बुधवार, 29 सितंबर 2010

इतिहास की पुनरावृत्ति !

                        क्या हमें फिर से अतीत के इतिहास को दुहराने का जरूरत आ पड़ी है. इस विषय को नहीं छूना चाह रही थी लेकिन आज की इस घटना ने झकझोर दिया. अब इंसां की वहाशियत ने हदें पर कर दीं हैं और वह भी आँखों के सामने जब देखा तो रोना आ गया उस माँ के रोने पर जिसने बेटी को स्कूल ही तो भेजा था पढ़ने के लिए और लौट कर तो उसे बेटी की लाश ही मिली और वह भी दरिंदों की नोची हुई अपनी बेटी की लाश.
                       कानपुर नगर - अब अखबारों में इस काम के लिए बहुत चर्चित हो रहा है. कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी डॉ. के नर्सिंग होम के आई सी यूं में भर्ती एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नीद सुला दिया गया क्योंकि एक दिन पहले ही उसने अपने माँ बाप से कहा था कि मुझे यहाँ से निकाल ले चलो नहीं तो मैं नहीं बचूंगी और नर्सिंग होम वालों ने छुट्टी नहीं दी. दूसरे ही दिन उन्हें बेटी के लाश मिल गयी.
                      पुलिस बलात्कार के जरूरी साक्ष्य भी नहीं जुटा पाई , पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट से पुष्टि के बाद साक्ष्य कहाँ से लाये? यद्यपि संचालिका अभी जेल में हैं लेकिन उन पर लगी धाराएँ पुलिस बदल कर हल्की कर रही है क्योंकि मालदार पार्टी है और बेटी किसी गरीब की.
                       कल स्कूल गयी १० वर्षीया दिव्या को लहूलुहान हालत में स्कूल कर्मियों द्वारा घर छोड़ा गया और जब माँ उसे अस्पताल ले गयी तो डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया. उस बच्ची के साथ जो व्यवहार किया गया है उसने अब तक के सारे वहशीपन के रिकार्ड तोड़ दिए थे. डॉक्टर खुद हतप्रभ थे कि इस नन्ही सी बच्ची के साथ क्या हुआ है?  डाक्टरी रिपोर्ट के अनुसार जो समय तय है उस समय बच्ची स्कूल में थी.
                       ये समाज क्या चाहता है , पहले तो इन मासूमों को होने से पहले ही ख़त्म करने की साजिश रची जाती है और अगर वह दुनियाँ में आ भी गयी तो दोयम दर्जे के व्यवहार का शिकार हो जाती है. अब तो उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं  बचा क्या फिर से बाल विवाह की प्रथा शुरू कर दी जाय या फिर उनकी शिक्षा को बंद कर दिया जाय. कोई भी माता पिता अपने बेटी के साथ साए की तरह से नहीं रह सकता है. उसको घर की देहलीज तो लांघ कर बाहर निकलना ही पड़ेगा.
                       पहले यही होता था न, कि किसी की सुन्दर बेटी पर अगर बूढ़े जमींदार की नजर भी पड़ गयी या सुल्तान की नजर पड़ गयी तो उसकी जिन्दगी उसकी नजर हो जाती थी. इसी लिए तो बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था या फिर जल्दी शादी करके उसको ससुराल वाली बना दिया जाता है और तब भी वह कम उम्र में ही माँ बनने के अभिशाप से ग्रसित होकर मृत्यु के मुँह में चली जाती थी. नसीब उसका मृत्यु  ही होती थी. या फिर बाल विधवा बनकर लोगों की इस गलत नजर का शिकार होकर अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष करती फिरती थी.
                         अब हमारे पास क्या रास्ता है? क्या करें हम? बेटियों को सिर्फ सीने से लगा कर रखे और विदा कर दें. अगर उनको घर से बाहर निकालेंगे तो फिर किसी वहशी की नजर न पड़ जाए. किसका विश्वास करें-- डॉक्टर, पड़ोसी, रिश्तेदार, स्कूल, रिक्शेवाला, बसवाला और फिर शिक्षक ? अगर किसी का नहीं तो फिर ये कौन सा जीवन जीने की हक़दार हैं?  इस बात को मैंने अपने एक लेख में पहले भी जिक्र किया था कि अब लड़कियों को खुद में इतना सक्षम बनाना होगा कि वे अपनी सुरक्षा खुद कर सकें. उनको मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग आरम्भ से देने की जरूरत अब आ पड़ी है. इसको स्कूल के स्तर पर ही अनिवार्य करना होगा. कम से कम वे संघर्ष कर अपना बचाव तो कर सकें. ये वहशी दरिन्दे कुछ भी नहीं सिर्फ मानसिक बीमारी से ग्रसित होते हैं. ये मनोविज्ञान की भाषा में सेडिस्ट होते हैं. दूसरे को कष्ट देने में इनको सुख मिलता है और इस बीमारी से ग्रसित लोग खुद बहुत मजबूत नहीं होते हैं. अब हर स्तर पर ये लड़ाई लड़ने की जरूरत है. बच्चियों को पूरी सुरक्षा मिले और उससे आप घर में भी स्कूल के माहौल के बारे में जानकारी लेती रहें. क्योंकि इस तरह के लोग किसी न किसी तरीके से बच्चियों पर पहले से ही नजर रखते हैं और मौका पा कर ऐसा कृत्य कर बैठते हैं.
                   घर में अच्छे संस्कार सिर्फ लड़कियों को ही देने की जरूरत नहीं होती है बल्कि अपने लड़कों को भी अच्छे संस्कार दें ताकि वे सोहबत में भी ऐसे घिनौने कामों में लिप्त न पाए जाएँ. अपने घरों से शुरू करेंगे तो बहुत से घर इस स्वस्थ माहौल को बनाने में सक्षम होंगे. हम अपने स्तर पर प्रयास कर सकते हैं और फिर पूरे समाज को सुधारना तो सबके वश में ही है क्योंकि ये वहशी भी किसी माँ बाप के बेटे होते हैं और पता नहीं उनको कम से कम कोई माता पिता तो ऐसी शिक्षा नहीं दे सकता है हाँ उनकी सोहबत ही उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है.

16 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ कर इतना मन दुखी हो गया कि क्या कहूँ....यहाँ मुंबई में भी....एक पिकनिक पर गयी लड़की गायब हो गयी और उसका शव मिला दूसरे दिन...पुलिस कहती है एक्सीडेंट है....क्या कहा जाए..मन क्षोभ से भर जाता है...कितनी विकृत मानसिकता वाले लोग हैं यहाँ...कड़ी सजा भी तो नहीं मिलती कि दूसरों की आँख खुले...
    बेहद बेहद शर्मनाक

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  2. कैसे बदलाव आये………………इतने घिनौने कृत्य के बाद भी समाज कुछ नही कर पाता……………बस संस्कार की फ़सल ही उगानी होगी बच्चों मे तभी शायद बदलाव आ सके।

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  3. रेखा जी हमारे समाज में पर्दा प्रथा ,लड़कियों के लिए अशिक्षा,या बाल विवाह जैसी प्रथाएं इसी दरिंदगी और बहशीपन से निजात पाने के लिए शायद बनी थीं ....और आज तब, जब औरत फिर अपना अस्तितिव पाने के लिए लड़ रही है वही बहशीपन उसकी राह में आ जाता है ....
    रौंगटे खड़े हो जाते हैं ये सब पढ़ सुन कर जाने कब अंत होगा इस दरिंदगी का.

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  4. सारे कुंवे में भंग है समाज की इस दशा के लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाये नरपिशाचों को या उनके रक्षकों को - पुलिस का आचरण देख कर तो लगता नहीं कि कुछ होगा लड़कियों को सक्षम होना सिखाना पालकों की बड़ी जिम्मेदारी है

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  5. विकृत मानसिक रुग्णता और समाज की निकृष्ट ठेकेदारों का वीभत्स उदहारण , मैंने भी सुबह जब ये समाचार देखा तो स्तब्ध रह गया.काश हमारा कानून इतना समर्थ होता की हम ऐसे दुराचारियो को सरेआम सजा दे पते .

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  6. ओह ...कितना वीभत्स ...रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना का ज़िक्र ....कुछ कहा ही नहीं जा रहा ..

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  7. क्या कहें..मानवता रसातल में पहुँच गई है.

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  8. अब समाज के वर्तमान स्वरूप के लिए ही तो कुछ सोचना होगा कि क्या होना चाहिए ? क्या हम इस अनैतिकता के आगे सिर झुका कर स्वीकार कर लें. अगर नहीं तो फिर कुछ तो सोचना होगा क्या विकल्प हो सकता है इसका ? सब सुझाव दें तो शायद कोई सकारात्मक दिशा प्राप्त हो जाए .

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  9. काश सरकार इन नराधमों को ऐसी सजा देने का प्रावधान करे जिसमें उनकी सात पुश्तें भी अपराध के नाम से ही काँप उठें ! बेहतरीन लेख के लिए शुभकामनायें !

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  10. रेखा जी। स्तब्ध हूं। आंसू ही साथ हैं, शब्द नहीं।

    महाकाव्‍य‍ लिख डालो इतना पतन दिखाई देता है
    जनता की आशाओं पर इक कफन दिखाई देता है।
    उजड़ा उजड़ा सच कहता हूँ चमन दिखाई देता है ।

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  11. मै shikha varshney की बात से सहमत हुं, आगे मेरी राय मै अगर ऎसे केस आये तो अपराधी को मार मार कर इतना मारा जये की देखने वालो के भी रोंगटे खडे हो जाये, ओर उस का हाल देख कर आईंदा कोई ऎसा घिनोन्ना कर्म करने से पहले हजार बार सोचे,ओर फ़िर उस के हाथ पेर तोड कर सडक पर फ़ेंक दिया जाये, क्योकि दरिंदो को इंसानो मे रहने लायक बनाने का यही एक् तरीका है.

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  12. Rekha di............bharat ek arab (million) se badi jansakhya wala desh hai.......aur inme agar 1% bhi aise kamine logo ko mane to bhi unki sankhya bahut jayda deekhti hai.......isliye ye to sambhav nahi hai ki aisee dukh bhari durghantnayen na ho......lekin ye bura lagta hai , jab aam logo ki samvedna bhi marr jati hai..!!

    kash aisa na hota........lekin aisa sirf socha hi ja sakta hai!!

    ek achchhi post!!

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  13. मुकेश,

    ये कहना कि ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है, गलत है. अगर समाज को इन दरिंदों को दंड देने का हक़ होता तो ये काम न होते. ये कानून के ठेकेडार - कल तक उस स्कूल का मैनेजर पुलिस के सामने घूम रहा था और तथाकथित सांसद पुलिस पर दबाव बना रहे थेकि उनको छुआ न जाय . जब स्थिति बेकाबू हो गयी तो उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा.
    अगर पुलिस और कानून न्यायपूर्वक अपना काम करें तो इन अपराधियों के लिए ऐसे ही दंड निर्धारित हो जैसे इन लोगों ने किया है तो देख कर हमारी आत्मा थर्रा जाएगी. अपराध हर युग में होते थे और रहे हैं लेकिन अब जब सीमायें टूटने लगीं हैं तो या तो न्याय का अधिकार जिसका अपराधी हो उसके हाथ में रहे या फिर न्याय उस स्तर पर और शीघ्र दिया जाय.

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  14. आपका कहना सही है .... बल्कि मैं कहूँगा .. संस्कारों की ज़रूरत लड़कों को ज़्यादा है ... वो ज़्यादा एगरेसिवे होते हैं ... सार्थक प्रश्न खड़े करती है आपकी पोस्ट ....

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