बुधवार, 8 सितंबर 2010

अधिनियम निर्माण और अनुप्रयोग !

                उत्तर प्रदेश सरकार 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण अधिनियम २००७ ' को लागू करने जा रही है. इसके लिए प्रत्येक जिले में ट्रिब्यूनल और अपीलिएत ट्रिब्यूनल गठित किया जाएगा.
                  इसके लागू होने पर पीड़ित व्यक्ति को ट्रिब्यूनल में  एक आवेदन पत्र देना होगा और ट्रिब्यूनल उनके बेटे बेटियों , नाती , पोतों का पक्ष सुनकर भरण पोषण का आदेश देगा और आदेश पालन न करने पर उन्हें एक माह की जेल व  जुरमाना देना पड़ेगा.
               इतिश्री अधिनियम कथा.
                   व्यक्ति को सामाजिक  व्याधियों और उत्पीड़न व अन्याय से बचाने के लिए ही क़ानून और दंड का प्रावधान किया गया था. ये कानून और दंड का मानव जाति के स्वभाव के अनुसार सदियों पुरानी व्यवस्था है. कालांतर में जब अपराध और उत्पीड़न का स्वरूप बदलने लगा और आचरण की दिशाएं बदल गयीं जिससे नए प्रकार कि घटनाएँ देखने को मिलने लगीं. क़ानून व्यवस्था इस ओर से जागरुक हुई और उनके मद्देनजर नए अधिनियम बनाने लगे. हमने अधिनियम बनाये और उनके विपरीत आचरण अपराध कहलाया गया. सरकार सिर्फ अधिनियम बनाएगी , उनको घर घर जाकर लागू  नहीं करेगी. अगर बहुत आगे बढे तो एक अपराध की एक ही सजा होगी. फिर वे मुक्त वैधानिक और नैतिक दोनों दायित्वों से. जुरमाना देकर और सजा भुगत कर वैधानिकता से , समाज की दृष्टि में अपमानित और तिरस्कृत होकर नैतिकता से भी.
                   अगर वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल में जाते हैं तो क्या इसके बाद उनके बहू और बेटे या नाती और पोते उनके प्रति उत्तरदायी रहेंगे. वे उनको घर में रखेंगे - नहीं , तब हमारी सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प होना चाहिए कि ऐसे लोगों को वह शरण देगी. यदि परिजन खर्च देने को तैयार है रखने को नहीं तो सरकार के पास क्या व्यवस्था है? क्या कोई दूसरा विकल्प है? अगर नहीं तो वे बुजुर्ग इसके बाद क्या करेंगे? कहाँ जायेंगे? मुझे संदेह है कि इससे पहले बुजुर्ग घर में जो भरण पोषण या आश्रय पाते रहे थे इसके बाद भी वे पा सकेंगे. पैसा हर मर्ज की दवा नहीं होती है.
                 अगर सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन हो रहा है तो क्या हम पश्चिम की नक़ल हर बात में कर रहे हैं सरकार उसके लिए खुद कुछ करें. इसमें संतान पक्ष ही दोषी हो ऐसा नहीं है? कितने बुजुर्ग ऐसे होते हैं जो अपने कार्यकाल में जिस शान से जिए हैं खाया पिया है उसी शान से रहना चाहते हैं और ये भूल जाते हैं कि उनके बच्चे जब पढ़ रहे थे तब कितना खर्च था और आज के बच्चे पढ़ रहे हैं तो कितना खर्च है? उनके बेटे घर के बजट को सही ढंग से चलाने ने के लिए बराबरी से मेहनत कर रहे हैं और तब भी वो नहीं खा और खिला सकते हैं जिसे उनने अपने जीवन में सामान्य समझ कर ग्रहण किया था. उनकी पत्नी घर में रहती थी और उनकी फरमाइश के अनुसार उनको बनाकर खिला सकती थीं और खिलाया भी. लेकिन वह बहू जो सुबह पूरा खाना बनाकर काम पर जाती है और शाम ६ बजे लौट कर आप उससे कहें कि चाय के साथ भजिये भी होने चाहिए और न करने पर अपशब्द या दूसरे के सामने अपमानित करें तब दोष किसे देंगे?
                यहाँ पर दोनों ही दोषी हो सकते हैं, कहीं बहू सुबह तैयार होकर ऑफिस चली गयी और दिन का खाना घर में मौजूद महिला बना रही है. शाम को उनके लौटने पर उन्हें चाय और नाश्ता भी तैयार मिलना चाहिए नहीं तो पतिदेव के कान भर कर नया नाटक तैयार होता है. उनके बच्चे स्कूल से आते हैं तो घर में दादी माँ और बाबा जी देखते हैं.
              इसके लिए एकतरफा निर्णय नहीं होता है. इसके लिए क़ानून के साथ साथ अस्थायी शरण स्थल भी बनाने चाहिए. अगर हम इसके बारे में मनोवैज्ञानिक , समाजसेवियों और काउंसलर के साथ विचार विमर्श करें तो पायेंगे कि इस स्थिति को सुधार  जा सकता है बगैर सजा के प्राविधान के - बस अस्थायी शरण स्थल हों. शिकायत के बाद बुजुर्गों जहाँ शरण मिल सके. अधिकतर तो ये होगा कि अपने घर में रहकर जिसे वे अपनी उपेक्षा समझते हैं या जो अपेक्षाएं करते हैं वो जब यहाँ पूरी नहीं होंगी तो उन्हें अपने घर से तुलना करना पड़ेगा और तब घर और अपने बच्चों के व्यवहार की कीमत पता चलेगी.
                           इसका दूसरा पक्ष जो बहूरानी सुबह सब कुछ सास या अन्य महिला या पुरुषों पर छोड़ कर चल देती हैं , जब उस घर के बुजुर्ग घर से हट जायेंगे और उन्हें सुबह से काम पर जाने तक सब कुछ तैयार करना होगा, घर में ताला डालना होगा और स्कूल से बच्चों को लौटकर ठन्डे खाने और खुद लेकर खाने कि जहमत उठानी पड़ेगी या फिर काम से लौट कर खुद ताला खोल कर अपने हाथ से चाय और नाश्ता बनाकर लेना पड़ेगा तो वे बुजुर्ग बहुत याद आयेंगे और तब अपनी गलती और उनके त्याग की कीमत पता चलेगी.
                        ये अस्थायी अलगाव उनके भ्रम को तोड़ने के लिए काफी हो सकता है और जो समस्या जेल और हर्जाने के द्वारा हमेशा के लिए घर के दरवाजे बंद करने का काम करेगा लेकिन इस विकल्प से वापस प्रेम और सौहार्दता का वातावरण स्थापित कर सकता है. 
                          मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि कुछ प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जहाँ वाकई उत्पीड़न और उपेक्षा की हदें पर हो जाती हैं ऐसे स्थानों पर स्थायी शरण स्थलों की व्यवस्था पहले हो जानी चाहिए ताकि वे घर से बेघर किये गए बुजुर्ग किसी दूसरे के दरवाजे के  मुहताज न हो जाएँ. उनके मिलने वाले खर्चे और बाकी सरकारी सहायता से इन शरण स्थलों कि व्यवस्था होनी चाहिए. ऐसे शरण स्थलों में यही बुजुर्ग एक दूसरे के सहारे और दुःख सुख के साथी बन जाते हैं. 
                       इस तरह से इस अधिनियम को लागू करने के पहले उसके अन्य व्यवस्थाओं को बना लेना चाहिए ताकि उचित परिणाम प्राप्त कर सकें और समस्या का समाधान भी.

10 टिप्‍पणियां:

  1. इस तरह से इस अधिनियम को लागू करने के पहले उसके अन्य व्यवस्थाओं को बना लेना चाहिए ताकि उचित परिणाम प्राप्त कर सकें और समस्या का समाधान भी

    -सहमत हूँ आपसे.

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  2. अधिनियम तो बन जाते हैं पर लागू कितने होते हैं..? आपसे सहमत.

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  3. ऎसे कानुन बनाने से कोई लाभ नही सब से पहले तो मां बाप ही अपने बच्चो के खिलाफ़ कोई रिपोर्ट नही लिखवायेगे, मेरी मां के संग कुछ ऎसे ही हालात थे, जब भी मैने उन से पुछा कि केसे है, तो उन का एक ही जबाब था बहुत खुश हुं, जब्कि वो बहुत दुखी थी, ओर अगर मुझे बताती तो, मै भी भाई को घर से पहले निकाल देता फ़िर कोई दुसरा ऊपाय सोचता, लेकिन मां तो मां है खुद दुख सह लेगी, बच्चो को दुखी नही देख सकती, फ़िर अगर किसी मां बाप ने रिपोर्ट कर भी दी तो क्या यह सरकार उन बुढे मां बाप को खुद समभाल सकेगी, उन के खाने पीने ओर रहने का इंतजाम कर सकेगी? अगर कुछ करना ही है तो बच्चो को अच्छी अच्छी बाते पढाई जाये स्कुल मै,
    आप के लेख से सहमत है . धन्यवाद

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  4. सही लिखा है ..नीयम बना देते हैं पर आगे होता क्या है यह समझना मुश्किल होता है ...

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  5. आज दिनांक 11 सितम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट घर का कानून शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

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