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शनिवार, 26 जनवरी 2013

संशोधन चाहता है संविधान !.

                        हम देश के गणतंत्र दिवस का बहिष्कार कर रहे हैं है आखिर क्यों ? ये संविधान किसके लिए बनाया गया था? इस देश के रहने वालों के लिए और उस समय देश के हालत कुछ और ही थे . हमारे संविधान निर्माता विद्वान और देशभक्त थे और वे सबसे पहले देश को  पैरों पर खड़ा करना चाहते थे और उसमें सभी की बराबर भागीदारी स्वीकार कर रहे थे।
                        एक वो गणतंत्र था जब कि  इस देश को लोकतंत्र का कलेवर पहनाया गया . उस समय के नेता ईमानदार और कर्मठ थे और देशभक्त भी थे . आज नेताओं की एक ही जाति और धर्म है स्वार्थ सिद्धि . सत्ता में आयें या नहीं अगर वे संसद में बैठे हैं तो फिर सत्ता में अपनी संभावनाओं को तलाशते हुए देश में बनाये जाने वाले क़ानून में खुद को रख कर तब समर्थन देते हैं जब कि  उनकी अपनी अंगुली न फँस रही हो। नैतिकता, समान अधिकार और समानता के प्रश्न पर कोई कहाँ एक दिखाई देता है। बातें करना और बात है और उसको अमल में लाना और बात .
                        न देश में आधी आबादी सुरक्षित है और न  बचपन - उसके क़ानून बनाने में सोचते सोचते सालों  गुजर  गए , वें न  बन सके हैं और  न नहीं पायेंगे . हाँ अगर सांसदों के हित की कोई बात शुरू होगी तो कोई विपक्ष नहीं है सब एक स्वर में उसका समर्थन करने में पीछे नहीं रहेंगे  ये संसद में बैठ कर देश नहीं अपने भले की नीतियों का निर्माण करने अधिक उत्सुक दिखलाई देते हैं। जो मर्यादा राजनैतिक दल लोकतंत्र में अपनी भूमिका में निभाते हैं वह सब भूल जाते हैं। नाम लोकतंत्र और काम आपतंत्र  के करने में सब माहिर है। हम गणतंत्र क्यों मनाएं ? अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं है। हमारी सेनाओं के जवान अपनी आहुति देश की रक्षा के लिए दे रहे हैं और उनसे कई गुनी ज्यादा सुविधाएँ और पैसे ये नेता खा रहे हैं . और देश के प्रधान मंत्री खामोश रहते हैं क्योंकि उन्हें चलने वाला रिमोट तो किसी और के हाथ में होता है जब तक उसको चलाया नहीं जाएगा तो उनके मुंह से शब्द कैसे बाहर  आ सकते हैं ?
                   अब ये स्पष्ट रूप से महसूस किया जाने लगा है कि जो युवा चाहता है उसके लिए वह एक जुट है और इसके लिए उसको संसद पर काबिज होना पड़ेगा और निजी स्वार्थों को पोषित करने वाले कानूनों को बदल कर एक स्वस्थ राजनीति की परंपरा का निर्वाह करने वाला संविधान बनाये रखना होगा . उसमें संशोधन चाहिए और ऐसे संशोधन जो देश और देशवासियों के हित में हों न की संसद में बैठे हुए लोगों की मर्जी और उनके हितों की पूर्ति करने वाले। ऐसे लोग आयोगों पर काबिज हैं जिन्हें उस आयोग के अंतर्गत आने वाली सीमाओं की पूरी पूरी जानकारी तक नहीं है। कोई गरीबों को किसी रूप में परिभाषित करता है तो कोई देश वासियों को मिनरल वाटर की बोतल पी कर सड़क पर फेंकने वाला बता रहा होता है।
--सत्ता का चश्मा चढ़ा कर देश को देखने वालों की अब इस देश को जरूरत नहीं है।
--अपने बल पर चलने के काबिल नहीं है और संसद में सीट पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को जरूरत नहीं है।
-- जेल में बैठ कर चुनाव लड़ने वालों की भी जरूरत नहीं है। अगर वे अपराधी साबित नहीं  हैं फिर भी अगर उनके ऊपर कोई  लगाया गया है और मामला लंबित है तब भी वे उससे बरी होने तक चुनाव के लिए अयोग्य घोषित किये जाने चाहिए।
--संविधान में परिभाषित किये गए कुछ शब्द विशेष को पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत है। जैसे अनुसूचित जाति  में आने वाले वे लोग जो आज भी सिर  पर मैला ढो  कर जीवन यापन कर रहे हैं उनका हक है  , न कि  उनका जो सिर्फ नाम के लिए जाति का लाभ उठा रहे हैं।
 --अल्पसंख्यक को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है क्योंकि देश की आबादी के बढ़ने से इस की सीमायें भी अब टूटने लगी हैं।
--आरक्षण का आधार अब आई आई टी की तरह से हर क्षेत्र में आर्थिक स्थिति को बनाया जाना चाहिए। क्योंकि  दलित वह  हैं मैला उठा रहे हैं , कूड़ा बीन रहे हैं लेकिन दलित नहीं है , भीख मांग कर पेट भर रहे हैं लेकिन दलित नहीं है . जो महिलायें अपने दुधमुंहे को सड़क के किनारे लिटा कर काम कर रही हैं लेकिन वे दलित की श्रेणी में नहीं आती है।  उनके बच्चों को आरक्षण की जरूरत है,  उनको नहीं जो  मैला ढोने  वालों का जाति  नाम लगा कर किसी आई इ एस के  परिजन   होने पर भी अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ पीढी दर पीढी उठा रहे हैं।, जो सिर्फ जाति के नाम पर पहले से लाभ के पदों पर काबिज हैं और आने वाली पीढियां भी इसका लाभ उठा रही हैं।
--कानून प्रणाली को त्वरित बनाने के लिए नए संशोधन होने चाहिए . अपराधों की गंभीरता बढ़ जाने पर उनके दंड में भी बढ़ोत्तरी और कठोरता आनी  चाहिए।
-- राज्य हो या केंद्र सबसे पहले देश के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधनों की उपलब्धता को प्राथमिकता देने की बात करनी चाहिए न कि  अपने अहम् को संतुष्ट करने वाले कामों में जनता के पैसे को बर्बाद करे . इसके लिए संविधान में ही प्रावधान किया जाना चाहिए।
--देश का विकास भूखे मरते हुए लोगों को रोटी और रोजी उपलब्ध करने से अधिक महसूस होगा न की बड़े बड़े पार्कों के सुन्दरीकरण के नाम पर पैसे लुटाने में। उस पार्क की चाहरदीवारी के बहार पोलिथीन लगा कर घर बना कर रहने वाले विकास की कहानी पर धब्बा दिखलाई देते हैं।
--ये गणतंत्र तब तक बेमानी है , जब तक की इस देश में वाकई लोकतंत्र सही अर्थों में स्थापित न हो जाए। 
                  अब निर्णय देश के युवा वर्ग पर निर्भर है और आधी आबादी इसादेश के भविष्य को तय करने में अपनी आधी नहीं बल्कि पूरी पूरी ताकत लगा कर ढर्रे पर लेन का काम करेगी। अब वो आरक्षण की भीख नहीं मांगेगी बल्कि अपने दम पर संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए उनको टक्कर देगी . कल आने दीजिये तब इसा गणतंत्र को मनाने के अर्थ को सार्थक करने के लिए सब साथ होंगे 

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

दुष्कर्म : महामारी !

     

              हम अगर अपने समाज के इतिहास पर दृष्टि डालें तो पायेंगे कि  जब हमारा चिकित्सा विज्ञानं इतना उन्नत नहीं था तो देश में कुछ महामारी ऐसी फैलती थी कि  गाँव के गाँव उसके शिकार हो जाते थे और तब पूरे देश में हडकंप मच जाता था। प्लेग, हैजा जैसे रोग महामारी के नाम से जाने जाते थे। जिनका इलाज बहुत जल्दी नहीं खोज जा सकता था , ठीक उसी तरह हमारे देश में और समाज में एक मनोविकृति दुष्कर्म नामक महामारी फैलती चली जा रही है और उसके रूप विकराल से विकराल होते चले जा रहे हैं . यह एक मनोरोग है और दिन पर दिन यह महामारी का रूप लेता चला जा रहा है। इस बीमारी के कीटाणु नर जाति के मष्तिष्क में ही घुस रहे हैं और इस बीमारी में उम्र, जाति और सामाजिक रिश्तों की भी कोई सीमा या बंदिश नहीं होती है। अधेड़ , जवान या किशोर कोई भी किसी भी उम्र की बच्ची, किशोरी ,युवती या फिर  प्रौढ़ा को  शिकार बना सकता है। अब तो इस बीमारी में एक और जटिलता देखी जाने लगी है कि पहले तो इस बीमारी का शिकार बिगडैल दबंग पुरुष ही हुआ करते थे और इस काम के लिए गरीब , अपने नौकरों की बेटियों या पत्नियों पर रीझ कर अपनी इस बीमारी का शिकार बना लिया करते थे और वे उनके मातहत होकर कैसे और किसके आगे मुंह खोलते ? इसलिए चुपचाप हुजूर के इस जुल्म को सहते रहते थे। न कोई थाना , और न कोई रपट - अपने माई बाप के खिलाफ कौन जबान खोल सकता था?
                    फिर इस काम के लिए राजनीति में जगह बनने लगी, नेताओं और उनके गुर्गों ने महत्वाकांक्षी महिलाओं को राजनीति में मुकाम दिलवाने का झांसा देकर उनकी इज्जत से खेलने लगे लेकिन इसके पीछे वे महिलायें भी बराबर की दोषी समझी जानी चाहिए , जो सिर्फ अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अपनी इज्जत से भी सौदा कर सकती हैं। दूसरे इसमें कद्दावर लोगों के द्वारा  अपने आकाओं को खुश करने के लिए लड़कियाँ उठाई जाने लगी और फिर छोड़ दी जाती क्योंकि उनके खिलाफ मुंह खोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी। कभी खोलने की कोशिश की जान से ही हाथ धोना पड़ा।  मधुमिता शुक्ल केस इसका गवाह है और इसमें एक बात अच्छी ये रही कि उसके गुनहगार को समुचित सजा मिली। 
                    हम जिस गति से विज्ञानं और कंप्यूटर युग में जा रहे हैं उससे भी ज्यादा आम लोगों के लिए उपलब्ध नए नए गजेट्स उनको पतन की और ले जा रहे हैं। नेट का युग आ गया और अगर इसमें हमारे कदम प्रगति के पथ पर बढे तो फिर गर्त में जाने के रास्ते भी खुल गए।  बस यही से इस महामारी के कीटाणुओं ने किशोरों, युवाओं, और अधेड़ों के अन्दर प्रवेश कर लिया। और प्रवेश करते ही सबसे पहले ये कीटाणु उसके बुद्धि और विवेक को ग्रस लेते हैं और उसकी आँखों की कोर्निया को बच्ची से लेकर वरिष्ठ महिलाओं तक सब सिर्फ और सिर्फ स्त्रीलिंग दिखने लगती हैं। उनकी बुद्धि से सामाजिक रिश्तों का पेज पूरा का पूरा डिलीट हो जाता है . अपवाद ही सही बाप - बेटी , भाई -बहन , चाचा भतीजी , मामा- भांजी और जीजा- साली और मित्र के रिश्तों पर तो कोई रोक लगायी ही नहीं जा सकती है। ये कीटाणु इन पवित्र रिश्तों की मर्यादा को खंडित करने में संकोच नहीं करते हैं . बाकी  पडोसी या मित्र के लिए तो कुछ भी संभव है।
                  जब इसके कीटाणु सोते रहते हैं तब तो कुछ भी नहीं लेकिन ये कीटाणु किसी भी स्त्रीलिंग को देख कर वीभत्स  रूप से सक्रिय  हो जाते हैं और तब उस रोग ग्रस्त व्यक्ति के लिए अपने पर अपने मन मष्तिष्क पर काबू रखना असंभव हो जाता है। स्कूल, अस्पताल, घर , रेल , बस , टैक्सी, ऑटो किसी भी स्थान पर ये अपने काम को अंजाम देने के लिए विवश हो जाते हैं। इसमें पहले समय में तो सिर्फ अनपढ़ और दबंगों को ही इसका शिकार देखा जाता था लेकिन अब तो विवेकपूर्ण और उच्च शिक्षित लोगों को भी इसका शिकार होते देखा जा रहा हैं। इसमें पद, शिक्षा और प्रतिष्ठा सब कुछ इसके कीटाणुओं के सक्रिय  होते ही विवेक को हर लेते हैं और तब शिक्षक , डॉक्टर , संरक्षक , मालिक या फिर कोई श्रमजीवी होने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता है।  व्यक्ति इसमें बिलकुल दिग्भ्रमित होकर कार्य करने लगता है। छात्र  वर्ग में तो यह हवा की तरह से फैल रहा है। अब तो इसने अपने पैर ऐसे फैलाने शुरू कर दिए हैं कि सामूहिक दुष्कर्म की घटनाएँ दिन पर दिन बढती जा रही हैं। अगर हम एक दिन का अख़बार उठा कर देखें तो हमें कई जगह पर कई घटनाएँ मिल जायेंगी और ये वही घटनाएँ है जिन्हें पुलिस ने दर्ज किया है और वे जो दर्ज की ही नहीं जाती हैं या फिर अपनी इज्जत की झूठी शान के चलते लोग पुलिस तक पहुँचाना ही नहीं चाहते हैं या फिर दबंगों के प्रभाव में दबा दिए जाते हैं , उनका इससे कोई भी लेना देना नहीं है।
                ऐसी घटनाएँ तो होती ही रहती हैं और दब जाती हैं बगैर किसी निर्णय के। ये कोई अनोखा मामला तो नहीं है जो ऐसा बवाल मचाया जा रहा है।   लेकिन अब सामूहिक दुष्कर्म के मामले  इतना तूल  क्यों पकड रहे  है क्योंकि निर्भया काण्ड के बाद से जो कुछ भी कानून ने किया बहुत संतोष जनक तो नहीं है लेकिन अब लड़कियों और उनके संरक्षकों ने इस अन्याय के खिलाफ मुंह खोलना शुरू कर दिया है और जैसे ही उन लोगों ने ये हिम्मत दिखाई , अपराधियों ने पीड़िता को ही नहीं बल्कि उनको परिवार और पैरोकारों को मारना और मरवाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों का कहना है कि  ये सब मीडिया की महिमा है, नहीं तो ऐसे कितने मामले अदालतों में पड़े हैं और वर्षों से निर्णय के लिए तरस रहे हैं। लेकिन कुछ  मामलों में अमानुषिकता की सारी  हदें पार हो गयीं और फिर जब यह महामारी अपनी पराकाष्ठा  पर पहुँच गयी है तो फिर कुछ तो इसके लिए आवाज उठाएंगे ही। अब जब ये बीमारी बुरी तरह से फैल चुकी है और इसको नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है . इस बात को समाज में सिर्फ आधी आबादी ने ही महसूस नहीं किया है बल्कि इस महामारी से बचे हुए युवा भी इस के निदान के खोज के लिए प्रयत्नशील हो रहे हैं। राजनीति के ठेकेदार और न्याय के पैरोकार अभी भी इस मामले को इतना गंभीर नहीं मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार इस काम के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि  सांसद शीतकाल का मजा अपने घरों में उठा रहे हैं फिर क्यों बेवजह परेशां हों? इसके लिए वर्मा समिति को नियुक्त कर दिया गया ,  जिससे सारे मामले को ध्यान में  रखते हुए उसके लिए निर्णय की संस्तुति वही करेगी।  लेकिन उसके निर्णयों को कितना माना जा रहा है।
                 इस महामारी को नियंत्रित करने के लिए प्रयास तो करने ही पड़ेंगे नहीं तो मानव जाति  का अस्तित्व  खतरे में पड  जाएगा हम इसके लिए समुचित इलाज को खोजने में प्रयत्नशील है कि ऐसा कुछ हो जाय कि ऐसे महामारी से ग्रस्त लोगों के लिए एक सबक बन जाय तो फिर कुछ सुझाव हम भी तो खोज ही सकते हैं-----

1. फास्ट ट्रेक कोर्ट का गठन (जिसके लिए सरकार सहमत हो रही है। )
2. पुलिस चार्जशीट कम से कम समय में तैयार करके कोर्ट में प्रस्तुत करे।
3.  इसके लिए रोज सुनवाई की जाए ताकि न्याय जल्दी मिले। 
4. इसके लिए आरोपित व्यक्ति की जमानत उसके निर्दोष साबित होने के पहले न की जाय।  हाल ही में जमानत पर आये अपराधियों ने पीड़िता को जला दिया।
5 . पीडिता का सम्पूर्ण इलाज सरकारी खर्च पर कराया , चाहे इसके लिए उसे कहीं भी भेजना पड़े। 
6 . इस महामारी के रोगी के लिए फाँसी की सजा उचित इलाज नहीं है क्योंकि वह कुछ ही समय में अपने सारे कष्ट से मुक्त हो जाएगा  अगर वह वास्तव में महामारी से ग्रस्त पाया जाता है तो उसको अंग-भंग  का दंड दिया जाय। 
7. आरोपियों के निम्न अदालत , उच्चा न्यायलय  सर्वोच्चा न्यायलय से दोषी घोषित होने के बाद कोई भी पुनर्विचार याचिका या दया याचिका का प्रावधान नहीं होना चाहिए। 
8. सौ दिन के अंदर इनके भविष्य का निर्णय होना आवश्यक है।
9  . इस महामारी से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर के बाहरी हिस्से पर जिस पर सीधी दृष्टि पड़े - जैसे चेहरे पर स्थायी रूप से ऐसा कोई निशान बना दिया जाय जिससे उसके इसा रोग से ग्रस्त होने का पता चलता रहे। ऐसे लोगों का चेहरा देखते ही उनसे सावधान रहा जा सके 
10 . वह निशान ऐसे लोगों को सामान्य लोगों के तरह से नागरिक अधिकारों से वंचित  करने के लिए पर्याप्त होने चाहिए।  ठीक वैसे ही जैसे कहा जाता है कि वह भारत का नागरिक हो पागल और दिवालिया नहीं होना चाहिए ठीक इसी तरह से वह इस महामारी से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।
11 . ऐसे लोगों के परिवार में कोई अपनी बेटी न दे बल्कि इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए
12 . इन्हें कोई अपने संस्थान  में प्रवेश या फिर नौकरी न दे।
                       अगर इन सब  पर अमल किया जाय तो फिर ऐसे लोगों को देख कर और चिन्हित होने के भय  से लोगो  में फैल रही इस महामारी पर स्वतः अंकुश लग जाएगा।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

विश्व मानवाधिकार दिवस !

                         
 
चित्र गूगल के साभार
              आज 10  दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में जाना जाता है . इस दिवस की नींव विश्वयुद्ध की विभीषिका से झुलस रहे लोगों के दर्द को समझ कर और उसको महसूस कर संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को सार्वभौमिक मानवाधिकार  घोषणापत्र अधिकारिक मान्यता प्रदान की। तब से यह दिन इसी नाम से यद् किया जाने लगा। 
                   अगर हम आज ही पेपर उठा कर देखे तो पता चलेगा की कितने मानवाधिकारों का हनन मानव के द्वारा ही किया जा रहा है। मानव के द्वारा मानव के दर्द को पहचानने और महसूस करने के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं होती है . अगर हमारे मन में मानवता है ही नहीं तो फिर हम साल में पचासों दिन ये मानवाधिकार का झंडा उठा कर घूमते रहें कुछ भी नहीं किया जा सकता है। ये तो वो जज्बा है जो हर इंसान के दिल में हमेशा ही बना रहता है बशर्ते की वह इंसान संवेदनशील हो। क्या हमारी संवेदनाएं मर चुकी है अगर नहीं तो फिर चलें हम अपने से ही तुलना शुरू करते हैं कि  हम मानवाधिकार को कितना मानते हैं?  क्या हम अपने साथ और अपने घर में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं ? 

                                   जब हम खुद ही अपने अधिकारों से वाकिफ नहीं हैं तो फिर मानवाधिकार का प्रयोग कैसे जान सकते हैं? जब हम अपने अधिकारों से परिचित होते हैं तभी तो उनको हासिल करने के लिए प्रयास कर सकते हैं . जब हमने अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए संकल्प लिया तो वह  दूर नहीं होता कि साथ  हम अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। जब एक आवाज अपने हक को पाने की लिए उठती है और उस आवाज में बुलंदी होती है तो लोग खुद ब खुद उस आवाज का साथ  देने  लगते हैं। इसके लिए अब अकेले लड़ने की जरूरत भी नहीं है बल्कि विश्व स्तर पर ही नहीं बल्कि हर देश और राज्य में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आयोग बने हुए हैं। अब देखना यह है की इन आयोगों को किस आधार पर मानव को न्याय पाने के लिए सहायता करनी होती है। 
               मानवाधिकारों का औचित्य और स्वरूप 
           मानव के जन्म लेने के साथ ही उसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ अधिकार उसको स्वतः मिल जाते हैं और वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इस दुनियाँ में प्रत्येक मनुष्य के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिकार एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त हो जाता है। चाहे वह अपने हक के लिए बोलना भी  जानता हो या नहीं . एक नवजात शिशु को दूध पाने का  अधिकार होता है और तब वह बोलना भी  नहीं जानता  लेकिन माँ उसको स्वयं देती है और अगर नहीं देती है तो उसके घरवाले , डॉक्टर सभी उसको इसके लिए कहते हैं क्योंकि  ये उस बच्चे का हक है और ये उसे मिलना ही चाहिए। एक बच्चे के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ये  जरूरत  सबसे अहम् होती है। लेकिन उसके बड़े होने के साथ साथ उसके अधिकार भी बढ़ने लगते हैं . बच्चा पढ़ने लिखने अपनी परवरिश के लिए उसको समुचित सुविधाएँ और वातावरण भी मिलना भी उनके जरूरी अधिकारों में आता है। उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए , अपने विकास के लिए और आगे बढ़ने के लिए कुछ हालत ऐसे चाहिए  जिससे की उनके रास्ते  में कोई व्यवधान न आये . पूरे विश्व में इस बात को अनुभव किया गया है और इसी लिए मानवीय मूल्यों की अवहेलना होने पर वे सक्रिय  हो जाते  हैं।   इसके लिए हमारे संविधान में भी उल्लेख किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14,15,16,17,19,20,21,23,24,39,43,45 देश में मानवाधिकारों की रक्ष करने के सुनिश्चित हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इस दिशा में आयोग के अतिरिक्त कई एनजीओ भी काम कर रहे हैं और साथ ही कुछ समाजसेवी लोग भी इस दिशा में अकेले ही अपनी मुहिम चला रहे हैं। 
                        सामान्य रूप से मानवाधिकारों को देखा जाय तो मानव जीवन में भोजन पाने का अधिकार , शिक्षा का अधिकार , बाल शोषण , उत्पीडन पर अंकुश , महिलाओं के लिए घरेलु हिंसा से सुरक्षा, उसके शारीरिक शोषण पर अंकुश , प्रवास का अधिकार , धार्मिक हिंसा से रक्षा आदि को लेकर बहुत सरे कानून बनाये गए हैं . जिन्हें मानवाधिकार की श्रेणी में रखा गया है . 

                                               मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाये गए और उनको लागू करना या करवाने के लिए प्रयास भी हो रहे हैं लेकिन वह सिर्फ  कागजी दस्तावेज  बन कर रह गए हैं। समाज में होने वाले इसके उल्लंघन के प्रति अगर मानव ही जागरूक नहीं है तो फिर इनका औचित्य क्या है? हम अपने घरों में काम करवाने के लिए छोटे छोटे बच्चों बच्चों को रखना पसंद करते हैं क्योंकि उनकी जरूरतें कम होती हैं , वे गरीब परिवार से होते हैं इसलिए उन्हें कुछ भी कहा जाय या दिया जाय वे आपत्ति करने की स्थिति में नहीं होते हैं। छोटी छोटी बच्चियां घरों में भारी भरकम काम करती   मिल जायेंगी। सिर्फ घर में ही नहीं बल्कि कारखानों में काम करने के लिए महिलायें 10 से 12 घंटे काम करती हुई मिल जायेंगी। भवन निर्माण में लगी महिलायें अपने छोटे छोटे बच्चों को कहीं जमीन पर लिटा कर काम करती हुई मिल जायेंगी और उन्हें अपने बच्चे को दूध पिलाने की भी छुट्टी नहीं दी जाती है। पैसा उन्हें पुरुषों की अपेक्षा कम मिलते हैं। इस दिशा में कहाँ हैं मानवाधिकार? 
                         छोटे छोटे बच्चे कारखानों में काम करते मिल जायेंगे , वे बच्चे जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा है। गरीब है तो घर में पैसे लाने के लिए घर वालों के द्वारा काम पर भेज दिए जाते हैं। सड़क पर नशे की चीजों को बेचते हुए बच्चे किस दृष्टि से मानवाधिकार के उल्लंघन का प्रतीक नहीं है।
                     घर में महिलाओं के साथ हो रहे घरेलु हिंसा की घटनाएँ  क्या हैं?  हम दंभ भरते हैं कि  नारी सशक्तिकरण हो रहा है, महिलायों की स्थिति सुधर चुकी है , वे आत्मनिर्भर हो अपने स्थान को सुरक्षित कर रही हैं लेकिन सच इसके विपरीत है  सिर्फ कुछ प्रतिशत महिलायें हैं जो आत्मनिर्भर हो कर अपने बारे में सोचने और करने के लिए स्वतन्त्र है, नहीं तो उनकी कमाई  भी घर के नाम पर उनसे ले ली जाती है और उनको मिलता है सिर्फ अपने खर्च भर का पैसा।
                     महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण के प्रति क़ानून बने है लेकिन फिर भी इसकी घटनाओं में कोई भी कमी नहीं आ रही है . उन्हें सुरक्षित रहने और इज्जत से जीने का अधिकार तो मानवाधिकार दिलाता ही है लेकिन उन्हें मिलता कब है? जिन्हें उन सबकी डोर थमाई गयी है वे ही कभी कभी उसका हनन करते हुए पाए जाते हैं।
                                        
           आज भी बचपन भूख से बिलखता हुआ और शिक्षा से बहुत दूर जी रहा है . प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन वे अभी तक अपर्याप्त हैं। उनका लागू होने में बहुत देर है अभी। अभी देश का बचपन अपने लिए जमीन तलाश कर रहा है . उनके अधिकारों का हनन हम कर रहे हैं। 
                    बड़े बड़े समाजसेवी लोगों के घर में महिलाओं के शोषण , बाल शोषण  की घटनाएँ हुआ करती हैं . वे सफेदपोश लोग ही मानवाधिकारों का हनन कर रहे होते हैं। हम उन्हें उसके रक्षक समझ रहे होते हैं लेकिन वे न्याय नहीं कर रहे होते हैं। उनके खिलाफ बोलने का साहस भी लोग नहीं कर पते हैं।
                हम और दिनों की तरह से इस दिन को भी एक रस्म समझ कर निभा लेते हैं लेकिन खुद को नहीं बदल पते हैं।  किसी के प्रति न्याय करने के लिए पहल भी अगर कर सकें तो एक एक कदम कुछ तो सुधर ला सकता है। बस हमेशा के तरह से ये संकल्प तो ले ही सकते हैं कम से कम हम तो इन मानवाधिकारों का हनन करने की कोशिश नहीं करेंगे 

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

दफन होने का अधिकार !

                      हमारे देश के संविधान में सभी को कुछ मौलिक अधिकार मिले हैं, जिनमें जीवन में होने वाली सभी जरूरतों को शामिल किया गया है। कमोबेश सभी किसी न किसी तरह से जी भी रहे हैं . घर नहीं तो सीमेंट के बड़े बड़े पाइप में घर बसा कर बरसात और सर्दी से बचने के लिए जी रहे हैं। मलिन बस्तियों में बांस और पालीथीन के सहारे टेंट की तरह बनाये घरों में अपने परिवार के साथ जीवन गुजार  रहे हैं। लेकिन वे जी रहे हैं चाहे एक छोटे से कमरे में 20 लोग जी रहे हों। जी रहे हैं घर में जगह नहीं है तो पार्क में , फुटपाथ पर , पेड़ों के नीचे रात गुजार ही लेते हैं और दिन में तो कोई मुकम्मल जगह की जरूरत ही नहीं है . इंसान कहीं भी काम पर जाकर या अपने लिए रोजगार खोजने या करने के लिए कहीं न कहीं तो चला ही जाता है।  जीने के लिए समस्या नहीं है - हम जिस समस्या की बात करने जा रहे हैं वह मेरी दृष्टि में तो आज तक नहीं गुजरी है क्योंकि मरने के बाद भी इंसान को दो गज जमीन की जरूरत को हम सदियों से स्वीकार करते चले आ रहे हैं। जिन्दगी में उसे रहने की अपनी जमीन न मिले लेकिन मरने पर तो उसके लिए वे लोग उसे जमीन मुहैय्या कराते  हैं वह भी तब जब कि  वह उसकी मांग नहीं कर रहा होता है,  लेकिन ये हमारा नैतिक दायित्व होता है कि  उस दिवंगत को दफन होने की जगह दी जाये 
                      अगर हम ये कहें कि  अब हमारे देश में ही बल्कि देश ही क्यों कहें ? उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के गृह जनपद में ऐसे जगह है जहाँ पर लोगों को दफन होने की जगह नहीं है। ये जगह है इटावा  जिले में चकरनगर के तकिया मोहल्ला . जहाँ पर दो परिवारों के रहने से शुरुआत हुई थी और धीरे धीरे आबादी बढती गयी और अब उन्हें अपने परिवार वालों को दफनाने के लिए जगह नहीं मिल रही है . हकीकत ये है कि  यहाँ पर हर घर में एक कब्र बनी हुई है। और कब्र के होने पर उसके साथ कुछ धार्मिक आस्थाएं भी जुडी होती हैं . उसको कोई लांघें नहीं और उसके  कुछ बनाया भी नहीं जाना चाहिए . यहाँ पर लोग घर के कमरों में , गुसलखाने में , दरवाजे के पास हर जगह कब्र बनाये हुए हैं . कब्र के बगल में बैठ कर खाना बना रहे होते हैं , सो रहे होते हैं। बच्चों की कब्र दरवाजे के पास बना देते हैं क्योंकि बच्चों के लिए जगह कम  लगती है। यहाँ घर वालों को घर में ही दफन करने के लिए मजबूर लोग कहाँ जाएँ? और कैसे जियें ? 
                      क्या सरकार मीलों लम्बे जंगल में से कुछ जगह भी इन दिवंगत लोगों के दफन होने के लिए देने की व्यवस्था नहीं कर सकती है ?  बड़े बड़े स्टेडियम, पार्क और गाँव को राजधानी बना देने वाले शासक अपने ही जनपद में लोगों के दफन होने के अधिकार को बहाल  नहीं कर  सकते हैं। अभी धरती इतनी छोटी नहीं है कि मरने के बाद इंसान के लिए दफन होने की जगह भी न मिल सके वे भी इंसान ही है  अपने ही घर में दफन करके उनके साथ ही जीने के लिए लोग मजबूर हैं। बड़ी बड़ी बातें और बड़े बड़े वादे  करने वाले ये सरकार के नुमाइंदे आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को समझने के लिए तैयार ही कहाँ है? यहाँ पर कोई एकडों जमीन पर बने बंगले  को सिर्फ अपने परिवार के रहने के लिए छोटा बता कर बड़े की मांग कर रहा है और कहीं वे अपने घर के सदस्य को मरने के बाद भी कहीं दो गज जमीन मुहैय्या नहीं करवा पा  रहे हैं।
                  हम लोकतंत्र में जी रहे हैं लेकिन जीने के अधिकार को खोने के बाद अब मरने के बाद दफन होने का हक भी खो रहे हैं।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ये कैसे सुधारगृह ?

एक संरक्षा गृह (चित्र गूगल के साभार )
                  


                      करीब करीब हर शहर में नारी सुधार  गृह , नारी निकेतन , बालिका गृह या अनाथालय जैसे संस्था सरकारी और अर्ध सरकारी स्तर के संस्थान मिल जायेंगे . जिनमें कभी कभी न्यायलय द्वारा विशेष स्थितियों में फँसी हुई लड़कियों और महिलाओं को रखने का आदेश दिया जाता है . कुछ घर से भागी हुई , अनाथ , पहली बार अपराध में लिप्त पाई जानेवाली नाबालिग लड़कियाँ या फिर परित्यक्ता लड़कियाँ जिन्हें किसी भी परिवार में शरण नहीं मिलती है उनको इन संस्थाओं में रखा जाता है। 
                  संस्थाओं को सम्बद्ध मंत्रालय द्वारा पूर्ण सहायता प्राप्त होती है। राज्य सरकार के द्वारा भी अनुदानित राशि मिलती है। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस तरह के गृह खोल कर संरक्षण प्रदान करती हैं . वहां पर भी  सरकार के द्वारा अनुदान प्राप्त होता है . इन  संरक्षा गृहों में  क्या होता है कि  वहां से मौका मिलने पर लड़कियाँ भाग जाती हैं या फिर भागने के प्रयास में पकड़ी जाती हैं। उन्हें पकड़ लिया जाता है और फिर पुलिस और वहां का स्टाफ मामले पर लीपापोती करके मामले को दबा देती हैं लेकिन किसी एक ही संस्था में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति किस और संकेत करती  है ? क्या इन संरक्षा गृहों में ये अनियमितताएं पायीं जाती हैं --
*क्या  सरक्षा गृह सिर्फ एक कैद बना कर छोड़ दिए जाते हैं , जिनके अन्दर ही उन्हें किसी भी हाल में रहने के लिए मजबूर किया जाता है ?
* क्या बाहरी दुनियां से उनका संपर्क नहीं होता है . अगर होता है तो फिर उस स्थान की संरक्षिका के आदेश पर ही। 
*क्या उनको काम के नाम पर संस्था के द्वारा बाहर  भेजा जाता है और वह भी वहां के कर्मचारियों की इच्छा के अनुसार .
*क्या उन्हें वहां के अधिकारीयों , कर्मचारियों के द्वारा उत्पीडित  किया जाता है जिससे ऊब कर भागने का प्रयास करती हैं ? 
*हो सकता है काम के नाम पर उनका शोषण किया जाता हो।
*क्या इन संरक्षा गृहों में कभी सरकारी निरीक्षण किया जाता है और निरीक्षण के समय वहां की संवासनियों को अपनी बात को निर्भीक रूप से कहने का अधिकार है। 
*क्या उनको अपनी इच्छानुसार पढ़ने , काम करने या फिर कुछ समय के लिए उस गृह से बाहर जाने की अनुमति प्राप्त होती है ? 
*क्या वहां पर सारे कर्मचारी सहयोगपूर्ण रवैया अपनाते हैं?
*क्या इन संरक्षा गृहों में पुनर्वास के द्वारा वहां रहने वाली लड़कियों को एक नया जीवन जीने का अवसर प्रदान करने के बारे में पहल जैसे कोई प्रयास भी किया जाता है।
*क्या उनके रहने , खाने और काम करने के लिए स्वस्थ वातावरण प्रदान किया जाता है?
                           फिर अगर किसी एक ही संस्थान से लड़कियों के भागने की घटना बार बार होती रहे और वह भी कुछ ही महीने के अनंतर में तो फिर संस्थान के ऊपर प्रश्नचिह्न उठ खड़े होना स्वाभाविक है। सारी  दुनियां से उपेक्षित या फिर अनाथ नारी एक सुरक्षित छत की कामना  करती है लेकिन जहाँ वह छत ही उनके मन में पलने वाली  सम्मान के जीवन जीने की तमन्ना चूर चूर हो जाये तो फिर वे अपने जीवन को दांव पर लगा कर कुछ भी करने के लिए मजबूर हो जाती हैं वे इस बात से भी वाकिफ होती हैं कि  अगर वे पकड़ी गयीं तो उनका जीवन और भी अधिक नरक बना दिया  जाएगा . इस  लेख को लिखने के लिए आधार  बना एक समाचार  -- मुंबई में मानखुर्द स्थित नवजीवन नारी सुधार गृह से कल 8 लड़कियाँ भाग निकली सिर्फ कल ही नहीं बल्कि इससे पूर्व 10 सितम्बर को भी 17 लड़कियाँ फरार हो गयीं थी 20 अक्टूबर को 35 लड़कियों ने भागने का प्रयास किया और 22 उसमें सफल हो गयीं।  कल भागी हुई लड़कियों को बार, पब और मसाज पार्लर से पकड़ा गया . 
                  इससे बहुत सारे  सवाल उठ खड़े होते हैं - क्या लड़कियों को पब, बार या मसाज पार्लर में पहले भी भेजा जाता रहा है या फिर वहां से जुड़े हुए लोग उनके संपर्क में रहे होंगे ताकि वे यहाँ से भाग कर वहां पहुँच गयीं। लड़कियों को एक सामान्य जीवन जीने लायक सुविधाएँ भी मुहैय्या नहीं हो रही हैं, जिससे कि वे उसके लिए लालायित रहती हैं और अवसर मिलने पर भागने का प्रयास करती हैं। कभी उन लड़कियों से भी यह जानने  का प्रयास किया जाता  है कि  वे चाहती क्या है?  अगर नहीं तो उस बंदीगृह जैसे संरक्षा गृहों में ऐसे ही भागने का प्रयास करती रहेंगी .  जब ऐसे गृहों में ऐसी कोई घटना हो जाती है तो महिला आयोग भी सक्रिय  दिखलाई देता है कभी उसने ऐसे संरक्षा गृहों की गतिविधियों और जीवनचर्या के जीवन के बारे में जानने के विषय में कोशिश की शायद नहीं . कितने ऐसे संरक्षा गृहों में लड़कियों को होटलों और तथाकथित समाजसुधारकों और सफेदपोशो के के दिल बहलाने के लिए होटलों और बंगलों में भेजा जाता है . वे निराश्रित , असहाय और मजबूर लड़कियाँ इसके खिलाफ बोलने का साहस  भी नहीं रखती हैं।  हाँ ऐसे ही जीवन जीने के लिए मजबूर होती हैं। ऐसे गृहों को अनुदान की लम्बी चौड़ी राशि  भी मिलती रहती है और कर्मचारियों और अधिकारियों की जेबें भी गर्म होती रहती हैं। 
                      कहीं कहीं तो ऐसे संरक्षा गृहों में वहां के कर्मचारियों के द्वारा ही नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण होता रहता है और वे बच्चियां जो इसका अर्थ भी नहीं जानती है इससे त्रसित जीती रहती हैं और तारीफ की बात ये है कि  नारी संरक्षा या बालिका सुधर गृहों में पुरुष कर्मचारियों की नियुक्ति दिन और रात  दोनों में ही गृहों के भीतर दर्ज होती रहती है। वहां की संरक्षिका भी इससे बेखबर रहती हैं क्योंकि रात में वे अपने घर में रहती हैं। संरक्षा गृह ऐसे ही लोगों के सुपुर्द करके। बच्चियां या कहें  इसके विपरीत नारी भी घर में सुरक्षित नहीं , संरक्षा गृहों में सुरक्षित नहीं ,  बाहर निकालने पर भी नहीं फिर हम अपने देश में क़ानून के द्वारा नर और नारी दोनों को समान जीवन जीने के अधिकार का अतिक्रमण होते हुए क्यों देख रहे हैं? कोई भी सरकार ये कोशिश नहीं कर पाती  है कि ऐसी घटनाओं को त्वरित रूप से न्याय के लिए समय सीमा निर्धारित कर सके . जब तक न्याय और कानून व्यवस्था इसकी और सार्थक कदम नहीं उठाएगी इसी तरह से लड़कियाँ त्रसित होकर भागती रहेंगी या फिर अपना शोषण करवाती रहेंगी। वे वहां से भाग कर भी सुरक्षित कहाँ होंगी ? वे या तो ऐसे ही बार पब या मसाज पार्लर में पहुच कर अपने शोषण के दूसरे रास्ते  पर चल कर किसी और गिरोह के चंगुल में फँस कर शोषित होती रहेंगी और एक जगह से निकल कर दूसरी जगह कैद हो जायेंगी। 
                  इन संरक्षा गृहों में उन्हें रख कर आत्मनिर्भर बनाने का काम सिर्फ कागजों में हो रहा है और वास्तव में ऐसे गृह है भी जहाँ पर इनसे विभिन्न काम लिए जाते हैं और फिर उसको बाजार में रख कर उस लाभ से इन्हें  भी हिस्सा दिया जाता है। वे आत्मविश्वास से भर कर आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का सपना देख सकती हैं . इन्हें एक नया जीवन जीने का अवसर भी प्रदान किया जाता है , उनका घर  की भी व्यवस्था के जाती है। यहाँ पर लड़कियों को बेटी की तरह से ही रखा जाता है और  ही उन्हें वर के साथ विदा भी कर दिया जाता है। काश!  देश के सारे संरक्षा गृहों को वास्तव में घर बना दिया जाय ताकि जिस उद्देश्य से इन्हें बनाया गया है वे वास्तव में उन्हें  कर सकें 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

जागरण की संस्कारशाला !

                    आज के परिवेश में जब आज की पीढी को देखते हैं या फिर आज की नयी पौध को देख कर यही कहते हुए सुनते हैं कि  पता नहीं कैसे संस्कार पाए है ? बच्चों को हम अपनी दृष्टि से कभी सुसंस्कृत नहीं पाते  हैं लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि  ये संस्कार बच्चों को मिलें कहाँ से? परिवार , समाज, स्कूल और अपने परिवेश से - लेकिन अगर हम खुद को इस कसौटी पर कसे तो ये ही पायेंगे कि जहाँ हम संस्कारों की बात करते हैं वहां पर कितनी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में पूर्णरूप से शायद हम भी परिचित नहीं है। फिर कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ये भी जरूरी नहीं की हमारे बड़े सम्पूर्ण हों और उनसे छोटे हमेशा उनसे कम ज्ञान ही रखते हों। वे भी हमें सिखा सकते हैं। 
                    मैं बात दैनिक जागरण के द्वारा आरम्भ की गयी संस्कारशाला के बारे में कर रही हूँ। इस बारे में पहले भी विभिन्न वर्गों में बाँट कर दैनिक जागरण द्वारा संस्कारशाला प्रस्तुत की गयी थी लेकिन इस बार उसके स्वरूप को बदल कर जिस उद्देश्य और लक्ष्य को सामने रख कर प्रस्तुत किया जा रहा है उससे हम सिफ बच्चों से ही नहीं बल्कि बड़ों से भी बहुत कुछ सीखने की अपेक्षा करते हैं। ये संस्कारशाला जो शुरू की गयी है संग्रहणीय  है और साथ ही इसको घरों और स्कूलों में संचित करके रखा जाय और बच्चों को इसके बारे में पूर्णरूप से परिचित करने का संकल्प घर परिवार और स्कूल द्वारा ठान  लिया जाय तो फिर वह दिन दूर नहीं जब कि  हम अपने समाज में बढती हुई उत्श्रंख्लता , अनुशासनहीनता और बड़ों के प्रति अनादर और उपेक्षा के भाव से उनको पूरी तरह न सही लेकिन बहुत हद तक दूर ले जाने में सफल हो सकेंगे .
                 हम सिर्फ बच्चों की बात ही क्यों करें बल्कि इस में दर्शाए जा रहे बहुत से संस्कार ऐसे हैं जो की समय के साथ उपलब्ध होने वाली सुविधायों से जुड़े हैं और वे हमने न अपने बचपन में सीखे हैं और न ही देखे हैं वे तो हमारे लिए भी उपयोगी हैं। इसको संग्रहनीय मान कर सभाल कर रखा जाय तो फिर ये आज भी नहीं बल्कि जैसे नैतिकता के मूल्य कभी बदलते और कम नहीं होते वैसे इन संस्कारों का मोल कभी कम नहीं होता बल्कि पढ़ने वाले को कभी कभी कुछ बातें ऐसे प्रभावित करती हैं कि हमारे अंतर में छिपे हुए गलत विचार आर धारणाएं अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं।  
                       मेरा अपना अनुभव है कि अगर इसको ध्यानपूर्वक पढ़ कर उसका विश्लेषण करे तो पायेंगे किये ये वह संस्कार हैं जो हमें ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति को संस्कारित बनाने में सही अर्थों में सहायक होते हैं। आप चाहे घर के बुजुर्ग हों , स्कूल के शिक्षक हों या फिर किसी भी ऑफिस में काम करने वाले जिम्मेदार अधिकारी - इनको अपने परिवेश में फैला कर वहां के वातावरण को और लोगों को नैतिक मूल्यों से अवगत करा कर अपने एक जिम्मेदार नागरिक , परिवार के सदस्य , स्कूल में गुरु शिष्य की परंपरा निभाने वाले गुरु साबित ही नहीं होंगे बल्कि इसके वर्तमान स्वरूप में पालने वाले दूषित वातावरण को प्रदूषण से मुक्त कर पाने में सहायक होंगे। 
             ये मीडिया द्वारा किया गया सार्थक प्रयास है जिसको जन जन तक पहुँचाने और  आम जन जीवन को एक सार्थक दिशा में मोड़ने की और नैतिकता से जोड़ कर सभ्य और सुसंस्कारित समाज के रूप में देखने और बदलने की मंशा को लेकर किया गया है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

राजकोष से राजनीति !

                   आज एक हैडिंग पढ़ी - "वादे सुनकर फूल गए , सरकार बनी तो भूल गए "  ऐसा तब होता है जब की जल्दी ही दुबारा मत के लिए जनता जनार्दन के सामने झोली न फैलानी हो और अपने ऊपर अंकुश लगाने वाला भी कोई न हो क्योंकि जनता तो ठग चुकी होती हैं . जब उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के बनाने का अवसर था तब उनको यह पता था कि  अभी उनको केंद्र के लिए मत के लिए इन लोगों के बीच फिर से आना होगा और उसने अपने किये वादों को पूरा करने की कोशिश पूरी की भले ही उसमें उसने अपने वादे के मुताबिक न रख कर फिर से उसके स्वरूप और उद्देश्य को बदल दिया हो। 
                    सत्ता में आकर सरकार पूरे राजकोष को खर्च करने की हकदार होती है और फिर शुरू होता है उसके वादों को पूरा करने का अवसर . पूर्व सरकार ने राजकोष को अपने नाम को और दल को अमर बनाने के लिए उडा  डाला और राज्य के विकास में कितने प्रतिशत खर्च हुआ इसका आकलन करने वालों की कोई औकात ही नहीं होती है क्योंकि प्रजातंत्र में एक निरंकुश सरकार को चलाने  के लिए सदन में बहुमत होने की जरूरत होती है और फिर थोड़े से लाभ या पद के प्रलोभन में वे राज्य और अपने क्षेत्र के हितों को गिरवी रखने में नहीं चूकते हैं। राजकोष को खाली करके अपने वादों को पूरा करने के लिए प्रयोग करके वाहवाही लूटना अधिक आसान  होता है। अपनी गाँठ का क्या जाता है? एक हाथ से आधा  पैसा दिया और दूसरे हाथ से 10 पैसे वसूल कर लिए लेकिन राजनीति  की इन चालों से दूर आम आदमी सिर्फ सर पटकता रह जाता है . राजनीति  में राजकोष सबसे पहले प्रयोग किया जाता है। हम कहते हैं कि  अरे इस सरकार ने तो कम से कम इतना तो अच्छा किया लेकिन वह किसी भी सरकार की कृपा नहीं होती है बल्कि वह हमारे ही पैसे पर अपनी मुहर लगा कर हमें देते हुए दिखलाई देते हैं। 
                      उत्तर प्रदेश की सरकार  ने कुछ ही महीनों में अपने किये वादों में से कुछ को पूरा करना आरम्भ किया लेकिन जितनी तेजी उसने दिखाई शायद कोई और होता तो अभी इसमें वक्त लग जाता लेकिन क्या हम ये सोच सकते हैं कि हर पार्टी के पास अपना एक अलग कोष होता है और वह कोष राजकोष से अलग होता है और हर दल के पास अकूत संपत्ति होती है क्या कभी किसी भी दल ने अपने निजी कोष से जनहित में कुछ पैसे भी खर्च किये सिर्फ उस समय को छोड़ कर जब चुनाव होने वाले हों। क्योंकि तब तो वे महिलाओं के लिए साडी , बच्चों के लिए किताबें या कपडे देने के लिए दानदाता बन जाते हैं लेकिन सत्ता पर काबिज होने के बाद किस दल ने अपनी कोष से जनहित में कुछ भी खर्च किया है। राजकोष से राजनीति करना सबको आता है और फिर हम अपनी पीठ थपथपाते रहे - ये कुछ लोगों को तो रिझा सकता है लेकिन जब राजनीति  के लटके झटकों के बाद आम आदमी रहत महसूस करने के बजाय त्राहि त्राहि करने लगे तो उसको हम क्या कहेंगे? 
                        लड़कियों को 30 हजार की एकमुश्त रकम देकर उसने वाहवाही लूटी लेकिन वह 30 हजार कितने दिनों तक उस परिवार को राहत  दे पायेगा . उसमें भी कितने सम्पन्न लोगों के घर गया होगा ये धन और उनके लिए इस धन की कोई भी कीमत नहीं है। इस धन को बांटने के लिए उनकी पात्रता के लिए उनकी स्थिति  को जान  लिया जाता तो शायद कुछ और परिवार इससे लाभान्वित होकर कुछ राहत महसूस कर पाते . 
                  बेरोजगारी भत्ता मिला लेकिन क्या ये रोजगार मिलने से बेहतर विकल्प नहीं हो सकता है। लोगों ने साम दाम दंड भेद सब कुछ इस्तेमाल करके अपने आपको इसके लिए सुपात्र घोषित कर दिया है। सरकार  की घोषणाओं  के साथ  उसके लिए जुगाड़ भिड़ाने लगते हैं और फिर शुरू होता है उसके लिए लाभ प्राप्त करने के लिए जुगाड़ की जुगत करने की प्रक्रिया जिसने जुगाडू लोग सफल हो ही जाते हैं। रोज नयी घोषणायें सरकार के लिए एक नयी छवि बनाने की पहल है और उसकी पृष्ठभूमि को और सुदृढ़ बनाने के लिए काफी है। सारी परियोजनाएं और सुविधाएँ प्रदेश के सिर्फ एक ही जिले में केन्द्रित करके ये राजकोष का दुरूपयोग करने के सिवा कुछ और नहीं कर रहे हैं। पूर्व सरकार और इनमें बस  इतना सा अंतर है कि उसने पत्थरों  को तराश कर अपनी छवि बनायीं और ये सिर्फ गृह नगर को राजधानी बनाने के काम को छोड़ कर सब कुछ बनाने पर राजकोष खाली कर रहे  हैं। अभी राज्य में ये हाल है जब ये केंद्र पर काबिज हो गए तो फिर ??????????????

                      इस को समझने के लिए सजग होने की जरूरत आम आदमी को है , सिर्फ आँख बंद करके मृग मरीचिका के झांसे में आने के पहले खुद इस बात पर गहन विचार करें कि दल की नीतियों का इतिहास क्या है? उसकी आज केंद्र की नीतियों में सहभागिता कितनी है? कितनी जनहित में आने वाले विधेयकों के प्रति दल सहिष्णु है या फिर वह अपने दल के निजी स्वार्थों के तहत हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग हैं। राजकोष से राजनीती करने वाले लोगों को सावधान रहने की जरूरत नहीं है। सरकार के द्वारा स्थापित सुशासन की और ध्यान दीजिये . राजकोष से धन लुटाया जा सकता है लेकिन राज्य में सुख , शांति और क़ानून व्यवस्था के प्रति उदासीनता उन्हें एक अच्छा  सुशासक नहीं बना रहा है। जो आम इंसान को किसी भी दृष्टि से राहत  नहीं दे पा  रही है बल्कि उसको दैनिक जीवन जीने के लिए नए नए करों से दो चार करने को बाध्य कर रही है फिर कैसे विश्वास  किया जाय कि  ये आगे जाकर इस देश के लोकतंत्र को एक स्वच्छ और सुशासित शासन दे सकेंगे .
राजकोष को व्यक्तिगत स्वार्थ से अलग यदि प्रयोग किया जाय या फिर आम लोगों के लिए उसका उचित तरीके से प्रयोग किया जाय तो उस सरकार के लिए एक सकारात्मक सोच को बनाने के लिए पर्याप्त है। राज्य की सीमायें सिर्फ और सिर्फ एक जिले या परिवार से जुड़े स्थाओं तक ही नहीं होती हैं बल्कि सर्कार बनाने के बाद राज्य की साडी सीमायें उसके लिए अपना घर होना चाहिए और हर व्यक्ति अपने से जुदा हुआ होना चाहिए। उनकी समस्याओं से जुड़ कर देखा जाना चाहिए। उन की तरह से जी कर देखना और सोचना चाहिए। राजकोष किसी की निजी संपत्ति नहीं है बल्कि उस पर आपको अपने विवेक से जनहित में व्यय करने के लिए नियुक्त किया जाता है तो फिर आम आदमी बन कर देखिये और उसकी समस्याओं को महसूस  करते हुए उसका उपयोग करें .