शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

मेरा सफरनामा (नासिक) !

               अब हमारी बारी थी नासिक को घूमने की. हमारी पहली ही यात्रा थी तो यहाँ के दर्शनीय स्थलों  से हम अधिक परिचित न थे लेकिन हमारे टैक्सी  वाले ने बताया कि   यहाँ  पर भी बहुत सारे स्थान देखने काबिल हैं. नासिक रोड से एक घंटा लगता है नासिक जाने में. रामायण कालीन  बहुत सारे स्थल हैं - जो आज भी उस काल के इतिहास के साक्षी माने जाते हैं. एक खास बात मुझे वहाँ जाने पर यह पता लगी कि  यहाँ नासिक नाम पड़ने के पीछे भी एक कथोक्ति है कि  यहाँ पर लक्ष्मण जी ने रावण की बहन सूर्पनखा की नाक काटी थी इसी लिए इसका नाम नासिक पड़ा. हम लोग उस स्थान को भी देखने गए जहाँ पर ये घटना घटित हुई थी. वहाँ एक कुटिया जैसे स्थान पर सूर्पनखा की क्षत विक्षत नाक वाली प्रतिमा और साथ ही लक्ष्मण  जी की प्रतिमा बनी हुई थी.                         यहाँ पर पंचवटी नामक स्थान विशेष उल्लेखनीय है. वैसे तो पंचवटी तो श्री राम की महत्वपूर्ण कार्यस्थली कही गयी है जहाँ पर वे अपने वनवास काल में रहे. उनके जीवन काल की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े स्थल अपनी अपनी कहानी कह रहे थे. वह अगस्त्य मुनि का आश्रम जहाँ पर राम को उपदेश दिए थे और उनकी पत्नी ने सीता को.. वह कुटिया जहाँ तीनों ने निवास किया था. 

                       सीता की स्मृतियों से जुड़ी हुई सीता गुफा है, जिसमें कहा जाता है की सीता जी ने निवास किया था. उस स्थल को देखने वालों की भीड़ देखते बनती थी. और वे सभी  एक विशाल लाइन  में खड़े थे. जब कि  उस गुफा में सिर्फ एक व्यक्ति ही प्रवेश कर आगे बढ़ सकता था और वह भी बैठे बैठे ही आगे बढ़ सकता था. एक लम्बी सुरंग की तरह वह गुफा सीता के निवास की कहानी कह रही थी.
                  वहाँ  से हम उस स्थान पर गए जहाँ पर कपिल मुनि ने तपस्या करके कपिला नामक नदी को प्रकट किया था और उस स्थान पर कपिला और गोदावरी नदी का संगम स्थल है. छोटी बड़ी पहाड़ियों के बीच में ये संगम स्थल है और चित्र में वही स्थल देखा जा सकता है.

                 इसी स्थान par  पहाड़ के ऊपर राम लक्ष्मण और सीता की  बड़ी बड़ी सी  मूर्तियाँ कहें या मैटल से  बनायीं गयी प्रतिमाएं जिन्हें पत्थर की ही नाव पर दिखाया गया है. चित्र में इनका आकाश की पृष्ठभूमि में दिखाई देना मुझे बहुत ही आकर्षक लगा था.


                 सीता का रावण द्वारा किये गए हरण के समय जिस कुटिया में सीता थी और लक्ष्मण द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा का स्थल भी चिन्हांकित किया गया है.
                रावण के पुत्र मेघनाद का वध करने के लिए लक्ष्मण ने जिस वृक्ष के नीचे तपस्या की थी , उसको भी विशेषरूप से चिन्हांकित किया गया है. इतने वर्ष बाद भी उस वृक्ष के अस्तित्व के विषय में शंका तो होती है लेकिन इतने साक्ष्य के बीच अविश्वास दब जाता है.
               नासिक की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है, इस पूरे स्थान को धार्मिक दृष्टि से देखें तो अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान है. यहाँ पर सिंहस्थ कुम्भ पड़ने वाला स्थल भी हमने देखा. गोदावरी के किनारे उस स्थल की तस्वीर भी ली. यद्यपि गोदावरी का पानी इस स्थान पर कानपुर कि गंगा से कम गन्दा न था, फिर भी लोग उसमें डुबकी लगा कर नहा रहे थे. चारों ओर पालीथीन तैर रहीं थी.

                एक विशेष बात मुझको यह लगी कि यही गोदावरी के किनारे ही बने बड़े बड़े बरामदों के ऊपर नगरपालिका द्वारा निर्मित भवन है , जिसमें पर्यटक अपना सामान जमा करके पूरा नासिक घूम सकते हैं और चलते समय कुछ शुल्क देकर सामान लेकर जाएँ. न सामान ढोने का चक्कर और न ही कुछ घंटों के लिए होटल का चक्कर क्योंकि स्टेशन नासिक रोड पर है जो कि यहाँ से बहुत दूर है.
               गोदावरी के गंदे पानी को छूने का मन नहीं कर रहा था , वही गोदावरी के किनारे ही एक चौमुखी सिंह की प्रतिमा थी जिसके चारों मुख से पानी निकल रहा था और वह पानी एकदम साफ था. लोग उसको गंगाजल की तरह से बोतल में भरकर ले जा रहे थे.
              संगम थल के पास ही एक भव्य मंदिर कपालेश्वर का मंदिर था. जिसके बारे में कहा गया है कि सम्पूर्ण भारत में यही एक मंदिर ऐसा है जहाँ पर शिवलिंग के साथ नंदी की प्रतिमा नहीं है. इस स्थान पर नंदी को गुरु मानकर स्थापित नहीं किया गया है . इस मंदिर के दर्शन से सम्पूर्ण बारह ज्योतिर्लिंगों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है. काफी ऊंचाईपर बना यह मंदिर काफी बड़ा और सीढ़ियों के बीच बीच में  और भी मंदिर बने हुए हैं.
                  इसके अतिरिक्त यहाँ पर गोराराम, कालाराम के मंदिर भी हैं . जिनमें राम की काली और गोरी प्रतिमाएं हैं. काले पत्थर से बने ये विशाल मंदिर पुलिस के नियंत्रण में भी हैं. यहाँ पर कैमरा ले जाना निषिद्ध हैं . उन मंदिरों कि स्थापत्य काला देखते बनती है. ये कितने प्राचीन हैं .इसके बारे में उनके पत्थरों   और उनपर उत्कीर्ण कृतियों से ही लगाया जा सकता है.
                 इन मंदिरों के बाहर बने बरामदों में बुजुर्ग महिलायें रुई की  बत्तियां बना रही होती हैं और लेने वालों को पैसे देकर बेचती भी हैं. यहाँ न बुढापा एक समस्या  न वक्त काटना. कई महिलाओं के समूह आपस में बातें करते हुए काम कर रही होती हैं. जो आत्मनिर्भरता का एक साधन भी है .                     
                   नासिक में विशुद्ध  महाराष्ट्रीय  संस्कृति के दर्शन हुए. पुरुष सिर पर गाँधी टोपी लगाये हुए. पहले लगा कि ये सब राजनीति से प्रेरित हैं क्या? लेकिन नहीं ये वहाँ की संस्कृति है. औरतें  लांगदार  धोती पहने हुए मिलेंगी और पुरुष धोती कमीज और टोपी में नजर आयेंगे.

7 टिप्‍पणियां:

  1. आभार घुमाने का :)मनोहारी वर्णन.

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  2. आपके साथ हम भी घूम लिए....बहुत ही बढ़िया विवरण...तस्वीरें भी बहुत अच्छी आई हैं.

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  3. आप तो बहुत अधिक घूम आयीं. अच्छा लगा. वहीँ नजदीक त्रिम्बकेश्वर भी है. शायद गयीं होंगी. श्री राम पूरे भारत के चहेते हैं. हर प्रांत में ऐसे ही प्रमाण गढ़ दिए गए हैं जिससे आस्था बनी रहे.

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  4. सुन्दर नासिक दर्शन. नदियों का कमोवेश हर जगह यही हाल है. धार्मिक स्थलों पर तो खास तौर से इनकी दुर्दशा है.

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  5. बहुत मनोरम वर्णन किया है....चलिए हमने भी नासिक के दर्शन कर लिए

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  6. घर बैठे नासिक दर्शन करवाने के लिए बहुत आभार ...
    इन पौराणिक स्थलों पर भ्रमण का मजा तभी है जब आपको उसके इतिहास की जानकारी हो ...
    ये जानकारी भविष्य में काम आयेगी ...!

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