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बुधवार, 27 मार्च 2013

हौसले को सलाम (९ ) !


  क्या हमारे लिए अपना संघर्ष ही हमेशा बड़ा  लगता है लेकिन अगर हमने अपने संवेदनशील ह्रदय से  आस पास के चरित्रों को ध्यान से  देखें तो  पता चलता है कि  हम अपनी जिन्दगी में  खुद को एक मनचाही जिन्दगी जीने के लिए संघर्ष करे या फिर कुछ लोगों को रोटियों और जीवन को चलाने  के लिए किया जाने वाला संघर्ष बराबर अर्थ रखता  है. 

                    आज की  प्रस्तुति है डॉक्टर रागिनी मिश्रा की .


रागिनी मिश्रा 



'सरिता'.....
मेरे लिए ये नाम सिर्फ मेरे घर में काम करनेवाली बाई का न होकर एक आदर्श का हो गया है, मेरे लिए इसका अर्थ लगातार बहने वाली नदी ना होकर एक मजबूत चट्टान का हो गया है, क्योंकि  जीवन से हर प्रकार का सुख, सम्पन्नता और संबल छूट जाने के बाद भी वह जिस दृढ इरादों के साथ अपने जीवन को संवार रही है, वह सच में एक मिसाल है हम स्त्रियों के लिये।
                        शराबी पति द्वारा एकड़ो जमीन,घर-बार  सब कुछ बर्बाद कर दिए जाने के बाद भी उसने अपने घर-परिवार या किसी के भी सामने हाँथ नहीं फैलाए बल्कि बीमार शराबी पति को लेकर शहर आकर इलाज़ कराने  लगी। मायके से भी मदद ना मिलने पर उसने हार ना मानी। अनपढ़ थी इसलिए दूसरे के घरों में साफ़- सफाई और मालिश इत्यादि का काम करने लगी . सारा दिन हाड़तोड़ मेहनत  उसने अपने पति का इलाज़ कराया। बच्चों का सरकारी स्कूल में नाम लिखाया। अनपढ़ होने के बावजूद उसे इस बात का भान था कि  अगर उसने पढाई-लिखाई  की होती तो उसकी आज यह दुर्दशा ना होती . इसलिए वह अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहती थी। आज उसका पति भगवान् को प्यारा हो चुका है। उसने अपनी दोनों बेटियों का विवाह एक खाते-पीते घर में किया है। दोनों बेटियां खुश हैं। वह आज भी उतनी ही मेहनत करती है कि उसने जो भी कर्ज अपनी बेटियों के विवाह में लिया था , उसे चुका सके. मेहनती, शरीफ और सच्चाई की प्रतिमूर्ति ' सरिता' मेरे लिए हमेशा ही एक आदर्श रहेगी।

.........................................................डॉ  रागिनी मिश्र ....................................

सोमवार, 25 मार्च 2013

कलम का क्रांतिकारी : गणेश शंकर विद्यार्थी !

                           
 
 कलम का  क्रांतिकारी : गणेश शंकर विद्यार्थी !
 
                                           गणेश शंकर विद्यार्थी एक मूक शहीद कहे जाते हैं, जो कि कलम से क्रांति के अग्रदूत बने। आपका जन्म इलाहाबाद के अतरसुइया नामक मोहल्ले 26 अक्टूबर 1890 में हुआ था। आपके पिता जयनारायण श्रीवास्तव और माँ गोमती देवी थी। 1905 ई. में भेलसा से अंग्रेजी से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में भर्ती के समय से ही उनका रुझान  पत्रकारिता की ओर हुआ और उस समय के लेखक सुन्दर लाल कायस्थ इलाहाबाद के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग करने लगे। लगभग एक वर्ष कालेज में पढ़ने के बाद 1908 ई. में कानपुर के करेंसी आफिस में 30 रु. मासिक की नौकरी की। परंतु अंग्रेज अफसर से झगड़ा हो जाने के कारण उसे छोड़कर पंडित पृथ्वीनाथ हाई स्कूल, कानपुर  में 1910  तक शिक्षण कार्य  किया। इसी के दौरान सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) तथा हितवार्ता (कलकत्ता) में समय समय पर लेख लिखने लगे। उन्होंने अपनी पहली किताब 'हमारी आत्मोत्सर्गता' अपनी सोलह वर्ष की उम्र में लिखी थी। 
                         कानपुर शहर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी  ने अखबार "प्रताप" से अंग्रेजों के साथ अपनी बगावत को एक अलग दिशा दी। जिसने कलम को ही अपनी बन्दूक और बम बना कर उस शासन की चूलें ही नहीं हिलायीं बल्कि उसके दम पर ही  देश को एक  नए जोश और देशभक्ति से भरने का काम किया। वे पत्रकारिता में रूचि रखते थे, अन्याय और अत्याचार के खिलाफ उमड़ते विचारों ने उन्हें कलम का सिपाही बना दिया। उन्होंने हिंदी और उर्दू - दोनों के प्रतिनिधि पत्रों 'कर्मयोगी और स्वराज्य' के लिए कार्य करना आरम्भ किया।                
             उस समय 'महावीर प्रसाद द्विवेदी', जो हिंदी साहित्य के स्तम्भ थे, ने उन्हें अपने पत्र 'सरस्वती' में उपसंपादन के लिए प्रस्ताव रखा और उन्होंने 1911-13 तक ये पद संभाला। वे साहित्य और राजनीति दोनों के प्रति समर्पित थे, अतः उन्होंने सरस्वती के साथ-साथ 'अभ्युदय' पत्र भी अपना लिया जो कि राजनैतिक गतिविधियों से जुड़ा था।
                      1911  में उन्होंने कानपुर वापस आकर 'प्रताप ' नामक अखबार का संपादन आरम्भ किया।  यहाँ उनका परिचय एक क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उदित हुआ। 'प्रताप' क्रांतिकारी पत्र के रूप में जाना जाता था। पत्रकारिता के माध्यम से अंग्रेजों की खिलाफत का खामियाजा उन्होंने भी भुगता। कानपुर कपड़ा मिल मजदूरों के साथ हड़ताल में उनके साथ रहे।  1920  में 'प्रताप ' का दैनिक संस्करण उन्होंने उतारा। प्रताप के प्रथम अंक  की सम्पादकीय में लिखा था कि  प्रताप सदैव सत्य के  समर्पित रहेगा और उन्होंने अपने उस  को पूरी  से निभाया। वे सदैव सत्य के मार्ग पर चलते रहे।

                    इतना नहीं बल्कि उन्होंने अपने प्रताप के माध्यम से और भी  ऐसे काम किये जो उल्लेखनीय  हैं। उन्होंने देश में 1859 में शुरू हुई कुली प्रथा को अपने पत्र के माध्यम से ही ख़त्म करने का प्रयास किया और सफल  रहे।  देश में जमींदारी प्रथा , देशी राज्यों का विलय , देश की जनता को एक साथ मिलकर लड़ने का सन्देश भी उन्हीं का दिया हुआ था। 
                जब अंग्रेजों द्वारा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने की देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई, तब घबराकर अंग्रेजों ने देश में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए।  सन1931 में पूरे कानपुर में दंगे हो रहे थे, भाई भाई खून से होली खेल रहे थे और सैकड़ो निर्दोषों की जान चली गई। तब गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में लोकप्रिय अखबार प्रताप के संपादक थे और उन्होंने पूरे दिन दंगाग्रस्त इलाकों में घूमकर निर्दोषों की जान बचाई थी। इतना ही नहीं कानपुर के जिस इलाके में उन्हें लोगों को फँसे होने की खबर मिलती वे तुरंत अपना काम छोड़कर वहाँ पहुँच जाते है, उन्होंने उस समय पत्रकारिता की नहीं बल्कि मानवता की जरूरत थी और गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता से ज्यादा मानवता को महत्व देते थे। कानपुर दंगे के दौरान जब उन्होंने बंगाली मोहाल में फँसे 200 मुसलमानों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया, तब एक बुजुर्ग मुसलमान ने उनका हाथ चूम कर - 'तू फरिश्ता है' कह पुकारा। 
          गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी पूरी जिंदगी में पांच बार जेल गए थे।  भारतीय इतिहास के एक सजग पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और सक्रिय कार्यकर्ता भी थे, जब कानपुर के दंगों के दौरान उन्होंने सैकड़ो लोगों की जान बचाई और वहाँ से फँसे लोगों को लॉरी में बिठा रहे थे तभी वहाँ भीड़ उमड़ी और किसी ने एक भाला विद्यार्थी जी के शरीर में घुसा दिया, लेकिन इससे पहले वे कुछ कर पाते उनके सिर पर लाठियाँ बरसने लगी और वे 25 मार्च 1931 को वे शांति के दूत अपनी मानवता के चलते शहीद हो चुके थे। कानपुर में लाशों के ढेर में उनकी लाश मिली थी. तब तक उनकी लाश इतनी फूल गई थी कि लोग पहचान नहीं पा रहे थे। दंगों के रोकते रोकते ही उनकी मौत हुई और उन्होंने 29 मार्च को अंतिम विदाई दी गई।
               उनकी शहादत को सभी भारतियों की भावपूर्ण श्रद्धांजलि !
                   

रविवार, 24 मार्च 2013

हौसले को सलाम (8)

                       जिन्दगी जितने लोगों की  हैं उसके  उतने ही रंग देखने को मिलते हैं  यह बात  नारी में ही देखने को मिलाती है की वह कितने धैर्य से अपने गिरे  संघर्ष के दिनों को हौसले से काट कर निकल आती है और तभी तो उसके हौसले को सलाम  करने का मन होता है. जब हम औरों के संघर्ष  हैं तो लगता है की अगर हमने अपने जीवन में संघर्ष किया है तो उसके आगे  बौना सा लगता है या  बड़ा भी हो तो हौसला हमें भी मिलता है. 
आज की इस व्यक्तित्व की  प्रस्तुति दे रही हैं नीलिमा शर्मा जी . 



नीलिमा शर्मा 

नीरू दी !! हाँ यही तो नाम था उनका ... मेरी बहन की सहेली नीरा ... प्यारी सी सूरत ....... शायद कवियों की सारी उपमाये उनको ही समर्पित होती थी .... तीन भाइयो की छोटी बहन ... जुड़वाँ बहन मीरा के साथ पैदा हुए थी परन्तु ईश्वर ने इनको ही उम्र का वरदान दिया था ... सातवे दशक में जब लडकिया कम ही को - एड कालेज में पढ़ती थी उस वक़्त में नीरू दी जब कालेज जाती थी तो कई दिल आहे भरते थे सुन्दरता और सहजता - सरलता का ऐसा अनोखा संगम कम ही देखने को मिलता था उस वक़्त मैं  यही कोई पांचवी छठी में पढ़ती थी . मेरी दी और नीरू दी अक्सर गप्पे लड़ाती थी और मुझसे चाय बनवाई जाती थी बदले में मुझे उन दोनों की चप्पल पहने को मिलती थी या कोई भी नई माला . या टॉप्स .उस उम्र में ख्वाहिशे भी कितनी होती हैं ,बड़ी बहनों के सामान पर अधिकार ज़माना बहुत अच्छा लगता था कभी लगता ही नही था कि वो बहन की सहेली हैं ...छोटी बहन की तरह उनसे जमकर लडाई झगड़ा करना आदतों में शुमार था .... अभी बीए फाइनल में ही आई थी मेरी सबसे बड़ी बहन के पति अपने दोस्त का रिश्ता नीरू दी के लिय ले आये लड़का बैंक में ऑफिसर , दो भाई एक बहन की फॅमिली , चंडीगढ़ जैसा शहर .. बस नीरू दी की बीजी को सब कुछ पसंद आ गया और तीन महीनो में दी की शादी भी हो गयी दीपक जीजू बहुत ही अच्छे ..लगे मुझे कम ही बात करती थी मैं उनसे लेकिन सब से जितना सुना अच्छा  ही लगता था . दी शादी के बाद और भी प्यारी लगने लगी बीच - बीच में बडी दी आकर बताती कि नीरू दी की सास से नही बन रही .... दादी उनको ज्यादा प्यार करती हैं या उनकी ननद उनको परेशान करती हैं
लाड़ - प्यार से पली दी अब सिर्फ घरेलू महिला बनकर रह गयी सास उस ज़माने में भी ताश पार्टिया - किटी पार्टिया करती थी .... आधुनिकता में भी भी रूढ़िवादिता कि बहु सारा घर सम्हाले .. छोटी छोटी बाते जब बढ़कर कलह का रूप लेने लगी तो जीजू के डैडी ने जीजू से कही बाहर तबादला करने को कह दिया और जीजू का ट्रांसफर अहमदाबाद हो गया तब तक दी दो-दो बेटो की माँ बन चुकी थी
बैंक में कiम का प्रेशर बढ़ रहा था ,परन्तु उस हिसाब से पैसा नही मिलता था . गुजराती लोगो के बीच जीजू को भी ज्यादा पैसे कमाने की ललक उठी और चिट  फंड का काम शुरू कर दिया बैंक की नौकरी छोड़ कर . इधर दी ने भी गुजराती लोगो के शहर में अपना पंजाबी सुट्स बनाने का बुटीक खोल लिया ... दी की मीठे बोली और उनका अप्रितम सौन्दय आस पास की महिलाओ को अपनी और खीचने लगा धीरे धीरे दी का काम चल निकला बच्चे भी स्कूल में जाने लगे दी ने जीजू से कहा के आप अपने काम  पर ध्यान दे घर मैं चला लूंगी . तीन साल बीत गये , दी का बुटीक अच्छे से चलने लगा था इधर पैसे कमाने के चक्कर में न जाने जीजू कहा चूक  गये बाकी  हिस्से दार उनको धोखा देकर सारा पैसा हड़प गये और जीजू को सब लोगो ने घेर लिया कि हमारा पैसा वापिस दो .घर के बाहर नारे लगने लगे पुलिस में कंप्लेंन की गयी और दी से बात करने का भी मौका नही मिला और जीजू सलाखों के पीछे डाल दिए गये .... दो बच्चे . जहाँ कोई अपना नही . सब ताने मारने वाले के इसका पति सारा पैसा खा गया बड़ी पैसे वाली बनती थी .ऐसे वक़्त में ससुराल वाले भी और मायके वाले भी महज तमाशबीन बनकर खड़े हो गये थे . दी ने अपना सारा गोल्ड बेच दिया सब कुछ बेचकर लोगो को उनका पैसा वापिस किया और जीजू के साथ जा खड़ी हुए जीजू को आजीवन कारावास सुनाया गया 14 साल की सजा सुनकर भी दी नही टूटी और बच्चो को हौसला दिया और दूर दिल्ली पढने भेज दिया बिना किसी रिश्तेदार का सहारा लिए  . बच्चे भी समझदार थे माँ का दर्द जानते थे . पढ़ लिखकर बहुत ही उच्चे पद पर आसीन हैं .... दोनों बच्चे आज गुडगाँव  में रहते हैं .... दी ने जीजू के बिना ही बड़े बेटे की शादी की ... उनकी बहु एक प्राइवेट बैंक की चीफ मेनेजर हैं ... दी का काम आज भी बहुत अच्छे से चल रहे हैं .... जिस अनजान शहर ने उनको गालियाँ दी थी आज उनकी मेहनत की तारीफ करते नही थकता हैं जीजू अब जेल से आने वाले है अगले साल तो दी अब बच्चो के पास दिल्ली शिफ्ट करना चाहती हैं परन्तु उस से पहले वो अपने आपको आर्थिक रूप से सुदृढ़ करना चाहती हैं ताकि बच्चो पर बोझ न बने . यह सब मुझे अभी पिछले ही हफ्ते दी से बात करने पर पता चला जब उनको अचानक करोल बाग में घुमते देखा .... 50 साल की दी ने 30 साल की शादीशुदा जिन्दगी में न जाने कितने रंग देख लिए थे वक़्त के साथ अपनों का अपनापन भी ....और मुझे ऐसे गले मिली कि जैसे हम बचपन में मिलते थे और वही बहस भी हुआ कि कहाँ थी इतने साल :)) सच में ,दी के हौसले को प्रणाम की ... उन्होंने अपने पति का साथ नही छोडा बच्चो को अच्छे संस्कार भी दिए और अपने को आर्थिक रूप से मजबूत भी बनाया ..... नारीवाद का झंडा उठाकर अपने पति पर आरोप , दी भी लगा सकती थी ,परन्तु उन्होंने उन हिस्सेदारों  को भी माफ़ कर दिया उनके संस्कार ऐसे थे . कहकर ..... कोइ कुछ भी कहे मैं तो यही कहूँगी की यह होती हैं नारी जो सब त्याग भी करती हैं और उनका बखान भी नही करती .

शनिवार, 23 मार्च 2013

शहीद दिवस पर !

                     आज शहीद दिवस पर  तीनों अमर शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि ! 




                 नहीं जानती कि इस  दिन हमारी संसद में कोई इन तीनों भगत , सिंह राजगुरु और सुखदेव  के लिए दो शब्द भी बोल होगा क्योंकि संसद की कार्यवाही नहीं देखी, लेकिन अखबार देखे हैं  और देखे हैं सरकार के विज्ञापन .  हाँ उत्तर प्रदेश सरकार के वैचारिक गुरु   राम मनोहर लोहिया जी  की जयंती भी आज  है और उसका भी विज्ञापन देखा है . सपा मुखिया के परिजनों की तस्वीर  के साथ समाजवाद की दुहाई , लेकिन शहीदों को  नमन  करते नहीं देखा है.  अरे ये तो समझ लो ये विचारों की ईमारत जब बनने लगी तो उस नींव में जिनके बलिदान की ईंटे लगी हैं उनको तो नहीं भूलना चाहिए .  किसी एक कोने में भी सही उन शहीदों को नमन तो करना चाहिए .  ये राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और कल देश के प्रतिनिधित्व का सपना देख  हैं और साथ ही देश के इतिहास को बदलने का दावा भी कर रहे है .

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

हौसले को सलाम ! ( ७ )

         हमारा संघर्ष  सिर्फ अपने जीवन में संघर्ष करती हुई माध्यम वर्गीय या उच्च वर्गीय महिलाओं के संघर्ष को ही नहीं देखती है बल्कि  ये तो सिर्फ एक महिला  के संघर्ष की गाथा से जुडी हुई दास्ताँ है . क्योंकि औरत सिर्फ औरत होती है और उसका संघर्ष भी एक  ही होता है  वह कोई शिक्षिका हो , गृहणी हो या फिर हमारे ही घर में काम करने वाली कोई महिला हो. आज की प्रस्तुति  है : अपर्णा साह जी की .
 
    
अपर्णा साह 
           भगवान ने दो जाति  बनाया ...एक शारीरिक रूप से सबल और दुसरे को निर्बल ...तो समाज -परिवार का ढांचा और परिवेश भी उसके अनुरूप  ही बना था .देश की गुलामी के लम्बे दौर मे पुरुष स्त्रियों को संरक्षण  देते-देते अपनी शक्ति को हथियार बना लिए फिर तो वे शोषक और शासक बन बैठें .यानि कि एक पुरुष से संरक्षण देना दूसरे पुरुष का काम हो चला ,वो ब्रह्मा-विष्णु -महेश की भूमिका का निर्वाह करने लगा .स्त्रियाँ घर की इज्जत बन परदे के पीछे छुप  गई ..
                                         स्त्रियाँ किसी भी तबके की हों वो शोषित है ,बस अंतर इतना है की मध्यम वर्ग की औरतें इज्जत के आवरण में अपने को समोय रहती है जबकि निचले तबके की मेहनतकश औरतें इज्जत के अलग अर्थ को अमल में लाती  हैं ....ये इतनी सबल होती हैं कि सलाम करने को जी चाहता है .कितनी सहजता से बचपनसे बुढ़ापा तक का सफ़र यूँ गुजर देती हैं मानो किसी के सहारे की आरजू ही नहीं .पति के निकम्मेपन,शराबीपन और अत्याचार को ये किस्मत का नाम देकर चिंतामुक्त हो जाया करते हैं ,औरत होने का दर्द सहती हैं,मार खाती हैं पर घायल सिर्फ शारीर होता है मन नहीं ......
                                            पूरे शरीर पे चोट का निशान,माथा फटा,खून बहता हुआ,तीन छोटे बच्चों को लिए गेट पर पिटती नेहा को देख मै विह्वल हो गई ,क्या हुआ "मेमसाहेब कुछ पैसा दे दीजिये मै खाली हाथ घर छोड़ आए हूँ,रात सामने के गराज में सोई हूँ,"ठंड अभी भी कायम है तो कैसे ये रही होगी .उसके हौसले को मैं देखने लगी और उसकी सहारा बन उसके साथ खड़ी हो गई ."जानती हैं मेमसाहेब माँ-बाप छोटी उम्र में शादी कर दिया, सास बहुत ख़राब बर्ताव मेरे साथ करती थी,तीनो बच्चे जल्दी ही हो गए ...उसके बाद पति को किसी तरह फुसलाकर यहाँ लेके आई,ये अच्छा कमाता था पर इसके माँ-बाप यहाँ आके रहने लगे ,सास के बहकावे  में आ मेरा मरद दारू पीने लगा,मै खूब लडती थी,चिल्लाती थी ,मुझे मारता था …आज चिल्लाके लड़ रही थी तो पीछे से माथा पे लाठी मारा " उसे हर तरह का सहायता दे प्यार से समझाई कि क्यों अपना घर छोडोगी ,जीत  तो तब होगी जब उन तीनो को घर से भगाओ ,इतने घर काम कर उन सबों को खिलाती थी न तो अपना और बच्चों का पेट कैसे न भर पाओगी ? .....फिर उसे थाना भेज शिकायत दर्ज करवा दी,,पति जेल गया फिर जमानत पे छूट  अपने माँ-बाप को लेकर अलग रह रहा है .इसे साथ रखने को लेकर कभी पंचायत कर रहा,कभी झगडा . नहीं जानती आगे क्या होगा पर परिवर्तन की हवा तो चल ही पड़ी है ........
                                                     हर तरफ कहानियां बिखरी पड़ी है, हर एक औरत की एक कहानी है .मेरी-आपकी-सबकी ..औरत एक जाति विशेष है सिर्फ ......जिसने दिमाग का प्रदर्शन किया  उसे पग-पग पर लक्षण लगाये जाते हैं .........इन आपबीतियों को,भोगों को कहानियों में ढालने  की कितनो को हिम्मत है और गर हिम्मत है तो कितने लिखने की कला के ज्ञाता हैं ............??????




बुधवार, 20 मार्च 2013

हौसले को सलाम ! (६)


                        वक़्त जिन्दगी में कैसे कैसे लाता है और उन मोड़ों पर कभी इंसान हार जाता है और कभी बड़ी वीरता और धैर्य से उन्हें पर कर मंजिल पा लेता है .  का नाम है जिन्दगी - जन्म से लेकर मृत्यु तक हम यन्त्र चालित से रहते हैं लेकिन उसमें अपने बुद्धि और विवेक से जीतने और हारने में हमारी अपनी ही कुशलता को श्रेय जाता है. 
                  आज की कड़ी की  प्रस्तुति  है रेखा जोशी जी की .



''ट्रिग ट्रिन ''दरवाज़े की घंटी के बजते ही मीता ने खिड़की से  झाँक कर देखा तो वहां उसने अपनी ही पुरानी इक छात्रा अनन्या को दरवाज़े के बाहर खड़े पाया ,जल्दी से मीता  ने दरवाज़ा खोला तो सामने खड़ी वही मुधुर सी  मुस्कान ,खिला हुआ चेहरा और हाथों में मिठाई का डिब्बा लिए अनन्या खड़ी थी । ''नमस्ते मैम ''मीता को सामने देखते ही उसने कहा ,''पहचाना मुझे आपने।  ''हाँ हाँ ,अंदर आओ ,कहो कैसी हो ''मीता ने उसे अपने घर के अंदर सलीके से सजे ड्राइंग रूम में बैठने को कहा । अनन्या ने टेबल पर मिठाई के डिब्बे को रखा और बोली ,''मैम आपको एक खुशखबरी देने आई हूँ मुझे आर्मी में सैकिड लेफ्टीनेंट की नौकरी मिल गई है ,यह सब आपके आशीर्वाद का फल है ,मुझे इसी सप्ताह जाईन करना है सो रुकूँ गी नही ,फिर कभी फुर्सत से आऊं गी ,''यह कह कर उसने मीता के पाँव छुए और हाथ जोड़ कर उसने विदा ली । अनन्या के जाते ही मीता के मानस पटल पर भूली बिसरी तस्वीरे घूमने लगी, जब एक दिन वह बी एस सी अंतिम वर्ष की कक्षा को पढ़ा रही थी तब उस दिन अनन्या क्लास में देर से आई थी और मीता  ने उसे देर से कक्षा में आने पर डांट  दिया था और क्लास समाप्त होने पर उसे मिलने के लिए बुलाया था । पीरियड खत्म होते ही जब मीता स्टाफ रूम की ओर जा रही थी तो पीछे से अनन्या ने आवाज़ दी थी ,''मैम ,प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो ,''और उसकी आँखों से मोटे मोटे आंसू टपकने लगे । तब मीता उसे अपनी प्रयोगशाला में ले गई थी ,उसे पानी पिलाया और सांत्वना देते हुए उसके रोने की वजह पूछी ,कुछ देर चुप रही थी वो ,फिर उसने अपनी दर्द भरी दास्ताँ में उसे भी शरीक कर लिया था  उसकी कहानी सुनने के बाद मीता की आँखे भी नम  हो उठी थी ।उसके पिता  का साया उठने के बाद उसके सारे रिश्तेदारों ने अनन्या की माँ और उससे छोटे दो भाई बहनों से मुख मोड़ लिया था ,जब उसकी माँ ने नौकरी करनी चाही तो उस परिवार के सबसे बड़े बुज़ुर्ग उसके ताया  जी ने उसकी माँ के सारे सर्टिफिकेट्स फाड़ कर फेंक दिए,यह कह कर कि उनके परिवार की बहुएं नौकरी नही करती। हर रोज़ अपनी आँखों के सामने अपनी माँ  और अपने भाई बहन को कभी पैसे के लिए तो कभी खाने के लिए अपमानित होते देख अनन्या का खून खौल  उठता था ,न चाहते हुए भी कई बार वह अपने तथाकथित रिश्तेदारों को खरी खोटी भी सुना दिया करती थी और कभी अपमान के घूँट पी कर चुप हो जाती थी ।
पढने  में वह एक मेधावी छात्रा  थी  ,उसने पढाई के साथ साथ एक पार्ट टाईम नौकरी भी कर ली थी ,शाम को उसने कई छोटे बच्चों को  ट्यूशन भी देना शुरू कर दिया था और वह सदा अपने छोटे भाई ,बहन की जरूरते पूरी करने  की कोशिश में रहती थी ,कुछ पैसे बचा कर माँ की हथेली में भी रख दिया करती थी ,हां कभी कभी वह मीता के पास आ कर अपने दुःख अवश्य साझा कर लेती थी ,शायद उसे इसी से कुछ मनोबल मिलता हो । फाइनल परीक्षा के समाप्त होते ही मीता को पता चला कि उनका परिवार कहीं और शिफ्ट कर चुका है ।धीरे धीरे मीता भी उसको भूल गई थी ,लेकिन आज अचानक से उसके आने से मीता को उसकी सारी बाते उसके आंसू ,उसकी कड़ी मेहनत सब याद आगये और मीता  का सिर  गर्व से ऊंचा हो गया उस लडकी ने अपने नाम को सार्थक कर दिखाया ,अपने छोटे से परिवार के लिए आज वह अन्नापूर्णा  देवी से कम नही थी |

रेखा जोशी 
 

सोमवार, 18 मार्च 2013

हौसले को सलाम (५)

                  जिन्दगी सबकी  में  अपने अपने नजरिये का एक स्वरूप होती है. दूसरे की जिन्दगी  किसी के लिए उपहास का  कभी  का सबब  जाती है लेकिन  जिन्दगी खुद  लिए   है?और  उसने किस  से जिया और किस तरह से उससे जूझ कर अपने और अपने  के लिए रस्ते बनाये यह तो वही बता सकता है. हम सिर्फ उसके   जानकर उसको व्यक्त कर सकते है। आज एक संघर्ष गाथा की प्रस्तुति है गुंजन श्रीवास्तव  की . 



मुझे याद है ...वो मिली थीं मुझे एक यज्ञ समारोह में .....स्टोर का सामान सहेजती हुई ..... बड़े घर की सभ्रांत महिला थीं ....कुछ दिन साथ रहे तो निकटता हो गयी ....एक बार कटनी से गुज़रीं तो मैंने घर पर आमंत्रित कर लिया .... साथ बैठे तो पुरानी यादों की पोटली खुल गयी ....वो मायके से बहुत बड़े घर की थीं ....अब तो सब उन्हें अम्माजी कहते थे .... तो मैं भी उन्हें अम्माजी कहने लगी ....उनका ब्याह भी सम्पन्न घर में हुआ था ....पर छोटी जगह और परदे में बहुओं को रखा जाता था .....यहाँ तक कि साड़ी वाले , चूड़ी वाले और सुनार भी अपनी दूकान लेकर घर आते थे .....पति के साथ सुख से रह रही थीं और बिजनेस पति और नंदोई मिलकर संभाल रहे थे ......सब कुछ बहुत अच्छा था ...अचानक पति को बुखार आया ....छोटी जगह पर पर्याप्त इलाज के अभाव में वो स्वर्गवासी हो गए ... उस समय अम्माजी की उम्र मात्र 30 साल थी और बड़ा बेटा 11 साल का जबकि छोटा बेटा मात्र 6 साल का था ....बड़ी दो बेटियाँ भी थीं ....पति के निधन के बाद नंदोई का रवईया बेईमानी भरा था ....पर अम्माजी ने कभी उन्हें व्यापार से अलग नहीं किया ...वो कहते थे पूरा व्यापार मेरे नाम कर दो पर अम्माजी कहती थीं की जब मेरे बच्चे बड़े होंगे तो कहाँ जायेंगे ...नंदोई आये दिन दूकान बंद करने की धमकी देते ...अम्माजी उन्हें मना लेतीं .....जैसे तैसे उन्होंने 3 साल गुज़ारे .....बेटे को ग्यारहवीं तक पढ़ने दिया ....उसके बाद उन्होंने अपने बेटे से कहा ....अब तुम गद्दी सँभालो ......बेटे की पढ़ाई छुडाने के दुःख में अम्माजी खूब रोयीं .... बेटियों की शादी उन्होंने अच्छा घर न देखकर बल्कि अच्छा लड़का देखकर कर दी ... सारे समाचार पत्र घर मँगवाती थीं ...ताकि देश और दुनिया की खबरें परदे के भीतर भी आ पायें .... बेटे बेटियों दोनों को घर , बाहर के सारे काम भी सिखाये और अच्छे संस्कार भी दिए ...बेटे को ऊँची तालीम न दिला पाने का प्रायश्चित कुछ इस तरह किया कि शहर में एक कन्या महा विद्यालय खोला जो अभी भी चल रहा है .. उनका कहना है कि कब कैसा वक़्त आये कोई नहीं जानता इसलिए हर लड़की को आत्म निर्भर ज़रूर होना चाहिए ...खुद समाज सेवी संस्थाओं में जाकर यथा सम्भव मदद करती हैं ...बहुत सादा जीवन व्यतीत किया पर कभी किसी से कर्ज नहीं लिया ......हमेशा आवश्यकतों को सीमित रखा ....उनका कहना था ''न कूदकर चलो न मुँह के बल गिरो'' .....व्यवहार ऐसा कि हर किसी को लगता है की वही उनके लिए ख़ास है ..... उनका वह विश्वास कि मैं दूसरे के सहारे हूँ .....अगर व्यापार से मिले 80 पैसे भी वो ले लेगा तो भी 20 पैसे तो मेरे बच्चों के लिए मिलेंगे ......अपनाने लायक है .....आज भी पूरे गाँव में उनका बहुत सम्मान है ।।