रविवार, 19 दिसंबर 2010

संसद के कारनामे !

                     
प्रजातंत्र में संसद देश के नीति निमार्ण और देश के शासन का  आधार होती है और सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी सांसद इसमें प्रतिनिधि बन कर बैठे होते हैं. देश की जनता जिन्हें चुन  कर भेजती है उनसे ये आशा करती है कि वे उसके विश्वास की रक्षा करेंगे जिस विश्वास पर उन लोगों ने उन्हें संसद में पहुँचाया है. उन्हें देश के जनप्रतिनिधियों के तौर पर सर्वाधिक वेतन और भत्ते मिल रहे हैं. सारा राष्ट्र संसद की कार्यवाही पर अपनी निगाहें टिकाये रखता है. कई बार सांसदों ने संसद की गरिमा को शर्मसार किया और देश के आम लोगों के सामने अपनी छवि जाहिल और गंवार लोगों से भी गई गुजरी बना कर दिखाई है. वह भी स्वीकार कर लिया और सब चुप रहे. लेकिन दिन पर दिन बढती जा रही संसद की बाधित कार्यवाही और सत्र के कार्यदिवसों का बहिष्कार कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है. 
         हमारी संसद के कार्यवाही एक वित्त वर्ष में तीन सत्रों - बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र में सम्पन्न होती है. इसमें कुल बैठके क्रमश ३५, २४ ,२४ होनी चाहिए. इस सभी बैठकों में नियमानुसार सभी सांसदों की उपस्थिति अपेक्षित है - चाहे वे एक मूक दर्शक के रूप में बैठे रहें. चूँकि संसद सत्र के लिए आवंटित कुल बजट में सभी का हिस्सा होता है. जिन दिनों  में सत्र नहीं होता सांसद स्वतन्त्र होते हैं, यह भी नहीं नजर आता कि  ये जन प्रतिनिधि कभी जनता के बीच आ ही गए हों या फिर उनकी समस्याओं  से अवगत ही हो जाएँ. .
                         इन सभी सांसदों के वेतन और भत्ते बढ़ाने के लिए बिल सर्वसम्मति से पास हो जाता है और अन्य विषयों पर विपक्ष का बहिर्गमन सत्र को धो कर रख देता है. सत्तारूढ़ दल अपनी गलतियों की स्वीकृति से बचता है क्योंकि सिद्ध होने पर वे अयोग्य घोषित कर दिए जायेंगे , जब पानी सिर से गुजर जाता है तब मंत्री अपने पद से इस्तीफा देते हैं. इस दिशा में असफल सत्रों के लिए कोई भी सांसद अपेन वेतन और भत्तों से तो वंचित होता नहीं है कि उनको इस कार्यवाही  के चलने या बाधित होने से कोई भय प्रतीत हो. उनकी उपस्थिति का भी कोई प्रश्न नहीं उठता है. वे स्वतन्त्र शासक हैं , इस दौरान भी कहीं भी रहे कोई उत्तरदायित्व उनके ऊपर नहीं आता है. इसी जगह अगर किसी सरकारी या निजी कर्मचारी की बात करें तो वे अपने  निर्धारित कार्य दिवसों पर कार्य के लिए अपने कार्यालय जाते हैं ( कार्य न भी करें तो भी कोई बात नहीं , वह विषय इतर  है.) उनकी उपस्थिति का आकलन होता है. उन्हें इस तरह की कोई भी छूट नहीं मिलती है. निर्धारित छुट्टियों से अधिक लेने का कोई प्राविधान नहीं होता है. उन्हें हड़ताल का अधिकार नहीं है - कार्य बंद करने का हक़ नहीं है और करते हैं तो वेतन कट जाता है - ठीक भी है काम नहीं तो वेतन किस बात का ?  फिर ये बात सांसदों पर लागू क्यों नहीं होती है? वर्ष में कुल ८३ दिन संसद का सत्र चलता है और उसमें भी उनको उसकी कोई चिंता नहीं है. 
                       इस बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही ने अपने अलग रिकार्ड कायम कर लिया है. इसमें सदन की २४ बैठकें होनी चाहिए और हर बैठक लगभग साढ़े पांच घंटे की होती है. इस तरह से १३२ घंटे इस सत्र में कार्यवाही चलनी चाहिए जिसमें १२४ घंटे ४० मिनट कार्यवाही हुई ही नहीं या बाधित रखी गयी. कुल सात घंटे और २० मिनट  लोकसभा की बैठक हुई. इसमें कम से कम ४८० तारांकित प्रश्न सूचित थे जिनमें से महज ५ प्रश्नों के उत्तर मौखिक तौर पर दिए गए. १० विधेयक  पेश किये गए जिनमें से ६ पारित हुए और १ वापस लिया गया. शेष अपना निर्णय न ले सके. 
                     राज्य सभा की कार्यवाही में बिना किसी काम के १०० घंटे गवाए सिर्फ २ घंटे तीस मिनट  काम हुआ. 
          यहाँ पर संसद के कामकाज में आने वाला औसत दैनिक खर्च ६.३५ करोड़ रुपये होता है और २३ दिन बिना काम काज के बीते. इस तरह से कुल १४६.०५ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ - प्रश्न काल, चर्चा और अन्य विधायी कार्यों के बगैर हुआ.
                   ये तस्वीर है हमारे प्रजातान्त्रिक शासन की - क्या ऐसा नहीं होना  चाहिए कि अगर सदन की कार्यवाही बाधित की जाती है तो सभी सांसदों को उनके दैनिक भत्तों से वंचित कर दिया जाय. उनकी उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाय . ये धन आता कहाँ से है? देश वासियों की गाढ़ी कमाई इसी तरह से ये लूटते रहेंगे और हम हाथ मलते रह जायेंगे. संसद में अगर सांसदों के हित का कोई विधेयक होगा तो सर्वसम्मति से पारित हो जाएगा लेकिन इस तरह के विधेयक लाएगा कौन ? फिर पारित क्यों होंगे ? वहाँ तो वही होता है जो मंजूरे सांसद होगा. फिर इसका निदान क्या है? इसके कुछ तो प्राविधान होना चाहिए नहीं तो अनुशासन खो चुकी संसद सिर्फ नाममात्र की रह जायेगी. 
             इस सत्र में महानुभावों की उपस्थिति कुछ इस प्रकार थी. जिनमें देश के दिग्गज काहे जाने वाले सांसद ही वर्णित हैं --
ए राजा - १ दिन

जयाप्रदा - १ दिन
मधु कोड़ा - १ दिन
बाबूलाल मरांडी - ३ दिन
कल्याण सिंह - ३ दिन 
राहुल गाँधी - ४ दिन
सोनिया गाँधी - ६ दिन
नवजोत सिंह सिद्धू - ८ दिन
लालू प्रसाद यादव - ८ दिन
मु. अजहरुद्दीन - १० 
             यहाँ बताते चलें की शीतकालीन सत्र २४ दिन का होता है. ये सांसद सत्र  कालीन भत्तों के शत प्रतिशत हक़दार हैं और रहेंगे भले ही उसके दौरान कहीं भी रहें? उनका कोई नैतिक उत्तरदायित्व न संसद के प्रति है और न ही जनता के प्रति. 

*समस्त आंकड़े  दैनिक जागरण के साभार

बुधवार, 17 नवंबर 2010

बड़े घराने बनाम सरकार !

   जब रतन टाटा ने घूस माँगने के मामले का खुलासा किया तो सरकार के कान खड़े हो गए और तुरंत ही सरकार नतमस्तक हो गयी. उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने रतन टाटा के घाव पर मरहम लगाते हुए उन्हें इस क्षेत्र में आने के लिए निमंत्रण दे डाला. ये एक बड़े घराने का आरोप था और खुलासा करते ही रास्ता साफ हो गया. जब सरकार के मंत्रालय स्तर इतना भ्रष्ट  है जहाँ करोड़ों की सौदा होती है और सतर्कता विभाग कभी कदार  अपनी तत्परता और निष्पक्षता के लिए कुछ एक अधिकारियों पर हाथ डाल कर वाह वही लूट लेती है और  ये बड़े करार होते हैं उन तक पहुँचने की हिम्मत उनमें नहीं है.

                        अब आम आदमी के बात करें तो वह तो इसके बिना कुछ करवा ही नहीं पाता है. समर्थ और सक्षम के लिए तो फिर भी ये बातें कोई मायने नहीं रखती हैं. हम बात करते हैं कोषागार की - जहाँ से अवकाश प्राप्त अपनी पेंशन पाते हैं. वहाँ चलें और देखें कि वे वृद्ध जो स्वयं चलने में असमर्थ है फिर भी घंटों लाइन में खड़े हैं, जिसको चक्कर आ गया तो वही बैठ गया. पेंशन लेने के बाद वहीं रखी एक भगवान की तस्वीर के आगे कुछ चढ़ावा चढ़ाना होता है. यहाँ कोई नहीं ले रहा और कोई नहीं दे रहा. श्रद्धा जाग्रत करवाकर कुछ चढ़वाया जा रहा है. शाम को वह चढ़ावा सबकी जेबों में चला जाता है.
                  
   'जीवित प्रमाण पत्र' हर वर्ष पेंशनर को जमा करना होता है. अगर उसको पेंशन लेनी है तो जमा करना  ही पड़ेगा. इस प्रक्रिया में अगर आपको निर्बाध पेंशन चाहिए है तो उस फार्म के साथ हर महीने के १०० रुपये के हिसाब से एक साल तक का चार्ज देना होगा तभी ये कार्य संभव है और यहाँ लाखों की संख्या में पेंशनर होते हैं. हो गयी न करोड़ों की कमाई. यहाँ कोई रिश्ता या परिचय काम नहीं आता है भले ही आप उसी कोषागार से अवकाशप्राप्त कर्मी क्यों न हों? अब नियम है तो है. ये पेंशनर जो अपने पैरों पर चल नहीं पाते , कुछ को तो दिखाई भी कम पड़ता है , कुछ मोहल्ले वालों के हाथ पैर जोड़ कर साथ लेकर आते हैं. वे कहाँ गुहार लगायें? किससे करें अपनी फरियाद और करने से भी क्या मिलेगा? उनकी पेंशन लटका दी जाएगी. वे कांपते हाथों से ये रकम देने के लिए मजबूर होते हैं लेकिन लेने वालों के हाथ नहीं कांपते है. ऐसा इस लिए भी होता है कि अब अधिकांश पेंशनर की पेंशन बैंक में जाने लगी है तो कोषागार वालों को तो साल में एक बार ही मौका मिलता है. धर्म की कमाई है. जो मांग रहे हैं वे अपनी मेहनत की कमाई मांग रहे हैं और जो देने वाले हैं उनकी तो मुफ्त की कमाई है इसलिए उनको देना होता है. चलिए आगे और विभागों में सेंध लगायेंगे .
*सभी चित्र गूगल के साभार *

सोमवार, 8 नवंबर 2010

सामाजिक दायित्व और आप !

                    फिल्मों में दिखाए जाने वाले स्टंट आज के युवाओं को कितना आकर्षित कर रहे हैं , इस विषय में कई बार खबरें मिल चुकी हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली की सड़कों पर लड़के बाइक पर स्टंट करते रहे और लोग देखते रह गए. वे कोई अपराध नहीं कर रहे थे इस लिए उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता . लेकिन ये फिल्मी स्टंट अगर युवाओं को भटकने वाला बन जाएँ तो फिर किस श्रेणी में रखना चाहेंगे हम?
                    ठीक दिवाली के दिन किसी के घर का दीपक बुझ गया और फिर चीत्कार और सिसकियों से भरे माहौल  में क्या कोई  सहृदय व्यक्ति ख़ुशी मना सकता है. पूरे मोहल्ले का माहौल खामोश रहा. दिए जले लेकिन आतिशबाजी का शोर नहीं था. दिवाली तो थी लेकिन दीपकों से निकलने वाली रोशनी उजली न लग रही थी. शर्मा जी ने अपने बेटे को अभी हाल में ही बाइक खरीद कर दी थी और वह अभी सिर्फ १८ वर्ष का बी टेक का छात्र था. फिल्मों में स्टंट करने के लिए वह घर वालों से चुपचाप किसी कोचिंग सेंटर को उसने ज्वाइन कर रखा था. इस लिए ही उसने बाइक खरीदने के लिए पिता को मजबूर कर दिया था. उसके इंस्टिट्यूट के घर से दूर होने के कारण पिता ने भी बाइक दिला दी थी. दोस्तों के सोहबत में और स्टंट के आकर्षण ने उसको सड़क पर स्टंट करते समय किसी भारी वाहन  से टकरा कर उसके नीचे आ जाने से उसके सिर को कटे तरबूज के तरह से खोल दिया था. उसके शरीर का कोई भी अंग सही सलामत नहीं बचा और १ हफ्ते  आई सी यूं में जीवन और मौत के साथ संघर्ष करने के बाद उसने दिवाली के दिन अंतिम सांस ली.
                     अभी तक तो सुना था एक्टिंग स्कूल, ड्रामा स्कूल, डांस स्कूल लेकिन ये स्टंट सिखाने वाले स्कूल के बारे में अभी तक न सुना था. जल्दी धनवान बनने के लालच ने और टीवी और सिनेमा के आकर्षण ने एक अच्छे खासे भावी इंजीनियर को उसको  जीवन और घर वालों से जुदा कर दिया.
                      अगर इस मृत्यु या हादसे को हम विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो इसमें हम किसे दोषी पाते हैं? क्या माँ बाप को जिसने बेटे को बी.टेक में एडमीशन तो दिला दिया और फिर जुटा दी उसके लिए सारी सुविधाएँ. ये उम्र ऐसी है कि बच्चे सोहबत में बहुत जल्दी भटक जाते हैं. इसलिए उनको अनभिज्ञ रखते हुए उनके बारे में सचेत रहने की जरूरत होती है. अभी उनको ग्लैमर की दुनियाँ की चकाचौंध अपनी तरफ खीचने के लिए काफी होती है. जब वे अपनी पढ़ाई के एक या दो साल संजीदगी के साथ गुजार लेते हैं और उनकी उपलब्धि भी हमें हमारे और उसके अनुरुप होती है तब बच्चे की ओर से बेफिक्र होना चाहिए. हमारा दायित्व सिर्फ बच्चे के लिए पैसा जुटाना ही नहीं होता है बल्कि उसको सही सांचे में ढालने की भी जरूरत होती है. आधे रास्ते जब वे हमारे साए में तय कर लें तब उनके हाथ को छोड़ा जा सकता है. अक्सर यह कहते हुए सुना है कि हम सिर्फ पैसे दे सकते हैं बाकी तो ये खुद देखें लेकिन वे अभी क्या देखेंगे? आपके दिए पैसे का दुरूपयोग भी कर सकते हैं. अपनी झूठी शान को दिखाने के लिए वे आपसे पैसे लेकर दोस्तों के साथ उड़ा सकते हैं. . इस लिए एक अच्छे और जिम्मेदार अभिभावक तभी बन सकते हैं जब कि उसके पीछे साए की तरह नहीं बल्कि उस  जासूस की तरह लगे रहिये जब तक कि आपको इस बात का यकीन न आ जाये कि अब उसके भटकने  की गुंजाइश नहीं रह गयी है.
                    कुछ दिन पहले एक लेख आया था कि क्या हम अपनी रिश्तेदार  या पड़ोसी के बच्चे को गलत दिशा में जाता हुआ देखें तो उनको आगाह कर दें या नहीं क्योंकि इसमें अपने पर आरोप लगने का भी डर रहता है. ऐसे झूठे आरोपों से मत डरिये आपका दृष्टिकोण सही है तो फिर जरूर बतलाइए. अगर माँ बाप आपको सही समझें तो ठीक है नहीं तो कल उसका परिणाम उनके सामने आ ही जाएगा. भले हमारे बच्चे न हों लेकिन किसी के बच्चे तो होते हैं और कोई भी माँ बाप ये नहीं चाहता कि उसके बच्चे किसी गलत दिशा में चले जाएँ. हमें अपने सामाजिक दायित्व  से विमुख नहीं होना चाहिए.

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

मानसिक अपंगता क्यों?

      
व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत हमने बहुत से प्रकार से अपंग बच्चों के बारे में जाना था . अब प्रश्न यह उठता है कि ये सारी कमियां पहले भी हुआ करती थी लेकिन उनकी संख्या इतनी अधिक न हुआ करती थी. तब तो गाँव में और घर में ही प्रसव हुआ करते थे और उनकी संख्या भी बहुत अधिक होती थी. सभी बच्चे चाहे कम अन्तराल पर हुए हों या फिर अधिक स्वस्थ होते थे.
              अधिक सुविधायों ने अगर हमको इस क्षेत्र में अधिक सक्षम बनाया है तो हमें उससे अधिक समस्याओं की जानकारी भी होने लगी है. उससे जनित समस्याओं के कारणों और उनके निराकरण पर भी विचार होने लगा है . पहले हम इससे वाकिफ नहीं थे क्योंकि उपचार की इन शाखाओं का विकास ही नहीं हुआ था बल्कि आज भी लोगों को इस चिकित्सा पद्धति के विषय में अधिक जानकारी नहीं है.
               आज मैं पहले के समय की बात देखती हूँ तो समझ आता है. मेरे पड़ोस में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार रहते थे और उनके पहले तीन लड़कियाँ थी और स्वस्थ थी. लड़के की चाह ने उनको सबसे अंत में पुत्र प्राप्त करने का सुयोग भी दिया  किन्तु लड़का मानसिक तौर पर अपंग था. ऐसे एक उनका ही मामला नहीं देखा बल्कि और कई मामले देखे और लोगों को कहते सुना - 'भगवान का अन्याय तो देखो कि लड़कियाँ सब भली चंगी और लड़का कैसा दिया? इस कैसा के पीछे क्यों को किसी ने न जाना और न ही जानने कि कोशिश की, ये कहिये कि तब इस प्रकार कि जानकारी हासिल भी नहीं हुई थी. 
              आज आमतौर पर लड़कियों की पढ़ाई और करियर के चलते विवाह कि उम्र बढ़ गयी है , हम इसको अच्छा मानते हैं या बुरा अपना अपना दृष्टिकोण है और कुछ तो शादी के बाद भी करियर के पीछे संतान का बोझ नहीं उठना चाहती हैं और बाद में प्लान करेंगे की तर्ज पर इस विषय को महत्व नहीं देती हैं. इन सब चीजों से शत प्रतिशत तो नहीं फिर भी मानसिक अपंगता के कारणों में प्रमुख बन रहे हैं. आइये उन कारणों पर विचार करें कि ये क्यों बढ़ रही है और इसमें कितनी सत्यता है?

 १. उम्र -- इसमें माँ की उम्र का बहुत अधिक महत्व है अगर माँ कि उम्र बहुत अधिक या बहुत कम होती है तब भी इस तरह के बच्चे होने की संभावना में वृद्धि हो जाती है. 
२. बेमेल विवाह -- बच्चे की मानसिक अपंगता में बेमेल विवाह की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. पति या पत्नी दोनों की आयु के बीच अधिक अंतर होना भी भावी बच्चे के पूर्ण विकास पर प्रश्नचिह्न लगा देता है.
३. माँ की शारीरिक स्थिति --  वर्तमान समय में मधुमेह, रक्ताल्पता, उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप आम बीमारी बन चुकी हैं लेकिन इन बीमारियों के रहते अगर वे गर्भ धारण करती हैं तो उसका प्रभाव बच्चे पर पड़ता है जिससे कि उसके सामान्य होने के रास्ते में कई अवरोध खड़े हो जाते हैं. 
४. मद्यपान/ ध्रूमपान --माँ का मद्यपान या ध्रूमपान दोनों ही बच्चे के मानसिक अपंग होने के लिए जिम्मेदार होते हैं. माँ के शरीर में अल्कोहल का जाना और ध्रूमपान से फेफड़ों पर पड़ने वाला दबाव बच्चे को प्रभावित करता है क्योंकि वह गर्भ में हवा पानी और भोजन सब माँ से ही ग्रहण करता है तो इन चीजों को जो भ्रूण ग्रहण करेगा उसके लिए कैसे सोचा जा सकता है कि वह एक सामान्य बच्चा हो सकता है. 
५. असामान्य प्रसव - नारी की शारीरिक रचना के अनुसार सामान्य प्रसव होना एक प्राकृतिक गुण है किन्तु जब ये सामान्य नहीं हो पाता है तो इसके लिए डॉक्टर को कुछ और तरीके अपनाने पड़ते हैं . उन तरीकों का प्रभाव अगर गलत हो गया तो बच्चे के मानसिक अपंग होने के अवसर बढ़ जाते हैं.

६. अल्ट्रा साउंड   / एक्स  रे -- गर्भावस्था के दौरान माँ के अल्ट्रा साउंड या एक्स रे अधिक होते हैं तो इससे बच्चे के स्वस्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. देखने में ये एक सामान्य प्रक्रिया होती है लेकिन अधिक होने पर यही घातक बन जाती है और बच्चे के लिए मानसिक अपंगता का कारण भी बन सकते हैं.
७. माँ की चोट -- गर्भावस्था में अगर किसी कारणवश माँ को चोट लग जाती है तो हमेशा तो नहीं लेकिन ये भी बच्चे के लिए मानसिक अपंगता का कारण सिद्ध होती है क्योंकि ऊपरी   तौर पर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि बच्चे कि मानसिक स्थिति क्या है? डॉक्टर बच्चे कि शारीरिक स्थिति विभिन्न तरीके से पता लगा लेते हैं लेकिन मानसिक अपंगता तो उसके कुछ बड़े होने पर ही पता लगती है.. 
८. नाल फँसना - कई बार बच्चे कि नाल उसके गले में फँस जाती है और इसका पता लगने में यदि देर हो जाती है तो बच्चे कि मौत तक हो जाती है लेकिन अगर नाल फंसने के बाद उसका जन्म होता है तो उस दौरान उसके जिन नसों पर उसका दबाव बना रहता है वे सामान्य तौर पर कार्य करें ये आवश्यक नहीं होता है और यही उसके मानसिक अपंग होने कि संभावना को बढ़ा देता है.
९. गन्दा पानी - कई बार डॉक्टर कहते हैं कि बच्चे के मुँह में या फिर पेट में भी गन्दा पानी चला गया है, उसके लिए कई उपाय किये जाते हैं कि उसको निकला जाय लेकिन जन्म से पूर्व ऐसा होना उनके सामान्य जीवन पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर सकता है.
१०. बच्चे का रोना - बच्चे का पैदा होते ही रोना बहुत जरूरी होता है क्योंकि माँ के गर्भ में तो वह सारी चीजें माँ से ग्रहण कर्ता है उसको बाहर के वातावरण या फिर अपनी शारीरिक क्रियाओं के लिए माँ पर निर्भर रहना पड़ता है लेकिन जैसे ही वह गर्भ से बाहर आता और जोर से रोता है तो वह बाहर से आक्सीजन ग्रहण कर्ता है और उसके उसके मष्तिष्क की नसों में रक्त प्रवाह आरम्भ होता है और वे  सामान्यतौर  पर कार्य करती हैं . यही अगर विपरीत होता है तो सबसे पहले डॉक्टर बच्चे को मार कर रुलाने का प्रयास करते हैं और तब भी नहीं रोता है तो उसको कृत्रिम तरीके से आक्सीजन देने कि व्यवस्था करते हैं . लेकिन जो इस बीच में देर होती है उससे मष्तिष्क कि नसे आपस में जुड़ जाती हैं और फिर कृत्रिम ढंग से आक्सीजन देने पर भी यदि नहीं खुल पति हैं तो उन नसों का जिन अंगों से सम्बन्ध होता है वे अंग सामान्य तौर पर कार्य नहीं कर पाते हैं इसमें अपंगता मानसिक और शारीरिक दोनों ही हो सकती हैं.
११. सिर में औजार लगना --  प्रसव के दौरान कई बार ऐसे स्थितियां आ जाती हैं कि बच्चे के जन्म के लिए कुछ औजारों का प्रयोग करना जरूरी होता है और यदि ये औजार बच्चे के सिर में कहीं भी लग जाते हैं तो वे घातक सिद्ध होते हैं. क्योंकि बच्चे का सिर सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है उससे उसके सारे शरीर कि प्रक्रिया जुड़ी होती है और औजार लगने पर यदि कोई भी रक्तवाहिनी क्षतिगस्त हो गयी तो उसका मानसिकतौर अपार अपंग होना निश्चित हो जाता है.
१२. सिर की चोट - बच्चे के सिर में यदि जन्म के कुछ दिनों के अंतर में ही चोट लग जाती है तो ये उसके लिए अच्छा नहीं होता है. उस समय तो पता नहीं चलता है लेकिन बाद में उसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं.
१३. उल्टा पैदा होना - सामान्य अवस्था में प्रसव में बच्चे का सिर पहले बाहर आता है और पैर बाद में , लेकिन कभी कभी बच्चे के उल्टे  पैदा होने से पहले पैर बाहर आते हैं और फिर उसका सिर फँस भी सकता है या फिर बाहर की  हवा उसके सिर को बाद में मिलती है तो उसके जो कार्य सिर से आरम्भ होते हैं उनमें विलम्ब होता है और फिर उसके लिए यह घातक हो सकता है.


                        इन स्थितियों से बचाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है ताकि माँ एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे. इन कारणों को शत प्रतिशत बच्चे कि मानसिक अपंगता के लिए जिम्मेदार नहीं मना जाता है लेकिन ऐसी परिस्थिति में हम बहुत हद तक ऐसे ही बच्चों को पा रहे हैं. इससे भावी को माँ को सतर्क करना या फिर स्वयं माँ का सावधानी बरतना अच्छा ही हो सकता है. इस प्रकार के बच्चे कभी भी पूरी तरह से सामान्य नहीं हो पाते हैं इनके लिए ही व्यावसायिक चिकित्सा उनको अपने कार्यों के लिए आत्मनिर्भर बनाने कि दिशा में सकारात्मक रास्ता दिखाती है और उनको उस ओर ले भी जाती है. 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

इतिहास की पुनरावृत्ति !

                        क्या हमें फिर से अतीत के इतिहास को दुहराने का जरूरत आ पड़ी है. इस विषय को नहीं छूना चाह रही थी लेकिन आज की इस घटना ने झकझोर दिया. अब इंसां की वहाशियत ने हदें पर कर दीं हैं और वह भी आँखों के सामने जब देखा तो रोना आ गया उस माँ के रोने पर जिसने बेटी को स्कूल ही तो भेजा था पढ़ने के लिए और लौट कर तो उसे बेटी की लाश ही मिली और वह भी दरिंदों की नोची हुई अपनी बेटी की लाश.
                       कानपुर नगर - अब अखबारों में इस काम के लिए बहुत चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी डॉ. के नर्सिंग होम के आई सी यूं में भर्ती एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नीद सुला दिया गया क्योंकि एक दिन पहले ही उसने अपने माँ बाप से कहा था कि मुझे यहाँ से निकाल ले चलो नहीं तो मैं नहीं बचूंगी और नर्सिंग होम वालों ने छुट्टी नहीं दी. दूसरे ही दिन उन्हें बेटी के लाश मिल गयी.
                      पुलिस बलात्कार के जरूरी साक्ष्य भी नहीं जुटा पाई , पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पुष्टि के बाद साक्ष्य कहाँ से लाये? यद्यपि संचालिका अभी जेल में हैं लेकिन उन पर लगी धाराएँ पुलिस बदल कर हल्की कर रही है क्योंकि मालदार पार्टी है और बेटी किसी गरीब की.
                       कल स्कूल गयी १० वर्षीया दिव्या को लहूलुहान हालत में स्कूल कर्मियों द्वारा घर छोड़ा गया और जब माँ उसे अस्पताल ले गयी तो डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. उस बच्ची के साथ जो व्यवहार किया गया है उसने अब तक के सारे वहशीपन के रिकार्ड तोड़ दिए थे. डॉक्टर खुद हतप्रभ थे कि इस नन्ही सी बच्ची के साथ क्या हुआ है?  डाक्टरी रिपोर्ट के अनुसार जो समय तय है उस समय बच्ची स्कूल में थी.
                       ये समाज क्या चाहता है , पहले तो इन मासूमों को होने से पहले ही ख़त्म करने की साजिश रची जाती है और अगर वह दुनियाँ में आ भी गयी तो दोयम दर्जे के व्यवहार का शिकार हो जाती है. अब तो उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं  बचा क्या फिर से बाल विवाह की प्रथा शुरू कर दी जाय या फिर उनकी शिक्षा को बंद कर दिया जाय. कोई भी माता पिता अपने बेटी के साथ साए की तरह से नहीं रह सकता है. उसको घर की देहलीज तो लांघ कर बाहर निकलना ही पड़ेगा.
                       पहले यही होता था न, कि किसी की सुन्दर बेटी पर अगर बूढ़े जमींदार की नजर भी पड़ गयी या सुल्तान की नजर पड़ गयी तो उसकी जिन्दगी उसकी नजर हो जाती थी. इसी लिए तो बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था या फिर जल्दी शादी करके उसको ससुराल वाली बना दिया जाता है और तब भी वह कम उम्र में ही माँ बनने के अभिशाप से ग्रसित होकर मृत्यु के मुँह में चली जाती थी. नसीब उसका मृत्यु  ही होती थी. या फिर बाल विधवा बनकर लोगों की इस गलत नजर का शिकार होकर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष करती फिरती थी.
                         अब हमारे पास क्या रास्ता है? क्या करें हम? बेटियों को सिर्फ सीने से लगा कर रखे और विदा कर दें. अगर उनको घर से बाहर निकालेंगे तो फिर किसी वहशी की नजर न पड़ जाए. किसका विश्वास करें-- डॉक्टर, पड़ोसी, रिश्तेदार, स्कूल, रिक्शेवाला, बसवाला और फिर शिक्षक ? अगर किसी का नहीं तो फिर ये कौन सा जीवन जीने की हक़दार हैं?  इस बात को मैंने अपने एक लेख में पहले भी जिक्र किया था कि अब लड़कियों को खुद में इतना सक्षम बनाना होगा कि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें. उनको मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग आरम्भ से देने की जरूरत अब आ पड़ी है. इसको स्कूल के स्तर पर ही अनिवार्य करना होगा. कम से कम वे संघर्ष कर अपना बचाव तो कर सकें. ये वहशी दरिन्दे कुछ भी नहीं सिर्फ मानसिक बीमारी से ग्रसित होते हैं. ये मनोविज्ञान की भाषा में सेडिस्ट होते हैं. दूसरे को कष्ट देने में इनको सुख मिलता है और इस बीमारी से ग्रसित लोग खुद बहुत मजबूत नहीं होते हैं. अब हर स्तर पर ये लड़ाई लड़ने की जरूरत है. बच्चियों को पूरी सुरक्षा मिले और उससे आप घर में भी स्कूल के माहौल के बारे में जानकारी लेती रहें. क्योंकि इस तरह के लोग किसी न किसी तरीके से बच्चियों पर पहले से ही नजर रखते हैं और मौका पा कर ऐसा कृत्य कर बैठते हैं.
                   घर में अच्छे संस्कार सिर्फ लड़कियों को ही देने की जरूरत नहीं होती है बल्कि अपने लड़कों को भी अच्छे संस्कार दें ताकि वे सोहबत में भी ऐसे घिनौने कामों में लिप्त न पाए जाएँ. अपने घरों से शुरू करेंगे तो बहुत से घर इस स्वस्थ माहौल को बनाने में सक्षम होंगे. हम अपने स्तर पर प्रयास कर सकते हैं और फिर पूरे समाज को सुधारना तो सबके वश में ही है क्योंकि ये वहशी भी किसी माँ बाप के बेटे होते हैं और पता नहीं उनको कम से कम कोई माता पिता तो ऐसी शिक्षा नहीं दे सकता है हाँ उनकी सोहबत ही उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.

सोमवार, 27 सितंबर 2010

लगेंगे हर बरस मेले (शहीद भगत सिंह )!

           आजादी जिनके सिर पर जूनून बन कर बोली , वे उसकी तमन्ना में फाँसी पर झूल गए  और फिर गुलामी की  कड़ियों को एक के बाद एक शहीद अपनी शहादत से कमजोर करते चले गए. जब आजादी मिली तो शहीदों की कहानी इतिहास लिख चुकी थी और आजादी का सेहरा बांध कर जश्न कुछ और लोगों ने मना लिया और देश के भाग्य विधाता बन गए. इतिहास आज भी ये प्रश्न उठाता है कि अगर कुछ लोग चाहते तो भगत सिंह और कुछ लोगों की  फाँसी को रोका जा सकता था लेकिन उन लोगों ने नहीं चाहा.
                                   इस भारत के लाल का जन्म अखंड भारत के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में २७ सितम्बर १९०७ को हुआ था. (अब पाकिस्तान में है.) उनका परिवार क्रांतिकारियों का ही परिवार था , घर में चाचा और पिता में कोई न कोई जेल में ही बना रहता था. भगत सिंह के पिता किशन सिंह और माता विद्यावती थी. उनकी रगों में देशभक्ति लहू बन कर दौड़ रही थी.
                   भगत डी ए वी कॉलेज में पढ़ रहे थे, तभी लाला लाजपत राय, रास बिहारी बोस के संपर्क में आये. उनके संपर्क में आने का मतलब था कि देश के अतिरिक्त कुछ सोचना ही नहीं था. १९१९ में जब जलियाँवाला काण्ड हुआ तब भगत सिंह मात्र  १२ बरस के थे और इस गोलीकांड ने उनको इतना विचलित कर दिया था कि वे अगले दिन जलियाँवाला बाग़  जाकर उसकी मिट्टी उठा कर लाये और अपने जीवन में उसको यादगार के रूप में रखे रहे. इस काण्ड ने ही उनके मन में अंग्रेजों को भारत से भागने की भावना को दृढ बनाया.
                        गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रेरित हो कर हो उन्होंने स्कूल छोड़ा और आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने लगे, किन्तु चौरी-चौरा काण्ड के बाद जब गाँधी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो वे क्षुब्ध हुए और तब उन्हें लगा कि ये अहिंसा का सिद्धांत उनके मनोबल और लड़ाई को कमजोर बनाने वाला है. इसके बाद उन्होंने आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को अपना लक्ष्य बना लिया कि इसके बगैर वे अंग्रेजों को यहाँ से नहीं निकाल सकते हैं.
                     उन्होंने लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नॅशनल स्कूल , लाहौर  में प्रवेश लिया और अपनी शिक्षा जारी रखी. ये स्कूल मात्र शिक्षा का केंद्र ही नहीं था अपितु वह क्रांतिकारी गतिविधियों का गढ़ था. वही उनकी मुलाकात भगवती चरण बोहरा, सुखदेव आदि से हुई.
                     विवाह से बचने के लिए वे घर से भाग कर कानपुर आ गए और यहाँ पर उनकी मुलाकात गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई. क्रांति का आगे का पाठ  उन्होंने यही पढ़ा और पारिवारिक कारणों से घर वापस लौट गए. वहाँ पर उन्होंने "नौजवान भारत सभा" का गठन किया और  क्रांति का सन्देश फैलाना आरम्भ कर दिया. १९२८ में उनकी मुलाकात दिल्ली में चन्द्र शेखर आजाद से हुई और दोनों ने मिलकर "हिंदुस्तान  समाजवादी प्रजातंत्र संघ" नाम की संस्था का गठन किया और इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति से देश को आजादी दिलाना रखा.
                     जब साइमन कमीशन भारत आया तो उसके विरोध में पुलिस द्वारा उसमें लाला लाजपत राय के ऊपर जो बेरहमी से लाठी चार्ज किया गया. भगत उसके साक्षी थे और उसमें घायल होकर ही बाद में वे स्वर्ग सिधार गए. उन्होंने चन्द्र शेखर , राजगुरु, सुखदेव से मिलकर इस काण्ड के पुलिस प्रमुख स्कॉट को मारने कि योजना बनाई लेकिन भूलवश वह उसके सहायक सांडर्स को मार बैठे और लाहौर  से भाग निकले. इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली का ध्यानाकर्षित करने के लिए बिना किसी को नुक्सान पहुंचाए असेम्बली में बम फोड़ा और इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाये . इस अपराध में उनको गिरफ्तार कर लिया गया.भगत सिंह के कुछ गद्दार मित्रों ने सांडर्स काण्ड के लिए पुलिस के साथ मिलकर इन लोगों के खिलाफ गवाही दी. भगत सिंह और उनके मित्र चाहते थे कि उनको गोली मार दी जाय लेकिन उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी की सजा सुनाई गयी  और २३ मार्च १९३१ को उन लोगों को  फाँसी दी गयी.
                       वे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित थे और अपनी मातृभूमि  के लिए शहीद हो गए. जब तक इस भारत भूमि का अस्तित्व है, वे सदैव नमनीय रहेंगे. आज उनके १०३ वें जन्म दिन पर हमारी उनको श्रद्धांजलि के रूप में ये लेख अर्पित है.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति (३) !

                   मनोरोग और मानसिक अपंगता दोनों अलग अलग व्याधियां है. इनके बारे में हम सामान्य व्यक्ति नहीं जान पाते हैं और हम इसके इलाज के लिए गलत जगह या गलत व्यक्ति के संपर्क में आकर अपना समय और धन दोनों नष्ट करते हैं और हमें उससे फायदा कुछ भी नहीं मिलता है.
                 एक मनोरोगी वह स्वस्थ व्यक्ति होता है , जो मानसिक और शारीरिक दोनों  दृष्टि से सामान्य होता है और उसके शरीर के सम्पूर्ण अवयव सही ढंग से काम करते हैं. अपने स्वभाव और वातावरण के अनुरुप वह मनोरोग से ग्रसित हो जाता है - जैसे यदि वह अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाला है तो वह अपनी बात किसी से शेयर नहीं करता और अंदर ही अन्दर सोचता रहता है . उसके जीवन में तमाम ऐसी स्थितियां आती है कि वह उनसे अकेले लड़ नहीं पाता है और किसी को वह साझीदार बना नहीं पाता है. जिसका परिणाम ये होता है कि वह किसी न किसी प्रकार की मानसिक व्याधि से ग्रसित हो जाता है. एक कमजोर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति अपनी परिस्थितियों  से भी नहीं लड़ पाता है और वह जीवन के उतार चढाव में आने वाले तनावों से अनिद्रा, अवसाद, कुंठा का शिकार हो जाता है और कई बार इनसे बचने के लिए वह नशीले पदार्थ तक लेने लगता है. ऐसे लोग मनोरोगी कहे जाते हैं . उनकी इन व्याधियों  का इलाज मनोचिकित्सक के पास होता है,  वे उसे काउंसलिंग, व्यावहारिक चिकित्सा  और विभिन्न दवाओं के द्वारा सामान्य स्थिति में ले आते हैं. ऐसे मनोरोगी ही आत्महत्या या दूसरों की हत्या करने तक का कृत्य कर डालते हैं.
                     मानसिक अपंगता वह स्थिति है , जब व्यक्ति अपनी उम्र के अनुसार कृत्य  नहीं कर पाता है. ये जन्मजात भी हो सकती है और किसी दुर्घटना के बाद भी. अक्सर इन लोगों की शारीरिक और मानसिक उम्र बराबर नहीं होती. जिसको हम I .Q के द्वारा चेक करते हैं. चाहे वे जन्मजात अपंगता के ग्रसित हो, किसी दुर्घटना के कारण या फिर पक्षाघात के बाद . इन लोगों को उनकी अधिकतम क्षमता तक पहुँचाना व अपने दैनिक कार्यों के लिए आत्मनिर्भर बनाना ही व्यावसायिक चिकित्सक का कार्य होता है.  उसके कार्य में धैर्य और सहानुभूति प्रमुख आधार होती है क्योंकि ऐसे रोगियों में सुधार बहुत धीमी गति से होता है और यही धैर्य और रोगी में आने वाला सुधार उनकी सफलता का द्योतक होता है.
                    इस विषय में जानकारी के अभाव में बच्चे के माता पिता या परिजन डॉक्टर के पास जाते हैं क्योंकि चिकित्सा की  ये शाखा अभी प्रत्येक अस्पताल में उपलब्ध नहीं है , हाँ इसके लिए विशेष अस्पताल या एन जी ओ अवश्य ही  कार्य कर रहे हैं. कुछ लोग उनको मनोचिकित्सक  के पास भेज देते हैं और मनोचिकित्सक भी अपने स्वार्थवश और पैसे की चाह में उन्हें भ्रमित कर देते हैं . ये मामला मेरे संज्ञान में आया है इसलिए उल्लेख कर रही हूँ. एक बच्चे को जो हाइपर एक्टिव था, मनोचिकित्सक ने उसको ब्लड प्रेशर लो करने की दवा देनी शुरू कर दी और उससे वह बच्चा सुस्त हो गया. जो सारे दिन घर में दौड़ता और तोड़ फोड़ करता था उसके सुस्त हो जाने से माता पिता को लगा कि मेरे बच्चे में सुधार आ रहा है जो  कि ये उनकी भूल थी क्योंकि वे इस बात से वाकिफ ही नहीं थे कि उनके बच्चे के साथ क्या हो रहा है? ऐसे ही बच्चों को व्यावसायिक चिकित्सक नियंत्रित करते हैं. जब उस बच्चे को और उसके पर्चे और दवा को एक व्यावसायिक चिकित्सक ने देखा तो बताया कि इसको गलत दवा दी जा रही है बस सिर्फ इस लिए कि माता पिता इस भुलावे में रहें कि  बच्चा अब कम परेशान कर रहा है और उसका इलाज जारी रखें.
                      इसका एक और उदाहरण भी सामने आया कि एक मनोचिकित्सक ऐसे रोगियों की बुलाती है और माता पिता को बाहर निकाल कर बच्चे  को कमरे में छोड़ देती है और वह अपनी गतिविधियाँ करता रहता है. आधे घंटे बाद वह माता पिता को बुलाती है और कहेगी कि आज मैंने ये observe किया है, दो दिन बाद फिर आइयेगा तब और देखूँगी. इसको बिहेवियर थेरेपी की जरूरत है. इस तरह से एक दिन के observation पर चार बार फीस वसूल लेती है. इसी बहाने होम विजिट पर भी आने की बात करेगी और उसकी फीस और अधिक होती है. माँ बाप इससे अनभिज्ञ होते हैं  और बच्चे के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं. इलाज के लिए वह अपने साथ व्यावसायिक चिकित्सक को रखती है और फिर उससे पूछ कर माता पिता को संतुष्ट कर देती है बस उसका इलाज नहीं कर पाती है हाँ पैसे जरूर ऐंठ लेती है.
                   इसको बताने का मेरा सिर्फ यह आशय है की ये व्याधियां तो इंसां के वश की बात नहीं है, जो मिली हैं उनसे मुक्ति या राहत के लिए सही दिशा में जाकर ही निदान मिल सकता है. आप हों या आपके परिचित हों, उन्हें सही दिशा का भान कराइए कि  उनको कैसे और कहाँ इसकी चिकित्सा के लिए प्रयास करना चाहिए.
                  ऐसे कई सेंटर भी होते हैं जहाँ पर ऐसे बच्चों को रखा जाता है और उनके चिकित्सा भी दी जाती है लेकिन अपने बच्चे को डालने से पहले वहाँ का वातावरण और वहाँ बच्चों के देख रेख के लिए रखे गए लोगों के विषय में जानकारी जरूर ले लें क्योंकि इस बारे में भी लोग मूर्ख बना कर पैसे ऐंठते रहते हैं. मेरे एक परिचित अपने बच्चे को एक डे  केयर सेंटर में रखते हैं और भरोसा उनको इसलिए हुआ क्योंकि उस सेंटर के संचालिका एक डॉक्टर हैं और उसमें उनका बच्चा भी रहता है. वे दिन में खुद अपने क्लिनिक जाती हैं और उनके सेंटर को कोई दूसरी लड़की देखती है. इस सेंटर में वह और भी बच्चों को रखती हैं. प्रति बच्चे वे कोई ३ हजार रुपये लेती हैं और एक लड़की रखी हुई है जो मात्र बी. ए पास है. उसको १ हजार रुपये देती हैं क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि मैं Occupation Therapist को नहीं अफोर्ड कर सकती हूँ. हाँ ये उनकी एक आमदनी का साधन भी है और अपना बच्चा भी ठीक से रहता है.

सोमवार, 20 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति ! (२)

                   बच्चे के जन्म की सूचना हमें उसके रोने से ही मिलती है क्योंकि उस समय हम सब तो बाहर ही होते हैं .बच्चे के इस रोने के कारण और इसके महत्व को मैंने खुद कभी इतनी गंभीरता से नहीं समझा था. हम तो यही समझते थे कि बच्चा जन्मते ही बाहर के वातावरण का आदी  नहीं होता है इसलिए वो रोता है. जब इस डगर चले तो पता चला कि ऐसा नहीं है . इस रोने से बच्चे का सारा जीवन जुड़ा होता है. जब तक शिशु माँ के गर्भ में  रहता है वह सारी जीवनी शक्तियां माँ से ही ग्रहण करता है. जन्म लेते ही वह तेजी से रोता है क्योंकि बाहर के वातावरण से उसका पहला स्पर्श होता है. इस रोने की क्रिया से ही शिशु के फेफड़े खुलते हैं और वह आक्सीजन ग्रहण करता है. उसके मस्तिष्क की जितनी भी नसें होती हैं वे आक्सीजन से ही सक्रिय होती हैं और उनमें रक्त संचार आरम्भ होता है. यह एक स्वस्थ शिशु के लिए अत्यंत आवश्यक होता है , इसमें ही उसके शारीरिक विकास और सक्षमता का राज छिपा होता है. इसके विपरीत अगर बच्चा नहीं रोता है तो डॉक्टर उसको तुरंत मार कर रुलाने का प्रयास करती है क्यों? क्योंकि उसका तुरंत रोना आवश्यक होता है और यदि इसके बाद भी बच्चा नहीं रोता है तो उसको वेंटिलेटर पर रख दिया जाता है या उसको यथाशक्ति  शीघ्र  आक्सीजन देने की व्यवस्था की जाती है  . अगर इस प्रक्रिया में ५ मिनट की भी देरी हो जाती  है तो शिशु के पूर्ण रूप से स्वस्थ होने की संभावना पर प्रश्न चिह्न लग जाता है. ऐसा इसलिए होता है कि अगर मष्तिष्क की नसों में रक्त संचार तुरंत नहीं हुआ तो कृत्रिम साधनों से दी जाने वाली आक्सीजन से सारी नसे नहीं खुल पाती हैं और जो इस बीच चिपक जाती हैं, उनको फिर नहीं खोला जा सकता है और वे जिन अंगों तक मष्तिष्क की निर्देशन तरंगों को ले जाने वाली होती है - वह अंग विकलांगता के शिकार हो जाते हैं. ये जन्मजात शारीरिक विकलांगता का  कारण होता है.
                        इसके अतिरिक्त इस प्रक्रिया के बाधित होने से मानसिक विकलांगता भी होती है, जिसमें शिशु शारीरिक रूप से पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है किन्तु उसका मष्तिष्क किसी दृष्टि से अक्षम होता है. इसको सामान्य व्यक्ति नहीं समझ सकता है .
और इस कमी के बारे में बचपन में पता भी नहीं चलता है, जब बच्चा बड़ा होता है तब उसकी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं से ये स्पष्ट हो पाता है.
                      विगत कुछ वर्षों में संचार के साधनों ने इस तरह के कुछ बच्चों या व्यक्तियों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ फिल्मों और टीवी सीरियल का निर्माण किया गया है. इस लिए कुछ प्रारंभ में रोगों के बारे में उनके अनुसार ही बताती हूँ ताकि सभी समझ सकें कि हाँ ऐसा क्यों होता है?
                 तारे जमीं पर -- इस फ़िल्म में मुख्य पात्र 'डिस्लेक्सिया' नामक रोग से ग्रसित होता है. जिसमें पीड़ित अध्ययन के दौरान अक्षरों के बीच भेद नहीं कर पाता है. वह ' b ' को 'd ' पढता है और 'p ' को 'q ' समझ सकता है. इसको माता - पिता सामान्य  त्रुटि मानते हैं और उसकी लापरवाही मान कर उसको प्रताड़ित करते हैं. वास्तव  में यह एक मानसिक अक्षमता है. फिर यदि ऐसे बच्चों के लिए समुचित व्यवस्था की जाय तो वे उसके अनुसार शिक्षित किये जाते हैं.
                 माई नेम इज खान --  इस फ़िल्म का नायक शाहरुख़ खान 'एस्पर्जास सिंड्रोम' का शिकार था. जिसमें पीड़ित  गुरुत्वाकर्षण की असुरक्षा का शिकार होता है. जिसमें वह जमीं पर देख कर चल सकते हैं क्योंकि उनकी मानसिकता ऐसी होती है के अगर वे नीचे देख कर नहीं चलेंगे तो गिर जायेंगे. किसी स्थिति में उनको झूला झूलने से ही डर लगता है और किसी स्थिति में वह तेज तेज झूलना ही पसंद करता है. इसमें एक स्थिति के दोनों ही रूप संभव होते हैं.
                  आपकी अंतरा --  यह एक TV सीरियल आया था, जिसमें की बच्ची को 'स्पेक्ट्रम डिसआर्डर   ' का शिकार दिखाया गया . इसमें जो भी क्रिया होती है वह दोनों ही रूपों में हो सकती है. जैसे कि अंतरा  बिल्कुल चुप और निष्क्रिय  रहती थी और कभी बच्चा इसके ठीक विपरीत अतिसक्रिय भी हो सकता है जैसे कि वह सारे घर में दौड़ता ही रहे या फिर बहुत शोर मचने वाला भी हो सकता है. इन बच्चों को यदि कहा जाय कि ये बिल्कुल ठीक हो सकते हैं ऐसी संभावना बहुत कम होती है लेकिन इनको संयमित किया जा सकता है और इनके व्यवहार में परिवर्तन लाया जा सकता है.
                    इन बच्चों के लिए ही इस प्रकार की चिकित्सा पद्धति का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार के बच्चों को मनोचिकित्सक इलाज नहीं कर सकता है, क्योंकि मनोरोग और मानसिक अपंगता दो अलग अलग स्थितियां हैं और इसके बारे में अगली किश्त में ............
                                                                                                                       (क्रमशः)

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति !

                सबसे पहले मैं ये बता दूं कि ये मेरा क्षेत्र बिल्कुल भी नहीं है लेकिन जब घर के सदस्य इससे जुड़े होते हैं तो कलम उसमें दखल जरूर देने लगती है. उसके ज्ञान को लेकर इस कलम से आप सब तक तो मैं पहुंचा ही सकती हूँ. जो बच्चे या रोगी आज के जीवन में समस्या बने हुए हैं और परिवार परेशान है और इस विषय में उनको अधिक जानकारी नहीं है, वे अपने बच्चों को डॉक्टर के पास लेकर दौड़ते रहते हैं और डॉक्टर कई बार अपने स्वार्थ के लिए गलत दिशा दिखा कर पैसे ऐंठते रहते हैं. 

                          सबसे पहले मैं इस चिकित्सा पद्धति के बारे में परिचय दूं उसके बाद उससे सम्बंधित जानकारी देती रहूंगी. व्यावसायिक चिकित्सा की यह शाखा जो मानसिक विकलांगता या शारीरिक विकलांग से जुड़ी है और ऐसे लोगों के पुनर्वास के सतत प्रयत्न करते हैं कि वे अपने जीवन में आने वाली परेशानियों से मुक्त हो सकें या फिर कम से कम अपने कार्यों के लिए किसी पर निर्भर तो न ही रहें. इस को औक्यूपेशनल   थेरपी के नाम से जाना  जाता  है. इससे सम्बद्ध डॉक्टर इन विकलांग लोगों को उनकी बीमारी के अनुरुप दैनिक जीवन में अपने कार्य हेतु सक्षम बनाने , उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने की दिशा में कार्य करते हैं. इसके लिए उनको वैकल्पिक या कृत्रिम  साधनों का विकास करना ताकि वे अपने जीवन में दूसरों पर आश्रित होने से बचें. इस में जन्मजात विकलांगता या दुर्घटना से आई विकलांगता के शिकार लोगों के लिए सकारात्मक बदलाव लाने के लिए चिकित्सा देते हैं. आम तौर पर इनकी शिक्षा में न्युरोलौजी, एनौटामी , मेडिसिन, सर्जरी , आर्थोपीदिक्स  और साइकोलॉजी शामिल होती है और इसके पूर्ण अध्ययन के साथ   व्यावहारिक ज्ञान (internship )  के बाद ही चिकित्सा के लिए अनुमति दी जाती है.  आमतौर ये आर्थोपीडिक , न्यूरोलौजिकल और साइकोलॉजिकल समस्याओं से ग्रस्त लोगों के इलाज से जुड़े होते हैं. इस तरह के रोगों से ग्रस्त व्यक्ति का सामान्य डॉक्टर के पास इलाज नहीं होता है. इस दिशा में जुड़े लोगों की  समाज सेवा और रोगियों के प्रति पूर्ण सहानुभूति ही उनकी सफलता का द्योतक होता है. 
                                                                                                                                         (क्रमशः)

बुधवार, 15 सितंबर 2010

अच्छा है विकल्प !

                   आज के अख़बार में एक कॉलम में ऐसी विज्ञप्ति देखी, जो कम से कम इससे पूर्व मेरी दृष्टि से कभी नहीं गुजरी थी. लोकतंत्र के लिए एक अच्छा विकल्प लगा.
          विज्ञप्ति थी  -------

                                                             भारतीय संसद 

                                                               राज्य सभा सचिवालय 
                          यातना निवारण विधेयक , २०१० सम्बन्धी
                                       राज्य सभा की प्रवर समिति 
                    इस विधेयक के सम्बन्ध में सुझाव आमंत्रित करती है.
                               ( सम्पूर्ण विवरण के लिए दैनिक जागरण ( १५ सितम्बर २०१० ) का पृष्ठ ९ पर देखें .)


                किसी अधिनियम के लिए इस तरह से जन मानस से मत संग्रह संसद के स्तर पर मेरी दृष्टि में पहली बार आया है. इसके अपवाद भी हो सकते हैं अतः  इसको विवाद का विषय न बनाया जाय. क्या इसी तरह से लोगसभा के स्तर पर जन प्रतिनिधि जहाँ अपनी जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए जाते हैं और वहाँ प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है या अक्षम नहीं भी हैं तो वे सिर्फ दल के झंडे तले सिर्फ हाथ उठाने भर का कार्य करने की क्षमता रखते हैं. जो जनहित से जुड़ा है वह राष्ट्र हित से भी जुड़ा होगा और इस तरह के विषयों पर जन का भी अधिकार होता है. संचार माध्यम से या व्यक्तिगत तौर पर राष्ट्रीय निर्णयों पर जन सामान्य की भागीदारी से उनकी देश की राजनीति या अन्य गतिविधियों के प्रति उदासीनता है उसको कम करेगा. अपनी बात जो वह ऊपर तक लाना चाहता है, उसको अगर प्रतिनिधि नहीं लाता है तो लोकसभा प्रश्न काल  में कुछ समय ऐसा होना चाहिए कि देश की जनता मूक या अकर्मठ प्रतिनिधियों के चलते मामलों को संसद के पटल पर रख सके. उन्हें उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना कि किसी मंत्री या सांसद के प्रश्न को.
                ऐसा एक प्रकोष्ठ स्थापित होना चाहिए  जो कि जनप्रतिनिधियों के निरंकुश आचरण , अनाचार या अत्याचार के प्रति विरोध दर्ज करने के बाद उनको निष्पक्ष विचार के लिए सदन के समक्ष प्रस्तुत कर सके . इसके लिए जन प्रतिनिधि को उत्तर देने के लिए बुलाया जाय. ये कार्य मात्र केंद्र स्तर पर ही नहीं अपितु राज्य स्तर पर भी होना चाहिए.
                 लोकतंत्र जो अब सिर्फ कुछ दलों, पूंजीपतियों या खानदानों में सिमट कर रह गया है. उसमें लोक की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए. छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक जो विकास निधि प्रदान की जाती है, वह कार्य वर्ष समाप्त होने पर वापस हो जाती है. क्षेत्र नरक का नरक बना रहता है और निधि वापस हो जाती है ऐसा किस लिए होता है?  छोटे स्तर पर पार्षद कहीं और व्यस्त होते हैं, उन्हें ठेकेदारों से समुचित कमीशन नहीं मिल पता है तो विकास कार्य में रूचि ही नहीं लेते हैं. ऐसे ही विधायकों और सांसदों  की निधि  जब वापस जाती है तो इसका मतलब ये समझा जाता है कि उनका क्षेत्र पूर्ण रूप से विकसित और सुवयावस्थित है. इस विषय में उनसे लिखित तौर पर मांगना चाहिए कि इस निधि की वापसी का पर्याय क्या है?
                 इस तरह से कुछ तो समस्याओं, अन्याय और प्रतिनिधित्व के प्रति न्याय की एक आशा जाग्रत होगी. देश की मौजूदा हालात  में कुछ तो सुधार होगा. एक संतोष जन मानस में होगा कि जो पांच साल के लिए दल के नाम पर प्रतिनिधि चुना है , उसकी कार्यविधि पर हम सवाल उठा सकते हैं और फिर उसका उत्तर भी मिलेगा. पार्टी के नाम पर बिठायीं गयी कठपुतलियाँ भी इसके तहत नाचना शुरू कर देंगी सिर्फ मत बढ़ाने के लिए ही संसद में नहीं बैठी रहेंगी.

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

हार्दिक शुभकामनाएँ !

                                                                                   ईद       


                                                                                  और


                                                                           गणेशोत्सव 



                                                               के सुखद संयुक्त संयोग पर 

                              सभी लोगों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

बुधवार, 8 सितंबर 2010

अधिनियम निर्माण और अनुप्रयोग !

                उत्तर प्रदेश सरकार 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण अधिनियम २००७ ' को लागू करने जा रही है. इसके लिए प्रत्येक जिले में ट्रिब्यूनल और अपीलिएत ट्रिब्यूनल गठित किया जाएगा.
                  इसके लागू होने पर पीड़ित व्यक्ति को ट्रिब्यूनल में  एक आवेदन पत्र देना होगा और ट्रिब्यूनल उनके बेटे बेटियों , नाती , पोतों का पक्ष सुनकर भरण पोषण का आदेश देगा और आदेश पालन न करने पर उन्हें एक माह की जेल व  जुरमाना देना पड़ेगा.
               इतिश्री अधिनियम कथा.
                   व्यक्ति को सामाजिक  व्याधियों और उत्पीड़न व अन्याय से बचाने के लिए ही क़ानून और दंड का प्रावधान किया गया था. ये कानून और दंड का मानव जाति के स्वभाव के अनुसार सदियों पुरानी व्यवस्था है. कालांतर में जब अपराध और उत्पीड़न का स्वरूप बदलने लगा और आचरण की दिशाएं बदल गयीं जिससे नए प्रकार कि घटनाएँ देखने को मिलने लगीं. क़ानून व्यवस्था इस ओर से जागरुक हुई और उनके मद्देनजर नए अधिनियम बनाने लगे. हमने अधिनियम बनाये और उनके विपरीत आचरण अपराध कहलाया गया. सरकार सिर्फ अधिनियम बनाएगी , उनको घर घर जाकर लागू  नहीं करेगी. अगर बहुत आगे बढे तो एक अपराध की एक ही सजा होगी. फिर वे मुक्त वैधानिक और नैतिक दोनों दायित्वों से. जुरमाना देकर और सजा भुगत कर वैधानिकता से , समाज की दृष्टि में अपमानित और तिरस्कृत होकर नैतिकता से भी.
                   अगर वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल में जाते हैं तो क्या इसके बाद उनके बहू और बेटे या नाती और पोते उनके प्रति उत्तरदायी रहेंगे. वे उनको घर में रखेंगे - नहीं , तब हमारी सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प होना चाहिए कि ऐसे लोगों को वह शरण देगी. यदि परिजन खर्च देने को तैयार है रखने को नहीं तो सरकार के पास क्या व्यवस्था है? क्या कोई दूसरा विकल्प है? अगर नहीं तो वे बुजुर्ग इसके बाद क्या करेंगे? कहाँ जायेंगे? मुझे संदेह है कि इससे पहले बुजुर्ग घर में जो भरण पोषण या आश्रय पाते रहे थे इसके बाद भी वे पा सकेंगे. पैसा हर मर्ज की दवा नहीं होती है.
                 अगर सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन हो रहा है तो क्या हम पश्चिम की नक़ल हर बात में कर रहे हैं सरकार उसके लिए खुद कुछ करें. इसमें संतान पक्ष ही दोषी हो ऐसा नहीं है? कितने बुजुर्ग ऐसे होते हैं जो अपने कार्यकाल में जिस शान से जिए हैं खाया पिया है उसी शान से रहना चाहते हैं और ये भूल जाते हैं कि उनके बच्चे जब पढ़ रहे थे तब कितना खर्च था और आज के बच्चे पढ़ रहे हैं तो कितना खर्च है? उनके बेटे घर के बजट को सही ढंग से चलाने ने के लिए बराबरी से मेहनत कर रहे हैं और तब भी वो नहीं खा और खिला सकते हैं जिसे उनने अपने जीवन में सामान्य समझ कर ग्रहण किया था. उनकी पत्नी घर में रहती थी और उनकी फरमाइश के अनुसार उनको बनाकर खिला सकती थीं और खिलाया भी. लेकिन वह बहू जो सुबह पूरा खाना बनाकर काम पर जाती है और शाम ६ बजे लौट कर आप उससे कहें कि चाय के साथ भजिये भी होने चाहिए और न करने पर अपशब्द या दूसरे के सामने अपमानित करें तब दोष किसे देंगे?
                यहाँ पर दोनों ही दोषी हो सकते हैं, कहीं बहू सुबह तैयार होकर ऑफिस चली गयी और दिन का खाना घर में मौजूद महिला बना रही है. शाम को उनके लौटने पर उन्हें चाय और नाश्ता भी तैयार मिलना चाहिए नहीं तो पतिदेव के कान भर कर नया नाटक तैयार होता है. उनके बच्चे स्कूल से आते हैं तो घर में दादी माँ और बाबा जी देखते हैं.
              इसके लिए एकतरफा निर्णय नहीं होता है. इसके लिए क़ानून के साथ साथ अस्थायी शरण स्थल भी बनाने चाहिए. अगर हम इसके बारे में मनोवैज्ञानिक , समाजसेवियों और काउंसलर के साथ विचार विमर्श करें तो पायेंगे कि इस स्थिति को सुधार  जा सकता है बगैर सजा के प्राविधान के - बस अस्थायी शरण स्थल हों. शिकायत के बाद बुजुर्गों जहाँ शरण मिल सके. अधिकतर तो ये होगा कि अपने घर में रहकर जिसे वे अपनी उपेक्षा समझते हैं या जो अपेक्षाएं करते हैं वो जब यहाँ पूरी नहीं होंगी तो उन्हें अपने घर से तुलना करना पड़ेगा और तब घर और अपने बच्चों के व्यवहार की कीमत पता चलेगी.
                           इसका दूसरा पक्ष जो बहूरानी सुबह सब कुछ सास या अन्य महिला या पुरुषों पर छोड़ कर चल देती हैं , जब उस घर के बुजुर्ग घर से हट जायेंगे और उन्हें सुबह से काम पर जाने तक सब कुछ तैयार करना होगा, घर में ताला डालना होगा और स्कूल से बच्चों को लौटकर ठन्डे खाने और खुद लेकर खाने कि जहमत उठानी पड़ेगी या फिर काम से लौट कर खुद ताला खोल कर अपने हाथ से चाय और नाश्ता बनाकर लेना पड़ेगा तो वे बुजुर्ग बहुत याद आयेंगे और तब अपनी गलती और उनके त्याग की कीमत पता चलेगी.
                        ये अस्थायी अलगाव उनके भ्रम को तोड़ने के लिए काफी हो सकता है और जो समस्या जेल और हर्जाने के द्वारा हमेशा के लिए घर के दरवाजे बंद करने का काम करेगा लेकिन इस विकल्प से वापस प्रेम और सौहार्दता का वातावरण स्थापित कर सकता है. 
                          मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि कुछ प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जहाँ वाकई उत्पीड़न और उपेक्षा की हदें पर हो जाती हैं ऐसे स्थानों पर स्थायी शरण स्थलों की व्यवस्था पहले हो जानी चाहिए ताकि वे घर से बेघर किये गए बुजुर्ग किसी दूसरे के दरवाजे के  मुहताज न हो जाएँ. उनके मिलने वाले खर्चे और बाकी सरकारी सहायता से इन शरण स्थलों कि व्यवस्था होनी चाहिए. ऐसे शरण स्थलों में यही बुजुर्ग एक दूसरे के सहारे और दुःख सुख के साथी बन जाते हैं. 
                       इस तरह से इस अधिनियम को लागू करने के पहले उसके अन्य व्यवस्थाओं को बना लेना चाहिए ताकि उचित परिणाम प्राप्त कर सकें और समस्या का समाधान भी.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

मी लोर्ड ! हम भूखे मर जायेंगे .

                      
हमारी  न्याय प्रक्रिया बहुत ही सुस्त है और इससे मुक्त होने के लिए कई प्रयास किये गए और इस दिशा में गुहार जारी भी है लेकिन इसका परिणाम नहीं निकाल पाता है. कभी ये कि हमारे पास जजों की संख्या कम है और लंबित मुकदमें अधिक है तो कार्य कैसे चलेगा? कुछ हमारे न्याय प्रणाली के रास्ते इतने उबड़ खाबड़ हैं कि उन्हें पार करने में वादी की जिन्दगी ही ख़त्म हो जाती है या फिर वह न्याय की आशा में दौड़ते दौड़ते पंगु हो जाता है. ये पंगुता पैसे से, स्वास्थ्य से, और शक्ति सभी से देखी जा सकती है. 
                         इस दिशा में एक विसंगति ये देखने को मिली जो कि अपने आप में एक मिसाल ही है. आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में सिविल न्यायलय में पिछले दिनों एक न्यायाधीश जे. वी. वी. सत्यनारायण मूर्ति ने एक दिन में रिकार्ड १११ मामले निबटाये . उनके कार्य कि गति को  देख कर वकीलों के एक वर्ग ने उनसे इस गति से कार्य न करने का आग्रह किया क्योंकि वकीलों को प्रति पेशी १०० से लेकर २०० रुपये फीस मिलती है. सालों चलने वाले मुकदमे उनकी स्थायी आमदनी का साधन है. न्यायाधीश ने उनकी इस दलील के बाद कहा कि वे आपराधिक दंड संहिता के अनुरुप काम कर रहे हैं और उन पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता है. वकीलों के मेहनताने की खातिर वादियों को कष्ट झेलने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है.
                      न्यायमूति ने अपने साढ़े तीन महीने के कार्य काल में ५०० मामले निपटाए है. और अभी १००० मामले उनकी अदालत में लंबित है. पूरे देश  में लगभग ३ करोड़ मामले लंबित हैं,.
                       यदि सभी नहीं तो सिर्फ कुछ प्रतिशत न्यायमूर्ति भी न्यायमूर्ति सत्यनारायण मूर्ति का अनुकरण करें तो इस बोझ को बहुत जल्दी काम किया जा सकता है.

                         हम न्याय प्रक्रिया के सुस्त होने पर किसको दोष देते हैं? हाँ इतना जरूर है कि वकीलों की इस भूमिका को कभी सोचा नहीं था.  क्या सिर्फ अपने स्वार्थ  के लिए वकील ये घिनौनी मानसिकता हैं रखते हैं ( इसमें सभी वकीलों को शामिल नहीं किया जा रहा है, खासतौर पर वे जो इस सोच के नहीं हैं.) वर्षों तक वादियों को लटका कर भटकते रहने के लिए मजबूर करना तो किसी भी कार्य की धर्मिता में नहीं आता है. वकील को फीस लेने का अधिकार होता है लेकिन सिर्फ पेशी पर तारीख  बढवा  देने पर या न्यायमूर्ति के अनुपस्थित होने पर भी अपनी फीस वसूल करना उचित है क्या? लेकिन ये होता है. गाँव से आने वाला वादी कभी कभी मीलों पैदल चलकर शहर तक आता है और अपने खाने के लिए नमक रोटी और हरी मिर्च और प्याज एक पोटली में बाँध कर लाता है लेकिन अपनी जेब में वकील की पूरी फीस के रुपये जरूर लाता है. इन तारीखों का सिलसिला वर्षों तक ख़त्म नहीं होता है और वादी इसी तरह हर पेशी पर फीस देकर चले जाते हैं. घर बिक जाते हैं, खेत बिक जाते हैं और घर के जेवर तक बिक जाते हैं और उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है. कितने इन वकीलों की नीति के शिकार जेल में सड़ते रहते हैं और उनके पैरोकार भी चल बसते हैं 
                         ऐसे न्याय में जिसमें न्याय न हो रहा हो, इसको हम क्या कहेंगे? इन वकीलों को अपने भूखे मरने की बहुत चिंता है लेकिन उन परिवारों की चिंता नहीं होती , जो इस मुकदमेंबाजी के चक्कर में बर्बाद हो रहे हैं यहाँ  तक कि ये बिलम्ब उनकी बलि भी ले लेता है. इसके लिए क्या करना होगा? इसके लिए हमारी क्या नैतिक जिम्मेदारी है? इसको कैसे ख़त्म किया जाय?  हमें भी अपने विचार प्रस्तुत करने चाहिए.

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सांसदों की वेतन वृद्धि : कितना उचित?

                          सांसदों के वेतन और भत्ते में वृद्धि - एक अहम् मुद्दा जिसे संसद में फिलहाल टाल दिया गया है. बाकी मुद्दे पीछे हैं, कोई एक मत नहीं हो पाटा  है. बहिर्गमन, निष्कासन और बहुत सारे कार्य होते हैं , जिससे हमारी संसद सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी चर्चित हो जाती है. यह एक  ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरी संसद एकमत है. आखिर ऐसा क्यों? न पक्ष और न विपक्ष का कोई असहयोग क्योंकि इससे सभी लाभान्वित होने वाले हैं. तब देश के सारे मुद्दे एक किनारे हो जाते हैं. चोर चोर मौसेरे भाई.
                     
                           उन्हें रहना, फ़ोन, बिजली यात्रा सभी सुविधाएँ मुफ्त प्राप्त होती हैं. उनका वेतन और दैनिक भत्ता  इतना होता है कि उनके लिए कम तो नहीं कहा जाएगा. इस पर भी कल ये दलील पेश की गयी कि -- क्या वाकई सांसदों के वेतन और भत्ते इतने काम हैं की  उनको अपने सार्वजनिक जीवन और जन संपर्क के कार्यों में पूरा  नहीं पड़ पाता है.  
'सांसदों से ईमानदारी की अपेक्षा करना जितना जरूरी है, उतना ही व्यवहारिक बातों पर ध्यान देना भी. जिस तरह से मंहगाई बढ़ रही है, उसमें सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाना बिल्कुल जायज है.'     
                            ये सांसद कितने प्रतिशत एक बार चुनाव जीतने के बाद अपने चुनाव क्षेत्र में जाते हैं. इनको संसद सत्र के अतिरिक्त कभी भी समय नहीं होता है. संसद में प्रश्न पूछने के लिए उन्हें अपने ही क्षेत्र से घूस चाहिए तब वे संसद में मुद्दे उठाएंगे क्योंकि उनका खर्च पूरा नहीं पड़ रहा है. कोई सांसद राज्य सभा में चुनाव के लिए अपने मत की  कीमत १ करोड़ रुपये लगाता  है और कोई ५० हजार. ये कमाई के अतिरिक्त साधन हैं जो कि उनको एक सांसद होने के नाते प्राप्त हैं. 
                      अगर उनके इतर खर्चों पर निगाह डालें तो पता चलता है कि ये कुछ विधायक और सांसद जब तक दो चार हत्याकांड में वांछित  न हों उनका दबदबा कम ही रहता है और इस दबदबे के लिए कई कई गुर्गों को पालने का खर्चा भी तो होता है.  उसको भी शामिल किया जाना चाहिए .
                       कभी इन सांसदों ने सोचा है कि अपने क्षेत्र कि समस्याओं  पर भी इसमें से कुछ खर्च कर दिया जाय. सांसद निधि से वे क्या करवाते हैं? दो मीटर सड़क बनवा दी और एक बड़ा सा पत्थर प्रमाण के लिए लगवा दिया गया चाहे उससे जुड़ी सड़क पानी और कीचड से भरी ही क्यों न पड़ी हो? इसके लिए भी उनके चमचों को पहुँच होती है. नहीं तो ये सांसद आम आदमी कि समस्याओं से दो चार कब होते हैं? हाँ ये जरूर सुनने को मिल जाता है कि इस बार आप हमें जिताइये  हम आपकी ये सड़क पक्की करवा देंगे और नाली पानी की  व्यवस्था जरूर सही करवा देंगे और फिर सब चमचों का राज. 
                       इस जगह एक ऐसे सांसद का उल्लेख मैं जरूरी समझती हूँ जो कि इटावा के जसवंत नगर  क्षेत्र से सांसद थे . अपने कार्यों और  जन सेवा के बल पर सांसद बने. अपना सम्पुर्ण जीवन सेवा कार्य में लगाया . अपने परिवार के लिए इतना भी नहीं कर पाए कि उनके बाद पत्नी को कार्य न करना पड़े. उनकी पत्नी आज भी कपड़ों पर  प्रेस करके अपना जीवन यापन कर रही हैं. (दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के आधार पर.) 
                       कभी इन्होने ये सोचा है कि ६०-७० कि उम्र में काम करके पेट पालने वाले पुरुषों और महिलाओं के लिए ऐसे कार्य संचालित करवा सकें के वे घर में बैठ कर खाना खा सकें. इस उम्र में दूसरों के घर में जाकर काम करने की सामर्थ्य न होने पर भी वे मजबूर हैं. इस उम्र के बुजुर्ग रिक्शा खींच कर अपना और पत्नी का पेट पाल रहे हैं. उनका कोई वेतन नहीं होता और कोई भी भत्ता नहीं होता. अगर रिक्शा नहीं चलाएंगे तो रोती  नहीं खा सकेंगे .
                          ये हमारे जन प्रतिनिधि हैं और सिर्फ अपना और अपना ही हित सोचते हैं जिन्हें अपने वेतन और भत्तों की चिंता है आम इंसां की नहीं.

सोमवार, 26 जुलाई 2010

क़ानून और हम!

        बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मुकदमे के फैसले में अपना फैसला दिया कि "शादी का झूठा वादा  करके यौन सम्बन्ध बनाना  बलात्कार नहीं है." और उस आरोपी को बरी कर दिया गया.
                       अब हमारा न्याय इस बात को स्पष्ट करे कि  यह अपराध किस श्रेणी में रखा जाय और अगर वह किसी भी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है तो फिर हमारे मूल्यों को कौन बचाएगा या फिर उनको फिर से परिभाषित किया जाय? क्या इस श्रेणी में वह लड़की अपराधी बनती है जो इस झांसे में आकर अपना भावात्मक और यौन शोषण करवाती रही. इस का परिणाम कुछ भी हो सकता है , वह लड़की गर्भवती हो सकती है, वह इस धोखे से धोखा खाकर आत्महत्या कर सकती है या फिर विक्षिप्त हो सकती है. तब हमारे कानून को बताना चाहिए कि इस हालात में उस बच्चे का क्या होगा? इस लड़की का भविष्य क्या होगा? बरी किया गया व्यक्ति तो पाकसाफ दमन लेकर समाज में सिर उठाये घूम रहा है और वह लड़की  जो जिन्दगी जियेगी ये हम सब को पता है.
                         अब जरूरत इस बात की है कि भारतीय संस्कृति और मूल्यों को परिमार्जित करके फिर से परिभाषित किया जाय क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति के समागम से हमारे मूल्यों का ह्रास हो चुका  है और हमारे विधि शास्त्र  को भी नवीन स्वरूप की आवश्यकता आन पड़ी है. लिव इन रिलेशनशिप  को मान्यता दी जा चुकी है बगैर ये जाने कि ये सुविधा और सुख की वजह से सामजिक मूल्यों का विघटन हो रहा है और इन संबंधों को प्रयोग के तौर पर मानने वालों के लिए तो कुछ भी नहीं है लेकिन इसमें भावात्मक रूप से जुड़े होने वाले के लिए शेष जीवन का स्वरूप ही बदल जाएगा.
                    हमारी क़ानून व्यवस्था किसी एक न्यायाधीश के द्वारा दिए गए निर्णय से थरथरा जाती है और फिर आम आदमी उसमें सिर मारता रह जाता है. हम अपने क़ानून व्यवस्था के सदियों पुराने कानूनों को आजतक बदल नहीं पाए हैं और वे बेमानी क़ानून हमें ही मुँह चिढा रहे हैं. आधे अधूरे क़ानून न्याय को सुलभ  नहीं दुर्लभ और दुष्कर बना देते हैं. इतने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट रोज कानून के पांसों से खेलते  है लेकिन फिर भी कुछ खोटे और कालातीत सिक्के अब भी क्यों चलाये जा रहे हैं? क्यों नहीं सोचा जाता कि इनको बदला जाय. इन्हीं के बीच में फंसा इन्साफ पाने वाला दम तोड़ देता है और उसको इन्साफ नहीं मिलता है.

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

मेरा सफरनामा (नासिक) !

               अब हमारी बारी थी नासिक को घूमने की. हमारी पहली ही यात्रा थी तो यहाँ के दर्शनीय स्थलों  से हम अधिक परिचित न थे लेकिन हमारे टैक्सी  वाले ने बताया कि   यहाँ  पर भी बहुत सारे स्थान देखने काबिल हैं. नासिक रोड से एक घंटा लगता है नासिक जाने में. रामायण कालीन  बहुत सारे स्थल हैं - जो आज भी उस काल के इतिहास के साक्षी माने जाते हैं. एक खास बात मुझे वहाँ जाने पर यह पता लगी कि  यहाँ नासिक नाम पड़ने के पीछे भी एक कथोक्ति है कि  यहाँ पर लक्ष्मण जी ने रावण की बहन सूर्पनखा की नाक काटी थी इसी लिए इसका नाम नासिक पड़ा. हम लोग उस स्थान को भी देखने गए जहाँ पर ये घटना घटित हुई थी. वहाँ एक कुटिया जैसे स्थान पर सूर्पनखा की क्षत विक्षत नाक वाली प्रतिमा और साथ ही लक्ष्मण  जी की प्रतिमा बनी हुई थी.                         यहाँ पर पंचवटी नामक स्थान विशेष उल्लेखनीय है. वैसे तो पंचवटी तो श्री राम की महत्वपूर्ण कार्यस्थली कही गयी है जहाँ पर वे अपने वनवास काल में रहे. उनके जीवन काल की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े स्थल अपनी अपनी कहानी कह रहे थे. वह अगस्त्य मुनि का आश्रम जहाँ पर राम को उपदेश दिए थे और उनकी पत्नी ने सीता को.. वह कुटिया जहाँ तीनों ने निवास किया था. 

                       सीता की स्मृतियों से जुड़ी हुई सीता गुफा है, जिसमें कहा जाता है की सीता जी ने निवास किया था. उस स्थल को देखने वालों की भीड़ देखते बनती थी. और वे सभी  एक विशाल लाइन  में खड़े थे. जब कि  उस गुफा में सिर्फ एक व्यक्ति ही प्रवेश कर आगे बढ़ सकता था और वह भी बैठे बैठे ही आगे बढ़ सकता था. एक लम्बी सुरंग की तरह वह गुफा सीता के निवास की कहानी कह रही थी.
                  वहाँ  से हम उस स्थान पर गए जहाँ पर कपिल मुनि ने तपस्या करके कपिला नामक नदी को प्रकट किया था और उस स्थान पर कपिला और गोदावरी नदी का संगम स्थल है. छोटी बड़ी पहाड़ियों के बीच में ये संगम स्थल है और चित्र में वही स्थल देखा जा सकता है.

                 इसी स्थान par  पहाड़ के ऊपर राम लक्ष्मण और सीता की  बड़ी बड़ी सी  मूर्तियाँ कहें या मैटल से  बनायीं गयी प्रतिमाएं जिन्हें पत्थर की ही नाव पर दिखाया गया है. चित्र में इनका आकाश की पृष्ठभूमि में दिखाई देना मुझे बहुत ही आकर्षक लगा था.


                 सीता का रावण द्वारा किये गए हरण के समय जिस कुटिया में सीता थी और लक्ष्मण द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा का स्थल भी चिन्हांकित किया गया है.
                रावण के पुत्र मेघनाद का वध करने के लिए लक्ष्मण ने जिस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी , उसको भी विशेषरूप से चिन्हांकित किया गया है. इतने वर्ष बाद भी उस वृक्ष के अस्तित्व के विषय में शंका तो होती है लेकिन इतने साक्ष्य के बीच अविश्वास दब जाता है.
               नासिक की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है, इस पूरे स्थान को धार्मिक दृष्टि से देखें तो अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान है. यहाँ पर सिंहस्थ कुम्भ पड़ने वाला स्थल भी हमने देखा. गोदावरी के किनारे उस स्थल की तस्वीर भी ली. यद्यपि गोदावरी का पानी इस स्थान पर कानपुर कि गंगा से कम गन्दा न था, फिर भी लोग उसमें डुबकी लगा कर नहा रहे थे. चारों ओर पालीथीन तैर रहीं थी.

                एक विशेष बात मुझको यह लगी कि यही गोदावरी के किनारे ही बने बड़े बड़े बरामदों के ऊपर नगरपालिका द्वारा निर्मित भवन है , जिसमें पर्यटक अपना सामान जमा करके पूरा नासिक घूम सकते हैं और चलते समय कुछ शुल्क देकर सामान लेकर जाएँ. न सामान ढोने का चक्कर और न ही कुछ घंटों के लिए होटल का चक्कर क्योंकि स्टेशन नासिक रोड पर है जो कि यहाँ से बहुत दूर है.
               गोदावरी के गंदे पानी को छूने का मन नहीं कर रहा था , वही गोदावरी के किनारे ही एक चौमुखी सिंह की प्रतिमा थी जिसके चारों मुख से पानी निकल रहा था और वह पानी एकदम साफ था. लोग उसको गंगाजल की तरह से बोतल में भरकर ले जा रहे थे.
              संगम थल के पास ही एक भव्य मंदिर कपालेश्वर का मंदिर था. जिसके बारे में कहा गया है कि सम्पूर्ण भारत में यही एक मंदिर ऐसा है जहाँ पर शिवलिंग के साथ नंदी की प्रतिमा नहीं है. इस स्थान पर नंदी को गुरु मानकर स्थापित नहीं किया गया है . इस मंदिर के दर्शन से सम्पूर्ण बारह ज्योतिर्लिंगों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. काफी ऊंचाईपर बना यह मंदिर काफी बड़ा और सीढ़ियों के बीच बीच में  और भी मंदिर बने हुए हैं.
                  इसके अतिरिक्त यहाँ पर गोराराम, कालाराम के मंदिर भी हैं . जिनमें राम की काली और गोरी प्रतिमाएं हैं. काले पत्थर से बने ये विशाल मंदिर पुलिस के नियंत्रण में भी हैं. यहाँ पर कैमरा ले जाना निषिद्ध हैं . उन मंदिरों कि स्थापत्य काला देखते बनती है. ये कितने प्राचीन हैं .इसके बारे में उनके पत्थरों   और उनपर उत्कीर्ण कृतियों से ही लगाया जा सकता है.
                 इन मंदिरों के बाहर बने बरामदों में बुजुर्ग महिलायें रुई की  बत्तियां बना रही होती हैं और लेने वालों को पैसे देकर बेचती भी हैं. यहाँ न बुढापा एक समस्या  न वक्त काटना. कई महिलाओं के समूह आपस में बातें करते हुए काम कर रही होती हैं. जो आत्मनिर्भरता का एक साधन भी है .                     
                   नासिक में विशुद्ध  महाराष्ट्रीय  संस्कृति के दर्शन हुए. पुरुष सिर पर गाँधी टोपी लगाये हुए. पहले लगा कि ये सब राजनीति से प्रेरित हैं क्या? लेकिन नहीं ये वहाँ की संस्कृति है. औरतें  लांगदार  धोती पहने हुए मिलेंगी और पुरुष धोती कमीज और टोपी में नजर आयेंगे.

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

ये मौत के सौदागर!

            वह कथोक्ति है न कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है ईश्वर उनके लिए खाई खोद कर तैयार कर देता है. लेकिन  ये कहावतें त्रेता , द्वापर या सतयुग में चिरतार्थ होती होंगी. अब तो दूसरों को मौत बेचने वाले किसी जेल में नहीं बल्कि मखमली सेजों पर सोते हैं. उनपर हाथ डालने की हिम्मत किसी नहीं है.
                         कुछ दिन पहले पढ़ा कि CSIR के एक अधिकारी की मृत्यु  लौकी का रस पीने से हो गयी. ये आयुर्वेद चिकित्सा की औषधि है और इसमें गलत कुछ भी नहीं है. हाँ कुछ ऐसी मानसिकता वाले लोगों ने इसे दूषित करने की कसम खाई है.  जो प्रकृतिका चिकित्सा कि औषधियों को भी जहर बना रहे हैं.
                      कानपुर में गाँव से दूध वालों के डिब्बों  को पकड़ा गया तो सब डिब्बे  छोड़ कर भाग गए क्योंकि उस दूध में यूरिया और फार्मोलीन   मिला हुआ होता  है जो किसी विष से कम घातक नहीं है. ये भी मौत परोस रहे है. हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि हरी सब्जियों में विशेषरूप से लौकी, खीर, तरबूज, और खरबूजे में किसान ऑक्सीटोसिन  के injection लगाकर रातोंरात बड़ा करके  बाजार में लाकर बेच लेते हैं. ये oxytocin भी जहर ही है. हरी  और मुलायम सब्जियां सबको आकर्षित करती हैं और हम  सभी उस जहर को जज्ब करते रहते हैं और फिर एक दिन  -
*बहुत दिनों से पेट में दर्द की शिकायत थी , पता चला की कैंसर है.
*भूख नहीं लगाती थी, पेट भारी रहता था लीवर सिरोसिस निकला.
*इसी पीलिया, आँतों में सूजन और पता नहीं कितनी घातक बीमारियाँ एकदम प्रकट होती है. फिर
उनका अंजाम कुछ    भी होता है.
                          सिर्फ यही क्यों? सभी खाद्य पदार्थों में मिलावट एक आम बात हो चुकी है और उसको जहरीला बनाने वाले लोग हम में से ही तो होते हैं. सिर्फ धनवान बनने की चाहत में जहर बो रहे हैं और इन  चीजों से दूर रहने  वाला आम आदमी इस जहर को अपने शरीर में उतार रहा है और उसके दुष्परिणामों को भी झेल रहा है .
                       वे जो ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगा कर जानवरों से दूध निकाल  रहे हैं या सब्जियां उगा रहे हैं वे इस ख्याल में हैं कि  वे अपनी चीजों को प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन यह भूल जाते हैं कि सारी वस्तुएं वे ही नहीं बना सकते हैं और उनके भाई बन्धु उनके लिए भी जहर परोस रहे हैं  जिसको  वे निगल रहे हैं.  इस बात से अनजान  तो नहीं हो सकते हैं फिर क्यों मानवजाति के दुश्मन अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ये जहर  खा और खिला रहा है. वह क्या सोचते हैं कि  इस जहर से बच जायेंगे? क्या धनवान बनने से  वे दूसरों के खिलाये जा रहे जहर से ग्रसित होकर खून की उल्टियाँ नहीं करेंगे?
क्या वे  कैंसर से ग्रसित नहीं होंगे?
पक्षाघात या हृदयाघात का शिकार नहीं होंगे?
हमारे बच्चे क्या इसकी पीड़ा नहीं झेलेंगे?
                      अगर वे इस बात से इनकार कर रहे हैं या अनजान हैं तो कोई बात नहीं. लेकिन ऐसा कोई भी चोर नहीं होता कि अपने किये अपराध की सजा न जानता हो. जब तक नजर से बचा हैं तो सफेदपोश और जिस दिन ये भ्रम टूट गया तो इससे बच वे भी नहीं सकते .हाँ ये हो सकता है कि पैसे के बल पर वे इन रोगों से लड़ सकते हैं लेकिन उस पीड़ा को उनकी तिजोरियों में रखा हुआ धन नहीं झेलेगा और क्या पता वह भी मौत से हार जाये और आप खुद अपने ही हाथों मौत परोस कर खुद ही उसके शिकार हो जाएँ.
                    इस जहर से कोई नहीं बच सकता है. अगर हम नहीं बचेंगे तो ये मौत के सौदागर भी नहीं बचेंगे.

                   

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

मेरा सफरनामा (शनि शिंगुनापुर)

               त्रयम्बकेश्वर से चल कर हम अपनी नयी मंजिल की ओर बढे तो चले वापस नासिक रोड और वहाँ से टैक्सी  करके चल दिए अहमदनगर के सीमा में पड़ने वाले शनि देव के प्रसिद्द स्थल शिंगुनापुर के लिए.  जब  हम  होटल  से  चलने  वाले  थे  तो हमने एक टैक्सी की. वहाँ से करीब १६० किमी है. मेरी बेटी को रोड यात्रा बिल्कुल भी सूट नहीं करती. वह और उसके सहेली ( मेरी मानस पुत्री ) दोनों ही कहने लगी तो ये तो जा नहीं सकती. ५ किमी तक में इसकी हालात ख़राब हो जाती है. अपने इतनी लम्बी जर्नी के लिए कैसे सोच लिया?
                                  पतिदेव भी गुस्से में आ गए कोई नहीं जाएगा. सब होटल में ही रुको और वापस चलो.  मेरा बहुत मन था कि यहाँ तक आयी हूँ तो दर्शन कर ही लूं. पापा की गुस्सा से दोनों ही बेटियां चलने के लिए बेमन से तैयार हुईं. टैक्सी की गयी और जब मैं होटल की सीढियां उतर रही थी तो मैंने मन ही मन कामना की -ये मेरी आस्था की परीक्षा है, मेरी बेटी को मंदिर तक सकुशल ही ले जाना चाहती हूँ और आपकी कृपा भी चाहती हूँ. " . बहुत दूर था मंदिर और बाई रोड ही जाना था. नासिक से शिंगुनापुर  जाने वाले रास्ते में एक खास चीज यह भी देखी की थोड़ी - थोड़ी दूर पर टेंट लगा कर कुर्सियां डाल कर दुकाने सजी थीं और वहाँ पर कोल्हू में जुटा हुआ बैल शांत खड़ा था शायद ग्राहकों के आने की प्रतीक्षा कर रहा था की कब आयें और उसको गन्ने का रस निकालने के लिए आदेश मिले. अभी तक तो मैंने मशीनों से रस निकलते हुए ही देखा था. यह मेरा पहला अनुभव था कि दुकान में बैल को कोल्हू में जोत कर रह निकल रहे थे.

                          मंदिर के अन्दर शनि देव की शिला जो की पूजन के लिए स्थापित है.

मंदिर के अन्दर तस्वीरें लेने के लिए अनुमति नहीं थी. फिर भी सिर्फ एक तस्वीर किसी तरह से ली और फिर शेष मंदिर के परिसर में ली गयीं.

इस स्थान पर हम पहली बार गए थे बस सुना भर था कि इसका हिन्दू धर्म में बड़ा ही महात्म्य है. आज इस समय जब कि हम १६० किमी की यात्रा करके आये और मेरी बेटी कि हालात वैसे ही सामान्य थी जैसे कि ट्रेन से यात्रा करने में होती है. मेरी आस्था  और दृढ हो चुकी थी   क्योंकि सब कुछ अच्छा लग रहा  था. ऐसा होने की तो मेरी बेटी कल्पना ही नहीं कर सकती थी और इस समय वह भी उस अज्ञात शक्ति के लिए नतमस्तक थी.
शनिवार के दिन यहाँ पर बहुत अधिक भीड़ होती है. चारों तरफ कारों, टैक्सियों और बसों का ताँता लगा था.. यहाँ पर शनिदेव की शिला का पूजन सिर्फ पुरुष ही करते हैं और वह भी वहीं प्रसाद कि दुकानों से मिलने वाले नारंगी रंग के एक वस्त्र धोती में. जिसको पहन कर नहा कर गीले वस्त्र में ही पूजन करने जाते हैं. चारों तरफ पुरुष तो नारंगी रंग के वस्त्रों में थे ही साथ ही नन्हे बटुक भी उसी वेशभूषा में बहुत प्यारे लग रहे थे. स्त्रियाँ मंदिर  प्रांगन में ही दर्शन कर सकती हैं. शिला स्पर्श करने का विधान वहाँ नहीं था. अपार भीड़ के बाद भी वहाँ पर कोई धक्का मुक्की नहीं थी. मंदिर के परिसर में सरसों का तेल चढाने के कारण चारों तरफ फिसलन थी. और शिला वाले चबूतरे पर तो तेल का तालाब ही बना हुआ था.
बस अगर सबसे खलने वाली बात थी तो ये थी यहाँ पर प्रसाद की दुकानों पर बड़ी लूट मची हुई थी. - एक प्रसाद की डलिया जिसमें मुश्किल से ३० या ३५ रुपये का सामान होगा उसकी कीमत उन लोगों ने ३५१ रुपये वसूल की. जब कि मंदिर जाने से पहले २५१ बताया था और लौट कर आने पर जब पेमेंट किया तो १०० रुपये बढ़ा कर लिए और बोले कि नहीं  इतना ही होता है. इसके साथ ही टैक्सी वालों का कमीशन भी ये लोग देते हैं कि भक्तो को उनके यहाँ लाने पर इतना मिलेगा. खैर ये तो सभी तीर्थ स्थानों पर होता है लेकिन इस तरह से नहीं. जब कि ये मान्यता है और सिर्फ मान्यता ही  नहीं बल्कि सत्य भी है कि यहाँ पर घरों में या दुकानों में आज भी ताले नहीं डाले जाते हैं. घर खुले ही रहते हैं और यहाँ पर चोरी जैसे घटनाएँ घटित नहीं होती. इसके बाद हम उसी टैक्सी से वापस नासिक रोड होटल में लौट कर आये कुल ३२० किमी यात्रा करने के बाद भी सभी लोग खुश थे और खास तौर पर मैं कि मेरी बिटिया रानी बिल्कुल नॉर्मल थीं और आज मैंने अपनी आस्था और विश्वास को पूरी तरह से फलीभूत होते देखा था.  
                

बुधवार, 30 जून 2010

मेरा एक सफरनामा (त्रयम्बकेश्वर मंदिर) !

                                              ऐसी सफर और सैर मैंने परिवार और कुछ आत्मीय लोगों के साथ शायद पहली बार की और उसको पूरा पूरा एन्जॉय किया. बस दुःख इस बात का रहा कि मेरी छोटी बेटी अपने exam के कारण इसमें शामिल नहीं हो पायी. इसमें अलग अलग राज्यों के मौसम से परिचय भी हुआ और उसका सुखद अनुभव भी अविस्मरणीय रहा.
                                             वैसे तो मेरा पड़ाव पहले नासिक ही रहा लेकिन मैंने सबसे पहले त्रयम्बकेश्वर  से ही अपनी यात्रा आरम्भ करती हूँ. नासिक रोड स्टेशन से लगभग २८ किलोमीटर कि दूरी पर पहाड़ियों के बीच में स्थित है. यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता देखते ही बनती है.

इस स्थान का विहंगम दृश्य देख कर ही पता चलता है कि इसकी सुन्दरता तो  अद्भुत ही है, साथ ही इसके लिए हिन्दू धर्म में जो आस्था जुड़ी है उसने इसको और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है. भारत भूमि पर स्थित १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक यहाँ पर है. यहाँ पर दर्शन के लिए लाइन में लगे लोगों को देख कर ही वहाँ के लोग बता देते हैं कि अभी ४ घंटे की लाइन लगी है. यहाँ पर सिर्फ त्रयम्बकेश्वर का ही महत्व नहीं हैं बल्कि गोदावरी नदी और ब्रह्मगिरी पर्वत को भी उतना ही महत्वपूर्ण मना जाता है.
त्रयम्बकेश्वर मंदिर का निर्माण नासिक  के  समीप  त्रयम्बक नामक  स्थान पर  श्रीमंत बालाजी बाजीराव उर्फ नानासाहिब  पेशवा द्वारा १७५५ में आरम्भ किया गया था और १९८६  में इसका कार्य पूर्ण हुआ था. . उस समय इस मंदिर के निर्माण में १६ लाख मुद्रा और ३१ वर्ष का समय लगा था. 
इसमें जो ३ लिंग स्थापित है , वे ब्रह्मा (सृष्टि के सृजक), विष्णु ( सृष्टि के पालक ) और महेश (सृष्टि के संहारक) के प्रतीक माने जाते हैं. शेष ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ भगवान शिव के लिंग को ही देखा जा सकता है.  ये लिंग प्राकृतिक हैं और गंगा का पवित्र जल शिवलिंग के ऊपर बहता है. ये लिंग जल के नीचे ही रहते हैं. पुजारी यहाँ पर दिन में तीन बार पूजा करते हैं और इसके लिए उनको १००० रुपये का प्रतिदिन का अनुदान प्राप्त होता है. प्रदोष काल  में विशेष पूजा का प्रावधान है. 

इस मंदिर कि वास्तु काला और प्राचीन स्थापत्य काल को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पत्थरों पर की गयी उत्कीर्णन का कार्य कितना उत्कृष्ट और अनुपम होता था. सदियों से खड़ा ये मंदिर आज भी अपनी  कथा स्वयं कह रहा है . 

मंदिर  की स्थापत्य  काला  का  नमूना यहीं  देख  सकते  हैं .
  
त्रयम्बक में स्थित ये कुण्ड गोदावरी नदी के उद्गम से बना स्थल मान  जाता है. गोदावरी नदी का उद्गम ब्रहाम्गिरी पर्वत से ही माना जाता है और इसको गंगा की  तरह ही पवित्रतम नदी माना जाता है. रामायण युग में सीता के इस गोदावरी में स्नान के लिए विशेष प्रेम की कथाएं सुनने को मिलती हैं. 
इस बारे में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अगर देर रात्रि नासिक से त्रयम्बक पहुंचना हो तो वहाँ के रास्ते इतने सुनसान हैं कि किसी भी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है. चारों ओर पहाड़ियों के बीच होने के कारण वहाँ पर जन जीवन भी बहुत अधिक नहीं है. वहाँ पर पूजा और धार्मिक संस्कारों से जुड़े कार्यों के लिए विशेष महत्व का स्थान माना जाता है.