मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ये कैसे सुधारगृह ?

एक संरक्षा गृह (चित्र गूगल के साभार )
                  


                      करीब करीब हर शहर में नारी सुधार  गृह , नारी निकेतन , बालिका गृह या अनाथालय जैसे संस्था सरकारी और अर्ध सरकारी स्तर के संस्थान मिल जायेंगे . जिनमें कभी कभी न्यायलय द्वारा विशेष स्थितियों में फँसी हुई लड़कियों और महिलाओं को रखने का आदेश दिया जाता है . कुछ घर से भागी हुई , अनाथ , पहली बार अपराध में लिप्त पाई जानेवाली नाबालिग लड़कियाँ या फिर परित्यक्ता लड़कियाँ जिन्हें किसी भी परिवार में शरण नहीं मिलती है उनको इन संस्थाओं में रखा जाता है। 
                  संस्थाओं को सम्बद्ध मंत्रालय द्वारा पूर्ण सहायता प्राप्त होती है। राज्य सरकार के द्वारा भी अनुदानित राशि मिलती है। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस तरह के गृह खोल कर संरक्षण प्रदान करती हैं . वहां पर भी  सरकार के द्वारा अनुदान प्राप्त होता है . इन  संरक्षा गृहों में  क्या होता है कि  वहां से मौका मिलने पर लड़कियाँ भाग जाती हैं या फिर भागने के प्रयास में पकड़ी जाती हैं। उन्हें पकड़ लिया जाता है और फिर पुलिस और वहां का स्टाफ मामले पर लीपापोती करके मामले को दबा देती हैं लेकिन किसी एक ही संस्था में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति किस और संकेत करती  है ? क्या इन संरक्षा गृहों में ये अनियमितताएं पायीं जाती हैं --
*क्या  सरक्षा गृह सिर्फ एक कैद बना कर छोड़ दिए जाते हैं , जिनके अन्दर ही उन्हें किसी भी हाल में रहने के लिए मजबूर किया जाता है ?
* क्या बाहरी दुनियां से उनका संपर्क नहीं होता है . अगर होता है तो फिर उस स्थान की संरक्षिका के आदेश पर ही। 
*क्या उनको काम के नाम पर संस्था के द्वारा बाहर  भेजा जाता है और वह भी वहां के कर्मचारियों की इच्छा के अनुसार .
*क्या उन्हें वहां के अधिकारीयों , कर्मचारियों के द्वारा उत्पीडित  किया जाता है जिससे ऊब कर भागने का प्रयास करती हैं ? 
*हो सकता है काम के नाम पर उनका शोषण किया जाता हो।
*क्या इन संरक्षा गृहों में कभी सरकारी निरीक्षण किया जाता है और निरीक्षण के समय वहां की संवासनियों को अपनी बात को निर्भीक रूप से कहने का अधिकार है। 
*क्या उनको अपनी इच्छानुसार पढ़ने , काम करने या फिर कुछ समय के लिए उस गृह से बाहर जाने की अनुमति प्राप्त होती है ? 
*क्या वहां पर सारे कर्मचारी सहयोगपूर्ण रवैया अपनाते हैं?
*क्या इन संरक्षा गृहों में पुनर्वास के द्वारा वहां रहने वाली लड़कियों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करने के बारे में पहल जैसे कोई प्रयास भी किया जाता है।
*क्या उनके रहने , खाने और काम करने के लिए स्वस्थ वातावरण प्रदान किया जाता है?
                           फिर अगर किसी एक ही संस्थान से लड़कियों के भागने की घटना बार बार होती रहे और वह भी कुछ ही महीने के अनंतर में तो फिर संस्थान के ऊपर प्रश्नचिह्न उठ खड़े होना स्वाभाविक है। सारी  दुनियां से उपेक्षित या फिर अनाथ नारी एक सुरक्षित छत की कामना  करती है लेकिन जहाँ वह छत ही उनके मन में पलने वाली  सम्मान के जीवन जीने की तमन्ना चूर चूर हो जाये तो फिर वे अपने जीवन को दांव पर लगा कर कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाती हैं वे इस बात से भी वाकिफ होती हैं कि  अगर वे पकड़ी गयीं तो उनका जीवन और भी अधिक नरक बना दिया  जाएगा . इस  लेख को लिखने के लिए आधार  बना एक समाचार  -- मुंबई में मानखुर्द स्थित नवजीवन नारी सुधार गृह से कल 8 लड़कियाँ भाग निकली सिर्फ कल ही नहीं बल्कि इससे पूर्व 10 सितम्बर को भी 17 लड़कियाँ फरार हो गयीं थी 20 अक्टूबर को 35 लड़कियों ने भागने का प्रयास किया और 22 उसमें सफल हो गयीं।  कल भागी हुई लड़कियों को बार, पब और मसाज पार्लर से पकड़ा गया . 
                  इससे बहुत सारे  सवाल उठ खड़े होते हैं - क्या लड़कियों को पब, बार या मसाज पार्लर में पहले भी भेजा जाता रहा है या फिर वहां से जुड़े हुए लोग उनके संपर्क में रहे होंगे ताकि वे यहाँ से भाग कर वहां पहुँच गयीं। लड़कियों को एक सामान्य जीवन जीने लायक सुविधाएँ भी मुहैय्या नहीं हो रही हैं, जिससे कि वे उसके लिए लालायित रहती हैं और अवसर मिलने पर भागने का प्रयास करती हैं। कभी उन लड़कियों से भी यह जानने  का प्रयास किया जाता  है कि  वे चाहती क्या है?  अगर नहीं तो उस बंदीगृह जैसे संरक्षा गृहों में ऐसे ही भागने का प्रयास करती रहेंगी .  जब ऐसे गृहों में ऐसी कोई घटना हो जाती है तो महिला आयोग भी सक्रिय  दिखलाई देता है कभी उसने ऐसे संरक्षा गृहों की गतिविधियों और जीवनचर्या के जीवन के बारे में जानने के विषय में कोशिश की शायद नहीं . कितने ऐसे संरक्षा गृहों में लड़कियों को होटलों और तथाकथित समाजसुधारकों और सफेदपोशो के के दिल बहलाने के लिए होटलों और बंगलों में भेजा जाता है . वे निराश्रित , असहाय और मजबूर लड़कियाँ इसके खिलाफ बोलने का साहस  भी नहीं रखती हैं।  हाँ ऐसे ही जीवन जीने के लिए मजबूर होती हैं। ऐसे गृहों को अनुदान की लम्बी चौड़ी राशि  भी मिलती रहती है और कर्मचारियों और अधिकारियों की जेबें भी गर्म होती रहती हैं। 
                      कहीं कहीं तो ऐसे संरक्षा गृहों में वहां के कर्मचारियों के द्वारा ही नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहता है और वे बच्चियां जो इसका अर्थ भी नहीं जानती है इससे त्रसित जीती रहती हैं और तारीफ की बात ये है कि  नारी संरक्षा या बालिका सुधर गृहों में पुरुष कर्मचारियों की नियुक्ति दिन और रात  दोनों में ही गृहों के भीतर दर्ज होती रहती है। वहां की संरक्षिका भी इससे बेखबर रहती हैं क्योंकि रात में वे अपने घर में रहती हैं। संरक्षा गृह ऐसे ही लोगों के सुपुर्द करके। बच्चियां या कहें  इसके विपरीत नारी भी घर में सुरक्षित नहीं , संरक्षा गृहों में सुरक्षित नहीं ,  बाहर निकालने पर भी नहीं फिर हम अपने देश में क़ानून के द्वारा नर और नारी दोनों को समान जीवन जीने के अधिकार का अतिक्रमण होते हुए क्यों देख रहे हैं? कोई भी सरकार ये कोशिश नहीं कर पाती  है कि ऐसी घटनाओं को त्वरित रूप से न्याय के लिए समय सीमा निर्धारित कर सके . जब तक न्याय और कानून व्यवस्था इसकी और सार्थक कदम नहीं उठाएगी इसी तरह से लड़कियाँ त्रसित होकर भागती रहेंगी या फिर अपना शोषण करवाती रहेंगी। वे वहां से भाग कर भी सुरक्षित कहाँ होंगी ? वे या तो ऐसे ही बार पब या मसाज पार्लर में पहुच कर अपने शोषण के दूसरे रास्ते  पर चल कर किसी और गिरोह के चंगुल में फँस कर शोषित होती रहेंगी और एक जगह से निकल कर दूसरी जगह कैद हो जायेंगी। 
                  इन संरक्षा गृहों में उन्हें रख कर आत्मनिर्भर बनाने का काम सिर्फ कागजों में हो रहा है और वास्तव में ऐसे गृह है भी जहाँ पर इनसे विभिन्न काम लिए जाते हैं और फिर उसको बाजार में रख कर उस लाभ से इन्हें  भी हिस्सा दिया जाता है। वे आत्मविश्वास से भर कर आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का सपना देख सकती हैं . इन्हें एक नया जीवन जीने का अवसर भी प्रदान किया जाता है , उनका घर  की भी व्यवस्था के जाती है। यहाँ पर लड़कियों को बेटी की तरह से ही रखा जाता है और  ही उन्हें वर के साथ विदा भी कर दिया जाता है। काश!  देश के सारे संरक्षा गृहों को वास्तव में घर बना दिया जाय ताकि जिस उद्देश्य से इन्हें बनाया गया है वे वास्तव में उन्हें  कर सकें 

9 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय .... व्यवस्था तो भलाई के लिए की जाती है पर होता कुछ और ही है ।

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  2. रेखा जी !! हमारी हर व्यवस्था प्याज है..आप एक पर्त खोलो नीचे न जाने कितनी पर्तें खुलती जाएँगी .
    दिखता कुछ और है होता कुछ और ही है.

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  3. आदर्शों और संस्कारों से विहीन समाज मैं मनुष्यता बचती ही कहां है!

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  4. जब तक नारी स्‍वयं सबल नहीं होगी, तब तक उसका शोषण होता ही रहेगा। survival of the fittest के युग में कमजोर तो हमेशा निवाला ही बनेगा।

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  5. हाँ शिखा जितना गहरे झांकेंगे उतने ही तह मिलती जाएगी फिर क्या हम इसी तरह से नारी के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की बात करते रहेंगे और जब भी मौका मिल जाएगा उसकी विवशता को अपने लिए लाभ उठाने का साधन बना लेंगे . इस काम में महिलायें भी शामिल होती हैं।

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  6. आए दिन ऐसी घटनाएँ पढ़ने और सुनने को मिलती है दीदी ...यहाँ के नियम कानून को ताक पे रख कर सब कुछ किया जाता है .....सार्थक लेख ....पर ऐसी समस्याओं का कोई निदान होगा .....ऐसा लगता नहीं है

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  7. ऐसी जगहों पर घर से भी अधिक परवाह हो..

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ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जो मन में होता है आपसे उजागर कर देते हैं. आपकी राय , आलोचना और समालोचना मेरा मार्गदर्शन और त्रुटियों को सुधारने का सबसे बड़ा रास्ताहै.