने वाली अनहोनी घटनाओं से हर इंसान वाकिफ है।  कभी कोई बच्चा अपहृत हो जाता है और फिर कभी पता नहीं लगता है या फिर फिरौती के नाम पर पैसे देने के बाद भी बच्चे की लाश मिलती है।  ऐसा क्यों हो रहा है ? माता पिता दोनों ही कामकाजी है तो वे अपनी अपनी नौकरी छोड़ कर घर में नहीं रह सकते हैं और बच्चा स्कूल से आकर कहाँ रहता है ? इसकी जानकारी सबको होती है और कभी कभी तो अपने बहुत करीब या पडोसी ही ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।  छोटी बच्चियों के साथ जो हो रहा है वह भी संस्कृति के विघटन का ही एक उदाहरण है।
                          हमारी संस्कृति में प्रकृति को पूजा जाता रहा है और वह कभी भी बेमानी नहीं था।  सबसे पहले हम पेड़ों को ही ले लेते हैं - नीम में देवी का निवास , पीपल में देवताओं का निवास , बरगद में भी सभी देवताओं के निवास मन जाता रहा है।  उसे समय कोई भी मंदिर बिना इन वृक्षों के होता ही नहीं था। इन वृक्षों को रोपा जाता था।  खेतों में , उनकी मेड़ों पर किस लिए ? पता है क्योंकि दोपहर में किसान धूप से बचने के लिए इन्हीं नीचे बैठ पर खाना खाता और कुँए का ठंडा पानी पीकर , सिर के नीचे अपनी साफी का तकिया लगा कर घड़ी दो घड़ी आराम कर लेता था।  जानवर को खेत जोतते थे , इन्हीं के नीचे अपना चारा और पानी पीकर विश्राम  करते थे।  गाय और बैल दोनों को ही जानवर नहीं माना जाता था , वे घर के सदस्य कहलाते थे।  उनके नाम रखे जाते थे जैसे आज कल कुत्तों के नाम रखे जाते हैं और सिर्फ और सिर्फ उन्हीं को बड़े घरों में पाला जाता है। जो इंसान को मुहैया नहीं है वह इन्हें मिलता है।
                                हम ही जिम्मेदार हैं न , इस विखण्डन के लिए।  गाँव में आज भी कुछ संस्कृति को आश्रय प्राप्त है लेकिन जो उन गाँवों से बाहर निकल कर आ रहे और शहरों की चकाचौंध में भ्रमित होते जा रहे हैं।  अपनी जड़ों को भूल गए और नए ढंग से बिना जड़ों के अपने को स्थापित करने लगे।  स्थापित तो हो जाएंगे लेकिन हम अपने को क्या कहेंगे ? "धोबी का कुत्ता घर का न घाट का." अभी जड़ों से हम पूरी तरह कटे भी नहीं है और न ही वृक्ष बन पाए हैं।  शहरी संस्कृति में अपने को ढाल तो रहे हैं लेकिन हम त्रिशंकु बन कर रह जाते हैं।
                               अपनी संस्कृति हमें पुरानी लगने लगी और हम आधुनिक कहलाना चाहते हैं फिर क्या होता है ? न हम पूरी तरह से अंग्रेज ही बन पाते हैं और न ही भारतीय।  अपनी संस्कृति की अच्छी चीजें हमें पुरातन पंथी लगने लगी , प्रणाम , नमस्कार और चरण स्पर्श की जगह  हाय , हैलो ने ले लिया और गुड़ मॉर्निंग , गुड़ नाईट ने हमारे घरों में पैर फैला लिए , परिणाम क्या हुआ कि जब हमने चाहा कि जिनके हम चरण स्पर्श करते हैं , हमारी इज्जत रखने के लिए बच्चे भी दुहराएँ लेकिन वे तो कब से इस सीमा को तोड़ कर आगे बढ चुके थे।  सवाल यहाँ सिर्फ इज्जत देने भर की नहीं हैं बल्कि अपने से बड़ों को पिछड़ा हुआ कहने में भी आज की पीढ़ी संकोच नहीं करती हैं और फिर इतनी आगे निकल जाती है कि  पीछे आना भी चाहे तो नहीं आ पाती है।
                               संस्कृति के विखंडन ने ही तो प्रकृति को क्रुद्ध होने का अवसर दिया है।  पेड़ कट गए , लम्बे चौड़े हाई वे बनाने के लिए रास्ते साफ कर दिए गए मीलों तक एक पत्ता भी नहीं है कि छाँव दे सकें।  वो पेड़ जो वर्षा के पानी को अपने पत्तों में रोक कर धीरे धीरे धरती को सींचते रहते थे तो आबादी पानी को नहीं तरसती थी।  जगह जगह कुँए मिल जाते थे और लोग वहीँ रुक कर कुँए में रस्सी और पानी पीने के लिए कोई पात्र भी मिल जाता था।  ठंडा पानी पिया और आगे चल दिए चलते चलते थक गए तो किसी पेड़ के नीचे आराम कर लिया।

            हमें बूँद बूँद पानी को तरसना नहीं पड़ता था।  जहाँ तालाब या कुँए थे भी उन्हें भी पाट कर उनके ऊपर घर बन गए या फिर सड़कें बन गईंं । पानी के प्राकृतिक साधनों का प्रयोग बंद कर दिया गया क्योंकि अब उनमें पानी बचा ही नहीं है । देश के कुछ महानगरों का जलस्तर शून्य की ओर जा रहा है। कल क्या करेंगे हम ?
            क्या हम वापस आ पायेंगे और संरक्षित करेंगे अपनी संस्कृति ? अभी काल के गर्भ में पल रहा है ये प्रश्न !
         
                            

विभिन्न राज्यों में नवरात्रि !


                      भारतीय हिन्दू समाज में जितने पर्व और त्यौहार मनाये जाते हैं , उनमें नवरात्रि का  विशिष्ट स्थान है।  नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है।  शक्ति ही सृष्टि का निर्माण करती है , उसका पालन  करती है और उसका संहार भी करती है।  इसीलिए देवी शक्ति को सर्वोपरि माना गया है।  शक्ति ही महालक्ष्मी , महासरस्वती और महाकाली के रूप में जानी  जाती हैं। नवरात्रि में इन्हीं व्यक्त महाशक्तियों की आराधना की जाती है। 
                     नवरात्रि भी वर्ष में दो बार मनाई जाती है।  प्रथम वासंतिक नवरात्रि - जिसके प्रथम दिन से नवसंवत्सर आरम्भ होता है और वह हिंदी पंचांग के नववर्ष का प्रारम्भ कहा जाता है।  दूसरी नवरात्रि आश्विन मास में होती हैं , जिन्हें  शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।  नवरात्रि का अर्थ है नौ रातों तक नौ रूपों में देवी दुर्गा की आराधना। शक्ति की उपासना का पर्व प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि , नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता है।  सर्वप्रथम श्री रामचंद्र जी ने इस शारदीय नवरात्रि की पूजा का आरम्भ समुद्र तट  पर किया था और विजय प्राप्त की। दशमी को विजयादशमी इसी लिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन श्रीरामचंद्र्र जी ने रावण का वध किया था।  
  भारत के सभी राज्यों में नवरात्रि का पर्व विभिन्न तरीकों से इसे मनाया जाता है।   इस समय नौ दिनों तक महिलाएं एवं पुरुष व्रत रखते  हैं।घर पर व्रत का खाना बनता है और सभी इसका आनंद उठाते हैं। दुकानों में  के व्रत दौरान खाए जाने वाले खाध पदार्थों की भरमार होती है। सजे धजे मंदिरों में पूजा ,भजन,कीर्तन ,जगराता होता है। कुल मिलाकर हर शहर का वातावरण उत्सव के रंग में रंगा होता है ।  हां पूजा के रस्मों में अंतर अवश्य होता है।  

                    उत्तरप्रदेश , मध्य प्रदेश और बिहार :--उत्तर भारत के इन राज्यों लगभग समान रूप से पूजा की जाती है और इसके नौ दिन नौ देवियों के नाम को समर्पित होते हैं।  पहले दिन कलश की स्थापना कर देवी का आह्वान किया जाता है और क्रमशः प्रथम - शैलपुत्री , द्वितीय- ब्रह्मचारिणी , तृतीय चंद्रघंटा , चतुर्थ - कूष्माण्डा , पंचम स्कंदमाता , षष्ठ - कात्यायनी , सप्तम - कालरात्रि , अष्टम - महागौरी , नवम - सिद्धिदात्री देवियों के नाम से पूजन और इनके मन्त्रों का जप भी किया जाता है। 
               नवरात्रि  में प्रथम दिन ही कलश स्थापना की जाती है और अखंड ज्योति जला कर रखी जाती है, जो नौ दिनों तक लगातार जलती रहती है।  व्रत रखने वाले शुद्धता से साथ अधिकतर भूमि शयन करते हैं।  अष्टमी या नवमी के दिन पूजन, हवन के बाद व्रत का परायण किया जाता है। 
                 नवरात्रि में अष्‍टमी और नवमी के दिन निकलने वाले ज्वारों पर भक्तों की अटूट आस्था है। माना जाता है कि ज्वारों में सांग लगवाने से मन्‍नतें पूरी होती है। कानपुर में ज्वारों का अलग ही महत्व है। यहां पर बच्चे, बड़े और महिलाएं जुलूस में शामिल होकर सांग* लगाकर देवियों के मंदिर जाते हैं , कानपुर में सिद्ध देवी मंदिरों के दरबार में जाते हैं। नवरात्रि  के पर्व पर शहर के सभी जगहों से ज्वारे निकलते हैं। इसमें कुछ लोग तो 40 सालों से ज्‍वारे निकाल  रहे हैं। लोगों का मानना है कि ज्वारे में शामिल होने मात्र से लोगों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।

क्‍या होता है ज्‍वारा -  नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में जौ डालकर ज्वारे बोए जाते हैं। इसमें नौ घड़े होते हैं और जहां पर ज्वारे बोए जाते हैं, वहा पर शुद्ध जल का कलश भी रखा जाता है। इस कलश के ऊपर नौ दिनों तक ज्‍योत जलाई जाती है। नवमी के दिन महिलाएं माता के दरबार के लिए ज्वाराअपने सर पर रख कर मंदिर की और प्रस्थान करती हैं और उनके साथ गाजे बाजे भी होते हैं।   बच्चे-पुरुष सांग लगवाते हैं।
                 इस क्षेत्र में नवरात्रि के व्रत में सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुरूप पूजा और व्रत करते हैं।  कुछ लोग निर्जल नौ दिन का व्रत  करते हैं और कुछ लोग सिर्फ एक लौंग खाकर रहते हैं।  फलाहारी व्रत अधिकतर लोग रखते हैं।समय और श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग एक समय व्रत रह कर शाम को एक बार खाना ग्रहण कर लेते हैं।  नवरात्रि के पुरे नौ दिन कन्याओं की कुछ लोग विशेष पूजा करते हैं।  उनको घर बुला कर उनके पैर धोकर और टीका लगा कर पूजा करके भोजन कराते  हैं और दक्षिणा देकर उनको विदा करते हैं।
               इसके अतिरिक्त नवरात्रि में रामचरित मानस का पाठ भी नवाह्न परायण के अनुसार नौ दिन में रामायण का सम्पूर्ण पाठ पूर्ण कर लेते हैं।
तमिलनाडु
दक्षिण के इस राज्य में नवरात्रि  का त्यौहार अलग  अंदाज में मनाया जाता है। नवरात्रि  की नौ रातें देवी दुर्गा ,देवी लक्ष्मी एवं देवी सरस्वती को समर्पित हैं।अय्यर  समुदाय की महिलाएं शाम को सुहागिनों को अपने घर पर बुलाती हैं तथा सुहाग की निशानियां जैसे चूड़ी ,कान की बाली आदि उपहार में देती हैं। एक नारियल , पान ,सुपारी एवं रूपये भी इन महिलाओं को दिये जाते हैं। मसूर और अन्य दालों से बने विशेष व्यंजन आमंत्रित लोगों के लिए प्रतिदिन बनता है। कुछ लोग घर में गोलू बनाते हैं।गोलू में अस्थाई रूप से नौ सीढ़ी बनाई जाती है जिस पर सजावटी सामान , देव देवी की मूर्तियां रखी जाती हैं। यह मूर्तियां पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं 
आंध्र प्रदेश 
                                 यहां नवरात्रि  के दौरान विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में  बटुकम्मा पाण्डूगा मनाया जाता है।  इसका अर्थ देवी मां का आह्वान  करना है। महिलाएं बटुकम्मा तैयार करती हैं। इसमें मौसमी फूलों की सात परतें होती हैं। यह देखने में फूलों का फूलदान जैसा लगता है। तेलगू में बटुक का अर्थ है जीवन और अम्मा का अर्थ है मां। इस दौरान महिलाएं सोने के जेवर और सिल्क की साड़ी पहनती हैं। बटुकम्मा बनाने के बाद महिलाएं शाम को रस्म निभाती हैं। बटुकम्मा को बीच में रखकर देवी शक्ति  को समर्पित गीतों पर नृत्य करती हैं। इसके बाद बटुकम्मा का विसर्जन पानी में कर दिया जाता है।
केरल
                 यहां अंतिम तीन दिन ही नवरात्रि  मनाई जाती है अष्टमी ,नवमी एवं विजया दशमी। केरल में शिक्षा प्रारंभ करने के लिए इन तीन दिनों को शुभ माना जाता है। अष्टमी के रोज किताबें और वाद्य यंत्र देवी सरस्वती के समक्ष  रखकर उसकी पूजा का जाती है। ऐसा ही बसंत पंचमी के दिन पश्चिम बंगाल में होता है । दशमी के दिन किताबों को निकालकर पढ़ा जाता है। 
कनार्टक
                  कर्नाटक में नवरात्रि मनाने की परंपरा आज भी पुरातन काल से चली आ रही है  , उसे ही मानते हैं। सन  1610 ई..में राजा वाडयार के समय से यह त्यौहार मनाया जाता है। विजयनगर साम्राज्य में जिस तरह से नवरात्रि  मनाई जाती थी आज भी यहां के लोग उसी तरह से इसे मनाते हैं। अधिकांश स्थानों की तरह यहां भी नवरात्रि  मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाई जाती है।महिषासुर मैसूर का निवासी था। मैसूर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है।आज भी यहाँ पर भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां सड़क पर सजे धजे हाथियों का जुलूस निकलता है।इसके अलावा प्रदर्शनी और मेले तो आम बात है।
गुजरात
                यहां धरती पर जीवन का स्रोत मां के गर्भ का प्रतीक मिटटी का कलश नवरात्रि  का मुख्य आकर्षण है। कलश में पानी ,सुपारी एवं चांदी का सिक्का डाला जाता है। सबसे ऊपर एक नारियल रखते हैं। महिलाएं इसके चारों ओर नृत्य करती हैं। इसे ही गरबा कहते हैं। डांडिया रास भी गुजरात में नवरात्रि  का आकर्षण है।गुजरात में नवरात्रि  के दौरान गरबा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गुजराती ड्रेस में सजे लड़के-लड़कियां जोड़े के साथ गरबा पंडालों में गीत-संगीत की धुन पर डांस करते हैं। गरबा पंडालों को खासतौर पर सजाया जाता है।   इस महोत्सव के दौरान देवी  दुर्गा की आराधना की जाती है। गरबा में हिस्सा लेने के लिए लोग खास तौर पर तैयारी करते हैं। करीब एक महीने पहले से ही ट्रेनिंग क्लास ज्वाइन करते हैं। आजकल गरबा का क्रेज देश के कई शहरों में बढ़ता जा रहा है।
महाराष्ट्र
            यहां के निवासियों के  लिए नवरात्रि  नई शुरूआत करने का समय है जैसे नया घर ,नया वाहन इत्यादि खरीदना। महिलाएं एक दूसरे को अपने घर पर आमंत्रित करती हैं और उन्हें नारियल ,पान ,सुपारी भेंट करती हैं। सुहागिनें एक दूसरे के माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं।महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई में नवरात्रि  गुजरात जैसा ही मनाया जाता है। प्रत्येक इलाके में गरबा और डांडिया खेला जाता है और सभी इसका भरपूर मजा लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश
                यहां का नवरात्रि  अनोखा है। नवरात्रि  में यहां के लोग रिश्तेदारों के साथ मिलकर पूजा करते हैं। अन्य राज्यों में जब यह पर्व खत्म होता है तब यहां कुल्लू दशहरा प्रारम्भ होता है। यह भारतवर्ष की शान है। लोग भक्ति  को व्यक्त करने के लिए नाचते गाते हैं। दशमी के दिन मंदिर  की मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। 
पंजाब
        यहां के निवासी पहले सात दिन व्रत रखते हैं। यहां जगराते  विशेष महत्व मन जाता है। जगराते  का अर्थ है  - पूरी रात जागकर देवी के भजन गाना। अष्टमी के दिन व्रत तोड़ने के लिए नौ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है । भंडारे में पूरी , हलवा और भिगोकर और फिर चने को चौंक कर खिलाया जाता है ।कन्याओं को लाल चुनरी उपहार में दी जाती है। इन कन्याओं को कंचिका  भी कहते हैं । नवरात्रि  पूरे देश में मनाई जाती है। मनाने की विधि में अंतर है। परंतु पूजा हर जगह पर देवी के शक्ति  रूप की ही होती है और लोगों का जोश ,उमंग और उल्लास भी एक जैसा ही होता है।
पश्चिम बंगाल 
                बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां काफी पहले ही शुरू हो जाती हैं। यहां पंचमी से दुर्गोत्सव की शुरुआत होती है। महाकाली की नगरी कोलकाता में तो पांच दिनों तक श्रद्धा और आस्था का ज्वार थमने का नाम ही नहीं लेता है बल्कि पूरे साल में सबसे उत्साह से इसे मनाने की तैयारी करते हैं।
                  पूजा के इन चार दिनों में सभी लोग खुशियां मनाते हैं। जिस प्रकार लड़की विवाह के बाद अपने मायके आती है, उसी प्रकार बंगाल में श्रद्धालु इसी मान्यता के साथ यह त्योहार मनाते हैं कि दुर्गा मां अपने मायके आई हैं।
               दुर्गोत्सव से पहले तो देवी मां की सुन्दर और मनोहारी मूर्तियां बनाई जाती हैं। प्रमुख रूप से कोलकाता के कुमोरटुली नामक स्थान पर कलाकार मूर्तियों को आकार देते हैं। बंगाली मूर्तिकार द्वारा देवी दुर्गा के साथ साथ लंबोदर गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी और कार्तिकेय की भी मूर्तियां बनाई जाती हैं। देश के बहुत से प्रांतों में बंगाली मूर्तिकारों की खूब मांग रहती है। यहां निर्मित मूर्तियां देश के अन्य स्थानों के साथ ही दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में विशाल पंडाल सजाए जाते हैं। शहर और दूर गांवों से आकर शिल्पकार पंडालों का निर्माण करते हैं। इन भव्य पंडालों को बनाने में आने वाली लागत लाखों रुपए में होती है। वहां के निवासी इन दिनों खूब खरीदारी करते हैं। 

                    फुटपाथ पर लोग सजावट की बहुत सारी सामग्री बेचते हैं। दुकानों से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह भीड़ का रेला दिखाई पड़ता है। सभी अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। लोग अपने परिजनों, संबंधियों को वस्त्र आदि उपहार स्वरूप देते हैं। विजयादशमी के दिन मां का विसर्जन होता है।
                      कुल मिला कर सम्पूर्ण देश में चाहे वह किसी भी भाग में हो , नवरात्रि शक्ति स्वरूपा देवी के लिए ही मनाया जाता है और सभी में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति का भाव भरा होता है। 
 *सांग : या लोहे का भरी सा भाला जैसा होता है , जिसे सांग लेकर चलने वाले अपने एक गाल से डालते हुए मुंह के अंदर से दूसरे गाल से निकाल कर चलते हैं।  भारी होने के कारण दोनों तरफ लोग उसे भाले को हाथों का सहारा देते हुए चलते हैं।  यह लोग ज्वारों के साथ साथ चलते हुए मंदिर तक जाते हैं।