सोमवार, 8 नवंबर 2010

सामाजिक दायित्व और आप !

                    फिल्मों में दिखाए जाने वाले स्टंट आज के युवाओं को कितना आकर्षित कर रहे हैं , इस विषय में कई बार खबरें मिल चुकी हैं. कुछ दिन पहले दिल्ली की सड़कों पर लड़के बाइक पर स्टंट करते रहे और लोग देखते रह गए. वे कोई अपराध नहीं कर रहे थे इस लिए उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता . लेकिन ये फिल्मी स्टंट अगर युवाओं को भटकने वाला बन जाएँ तो फिर किस श्रेणी में रखना चाहेंगे हम?
                    ठीक दिवाली के दिन किसी के घर का दीपक बुझ गया और फिर चीत्कार और सिसकियों से भरे माहौल  में क्या कोई  सहृदय व्यक्ति ख़ुशी मना सकता है. पूरे मोहल्ले का माहौल खामोश रहा. दिए जले लेकिन आतिशबाजी का शोर नहीं था. दिवाली तो थी लेकिन दीपकों से निकलने वाली रोशनी उजली न लग रही थी. शर्मा जी ने अपने बेटे को अभी हाल में ही बाइक खरीद कर दी थी और वह अभी सिर्फ १८ वर्ष का बी टेक का छात्र था. फिल्मों में स्टंट करने के लिए वह घर वालों से चुपचाप किसी कोचिंग सेंटर को उसने ज्वाइन कर रखा था. इस लिए ही उसने बाइक खरीदने के लिए पिता को मजबूर कर दिया था. उसके इंस्टिट्यूट के घर से दूर होने के कारण पिता ने भी बाइक दिला दी थी. दोस्तों के सोहबत में और स्टंट के आकर्षण ने उसको सड़क पर स्टंट करते समय किसी भारी वाहन  से टकरा कर उसके नीचे आ जाने से उसके सिर को कटे तरबूज के तरह से खोल दिया था. उसके शरीर का कोई भी अंग सही सलामत नहीं बचा और १ हफ्ते  आई सी यूं में जीवन और मौत के साथ संघर्ष करने के बाद उसने दिवाली के दिन अंतिम सांस ली.
                     अभी तक तो सुना था एक्टिंग स्कूल, ड्रामा स्कूल, डांस स्कूल लेकिन ये स्टंट सिखाने वाले स्कूल के बारे में अभी तक न सुना था. जल्दी धनवान बनने के लालच ने और टीवी और सिनेमा के आकर्षण ने एक अच्छे खासे भावी इंजीनियर को उसको  जीवन और घर वालों से जुदा कर दिया.
                      अगर इस मृत्यु या हादसे को हम विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो इसमें हम किसे दोषी पाते हैं? क्या माँ बाप को जिसने बेटे को बी.टेक में एडमीशन तो दिला दिया और फिर जुटा दी उसके लिए सारी सुविधाएँ. ये उम्र ऐसी है कि बच्चे सोहबत में बहुत जल्दी भटक जाते हैं. इसलिए उनको अनभिज्ञ रखते हुए उनके बारे में सचेत रहने की जरूरत होती है. अभी उनको ग्लैमर की दुनियाँ की चकाचौंध अपनी तरफ खीचने के लिए काफी होती है. जब वे अपनी पढ़ाई के एक या दो साल संजीदगी के साथ गुजार लेते हैं और उनकी उपलब्धि भी हमें हमारे और उसके अनुरुप होती है तब बच्चे की ओर से बेफिक्र होना चाहिए. हमारा दायित्व सिर्फ बच्चे के लिए पैसा जुटाना ही नहीं होता है बल्कि उसको सही सांचे में ढालने की भी जरूरत होती है. आधे रास्ते जब वे हमारे साए में तय कर लें तब उनके हाथ को छोड़ा जा सकता है. अक्सर यह कहते हुए सुना है कि हम सिर्फ पैसे दे सकते हैं बाकी तो ये खुद देखें लेकिन वे अभी क्या देखेंगे? आपके दिए पैसे का दुरूपयोग भी कर सकते हैं. अपनी झूठी शान को दिखाने के लिए वे आपसे पैसे लेकर दोस्तों के साथ उड़ा सकते हैं. . इस लिए एक अच्छे और जिम्मेदार अभिभावक तभी बन सकते हैं जब कि उसके पीछे साए की तरह नहीं बल्कि उस  जासूस की तरह लगे रहिये जब तक कि आपको इस बात का यकीन न आ जाये कि अब उसके भटकने  की गुंजाइश नहीं रह गयी है.
                    कुछ दिन पहले एक लेख आया था कि क्या हम अपनी रिश्तेदार  या पड़ोसी के बच्चे को गलत दिशा में जाता हुआ देखें तो उनको आगाह कर दें या नहीं क्योंकि इसमें अपने पर आरोप लगने का भी डर रहता है. ऐसे झूठे आरोपों से मत डरिये आपका दृष्टिकोण सही है तो फिर जरूर बतलाइए. अगर माँ बाप आपको सही समझें तो ठीक है नहीं तो कल उसका परिणाम उनके सामने आ ही जाएगा. भले हमारे बच्चे न हों लेकिन किसी के बच्चे तो होते हैं और कोई भी माँ बाप ये नहीं चाहता कि उसके बच्चे किसी गलत दिशा में चले जाएँ. हमें अपने सामाजिक दायित्व  से विमुख नहीं होना चाहिए.

12 टिप्‍पणियां:

  1. सामाजिक दायित्वों के बारे में हम अपने पूर्वाग्रह से बाहर निकल नहीं पाए है .मैंने कई ऐसे बच्चो को देखा है जिनके माता पिता ने अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए उनको अभियांत्रिकी में प्रवेश दिलवा दिया (डोनेसन देकर) लेकिन वो छात्र अपने आप को मुश्किल में पाते है पढाई के दौरान . ऐसे छात्र निराशा के दौर से गुजरते हुए अभिभावकों के लिए सर दर्द साबित होते है और समाज के लिए अभिशप्त .अच्छा आलेख .

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  2. बेहद दर्दनाक घटना, अब उस परिवार को दोष देने का कोई फायदा नहीं, मगर बच्चे को अच्छे और बुरे की समझ घर से शुरू होती है ! और यह हम बड़ों का दायत्व है कि हम कोई भी फैसला सोच विचार और अपने बच्चे की समझ को ध्यान में रखते हुए करें !

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  3. सही कह रही हैं ये सभी का सामाजिक दायित्व है और हमे इससे मूँह नही मोडना चाहिये…………तभी शायद बदलाव आये समाज मे और सभी की सोच मे……………सोचने को मजबूर करती है ये पोस्ट्।

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  4. बहुत ही बढ़िया आलेख...अभिभावकों की जिम्मेवारियों का अहसास दिलाती हुई

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  5. हर कोई आज अपने बच्चों को डॉक्टर और इंजिनीअर ही बनाना चाहता है ,किसी को इस बात की चिंता नहीं है की सबसे पहले बच्चों को इंसान बनने की शिक्षा दी जाय......आज के शिक्षण संस्थान और भ्रष्ट सरकारी शिक्षा नीतियाँ भी बच्चों को इंसानियत से दूर ले जाने की राह पे ही चल रही है......उस बच्चे के साथ हुए दर्दनाक हादसे के लिए उसके माता-पिता को मैं पूरी तरह जिम्मेवार मानता हूँ ....

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  6. विचारणीय लेख ....आज की इस दौड में अभिभावक भी बेचारे निरीह से हो गए हैं ...और बच्चे निरंकुश ...बेहद दर्दनाक घटना ..

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  7. प्रेरणादायी सुन्दर पोस्ट.

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  8. बिलकुल सही कहा अगर हम अपना सामाजिक दायित्व नही निभायेंगे तो समाज मे क्या रह जायेगा। अच्छा लगा आपका आलेख। धन्यवाद।

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  9. बिचारणीय आलेख माता पिता को भी अपनी सोच बदलने की जरुरत है और बच्चों को सही माहोल.

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  10. दर्दनाक घटना, जबकि आज के बच्चे ज़्यादा व्यावहारिक होने लगे हैं तब.

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  11. रेखा जी, अगर हर इंसान आपकी तरह सोचे, तो अपना देश सचमुच का स्‍वर्ग बन जाऍ।

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