रविवार, 9 दिसंबर 2012

विश्व मानवाधिकार दिवस !

                         
 
चित्र गूगल के साभार
              आज 10  दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में जाना जाता है . इस दिवस की नींव विश्वयुद्ध की विभीषिका से झुलस रहे लोगों के दर्द को समझ कर और उसको महसूस कर संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार  घोषणापत्र अधिकारिक मान्यता प्रदान की। तब से यह दिन इसी नाम से यद् किया जाने लगा। 
                   अगर हम आज ही पेपर उठा कर देखे तो पता चलेगा की कितने मानवाधिकारों का हनन मानव के द्वारा ही किया जा रहा है। मानव के द्वारा मानव के दर्द को पहचानने और महसूस करने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं होती है . अगर हमारे मन में मानवता है ही नहीं तो फिर हम साल में पचासों दिन ये मानवाधिकार का झंडा उठा कर घूमते रहें कुछ भी नहीं किया जा सकता है। ये तो वो जज्बा है जो हर इंसान के दिल में हमेशा ही बना रहता है बशर्ते की वह इंसान संवेदनशील हो। क्या हमारी संवेदनाएं मर चुकी है अगर नहीं तो फिर चलें हम अपने से ही तुलना शुरू करते हैं कि  हम मानवाधिकार को कितना मानते हैं?  क्या हम अपने साथ और अपने घर में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं ? 

                                   जब हम खुद ही अपने अधिकारों से वाकिफ नहीं हैं तो फिर मानवाधिकार का प्रयोग कैसे जान सकते हैं? जब हम अपने अधिकारों से परिचित होते हैं तभी तो उनको हासिल करने के लिए प्रयास कर सकते हैं . जब हमने अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए संकल्प लिया तो वह  दूर नहीं होता कि साथ  हम अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। जब एक आवाज अपने हक को पाने की लिए उठती है और उस आवाज में बुलंदी होती है तो लोग खुद ब खुद उस आवाज का साथ  देने  लगते हैं। इसके लिए अब अकेले लड़ने की जरूरत भी नहीं है बल्कि विश्व स्तर पर ही नहीं बल्कि हर देश और राज्य में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आयोग बने हुए हैं। अब देखना यह है की इन आयोगों को किस आधार पर मानव को न्याय पाने के लिए सहायता करनी होती है। 
               मानवाधिकारों का औचित्य और स्वरूप 
           मानव के जन्म लेने के साथ ही उसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ अधिकार उसको स्वतः मिल जाते हैं और वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इस दुनियाँ में प्रत्येक मनुष्य के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिकार एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त हो जाता है। चाहे वह अपने हक के लिए बोलना भी  जानता हो या नहीं . एक नवजात शिशु को दूध पाने का  अधिकार होता है और तब वह बोलना भी  नहीं जानता  लेकिन माँ उसको स्वयं देती है और अगर नहीं देती है तो उसके घरवाले , डॉक्टर सभी उसको इसके लिए कहते हैं क्योंकि  ये उस बच्चे का हक है और ये उसे मिलना ही चाहिए। एक बच्चे के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ये  जरूरत  सबसे अहम् होती है। लेकिन उसके बड़े होने के साथ साथ उसके अधिकार भी बढ़ने लगते हैं . बच्चा पढ़ने लिखने अपनी परवरिश के लिए उसको समुचित सुविधाएँ और वातावरण भी मिलना भी उनके जरूरी अधिकारों में आता है। उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए , अपने विकास के लिए और आगे बढ़ने के लिए कुछ हालत ऐसे चाहिए  जिससे की उनके रास्ते  में कोई व्यवधान न आये . पूरे विश्व में इस बात को अनुभव किया गया है और इसी लिए मानवीय मूल्यों की अवहेलना होने पर वे सक्रिय  हो जाते  हैं।   इसके लिए हमारे संविधान में भी उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,17,19,20,21,23,24,39,43,45 देश में मानवाधिकारों की रक्ष करने के सुनिश्चित हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इस दिशा में आयोग के अतिरिक्त कई एनजीओ भी काम कर रहे हैं और साथ ही कुछ समाजसेवी लोग भी इस दिशा में अकेले ही अपनी मुहिम चला रहे हैं। 
                        सामान्य रूप से मानवाधिकारों को देखा जाय तो मानव जीवन में भोजन पाने का अधिकार , शिक्षा का अधिकार , बाल शोषण , उत्पीडन पर अंकुश , महिलाओं के लिए घरेलु हिंसा से सुरक्षा, उसके शारीरिक शोषण पर अंकुश , प्रवास का अधिकार , धार्मिक हिंसा से रक्षा आदि को लेकर बहुत सरे कानून बनाये गए हैं . जिन्हें मानवाधिकार की श्रेणी में रखा गया है . 

                                               मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाये गए और उनको लागू करना या करवाने के लिए प्रयास भी हो रहे हैं लेकिन वह सिर्फ  कागजी दस्तावेज  बन कर रह गए हैं। समाज में होने वाले इसके उल्लंघन के प्रति अगर मानव ही जागरूक नहीं है तो फिर इनका औचित्य क्या है? हम अपने घरों में काम करवाने के लिए छोटे छोटे बच्चों बच्चों को रखना पसंद करते हैं क्योंकि उनकी जरूरतें कम होती हैं , वे गरीब परिवार से होते हैं इसलिए उन्हें कुछ भी कहा जाय या दिया जाय वे आपत्ति करने की स्थिति में नहीं होते हैं। छोटी छोटी बच्चियां घरों में भारी भरकम काम करती   मिल जायेंगी। सिर्फ घर में ही नहीं बल्कि कारखानों में काम करने के लिए महिलायें 10 से 12 घंटे काम करती हुई मिल जायेंगी। भवन निर्माण में लगी महिलायें अपने छोटे छोटे बच्चों को कहीं जमीन पर लिटा कर काम करती हुई मिल जायेंगी और उन्हें अपने बच्चे को दूध पिलाने की भी छुट्टी नहीं दी जाती है। पैसा उन्हें पुरुषों की अपेक्षा कम मिलते हैं। इस दिशा में कहाँ हैं मानवाधिकार? 
                         छोटे छोटे बच्चे कारखानों में काम करते मिल जायेंगे , वे बच्चे जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा है। गरीब है तो घर में पैसे लाने के लिए घर वालों के द्वारा काम पर भेज दिए जाते हैं। सड़क पर नशे की चीजों को बेचते हुए बच्चे किस दृष्टि से मानवाधिकार के उल्लंघन का प्रतीक नहीं है।
                     घर में महिलाओं के साथ हो रहे घरेलु हिंसा की घटनाएँ  क्या हैं?  हम दंभ भरते हैं कि  नारी सशक्तिकरण हो रहा है, महिलायों की स्थिति सुधर चुकी है , वे आत्मनिर्भर हो अपने स्थान को सुरक्षित कर रही हैं लेकिन सच इसके विपरीत है  सिर्फ कुछ प्रतिशत महिलायें हैं जो आत्मनिर्भर हो कर अपने बारे में सोचने और करने के लिए स्वतन्त्र है, नहीं तो उनकी कमाई  भी घर के नाम पर उनसे ले ली जाती है और उनको मिलता है सिर्फ अपने खर्च भर का पैसा।
                     महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण के प्रति क़ानून बने है लेकिन फिर भी इसकी घटनाओं में कोई भी कमी नहीं आ रही है . उन्हें सुरक्षित रहने और इज्जत से जीने का अधिकार तो मानवाधिकार दिलाता ही है लेकिन उन्हें मिलता कब है? जिन्हें उन सबकी डोर थमाई गयी है वे ही कभी कभी उसका हनन करते हुए पाए जाते हैं।
                                        
           आज भी बचपन भूख से बिलखता हुआ और शिक्षा से बहुत दूर जी रहा है . प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन वे अभी तक अपर्याप्त हैं। उनका लागू होने में बहुत देर है अभी। अभी देश का बचपन अपने लिए जमीन तलाश कर रहा है . उनके अधिकारों का हनन हम कर रहे हैं। 
                    बड़े बड़े समाजसेवी लोगों के घर में महिलाओं के शोषण , बाल शोषण  की घटनाएँ हुआ करती हैं . वे सफेदपोश लोग ही मानवाधिकारों का हनन कर रहे होते हैं। हम उन्हें उसके रक्षक समझ रहे होते हैं लेकिन वे न्याय नहीं कर रहे होते हैं। उनके खिलाफ बोलने का साहस भी लोग नहीं कर पते हैं।
                हम और दिनों की तरह से इस दिन को भी एक रस्म समझ कर निभा लेते हैं लेकिन खुद को नहीं बदल पते हैं।  किसी के प्रति न्याय करने के लिए पहल भी अगर कर सकें तो एक एक कदम कुछ तो सुधर ला सकता है। बस हमेशा के तरह से ये संकल्प तो ले ही सकते हैं कम से कम हम तो इन मानवाधिकारों का हनन करने की कोशिश नहीं करेंगे 

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

दफन होने का अधिकार !

                      हमारे देश के संविधान में सभी को कुछ मौलिक अधिकार मिले हैं, जिनमें जीवन में होने वाली सभी जरूरतों को शामिल किया गया है। कमोबेश सभी किसी न किसी तरह से जी भी रहे हैं . घर नहीं तो सीमेंट के बड़े बड़े पाइप में घर बसा कर बरसात और सर्दी से बचने के लिए जी रहे हैं। मलिन बस्तियों में बांस और पालीथीन के सहारे टेंट की तरह बनाये घरों में अपने परिवार के साथ जीवन गुजार  रहे हैं। लेकिन वे जी रहे हैं चाहे एक छोटे से कमरे में 20 लोग जी रहे हों। जी रहे हैं घर में जगह नहीं है तो पार्क में , फुटपाथ पर , पेड़ों के नीचे रात गुजार ही लेते हैं और दिन में तो कोई मुकम्मल जगह की जरूरत ही नहीं है . इंसान कहीं भी काम पर जाकर या अपने लिए रोजगार खोजने या करने के लिए कहीं न कहीं तो चला ही जाता है।  जीने के लिए समस्या नहीं है - हम जिस समस्या की बात करने जा रहे हैं वह मेरी दृष्टि में तो आज तक नहीं गुजरी है क्योंकि मरने के बाद भी इंसान को दो गज जमीन की जरूरत को हम सदियों से स्वीकार करते चले आ रहे हैं। जिन्दगी में उसे रहने की अपनी जमीन न मिले लेकिन मरने पर तो उसके लिए वे लोग उसे जमीन मुहैय्या कराते  हैं वह भी तब जब कि  वह उसकी मांग नहीं कर रहा होता है,  लेकिन ये हमारा नैतिक दायित्व होता है कि  उस दिवंगत को दफन होने की जगह दी जाये 
                      अगर हम ये कहें कि  अब हमारे देश में ही बल्कि देश ही क्यों कहें ? उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के गृह जनपद में ऐसे जगह है जहाँ पर लोगों को दफन होने की जगह नहीं है। ये जगह है इटावा  जिले में चकरनगर के तकिया मोहल्ला . जहाँ पर दो परिवारों के रहने से शुरुआत हुई थी और धीरे धीरे आबादी बढती गयी और अब उन्हें अपने परिवार वालों को दफनाने के लिए जगह नहीं मिल रही है . हकीकत ये है कि  यहाँ पर हर घर में एक कब्र बनी हुई है। और कब्र के होने पर उसके साथ कुछ धार्मिक आस्थाएं भी जुडी होती हैं . उसको कोई लांघें नहीं और उसके  कुछ बनाया भी नहीं जाना चाहिए . यहाँ पर लोग घर के कमरों में , गुसलखाने में , दरवाजे के पास हर जगह कब्र बनाये हुए हैं . कब्र के बगल में बैठ कर खाना बना रहे होते हैं , सो रहे होते हैं। बच्चों की कब्र दरवाजे के पास बना देते हैं क्योंकि बच्चों के लिए जगह कम  लगती है। यहाँ घर वालों को घर में ही दफन करने के लिए मजबूर लोग कहाँ जाएँ? और कैसे जियें ? 
                      क्या सरकार मीलों लम्बे जंगल में से कुछ जगह भी इन दिवंगत लोगों के दफन होने के लिए देने की व्यवस्था नहीं कर सकती है ?  बड़े बड़े स्टेडियम, पार्क और गाँव को राजधानी बना देने वाले शासक अपने ही जनपद में लोगों के दफन होने के अधिकार को बहाल  नहीं कर  सकते हैं। अभी धरती इतनी छोटी नहीं है कि मरने के बाद इंसान के लिए दफन होने की जगह भी न मिल सके वे भी इंसान ही है  अपने ही घर में दफन करके उनके साथ ही जीने के लिए लोग मजबूर हैं। बड़ी बड़ी बातें और बड़े बड़े वादे  करने वाले ये सरकार के नुमाइंदे आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को समझने के लिए तैयार ही कहाँ है? यहाँ पर कोई एकडों जमीन पर बने बंगले  को सिर्फ अपने परिवार के रहने के लिए छोटा बता कर बड़े की मांग कर रहा है और कहीं वे अपने घर के सदस्य को मरने के बाद भी कहीं दो गज जमीन मुहैय्या नहीं करवा पा  रहे हैं।
                  हम लोकतंत्र में जी रहे हैं लेकिन जीने के अधिकार को खोने के बाद अब मरने के बाद दफन होने का हक भी खो रहे हैं।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ये कैसे सुधारगृह ?

एक संरक्षा गृह (चित्र गूगल के साभार )
                  


                      करीब करीब हर शहर में नारी सुधार  गृह , नारी निकेतन , बालिका गृह या अनाथालय जैसे संस्था सरकारी और अर्ध सरकारी स्तर के संस्थान मिल जायेंगे . जिनमें कभी कभी न्यायलय द्वारा विशेष स्थितियों में फँसी हुई लड़कियों और महिलाओं को रखने का आदेश दिया जाता है . कुछ घर से भागी हुई , अनाथ , पहली बार अपराध में लिप्त पाई जानेवाली नाबालिग लड़कियाँ या फिर परित्यक्ता लड़कियाँ जिन्हें किसी भी परिवार में शरण नहीं मिलती है उनको इन संस्थाओं में रखा जाता है। 
                  संस्थाओं को सम्बद्ध मंत्रालय द्वारा पूर्ण सहायता प्राप्त होती है। राज्य सरकार के द्वारा भी अनुदानित राशि मिलती है। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस तरह के गृह खोल कर संरक्षण प्रदान करती हैं . वहां पर भी  सरकार के द्वारा अनुदान प्राप्त होता है . इन  संरक्षा गृहों में  क्या होता है कि  वहां से मौका मिलने पर लड़कियाँ भाग जाती हैं या फिर भागने के प्रयास में पकड़ी जाती हैं। उन्हें पकड़ लिया जाता है और फिर पुलिस और वहां का स्टाफ मामले पर लीपापोती करके मामले को दबा देती हैं लेकिन किसी एक ही संस्था में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति किस और संकेत करती  है ? क्या इन संरक्षा गृहों में ये अनियमितताएं पायीं जाती हैं --
*क्या  सरक्षा गृह सिर्फ एक कैद बना कर छोड़ दिए जाते हैं , जिनके अन्दर ही उन्हें किसी भी हाल में रहने के लिए मजबूर किया जाता है ?
* क्या बाहरी दुनियां से उनका संपर्क नहीं होता है . अगर होता है तो फिर उस स्थान की संरक्षिका के आदेश पर ही। 
*क्या उनको काम के नाम पर संस्था के द्वारा बाहर  भेजा जाता है और वह भी वहां के कर्मचारियों की इच्छा के अनुसार .
*क्या उन्हें वहां के अधिकारीयों , कर्मचारियों के द्वारा उत्पीडित  किया जाता है जिससे ऊब कर भागने का प्रयास करती हैं ? 
*हो सकता है काम के नाम पर उनका शोषण किया जाता हो।
*क्या इन संरक्षा गृहों में कभी सरकारी निरीक्षण किया जाता है और निरीक्षण के समय वहां की संवासनियों को अपनी बात को निर्भीक रूप से कहने का अधिकार है। 
*क्या उनको अपनी इच्छानुसार पढ़ने , काम करने या फिर कुछ समय के लिए उस गृह से बाहर जाने की अनुमति प्राप्त होती है ? 
*क्या वहां पर सारे कर्मचारी सहयोगपूर्ण रवैया अपनाते हैं?
*क्या इन संरक्षा गृहों में पुनर्वास के द्वारा वहां रहने वाली लड़कियों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करने के बारे में पहल जैसे कोई प्रयास भी किया जाता है।
*क्या उनके रहने , खाने और काम करने के लिए स्वस्थ वातावरण प्रदान किया जाता है?
                           फिर अगर किसी एक ही संस्थान से लड़कियों के भागने की घटना बार बार होती रहे और वह भी कुछ ही महीने के अनंतर में तो फिर संस्थान के ऊपर प्रश्नचिह्न उठ खड़े होना स्वाभाविक है। सारी  दुनियां से उपेक्षित या फिर अनाथ नारी एक सुरक्षित छत की कामना  करती है लेकिन जहाँ वह छत ही उनके मन में पलने वाली  सम्मान के जीवन जीने की तमन्ना चूर चूर हो जाये तो फिर वे अपने जीवन को दांव पर लगा कर कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाती हैं वे इस बात से भी वाकिफ होती हैं कि  अगर वे पकड़ी गयीं तो उनका जीवन और भी अधिक नरक बना दिया  जाएगा . इस  लेख को लिखने के लिए आधार  बना एक समाचार  -- मुंबई में मानखुर्द स्थित नवजीवन नारी सुधार गृह से कल 8 लड़कियाँ भाग निकली सिर्फ कल ही नहीं बल्कि इससे पूर्व 10 सितम्बर को भी 17 लड़कियाँ फरार हो गयीं थी 20 अक्टूबर को 35 लड़कियों ने भागने का प्रयास किया और 22 उसमें सफल हो गयीं।  कल भागी हुई लड़कियों को बार, पब और मसाज पार्लर से पकड़ा गया . 
                  इससे बहुत सारे  सवाल उठ खड़े होते हैं - क्या लड़कियों को पब, बार या मसाज पार्लर में पहले भी भेजा जाता रहा है या फिर वहां से जुड़े हुए लोग उनके संपर्क में रहे होंगे ताकि वे यहाँ से भाग कर वहां पहुँच गयीं। लड़कियों को एक सामान्य जीवन जीने लायक सुविधाएँ भी मुहैय्या नहीं हो रही हैं, जिससे कि वे उसके लिए लालायित रहती हैं और अवसर मिलने पर भागने का प्रयास करती हैं। कभी उन लड़कियों से भी यह जानने  का प्रयास किया जाता  है कि  वे चाहती क्या है?  अगर नहीं तो उस बंदीगृह जैसे संरक्षा गृहों में ऐसे ही भागने का प्रयास करती रहेंगी .  जब ऐसे गृहों में ऐसी कोई घटना हो जाती है तो महिला आयोग भी सक्रिय  दिखलाई देता है कभी उसने ऐसे संरक्षा गृहों की गतिविधियों और जीवनचर्या के जीवन के बारे में जानने के विषय में कोशिश की शायद नहीं . कितने ऐसे संरक्षा गृहों में लड़कियों को होटलों और तथाकथित समाजसुधारकों और सफेदपोशो के के दिल बहलाने के लिए होटलों और बंगलों में भेजा जाता है . वे निराश्रित , असहाय और मजबूर लड़कियाँ इसके खिलाफ बोलने का साहस  भी नहीं रखती हैं।  हाँ ऐसे ही जीवन जीने के लिए मजबूर होती हैं। ऐसे गृहों को अनुदान की लम्बी चौड़ी राशि  भी मिलती रहती है और कर्मचारियों और अधिकारियों की जेबें भी गर्म होती रहती हैं। 
                      कहीं कहीं तो ऐसे संरक्षा गृहों में वहां के कर्मचारियों के द्वारा ही नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहता है और वे बच्चियां जो इसका अर्थ भी नहीं जानती है इससे त्रसित जीती रहती हैं और तारीफ की बात ये है कि  नारी संरक्षा या बालिका सुधर गृहों में पुरुष कर्मचारियों की नियुक्ति दिन और रात  दोनों में ही गृहों के भीतर दर्ज होती रहती है। वहां की संरक्षिका भी इससे बेखबर रहती हैं क्योंकि रात में वे अपने घर में रहती हैं। संरक्षा गृह ऐसे ही लोगों के सुपुर्द करके। बच्चियां या कहें  इसके विपरीत नारी भी घर में सुरक्षित नहीं , संरक्षा गृहों में सुरक्षित नहीं ,  बाहर निकालने पर भी नहीं फिर हम अपने देश में क़ानून के द्वारा नर और नारी दोनों को समान जीवन जीने के अधिकार का अतिक्रमण होते हुए क्यों देख रहे हैं? कोई भी सरकार ये कोशिश नहीं कर पाती  है कि ऐसी घटनाओं को त्वरित रूप से न्याय के लिए समय सीमा निर्धारित कर सके . जब तक न्याय और कानून व्यवस्था इसकी और सार्थक कदम नहीं उठाएगी इसी तरह से लड़कियाँ त्रसित होकर भागती रहेंगी या फिर अपना शोषण करवाती रहेंगी। वे वहां से भाग कर भी सुरक्षित कहाँ होंगी ? वे या तो ऐसे ही बार पब या मसाज पार्लर में पहुच कर अपने शोषण के दूसरे रास्ते  पर चल कर किसी और गिरोह के चंगुल में फँस कर शोषित होती रहेंगी और एक जगह से निकल कर दूसरी जगह कैद हो जायेंगी। 
                  इन संरक्षा गृहों में उन्हें रख कर आत्मनिर्भर बनाने का काम सिर्फ कागजों में हो रहा है और वास्तव में ऐसे गृह है भी जहाँ पर इनसे विभिन्न काम लिए जाते हैं और फिर उसको बाजार में रख कर उस लाभ से इन्हें  भी हिस्सा दिया जाता है। वे आत्मविश्वास से भर कर आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का सपना देख सकती हैं . इन्हें एक नया जीवन जीने का अवसर भी प्रदान किया जाता है , उनका घर  की भी व्यवस्था के जाती है। यहाँ पर लड़कियों को बेटी की तरह से ही रखा जाता है और  ही उन्हें वर के साथ विदा भी कर दिया जाता है। काश!  देश के सारे संरक्षा गृहों को वास्तव में घर बना दिया जाय ताकि जिस उद्देश्य से इन्हें बनाया गया है वे वास्तव में उन्हें  कर सकें 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

जागरण की संस्कारशाला !

                    आज के परिवेश में जब आज की पीढी को देखते हैं या फिर आज की नयी पौध को देख कर यही कहते हुए सुनते हैं कि  पता नहीं कैसे संस्कार पाए है ? बच्चों को हम अपनी दृष्टि से कभी सुसंस्कृत नहीं पाते  हैं लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि  ये संस्कार बच्चों को मिलें कहाँ से? परिवार , समाज, स्कूल और अपने परिवेश से - लेकिन अगर हम खुद को इस कसौटी पर कसे तो ये ही पायेंगे कि जहाँ हम संस्कारों की बात करते हैं वहां पर कितनी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में पूर्णरूप से शायद हम भी परिचित नहीं है। फिर कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ये भी जरूरी नहीं की हमारे बड़े सम्पूर्ण हों और उनसे छोटे हमेशा उनसे कम ज्ञान ही रखते हों। वे भी हमें सिखा सकते हैं। 
                    मैं बात दैनिक जागरण के द्वारा आरम्भ की गयी संस्कारशाला के बारे में कर रही हूँ। इस बारे में पहले भी विभिन्न वर्गों में बाँट कर दैनिक जागरण द्वारा संस्कारशाला प्रस्तुत की गयी थी लेकिन इस बार उसके स्वरूप को बदल कर जिस उद्देश्य और लक्ष्य को सामने रख कर प्रस्तुत किया जा रहा है उससे हम सिफ बच्चों से ही नहीं बल्कि बड़ों से भी बहुत कुछ सीखने की अपेक्षा करते हैं। ये संस्कारशाला जो शुरू की गयी है संग्रहणीय  है और साथ ही इसको घरों और स्कूलों में संचित करके रखा जाय और बच्चों को इसके बारे में पूर्णरूप से परिचित करने का संकल्प घर परिवार और स्कूल द्वारा ठान  लिया जाय तो फिर वह दिन दूर नहीं जब कि  हम अपने समाज में बढती हुई उत्श्रंख्लता , अनुशासनहीनता और बड़ों के प्रति अनादर और उपेक्षा के भाव से उनको पूरी तरह न सही लेकिन बहुत हद तक दूर ले जाने में सफल हो सकेंगे .
                 हम सिर्फ बच्चों की बात ही क्यों करें बल्कि इस में दर्शाए जा रहे बहुत से संस्कार ऐसे हैं जो की समय के साथ उपलब्ध होने वाली सुविधायों से जुड़े हैं और वे हमने न अपने बचपन में सीखे हैं और न ही देखे हैं वे तो हमारे लिए भी उपयोगी हैं। इसको संग्रहनीय मान कर सभाल कर रखा जाय तो फिर ये आज भी नहीं बल्कि जैसे नैतिकता के मूल्य कभी बदलते और कम नहीं होते वैसे इन संस्कारों का मोल कभी कम नहीं होता बल्कि पढ़ने वाले को कभी कभी कुछ बातें ऐसे प्रभावित करती हैं कि हमारे अंतर में छिपे हुए गलत विचार आर धारणाएं अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं।  
                       मेरा अपना अनुभव है कि अगर इसको ध्यानपूर्वक पढ़ कर उसका विश्लेषण करे तो पायेंगे किये ये वह संस्कार हैं जो हमें ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति को संस्कारित बनाने में सही अर्थों में सहायक होते हैं। आप चाहे घर के बुजुर्ग हों , स्कूल के शिक्षक हों या फिर किसी भी ऑफिस में काम करने वाले जिम्मेदार अधिकारी - इनको अपने परिवेश में फैला कर वहां के वातावरण को और लोगों को नैतिक मूल्यों से अवगत करा कर अपने एक जिम्मेदार नागरिक , परिवार के सदस्य , स्कूल में गुरु शिष्य की परंपरा निभाने वाले गुरु साबित ही नहीं होंगे बल्कि इसके वर्तमान स्वरूप में पालने वाले दूषित वातावरण को प्रदूषण से मुक्त कर पाने में सहायक होंगे। 
             ये मीडिया द्वारा किया गया सार्थक प्रयास है जिसको जन जन तक पहुँचाने और  आम जन जीवन को एक सार्थक दिशा में मोड़ने की और नैतिकता से जोड़ कर सभ्य और सुसंस्कारित समाज के रूप में देखने और बदलने की मंशा को लेकर किया गया है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

राजकोष से राजनीति !

                   आज एक हैडिंग पढ़ी - "वादे सुनकर फूल गए , सरकार बनी तो भूल गए "  ऐसा तब होता है जब की जल्दी ही दुबारा मत के लिए जनता जनार्दन के सामने झोली न फैलानी हो और अपने ऊपर अंकुश लगाने वाला भी कोई न हो क्योंकि जनता तो ठग चुकी होती हैं . जब उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के बनाने का अवसर था तब उनको यह पता था कि  अभी उनको केंद्र के लिए मत के लिए इन लोगों के बीच फिर से आना होगा और उसने अपने किये वादों को पूरा करने की कोशिश पूरी की भले ही उसमें उसने अपने वादे के मुताबिक न रख कर फिर से उसके स्वरूप और उद्देश्य को बदल दिया हो। 
                    सत्ता में आकर सरकार पूरे राजकोष को खर्च करने की हकदार होती है और फिर शुरू होता है उसके वादों को पूरा करने का अवसर . पूर्व सरकार ने राजकोष को अपने नाम को और दल को अमर बनाने के लिए उडा  डाला और राज्य के विकास में कितने प्रतिशत खर्च हुआ इसका आकलन करने वालों की कोई औकात ही नहीं होती है क्योंकि प्रजातंत्र में एक निरंकुश सरकार को चलाने  के लिए सदन में बहुमत होने की जरूरत होती है और फिर थोड़े से लाभ या पद के प्रलोभन में वे राज्य और अपने क्षेत्र के हितों को गिरवी रखने में नहीं चूकते हैं। राजकोष को खाली करके अपने वादों को पूरा करने के लिए प्रयोग करके वाहवाही लूटना अधिक आसान  होता है। अपनी गाँठ का क्या जाता है? एक हाथ से आधा  पैसा दिया और दूसरे हाथ से 10 पैसे वसूल कर लिए लेकिन राजनीति  की इन चालों से दूर आम आदमी सिर्फ सर पटकता रह जाता है . राजनीति  में राजकोष सबसे पहले प्रयोग किया जाता है। हम कहते हैं कि  अरे इस सरकार ने तो कम से कम इतना तो अच्छा किया लेकिन वह किसी भी सरकार की कृपा नहीं होती है बल्कि वह हमारे ही पैसे पर अपनी मुहर लगा कर हमें देते हुए दिखलाई देते हैं। 
                      उत्तर प्रदेश की सरकार  ने कुछ ही महीनों में अपने किये वादों में से कुछ को पूरा करना आरम्भ किया लेकिन जितनी तेजी उसने दिखाई शायद कोई और होता तो अभी इसमें वक्त लग जाता लेकिन क्या हम ये सोच सकते हैं कि हर पार्टी के पास अपना एक अलग कोष होता है और वह कोष राजकोष से अलग होता है और हर दल के पास अकूत संपत्ति होती है क्या कभी किसी भी दल ने अपने निजी कोष से जनहित में कुछ पैसे भी खर्च किये सिर्फ उस समय को छोड़ कर जब चुनाव होने वाले हों। क्योंकि तब तो वे महिलाओं के लिए साडी , बच्चों के लिए किताबें या कपडे देने के लिए दानदाता बन जाते हैं लेकिन सत्ता पर काबिज होने के बाद किस दल ने अपनी कोष से जनहित में कुछ भी खर्च किया है। राजकोष से राजनीति करना सबको आता है और फिर हम अपनी पीठ थपथपाते रहे - ये कुछ लोगों को तो रिझा सकता है लेकिन जब राजनीति  के लटके झटकों के बाद आम आदमी रहत महसूस करने के बजाय त्राहि त्राहि करने लगे तो उसको हम क्या कहेंगे? 
                        लड़कियों को 30 हजार की एकमुश्त रकम देकर उसने वाहवाही लूटी लेकिन वह 30 हजार कितने दिनों तक उस परिवार को राहत  दे पायेगा . उसमें भी कितने सम्पन्न लोगों के घर गया होगा ये धन और उनके लिए इस धन की कोई भी कीमत नहीं है। इस धन को बांटने के लिए उनकी पात्रता के लिए उनकी स्थिति  को जान  लिया जाता तो शायद कुछ और परिवार इससे लाभान्वित होकर कुछ राहत महसूस कर पाते . 
                  बेरोजगारी भत्ता मिला लेकिन क्या ये रोजगार मिलने से बेहतर विकल्प नहीं हो सकता है। लोगों ने साम दाम दंड भेद सब कुछ इस्तेमाल करके अपने आपको इसके लिए सुपात्र घोषित कर दिया है। सरकार  की घोषणाओं  के साथ  उसके लिए जुगाड़ भिड़ाने लगते हैं और फिर शुरू होता है उसके लिए लाभ प्राप्त करने के लिए जुगाड़ की जुगत करने की प्रक्रिया जिसने जुगाडू लोग सफल हो ही जाते हैं। रोज नयी घोषणायें सरकार के लिए एक नयी छवि बनाने की पहल है और उसकी पृष्ठभूमि को और सुदृढ़ बनाने के लिए काफी है। सारी परियोजनाएं और सुविधाएँ प्रदेश के सिर्फ एक ही जिले में केन्द्रित करके ये राजकोष का दुरूपयोग करने के सिवा कुछ और नहीं कर रहे हैं। पूर्व सरकार और इनमें बस  इतना सा अंतर है कि उसने पत्थरों  को तराश कर अपनी छवि बनायीं और ये सिर्फ गृह नगर को राजधानी बनाने के काम को छोड़ कर सब कुछ बनाने पर राजकोष खाली कर रहे  हैं। अभी राज्य में ये हाल है जब ये केंद्र पर काबिज हो गए तो फिर ??????????????

                      इस को समझने के लिए सजग होने की जरूरत आम आदमी को है , सिर्फ आँख बंद करके मृग मरीचिका के झांसे में आने के पहले खुद इस बात पर गहन विचार करें कि दल की नीतियों का इतिहास क्या है? उसकी आज केंद्र की नीतियों में सहभागिता कितनी है? कितनी जनहित में आने वाले विधेयकों के प्रति दल सहिष्णु है या फिर वह अपने दल के निजी स्वार्थों के तहत हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग हैं। राजकोष से राजनीती करने वाले लोगों को सावधान रहने की जरूरत नहीं है। सरकार के द्वारा स्थापित सुशासन की और ध्यान दीजिये . राजकोष से धन लुटाया जा सकता है लेकिन राज्य में सुख , शांति और क़ानून व्यवस्था के प्रति उदासीनता उन्हें एक अच्छा  सुशासक नहीं बना रहा है। जो आम इंसान को किसी भी दृष्टि से राहत  नहीं दे पा  रही है बल्कि उसको दैनिक जीवन जीने के लिए नए नए करों से दो चार करने को बाध्य कर रही है फिर कैसे विश्वास  किया जाय कि  ये आगे जाकर इस देश के लोकतंत्र को एक स्वच्छ और सुशासित शासन दे सकेंगे .
राजकोष को व्यक्तिगत स्वार्थ से अलग यदि प्रयोग किया जाय या फिर आम लोगों के लिए उसका उचित तरीके से प्रयोग किया जाय तो उस सरकार के लिए एक सकारात्मक सोच को बनाने के लिए पर्याप्त है। राज्य की सीमायें सिर्फ और सिर्फ एक जिले या परिवार से जुड़े स्थाओं तक ही नहीं होती हैं बल्कि सर्कार बनाने के बाद राज्य की साडी सीमायें उसके लिए अपना घर होना चाहिए और हर व्यक्ति अपने से जुदा हुआ होना चाहिए। उनकी समस्याओं से जुड़ कर देखा जाना चाहिए। उन की तरह से जी कर देखना और सोचना चाहिए। राजकोष किसी की निजी संपत्ति नहीं है बल्कि उस पर आपको अपने विवेक से जनहित में व्यय करने के लिए नियुक्त किया जाता है तो फिर आम आदमी बन कर देखिये और उसकी समस्याओं को महसूस  करते हुए उसका उपयोग करें .
                 

शनिवार, 10 नवंबर 2012

दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएं!

                 दीपावली एक  अधिक दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है जिसे हम 5 दिन तक मनाते  हैं और इसका हर दिन किसी न किसी पौराणिक विषय से जुडा हुआ है।  इसको छोटे से लेकर बड़े तक सभी बड़े उल्लास के साथ  मनाते  हैं। यह दीप पर्व  मेरी सभी साथियों को परिवार सहित बहुत बहुत मंगलमय हो। 
          लक्ष्मी जी सदैव आप सभी पर अपनी कृपा बनायें रखे लेकिन लक्ष्मी जी के आगमन और  अपने स्थिर रखने के लिए आप सभी को भी कुछ प्रयत्न करने होते हैं। उनकी कृपा को सहृदयता से ग्रहण कर उसके उपयोग को सार्थक ढंग से कर उनकी कृपा को सदैव अपने ऊपर बनाये रखें . 
                लक्ष्मी जी की कृपा मिलती है लेकिन वे रहती वहीँ हैं जहाँ पर सुमति, सुख और शांति का निवास हो। घर में बुजुर्ग , स्त्री और आश्रितों को समुचित सम्मान और प्यार मिले . उनके ह्रदय से सदैव आशीष और मंगल कामनाएं निकलती हों .  अतः हमारे सदैव ऐसे प्रयास हों कि उनकी कृपा हम पर बनी ही रहे . 

                           दीपावली शत शत शुभ हो !

                                              

सोमवार, 5 नवंबर 2012

कुछ ऐसा भी सोचें !

                कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं की कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं और वे अपने जीवन का सा विषय लगाती हैं। आज हम भी घर में अकेले हैं लेकिन सक्षम है तो सब कर लेते हैं लेकिन कल किसने देखा है? हमें कब किस हाल में किसकी जरूरत हो? 

              आज के दौर में चाहे संयुक्त परिवार हों या एकाकी परिवार या फिर निःसंतान बुजुर्ग हों। सब  का एक हाल है की वे कभी न कभी मजबूर औरअसहाय हो जाते  हैं। उम्र के इस पड़ाव पर बीमारी , कमजोर दृष्टि या शारीरिक अक्षमता के चलते इंसान इतना मजबूर हो जाता है कि उसे दूसरे दो हाथों के सहारे की जरूरत  होती है - दो युवा या फिर सक्षम हाथों की। सबकी ऐसी किस्मत नहीं होती कि उन्हें हर पड़ाव पर दो हाथों का सहारा मिलता ही रहे . चाहे वे हाथ घर में ही मौजूद क्यों न हों ? फिर जिनके बच्चे दूर हैं चाहे नौकरी के लिए या फिर पढाई के लिए वे तो कभी कभी आकस्मिक दुर्घटना के अवसर पर विवश हो जाते हैं। 
             इस बात विषय के लिए मैं प्रेरित हुई कल की एक घटना से  मैं घर से निकली थी किसी काम से वहीँ पास में रहने  मेरी एक रिश्तेदर अपने गेट पर खड़ीं काँप रही थी , मुझे देखा तो बोली कि पास डॉक्टर के यहाँ तक जाना है बुखार चढ़ा है अकेले जाने की हिम्मत नहीं है। मैंने उन्हें सहारा दिया और डॉक्टर के यहाँ तक ले गयी . वहां से दवा दिलवा कर घर छोड़ गयी। उनके एक बेटी और एक बेटा  है। बेटी शादीशुदा और थोड़ी दूर पर रहती है लेकिन बेटा  साथ में रहता है। वे 74 वर्षीय हैं और बेटे  का कहना है की इस उम्र में तो कुछ न कुछ लगा ही रहता है . इन्हें कहाँ तक डॉक्टर के यहाँ ले जाएँ ? ये शब्द मुझसे एक बार खुद उन्होंने कहे थे। मैं उसे सुन कर रह  गयी लेकिन उनकी माँ  की खोज खबर अक्सर लेने पहुँच जाती हूँ .
                एक वही नहीं है बल्कि कितने बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके पास कोई नहीं रहता है या फिर वे दोनों ही लोग रहते हैं। चलने फिरने में असुविधा महसूस करते हैं। ऐसे लोगों के लिए एक सामाजिक तौर पर मानव सेवा केंद्र होना चाहिए .  यह काम सरकार  तो क्या करेगी ? हम समाज में रहने वाले कुछ संवेदनशील लोग इस दिशा में प्रयास करें तो कुछ तो समस्या हल कर ही लेंगे . इसमें सिर्फ सेवा और दया का भाव चाहिए।
                  आज बुजुर्ग जिनके बच्चे बहार हैं और वे अपने काम या घर के कारन उनके साथ जाना नहीं चाहते हैं या फिर बच्चे उनको अपने साथ रखने में असमर्थ हैं या फिर उनकी कोई मजबूरी है।माता - पिता  जब तक  साथ हैं तब तक तो एक दूसरे का सहारा होता है लेकिन जब उनमें से एक चल बसता है तो फिर दूसरे के लिए अकेले जीवन को  मुश्किल हो जाता है , एक बोझ बन जाता है। तब तो और ज्यादा जब वे बीमार हों या फिर चलने फिरने में अक्षम हों।
                     इसके लिए हर मोहल्ले में या अपने अपने दायरे में ऐसे युवाओं या फिर सक्षम वरिष्ठ नागरिकों के पहल की जरूरत है कि  एक ऐसी समिति या सेवा केंद्र बनाया जाय जिसमें ऐसे लोगों की सहायता के लिए कार्य किया जा सके . इस काम के लिए बेकार युवाओं को  या फिर समाज सेवा में रूचि रखने वाले लोगों को नियुक्त किया जा सकता है लेकिन जिन्हें नियुक्त किया जाय वे विश्वसनीय और जिम्मेदार होने चाहिए। जो लोग ऐसे बुजुर्गों को अस्पताल ले जाने के लिए, बैंक जाने या ले जाने के लिए , बिल जमा करने के लिए या फिर घर की जरूरतों को पूरा करने वाले सामान की खरीदारी के लिए सहयोग दे सकें . इसके बदले में सेवा शुल्क उनसे उनकी सामर्थ्य के अनुसार लिया जा सकता है और वे इसको ख़ुशी ख़ुशी देने के लिए तैयार भी हो जायेंगे . इस काम को  संस्था अपनी देख रेख में करवाएगी  - जिसमें इलाके के बुजुर्ग और एकाकी परिवारों की जानकारी दर्ज की जाय और उनको कैसा सहयोग चाहिए ये भी दर्ज होना चाहिए। लोगों के पास पैसा होता है लेकिन सिर्फ पैसे होने से ही सारे  काम संपन्न नहीं हो सकते हैं। इसके लिए उन्हें सहयोग की जरूरत होती है। ये सहयोग किसी भी तरीके का हो सकता है। 
             ऐसा नहीं है कि  ये बहुत मुश्किल काम हो क्योंकि काफी युवा सिर्फ झूठी नेतागिरी में विभिन्न दलों के छुटभैयों के पीछे पीछे चल कर जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे लगते हुए मिल जाते हैं और उनको इससे क्या मिलता है? इससे वे भी वाकिफ हैं लेकिन ऐसे युवाओं को सपारिश्रमिक  ऐसे कामों के लिए अगर प्रोत्साहित किया जाय तो समाज के इस वर्ग की बहुत बड़ी समस्या हल हो सकती है . ऐसे हालत में ये सवाल पैदा होता है कि  ये युवा ऐसे कामों के लिए क्यों तैयार होंगे? उन्हें इस दिशा में समझाना होगा और उन्हें मानसिक  तौर पर तैयार  होगा  क्योंकि उन्हें तथाकथित नेताओं और छुटभैयों से कुछ मिलता तो नहीं है लेकिन इस काम से उन्हें आज नहीं तो कल कुछ संतुष्टि तो जरूर मिलेगी .  मानवता एक ऐसा भाव है जिसकी कीमत कभी कम नहीं होती और इसके बल पर ही ये समाज आज भी मानवीय मूल्यों को जिन्दा रखे हुए हैं। भले इसका मूल्य लोग कम आंकते हों लेकिन जो इसको महसूस करता  है उसकी दृष्टि में यह अमूल्य है।  इस काम के लिए सोशल साइट्स को अपने लिए काम करने वाले युवाओं को खोजने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है  क्योंकि अपने व्यस्त काम में भी सेवा भाव से जुड़े लोग कुछ समय निकाल  सकते हैं और निकालते  ही हैं। सिर्फ युवा ही क्यों ? कुछ घरेलु महिलायें भी इसा काम के लिए समय निकाल सकती हैं जो अपना समय गपबाजी या फिर सीरियल देखने में गुजराती हैं वे इस काम में भी लगा सकती हैं। सिर्फ एक जागरूक महिला के आगे आने की जरूरत होती है फिर उसके साथ चलने वालों का कारवां तो बन ही जाता है। 
             इसके लिए नियुक्त किये गए युवाओं के विषय में उनकी चारित्रिक जानकारी को संज्ञान में रखना बहुत ही जरूरी होगा क्योंकि अकेले बुजुर्गों के साथ कितनी दुर्घटनाये हो रही हैं और वे भी जान पहचान वालों के द्वारा तो हमारा प्रयास इस जगह अपने उद्देश्य में विफल हो सकता है। इसके लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी काम करने वालों की विश्वसनीयता को परख कर ही नियुक्त किया जा सकता है। मेरे परिचय में एक परिवार है जिसमें तीन बेटे हैं और तीनों ही अपने इष्ट मित्रों , जान पहचान वालों या रिश्तेदारों के लिए उनकी मुसीबत में खबर मिलने पर हर तरह से सहायता करने के लिए तैयार रहते हैं। तीनों नौकरी करते हैं फिर भी अपने सहायता कार्य में कभी भी उदासीनता नहीं बरतते  हैं। अगर दस परिवारों में एक परिवार का एक बेटा  भी ऐसा हो जाय तो फिर हमें अपने काम के लिए कहीं और न खोज करनी पड़े . इस प्रयास को हम व्यक्तिगत स्तर  पर तो कर ही सकते हैं। वैसे मैं बता दूं कि इसकी पहल मैं अपने स्तर  पर बहुत समय से कर रही हूँ . मेरा और मेरे पतिदेव् का फोन नंबर ऐसे हमारे परिचितों के पास रहता है कि जब भी उन्हें जरूरत हो हमें कॉल कर सकते हैं। हम अपनी शक्ति भर उनके लिए  भी संभव है करने को तैयार रहते हैं।
                 

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

दशहरे पर !

                                



         आज दशहरे पर हर  वर्ष की तरह इस वर्ष भी हर शहर  में और कई जगह पर रावण के पुतलों को जलाया जाएगा और  परंपरागत रूप से घर के बड़े बच्चों को ये कहते हुए सुने जा सकते हैं कि  ये तो बुराई के अंत और भलाई की बुराई के ऊपर विजय का पर्व है,  इसी लिए बुराई  के प्रतीक रावण  को भलाई के प्रतीक राम जी इसको जलाते हैं। 
                           रावण एक प्रतीक है और जब ये प्रतीक था तो सिर्फ और सिर्फ एक ही रावण था . उसके अन्दर पलने वाली हर बुराई उसके अन्दर के विद्वान पर भारी पड़ी थी और फिर उसका अंत हुआ . लेकिन कभी हमने सोचा है कि रावण तो आज भी जिन्दा है और आज वह एक नहीं है बल्कि आज तो हर जगह बहुत रूपों में हर इंसान में कहीं न कहीं जरूर  मिल जाता है। अगर रावण की बुराइयों से हम अपने अन्दर पलने वाली आदतों और बुराइयों से तुलना करें तो कहीं न कहीं कुछ तो जरूर सबमें मिल ही जाता है। अब राम भी हम है और रावण भी . फिर हम पर निर्भर करता है कि  हम किस तरह से अपने अंतर में पलने वाले रावण को ख़त्म करने की दिशा में प्रयास करें। राम तो पूरी तरह से इस युग में कोई शायद ही होगा और होगा भी तो वह मानव की श्रेणी में रखा जा  सकता है। 
                         रावण के  कई रूप बिखरे पड़े हैं कि  हर कोई दूसरे को देख कर अपने को राम और उसको रावण साबित करने में लगा रहता है। इस जगह अगर हम सभी , सभी न भी सही कुछ लोग जो वाकई इस समाज में शुभचिंतक इंसान कहे जाते हैं।  लेकिन हर कोई सम्पूर्ण नहीं होता फिर भी ऐसा नहीं है कि  हम अपनी कमजोरियों या अपने दोषों को न जानते हों फिर हम ही तो हैं जो उन पर विजय पा सकते हैं। ये तो निश्चित है कि असंभव कुछ भी नहीं है। 
                     रावण  की तरह हम लोगों में भी तो स्वयं को सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ समझने की बुराइ समाई  होती है और अपने इस गुण के कारण  दूसरों को नीचा दिखाने और अपमानित करने की भावना से भी भरे होते हैं जो रावण का भी एक रूप है। इसी रावण  को तो हमें पराजितकर अपने को इससे मुक्त करने का प्रयास करना ही आज के दिन की सार्थकता हो  सकती है।  
                    रावण का एक रूप ये भी है कि उसको जीवन में अपनी प्रशस्ति को ही सुनना पसंद था , उसके विरुद्ध उसे सच सुनना भी गवारा नहीं था। कहीं हमारे अन्दर भी तो ऐसा ही दुर्गुण नहीं है। अगर हमें अपनी प्रशंसा पसंद आती है तो आलोचना सुनकर हम अपनी कमियों से वाकिफ होते हैं . अपनी आलोचना को खुले मन से स्वीकार करना और उसका अपने आप में विश्लेषण करके उससे मुक्ति पाने का संकल्प ही लेना ही हमारे लिए उस रावण पर विजय पाने का अवसर होगा।
                      रावण के एक रूप है -  नारी के देवी स्वरूप का अपमान करना, जीवन में पत्नी एक होती है शेष सभी चाहे वह बेटी के रूप में हो , बहन के रूप में हो या फिर किसी अनजान महिला के रूप में लेकिन उसके प्रति कलुषित विचार मन में रखना उसी का ही एक रूप है। रावण का यह रूप सर्वाधिक समाज में दिखाई दे रहा है . वह भी हम जैसे लोग हैं -  जो उसकी अस्मत को मान नहीं देते बल्कि उससे खेलने का प्रयास करते हैं या उनके प्रति मानसिक तौर पर ही सही दूषित विचार मन में रखते हैं।  इस पर विजय पाना या फिर लोगों को इस रावण के प्रति आगाह करना भी एक सार्थक प्रयास होगा। 
                      रावण के एक रूप है भ्रष्टाचार से लिप्त होना - यह तो घर से लेकर बाहर  निकलने पर हर कदम पर हमें देखने को मिलता है। छोटे से छोटे अवसर को भी लोग छोड़ते नहीं है . उनके खजानों में करोड़ों रुपये और संपत्ति भी कम दिखाई देती है। उनके अन्दर बैठा हुआ रावण उन्हें ये नहीं समझने देता है कि ऐसी संपत्ति जिसे हम चोरी से संग्रह करके रख रहे हैं , उसको कभी अपने लिए प्रयोग नहीं कर पायेंगे फिर वो किस लिए संग्रह कर रहे हैं?  सिर्फ उस संपत्ति पर एक नाग की तरह  बैठने के लिए। अगर हम इस भाव से मुक्त हो सकें तो दशहरे की सार्थकता बढ़ सकती है। 
                    रावण का एक स्वरूप है बाहुबल का अभिमान - यह तो सारी बुराइयों का स्रोत है लेकिन रावण तो श्रेष्ठ विद्वान और धर्मचारी भी था। आज उस रावण  के सद्गुणों को नहीं बल्कि उसके दुर्गुणों को ही अपना कर अपने को स्वयम्भू समझने की जो भूल मानव कर चूका है वह उसके लिए एक दिन अंत का कारण बन जाता है। जीवन में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका क्षय न हो और क्षय होने पर खुद अपनी ही दृष्टि में वह इतना बेबस हो जाता है कि  उसको अपने पर पश्चाताप करने का अवसर नहीं मिलता है।
                    इसा विजय दशमी को सार्थक बनाने के लिए हर कोई अपने अन्दर बैठे रावण को मार भागने में सफल  हो और खुद उस पर विजय पाकर एक सुन्दर और सुखद जीवन की और एक कदम बढ़ने की पहल कर लोगों को प्रेरित करें । ऐसे ही अगर कुछ लोग ही इस दिशा में सक्रिय  हों तो फिर जीवन जीवन होगा। जीवन का उद्देश्य भी बदल जायेगा और हम सही अर्थों में खुद को मानव बन मानवता के हित में एक सफल प्रयोग करते हुए पाए जायेंगे .

               विजयादशमी पर अपने अन्दर के रावण के पुतले को जला कर खुद को उससे मुक्त करें .  

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

1962 के युद्ध की कुछ धुंधली यादें !

                                20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत के ऊपर आक्रमण कर उसे युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया था . भारत चीन की सीमायें जहाँ हैं वहां पर सर्दी का हर समय आलम बहुत बुरा रहता है, यहाँ का तापमान सदैव ही माइनस में होता है। । वे उसके आदी  हुआ करते है और हमारे जैसे देश में हर सैनिक में इतनी सर्दी सहने का माद्दा  न था।  लेकिन हमारे सैनिक अपनी जान की बाजी लगाये दुश्मनों का सामना करते रहे। वहां पर रसद और हथियार पहुँचाने में भी इतनी कठिनाई होती थी कि सैनिकों के पास इसका अभाव बना रहता था। उनके पास लड़ने के लिए पर्याप्त हथियार भी नहीं होते थे।  खाने के लिए सामग्री उपलब्ध नहीं होती थी .  खाली  पेट ही वे सीमा पर डटे रहते थे। 

चीन सीमा पर हमारे सैनिक  ( चित्र गूगल के साभार  )


                              उस समय मैं बहुत ही छोटी थी लेकिन घर के माहौल के अनुसार चूंकि घर में पत्र और पत्रिकाओं का नियमित आगमन हम सभी भाई बहनों को इन सब खबरों से अवगत कराये रहता था। उस समय सीमा पर कितनी सर्दी होगी ? उस साल उरई में भी इतनी सर्दी पड़  रही थी कि  खुले रखी बाल्टियों में बर्फ जम जाया करती थी। घर में लकड़ी के बड़े बड़े  लक्कड़  हर समय जला करते थे ताकि सर्दी से बचा जा सके . 
                              उस सर्दी में सैनिक किसी छावनी से उरई से होते हुए झाँसी की ओर  मिलेट्री की गाड़ियों में भर कर जाया करते थे . हमारा घर सड़क के किनारे था और हम दूसरी मंजिल पर रहते थे। घर के सामने  बनी छत पर एक बड़ा सा खुला हुआ हिस्सा था,  जिससे हम लोग खड़े होकर सड़क का नजारा देखा करते थे। दिन में जब सैनिकों की गाड़ियों  निकलना शुरू होती तो लगातार निकलती रहती . हम भाई बहन उस खिड़की में खड़े हो जाते और सैनिकों से जयहिन्द किया करते थे। उनमें से जो आगे खुले हुए ऊपर के हिस्से में बनी जगह में खड़े होकर देखता रहता वे हमें देख कर जयहिन्द का उत्तर दिया करते थे। हम लगातार उसी मुद्रा में खड़े रहते और गाड़ियाँ निकलती रहती , सैनिक उत्तर देते रहते , कभी कोई सैनिक नहीं देख पाता  या उत्तर नहीं देता तो हमारा मुंह लटक जाया करता था देखो न इसने हमसे जयहिन्द नहीं किया। वह समय था जब राष्ट्रीय  रक्षा कोष के लिए पैसा दिया जा रहा था . हम अपनी गोलक से निकाल  कर पापा को पैसे देते कि  आप इन्हें जमा करवा दें .

                   हमारे बड़े बूढ़े यही कहा करते थे की हमारे सैनिक वहां मरे जा रहे हैं क्योंकि चीन वाले तो उस सर्दी के आदी  है और हमारे सैनिकों के लिए ये भारी पड़ रहा है और उन लोगों ने लड़ाई सर्दी में इसी लिए छेडी  है जिससे कि  आधे सैनिक तो इस सर्दी से ही भर जायेंगे  और ये हकीकत भी थी।   आज 50 वर्षों के होने पर आज की नयी पीढी उस युद्ध के बारे में जानती , तक नहीं है क्योंकि उस युद्ध का जिक्र कहीं पाठ्यक्रम में मिलता ही नहीं है। मैं उन सभी शहीदों को नमन करती हूँ जो उस युद्ध में दुश्मन की साजिश में मारे गए या फिर प्रकृति के कहर से . ये देश और देशवासी उनके सदैव ऋणी  रहेंगे . भारतमाता भी अपने लालों पर गर्व करती है।
                            
                                         जय हिन्द , जय भारत 
                   
                   

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

बाबूजी की 21वीं पुण्यतिथि !



                        20 अक्टूबर 1991 - वह दिन था जिस दिन बाबूजी (ससुर जी ) ने भी हमें अकेले छोड़ दिया था . शायद कोई ऐसा दुर्भाग्यशाली होगा जिसने अपने दोनों पिताओं को सिर्फ 2 माह 10 दिन के अंतर से खो दिया हो . मैं हूँ न - जिसने खोया है . 

                    कुछ तो ऐसा होता है जिसके लिए हम उनके जाने के बाद भी याद करते हैं। मेरे बाबूजी बड़े ही सिद्धांतवादी थे। उन्होंने जीवन भर कानपुर के बड़े सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट की नौकरी की और ऐसे विभाग में रहे जहाँ उनके साथियों ने अपने कार्यकाल में ही बड़ी बड़ी कोठियां खड़ी कर ली और वे रिटायर्मेंट के बाद समय के अन्दर क्वार्टर खाली कर किराये के मकान  में आ गए अपने लिए एक मकान  भी नहीं बनवा  सके थे।
                   लड़कियों के जन्म को लेकर आज नहीं बल्कि ये परंपरा तो पुराने समय से चली आ रही है कि एक दो तक ठीक है लेकिन उससे अधिक तो घर वाले हाय तौबा मचाने लगते थे। मेरे बाबूजी के कोई बेटी न थी बस दो बेटे थे , सो मेरी जेठानी को जब पहली बेटी हुई तो सारे  घर में खुशियाँ इतनी मनाई गयीं कि  जैसे कोई लाटरी खुल गयी हो। उसके बाद दूसरी बेटी लेकिन बाबूजी ने कभी ये नहीं कहा कि  फिर बेटी आ गयी। दोनों उनके लिए जान से प्यारी थी। फिर मेरी शादी हुई और मेरी भी पहली बेटी हुई - हम विश्वविद्यालय कैम्पस में रहते थे . जिसने सुना चुप लगा गया कोई बाबूजी से पूछने भी नहीं आया . बाबूजी बोले -  'अरे पोती मेरे घर आई है सब लोगों को साँप क्यों सूंघ गया?  ' उन्होंने उसी धूम धाम से मुंडन किया सबको बुलाया . फिर कुछ साल बाद मेरी दूसरी बेटी।  बाबूजी ने अपने दिल में भले ही सोचा हो लेकिन कभी हम लोगों से इस बारे में एक शब्द नहीं कहा . जो बच्ची सबसे छोटी होती उनकी "रानी रानी " होती और सुबह उठ कर लाओ हमें दे जाओ हम जरा उससे बातें करेंगे . वह बोल न पाती हो बाबा जी उससे बतियाते रहते और हम अपने काम कर डालते . 
इसके कुछ साल बाद फिर मेरे जेठानी जी को बेटी हुई। हमारे परिवार में 5 बेटियां हो गयीं और लोगों ने हमें ताने दिए लेकिन उन्होंने कभी कुछ भी नहीं कहा।  हमारा संयुक्त परिवार रहा और जो आज भी हैं, भले ही अब परिवार के नाम पर सारे  बच्चे बाहर  या शादी हो चुकी है हम चार लोग भर है। तब भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस एक दिन बोले - 'तुम लोग कितना कमाओगे ? चिंता मत करना ये लक्ष्मी है,  हो सकता है कि इनके भाग्य से हम कमा  रहे हैं। ' जब पेंशन लेने जाते छुटकी के लिए खिलौने और बाकी लोगों के लिए कुछ न कुछ लेकर आते। ऐसा नहीं वे बच्चियों को जान देते तो बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते  - उनके कैंसर के आखिरी स्थिति में मेरे पति ने बच्चों को बता दिया था कि ' अब बाबा ज्यादा दिन नहीं रहेंगे।  ' छोटों की बात जाने दीजिये मेरी जेठानी की बड़ी बेटी जो उस समय हाई  स्कूल में पढ़ रही थी एकदम चुप हो गयी थी और जब इन्हें अकेले में पाती  तो कहती ,' चाचा प्लीज बाबा को बचा लीजिये न। ' उसकी बात सुनकर हम लोग भी रो देते थे। 
बाबा और मेरी छोटी बेटी प्रियंका 


                      मेरी बड़ी  बेटी ने उनके न रहने के बाद  उनके डेन्चर को फेंकने नहीं दिया। मम्मी सब बाबा को ले गए इसको नहीं ले जाने देंगे . ये मेरे पास रहेगा और वह आज भी एक डिब्बे में सहेजा रखा है। अगर उन्होंने अपनी पोतियों को इतना प्यार दिया तो वे भी उन्हें बहुत प्यार करती थी । ये सब बातें होती हैं जो हमें अपने बुजुर्गों से जोड़ कर रखती हैं। 
                     मैं उन्हें शत शत नमन करती हूँ और कहती हूँ कि  लड़कियों के प्रति ईश्वर  हर इंसान में ऐसी ही भावना भरे . 

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

या देवी सर्वभूतेषु !


                      नवरात्रि में हम सभी हिन्दू धर्म के मानने वाले इन शुभ दिनों में देवी की आराधना विशेष ढंग से करते हैं और इन दिनों में कन्या को देवी मान कर पूजते हैं . इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का विशेष रूप से लोग पाठ  करते हैं और इसके देवी के श्लोकों को उच्च स्वर में ध्वनि  सहित पाठ  भी करते हैं। लेकिन इसके अर्थ के अनुरूप आज के सन्दर्भ में  सब अर्थ बदल गए क्योंकि देवी ने तो सभी मानवों में एक जैसे  ही गुण दिए थे लेकिन हमने उनको अपने अनुरूप विकसित कर स्वयंभू बन उनकी सत्ता को भी चुनौती देने लगे हैं। 

                    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

इसके अर्थ के अनुरूप अब शक्ति सिर्फ कुछ ही लोगों के अन्दर शेष रह गयी है शेष तो शोषित हैं न उनके द्वारा और शोषक ही उच्च स्वर में इन मन्त्रों को उच्चारित करते हैं।  ( ये बात सब पर लागू नहीं होती। अतः इसे अन्यथा न लें )

                   या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

      अगर देवी  सभी प्राणिओं  में माँ के रूप में स्थित हों तो फिर कन्या भ्रूण हत्या, कन्या के साथ बलात्कार और  घर से बेघर करने वाले लोग  इस दुनियां में होते ही नहीं क्योंकि माँ का रूप जीवन दायिनी और ममता भरा  होता है। 

                 या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

        अगर  सभी मानवों में दया होती तो फिर इस विश्व में फैले हुए अत्याचार और अनाचार से मानव जाति त्राहि माम न  कर रही होती। इतनी हत्याएं और आतंकी हादसे न होते। लोग अपने ही घर के लोगों के खून के प्यासे  न होते।  किस दृष्टि से माँ दया रूप में  दिख रही हैं।
                 या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

          यही तो एक ऐसी चीज  है जो सभी प्राणियों में सिर्फ मनुष्य के पास  है लेकिन फिर भी अन्य प्राणी तो बुद्धि से कम होते हुए भी अपनी जाति के प्रति सहृदयता का व्यवहार करते हैं। मनुष्य इस गुण के रूप में  धारण करते हुए भी आपका ही  अपहरण करने पर अमादा न  रहता है।ये  कैसी बुद्धि है माँ? 
                     
                  या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः          
                 
        अज विश्व में सिर्फ आपका यही रूप ही तो  भाता है , अपने अंतर में झांक कर तुझे पाने की चाह  किसी को नहीं है . वह अपनी जेबों और तिजोरियों में खोजता फिर रहा है और फिर जो आपके रूप में विराजमान है उन्हें भी  खोता जा रहा है।

                    या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

           तुष्टि रूप में तुझे पा  लेता तो शायद  आज की दुनियां में जो कुछ भी हो रहा है ,  हत्या , लूटपाट , डकैती और सबसे बड़ा घोटालों का जो सिलसिला चल रहा है वह तो होना ही नहीं चाहिए तुष्टि तो शायद इंसान अपने विकास के मार्ग में एक रोड़ा मानता आ रहा है। 
                  
                     या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः .

                 इसकी खोज में तो  संत पर्वतों और कंदराओं की खाक छानते रहते हैं और अपने अंतर में  आपके इस रूप को नहीं  देख पाते  हैं।कैसा अजीब है आपका ये रूप और इसीलिए न वह सुख शांति से खुद  रहता है और न ही औरों को रहने  देता है।

                क्या हमारी श्रद्धा से जुड़े  ये सारे भाव अपने अर्थ को खोते चले जा  रहे हैं। वही एक इंसान सुबह उठकर नौ दिन तक सात्विक भोजन से लेकर आचरण के साथ  सब कुछ करना स्वीकार  कर लेता है और फिर भी अपने अंतर में देवी प्रदत्त इन गुणों को खोज नहीं पाता   है . 

                माँ हमें शक्ति बुद्धि, तुष्टि , शांति प्रदान  करें  और उन्हें भी जो इस बात से नावाकिफ  है कि  वे कर क्या रहे हैं?
                 

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस !

चित्र गूगल के साभार 
                     

                       मानव में मष्तिष्क ही एक ऐसी चीज है जो उन्हें सम्पूर्ण प्राणियों में श्रेष्ठ बनाता है। इसी मष्तिष्क से इंसान धरती से  तक के अध्ययन ही नहीं बल्कि असंभव मानी  जाने वाली उपलब्धियों को प्राप्त कर पा  रहा है।
                          आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर इस विषय में कुछ कहने और बताने के बारे में सोचा है क्योंकि आज भी इतनी प्रगति के बाद में हमारे मेडिकल के क्षेत्र में ही इस मानसिक स्वास्थ्य की गुत्थियों को सुलझाने में विशेषज्ञ कहे जाने वाले लोग भी समझ नहीं पा  रहे हैं . इस विषय में जब तक बच्चे के विषय में जानकारी प्राप्त होती तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। चिकित्सा विज्ञानं में मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धी कोई विशेष शिक्षा सम्बद्ध नहीं है बल्कि डॉक्टर भी इसके विषय में पूरी तरह से वाकिफ नहीं होते हैं। 

                          इस विषय  में अध्ययन  करते और उसके निदान के विषय में शोध की दिशा में  प्रयासरत होने के नाते स्पष्ट रूप  कह सकती हूँ कि  ये जरूरी नहीं की कि  बाल रोग चिकित्सक चिकित्सक  को इस विषय में जानकारी  होती  है , हाँ वे अपने विषय के तो विशेषज्ञ होते है लेकिन इस विषय को नहीं समझ पाते हैं।*

                          मानसिक स्वास्थ्य   के बारे में कहा जा सकता है कि जब बच्चा पैदा होता है तो वह सामान्य ही दिखलाई देता  है .  उसका विकास धीरे धीरे होने पर  घर  वाले कम ध्यान देते हैं।  बुजुर्ग और घर के बड़े  अपने  अनुभव के आधार पर कहने  लगते हैं कि कोई कोई बच्चा देर से चलता या बोलता है या फिर   बाकी क्रियायों के विषय में सुस्त होता है। उनके पास इस विषय में उदहारण भी तैयार होते हैं कि  उसका बच्चा इतने दिन में  बोला या  चला लेकिन वे ये  जाते हैं की उनके समय और आज के समय में बच्चों के विकास और उनकी आई क्यू में बहुत अंतर हो  चुका  है। एक सामान्य बच्चा  से विकास की और अग्रसर होता है। अज आज भी बच्चे के दो साल तक उसके सामान्य विकास का  किया जाता है और जब वे इसा और सजग होते हैं तो बाल रोग विशेषज्ञ के पास जाते हैं और बाल रोग विशेषज्ञ में इतनी जागरूकता और जानकारी का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है और फिर भी वे बच्चे को अपने हाथ से मरीज निकल न जाय जाय  उसके ऊपर अपने  प्रयोग करते  रहते हैं। बहुत  स्थिति हुई तो बच्चे को बगैर उसके विषय में  ज्ञान  उसको एम आर  (Mentally  Retarded  ) घोषित कर देते हैं। इसके बाद उनको ये भी नहीं पता  होता है कि बच्चों को कहाँ और कैसे  भेजा जाता है ? वे जो बच्चे अधिक सक्रिय होते हैं , उनको  स्ट्रोइड दे  देते हैं जिससे बच्चा या तो सोता रहता है या फिर वह निष्क्रिय पड़  जाता है . इसको उसके माता पिता ये  समझते है कि  बच्चे में सुधार हो रहा है , जबकि  ऐसा कुछ भी नहीं होता है। बच्चे के माता पिता डॉक्टर को भगवान  समझ कर विश्वास करते रहते हैं और डॉक्टर उस विश्वास का फायदा  उठाते रहते  है।
                         मानसिक  अस्वस्थता की कई श्रेणी होती हैं।  बच्चों को एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। इसका सीधा  सम्बन्ध मनोचिकित्सक से हो सकता है . इस विषय की जानकारी वह रखता है , लेकिन  समाज में मनोचिकित्सक से इलाज कराने  में आदमी पागल घोषित कर दिया जाता है या फिर मनोचिकित्सक को पागलों का डॉक्टर। हम बहुत  आगे बढ़ चुके हैं और निरंतर बढ़ भी रहे हैं लेकिन हम विश्वास पूर्वक ये नहीं कह सकते हैं कि  हमें हर क्षेत्र में पूर्ण ज्ञान है। 
                         बच्चे में 1 साल से पूर्व  मानसिक स्थिति को समझने  का पैमाना नहीं है, हाँ अगर शारीरिक  लक्षण प्रकट हो रहे हैं तब इस दिशा में हम सक्रिय हो  जाते हैं।  फिर भी हम मानसिक तौर पर अस्वस्थता को पकड़ने का प्रयास नहीं कर पाते  हैं और कर भी नहीं  सकते हैं।यह बात स्पष्ट तौर पर कही  जा सकती  है कि  यह बच्चों की अस्वस्थता की डिग्री पर निर्भर करता है कि  उसके  सुधार  होने की कितनी संभावना है ? इस  तरह के बच्चों को स्पेशल चाइल्ड  कहते हैं .
                            इसके लिए और किसी  शहर  की बात तो  नहीं कह सकती  हूँ लेकिन इस दिशा में दिल्ली में कई सेंटर हैं  पर इसके विषय में  बच्चों पर काम  हो रहा है और  उनकी स्थिति में सुधार  हो रहा है। इस दिशा में   सब से सार्थक कदम ये हो सकता है कि  इस स्थिति की ओर  भी ध्यान दिया जाय और हर  अस्पताल में और  मेडिकल कॉलेज में इस क्षेत्र में प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। वहां पर ऐसे बच्चों के लिए भी  जगह होनी चाहिए और इसके विशेषज्ञ होने चाहिए।

*ये लेख  मानसिक  स्वास्थ्य के लिए  कार्यरत विशेषज्ञ डॉ  प्रियंका  श्रीवास्तव से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा  गया है।

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

दो अक्टूबर !

             
 

        " दो अक्टूबर " देश के लिए   महत्वपूर्ण दिवस है  क्योंकि  इस दिन ने हमें एक नहीं इस देश को दो महापुरुष दिए हैं .

                            महात्मा गाँधी एक नाम नहीं बल्कि एक  विचारधारा  और एक सिद्धांत का नाम है।  एक  विचारधारा जिसने सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि विश्व के तमाम महान लोगों ने  इस दिशा में किये गए कामों के  प्रेरणास्रोत  गाँधी के दर्शन को ही  माना है . इसके लिए चाहे हम जो भी कहें , आप जब गाँधी के दर्शन को बीती कल की बातें मानने लगे हैं क्योंकि अब लोगों के आदर्श और दर्शन पर भौतिकता का मुलम्मा चढ़ गया है और वे बातें अब कोई भी मायने नहीं रखती हैं। इसने वर्षों में सत्य की जगह झूठ और फरेब  ने ले ली है . अहिंसा का मोल सिर्फ कमजोर लोगों के लिए बचा है क्योंकि वे दबंगों से लड़ कर जीत नहीं सकते हैं और इसके लिए वे सिर्फ अहिंसा की बात करते  भी है और शोषित भी होते हैं।  अब तो वे भी इस बात को नहीं मानते  जो गाँधी के राजघाट पर  आज के दिन पुष्पांजलि  अर्पित करने जाते  हैं। हमारे सारी  सरकारी संस्थाओं में टंगी  गाँधी जी की तस्वीर नौ नौ आंसूं रोती  है क्योंकि अब तो जहाँ से  शासन चलता है , वह संसद भी हिंसा से अछूती नहीं रही ,  देश इस दर्शन को कितना समझ पायेगा?  अब तो आज के नेता ही युवा पीढी के दिग्दर्शक  बन चुके हैं . गाँधी फिर से नहीं आयेंगे इस देश को हमारी मानसिक गुलामी से आजाद कराने , अब तो  देश की छवि देखनी है तो विश्व के सबसे भ्रष्ट देशों में 
 उसकी बढती हुई श्रेणी देखनी  होगी।




                       दूसरे महा पुरुष   लालबहादुर शास्त्री जो  सही अर्थों में देश के सपूत थे। जिनका जीवन एक आदर्श बना था . जब  रेल मंत्री बने  तो रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए  त्यागपत्र दे दिए। दो साल  भी वे नहीं रहे इस देश के प्रधानमंत्री लेकिन उनके सम्पूर्ण जीवन को देखे तो देश का सबसे गरीब प्रधानमंत्री बने और अपने चंद महीनों के कार्यकाल  में ही इतिहास रच गए . शायद वे देश के पहले प्रधानमंत्री होगें  जो ऋणी ही इसा दुनियां को छोड़ गए। 

                          अज दोनों महापुरुषों के जन्मदिन पर मैं शत शत प्रणाम करती हूँ . अगर इनके आदर्शों को हम थोडा सा भी अपना सकें तो देश और मानवजाति के प्रति हमारी पहली जिम्मेदारी का वहन करना होगा