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शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल !

                                 


                        आज सरदार पटेल के जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा बहुत सुखदाई  लगी । सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता के अदभुत प्रणेता थे,  जिनके ह्रदय में भारत  की आत्मा बसती थी।  वास्तव में वे भारतीय जनमानस अर्थात किसान की आत्मा थे। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल एक शांत ज्वालामुखी थे। वे नवीन भारत के निर्माता थे। उन्हे भारत का ‘लौह पुरूष‘  कहा जाता है।
                   वह व्यक्तित्व जो इस भारत के शुरूआती निर्माण में पूरे मन से समर्पित रहा और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर रह कर भी उनके हाथ अपने वचन के कारण बंधे रहे और जहाँ जहाँ विवश पाये गए या उनके निर्णयों को गांधीजी या नेहरूजी के कारण दरकिनार कर दिए गए वे आज भी नासूर  बन कर रिस रहे हैं।  
                                    सरदार पटेल ने भारत विभाजन स्वीकार किया था क्योंकि  पूरे भारत के हाथ से जाने का भय सामने खड़ा दिख रहा था - नवंबर,1947 में संविधान परिषद की बैठक में उन्होंने अपने इस कथन को स्पष्ट किया, मैंने विभाजन को अंतिम उपाय के रूप में तब स्वीकार किया था, जब संपूर्ण भारत के हमारे हाथ से निकल जाने की संभावना हो गई थी। वे गांधीजी और नेहरूजी की बात का सम्मान करते थे लेकिन विभाजन के समय पाकिस्तान को  ५५ करोड़ रूपयें देने के निर्णय के सर्वथा विरोधी थे और तत्कालीन सरकार ने इसको अस्वीकार भी कर दिया था लेकिन गांधीजी के अनशन ने सरकार के इस फैसले को पलटवाया गया था।  उस समय सरकार को अपने विवेक से निर्णय लेने का अधिकार न था।  गांधी जी का अंधानुकरण ही सबसे घातक सिद्ध होने वाला था ये बात सरदार पटेल को आभास दे गयी थी और उन्होंने कहा था - 'अब मैं इस शासन में न रह सकूँगा। ' 

                    वे एक समर्थ और जागरूक गृहमंत्री थे और देशहित में उनके विचारों को कितना स्वीकार किया गया ये बात और है।  शायद उस समय हम सिर्फ और सिर्फ आजादी को गांधी जी और नेहरूजी द्वारा दिलवाई गई नियामत समझ रहे थे।  
               
जब चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने नेहरू को पत्र लिखा कि वे तिब्बत को चीन का अंग मान लें तो पटेल ने नेहरू से आग्रह किया कि वे तिब्बत पर चीन का प्रभुत्व कतई न स्वीकारें, अन्यथा चीन भारत के लिए खतरनाक सिद्ध होगा। नेहरू नहीं माने बस इसी भूल के कारण हमें चीन से पिटना पड़ा और चीन ने हमारी सीमा की 40 हजार वर्ग गज भूमि पर कब्जा कर लिया। वह चीन १९६२ में जिस रूप में हमारे सामने खड़ा हुआ वह हमारी उस भूल का ही परिणाम था और तब से लेकर आज कितने नापाक इरादे हमें देखने को मिलते ही रहते हैं।
                              बहुत जल्दी चले गए थे सरदार पटेल अगर देश को उनका साथ कुछ और बरसों तक मिल गया होता तो शायद देश का स्वरूप कुछ और ही होता।  उनके जन्मदिन पर कुछ लिखने का मन था सो लिखा।  

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

मित्र बनाओ बनाम ...........!






                                       ये बानगी है कुछ विज्ञापनों की -----रोज करीब करीब हर दैनिक अख़बार में निकला करते हैं. इनसे आने वाली बू सबको आती है और सब इस बात को समझते हैं. अख़बार वाले भी और असामाजिक गतिविधियों में लिप्त लोगों को सही दिशा देने वाली संस्थाएं भी लेकिन क्या कभी इस ओर किसी ने प्रयास किया कि  इनकी छानबीन की जाय ? लेकिन आख़िर की क्यों जाय? 
             

         परिवार संस्था पहले भी थी और आज भी है, बस उसके नियम और कायदे कुछ उदार हो गए हैं. पहले बेटे और बहू परिवार के साथ ही रहते थे और वहीं पर कोई नौकरी कर लेते थे. उस समय मिल जाती थीं. घर और परिवार की मर्यादा का पालन होता रहता था. मुझे अपना बचपन और जीवन का प्रारंभिक काल याद है. घर से बाहर जाने पर अकेले नहीं जा सकते  थे कोई साथ होना चाहिए. स्कूल भी अकेले नहीं बल्कि साथ पढ़ने वाली कई लड़कियाँ इकट्ठी हो कर जाती थीं. भले ही स्कूल घर से २० कदम की दूरी पर था. समय के साथ ये सब बदला और बदलते बदलते यहाँ तक पहुँच गया कि लड़कियाँ और लड़के दोस्ती के नाम पर कहाँ से कहाँ तक पहुँचने लगे हैं। कहीं भी विश्वास जैसी चीजें अब रह नहीं गयीं हैं।  दोस्ती के नाम पर ऐसे काम भी होने लगे हैं , जिसमें यहाँ से लड़कियों को लेकर विदेशों में तक पहुँचाने वाले रैकेट मौजूद हैं. कहीं कभी कोई वारदात सामने आ गयी तो हंगामा मच जाता है लेकिन खुले आम आने वाले इन विज्ञापनों को क्या कोई नहीं पढ़ पाता है ? 
                 सिर्फ ये ही क्यों? मसाज सेंटर के नाम पर निकलने वाले विज्ञापनों में भी आप इस तरह के कामों की महक पा सकते हैं. हमारी सरकार या फिर पुलिस  किस इन्तजार में रहती है कि ऐसे लोगों पर छापे मारने के लिए कोई बड़ी वारदात जब तक न हो जाए तब तक उनकी नींद खुलती ही नहीं है. इन विज्ञापनों में फ़ोन नं.  ईमेल एड्रेस सभी कुछ होता है. इसके लिए कोई आपरेशन क्यों नहीं चलाया जाता है? समाज में सेक्स के भूखे भेडिये बेलगाम घूम रहे हैं जिनसे बच्चियों से लेकर युवतियां ही नहीं बल्कि उम्र दराज महिलायें भी सुरक्षित नहीं है. जिसमें ऊँची पहुँच वाले लोगों को तो अब संयम जैसे गुण से कोई वास्ता ही नहीं रह गया है या फिर इनके साए तले पलने वाले लोग भूखे भेडिये बन कर घूम रहे हैं. 

                  अब ये लड़कियों तक ही सीमित नहीं रह गया है क्योंकि अब तो लड़कों को  भी अच्छे पैसे मिलने के नाम पर लुभाया जाने लगा है और लडके भी क्या करें ? सब तो पढ़ लिख कर नौकरी नहीं पा लेते हैं बल्कि  पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ उन्हें सिर्फ काम की तलाश में उलझा ले जाता है और फिर वे इनके जाल में ऐसे फँस जाते हैं कि निकल ही नहीं पाते हैं। ऐसा नहीं है पुलिस ने ऐसे  मामलों पर काम  किया और भंडाफोड़ भी किया लेकिन ये काम तो आज भी खुले आम अखबारों में निमंत्रण दे रहे हैं और हम पढ़ रहे हैं।  
कुछ विज्ञापन की बानगी : 

* प्रिया मसाज पार्लर रजि. २००८ अमीर घरों की अकेली महिलाओं की बॉडी मसाज करके युवक रोजाना २५ - ३० हजार कमाएं।  सर्विस आधे घंटे में।  संपर्क सूत्र : ००००००००० 

 * दीपा मसाज पार्लर रजि. २००४  अमीर घरों की अकेली महिलाओं की बॉडी मसाज करके युवक रोजाना २५ - ३० हजार कमाएं।  सर्विस आधे घंटे  में।  संपर्क सूत्र : ०००००००००


              अलग अलग नाम से  पार्लर के  ढेरों विज्ञापन और एक ही भाषा होती है - कोई भी इसकी भाषा पढ़  समझ सकता है कि इसके पीछे क्या चल रहा है ? फिर क्यों समाज के ये कोढ़ पाले जा रहे हैं क्योंकि उनके ऊपर हाथ रखने वाले भी इसमें हिस्सेदार होते हैं। कौन होती है अमीर घरों की अकेली महिलायें ? और क्या  सिर्फ मसाज के काम के पच्चीस हजार से लेकर तीस हजार तक सिर्फ आधे घंटे में मिलते हैं तो फिर क्यों कोई बोझ ढोता है।  क्यों सुबह से शाम तक ऑफिस में काम करता है और फिर  भी नहीं  कमा पता इतना ? ढेरों सवाल है और उत्तर हम सभी जानते हैं और चुप हैं।  
                मीडिया वाले नए नए मामलों को लेकर टी वी पर रोज पेश करते रहते हैं लेकिन उनकी नजर इन पर क्यों नहीं पड़ती है कि वे ऐसे लोगों तक पहुँचने के लिए अपने जाल बिछा कर इनका खुलासा करें. जो खुल गया उसको पेश करके कौन सा कद्दू में तीर मार रहे हैं. अभी हम आदिम युग की ओर फिर प्रस्थान करने लगे हैं तो फिर अपने प्रगति के दावों को बखानना बंद करें नहीं तो अंकुश लगायें।  इस तरह की संस्थाओं और विज्ञापनों पर जिनसे समाज का भला नहीं  होता है. इस दलदल में फंसने के बाद अगर कोई बाहर निकलना भी चाहे तो नहीं निकाल सकता है. अपना भंडा फूटने के डर से इनसे जुड़े लोगों को इस तरह से अनुबंधित कर लिया जाता है या फिर उनको ऐसे प्रमाणों के साथ बाँध दिया जाता है कि वे उससे निकलने का साहस नहीं कर पाते हैं. इससे समाज सिर्फ और सिर्फ पतन कि ओर जा रहा है. इस पर अंकुश लगाना चाहिए चाहे जिस किसी भी प्रयास से लगे. .

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस !

                                  कहते हैं न कि इंसान वही सुखी है जो तन , मन से सुखी हो।  धन का सुख तो उसकी लालसाओं और जरूरतों से जुड़ा रहता है।  कभी वह अपार धन के बाद भी , पलंग के गद्दे के नीचे नोटों की मोटी तह लगा कर भी सुखी नहीं होता और कभी कोई इस " दाता इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय , मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय। " सूक्ति पर विश्वास करके जीवन भर सुखी रह लेता है। 
                                    आज का जो जीने का तरीका है या फिर कहें इस वर्तमान जीवनचर्या ने इंसान को तनावों के अतिरिक्त कुछ दिया ही नहीं है।  ये सत्य है कि आज हर आयु वर्ग में कुंठा , अवसाद और तनाव के शिकार लोग मिल रहे हैं। सबके अपने अपने तरीके के तनाव है और इस तनाव के जो कारण है वही आगे जाकर उनको अवसाद का शिकार बना देते हैं।  आज ८० प्रतिशत लोग (  इसमें हर आयु वर्ग के हैं ) मानसिक तौर पर स्वस्थ नहीं है।  सबकी अपनी अपनी परेशानियां है - बच्चे को स्कूल से भेजने से जीवन में कम्पटीशन और सबसे आगे रहने की लालसा,  चाहे ये अभिभावकों के द्वारा थोपी गयी हो उनके बचपन की अल्हड़ता और भोलेपन को छीन लेता है।  स्कूलों की शिक्षा पद्यति ने भी उनको किताबों और होम वर्क के तले इतना दबा दिया है कि वे कुछ और सोच ही नहीं पाते हैं।  खुली हवा में खेलना उनके लिए कितना जरूरी है ये कोई समझता नहीं है।  
                                   उससे आगे बढे तो अपने करियर की चिंता युवाओं को इसका शिकार बना रही है।  बार बार की असफलता या फिर मनमुताबिक जगह का न मिलना उन्हें क्या देता है ? यही  कुंठा , तनाव और अवसाद ! 
जबतक उन्हें मंजिल मिल नहीं जाती वे संघर्ष करते रहते हैं और ये संघर्ष का काल क्या उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ रहने देता है।  घर वालों के कटाक्ष , पड़ोसियों की बातें और सफल हुए मित्रों के माता पिता की अपने बच्चों की सफलता की लम्बी चौड़ी बातें - उन्हें क्या देता है ? सिर्फ कुंठा ,मानसिक तनाव और अवसाद।  
                                   नौकरी करने वाले जो कॉर्पोरेट जगत से जुड़े हैं - उनके काम की कोई सीमा नहीं है , डेड लाइन , टारगेट और प्रोजेक्ट का कम्पलीट होना - ऐसे बेरियर हैं कि कई बार बच्चे अपने सगे रिश्तों के  महत्वपूर्ण अवसरों पर शामिल होने से वंचित हो जाते हैं।  जीवन के कुछ पल ऐसे होते हैं कि जिन्हें इंसान अपने अनुसार जीना चाहता है लेकिन आज वह भी नसीब नहीं है फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य बरक़रार रहेगा।  
                                      परिवार वालों की अपनी तरह की अलग अलग समस्याएं , बुजुर्गों की भी अपनी समस्याएं हैं , एकाकीपन , आर्थिक असुरक्षा , पारिवारिक तनाव ये सब मानसिक तौर  वाले कारक है और इससे ही बढ़ता जा रहा है - समाज में स्वस्थ मानसिकता का अभाव !
                                        इसके परिणाम क्या हो रहे हैं -- 


  • छोटी कक्षा के छात्र ने पिता के डांटने पर आत्महत्या  ली।  . 
  • लड़की ने माँ के देर तक बाहर न रहने के आदेश पर आत्महत्या। 
  • उच्च पदासीन अधिकारी द्वारा आत्महत्या। 
  • अफसरों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या। 
  • पत्नी के मायके जाने पर आत्महत्या।
  • परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या।

                                      जो उम्र होती है खेलने की क्यों मौत चुन लेते हैं ? आत्महत्या  अपने आप में इस बात की द्योतक है कि  मानसिक दबाव में रहा होगा।  जब उसको अपने अनुसार कोई भी भविष्य के लिए आशा नजर नहीं आती तो वह ऐसे कदम उठा लेता है।  
                                    ये जीवन की इति नहीं है - अगर हमारे परिवार का कोई सदस्य , मित्र , बच्चे या फिर कोई परिचित  मानसिक तौर पर अवसाद , कुंठा या तनाव  शिकार है तो उसको मनोरोग विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए।  इससे पहले कि वह गंभीर समस्या का शिकार जो जाए।   काउंसलिंग की भी जरूरत होती है जो परिवार के सदस्य सबसे अच्छी तरह से अध्ययन करके कर सकते हैं।  हमें अपनी आर्थिक प्रगति भरपूर दिख रही है लेकिन  उसके पीछे दीमक की तरह खा रहे ये अवसाद , कुंठा और तनाव  किसी को नजर नहीं आते हैं।  
आप स्वयं अपना स्वविश्लेषण कीजिये और फिर स्वयं को स्वस्थ रखने की दिशा में प्रयास कीजिये और अगर आप स्वस्थ हैं तो दूसरों के लिए प्रयास कीजिए।  

कुछ सार्थक सुझव दे सकती हूँ जिनको अपनाने से कुछ तो इससे ग्रसित लोग स्वयं को स्वस्थ बनाने की दिशा में सक्रिय हो सकते हैं --

१. नियमित सुबह भ्रमण के लिए निकले , सुबह की जलवायु आपको शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी सामान्य रहने में सहायक होगी। 

२.  सोने   और जागने का  समय निश्चित करें। 

३. ६ घंटे की नींद जरूर लें , सोने के बाद दिमाग  तरोताजा रहता है। 

४. लगातार कंप्यूटर या मोबाइल पर काम न करें।  सोशल साइट पर रहने के बजाय अपने आस पास सामाजिक होने का प्रयास करें।  

५. बच्चों को भी पढाई से उठाकर कुछ देर  खुली हवा में पार्क या अन्य जगह पर खेलने के लिए कहें।  

६. परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताएं और उनके नियमित जीवन की समस्याओं से अवगत रहें।  
                            अगर जीवन है तो उसे पूरी  तरह से स्वस्थ होकर जीना ही वास्तव में जीवन है।

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

घरेलू आतंकवाद : अनदेखा क्यों ?

वे हमारी जड़ों में तीखा जहर बो रहे हैं ,
और हम हैं  कि जाग कर भी सो रहे हैं .
दूसरों को अंगुली दिखा कर बनते हैं  होशियार
अपने नाक के तले बसे चोरों से न हों ख़बरदार।
                              हम और हमारे नेता सभी कहते फिरते हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पाठशाला है और वहाँ पर विभिन्न संगठनों को शरण दी जा रही है। वहाँ की सरकार उनको संरक्षण दे रही है। हम खुद क्या कर रहे हैं ? अपने गिरेबान में झांक कर देखने कि फुरसत किसे है?
                                  हम अपने घर में पलने वाले और पाले  जाने वाले आतंकियों की ओर नजर ही नहीं डाल पा रहे हें . हम आतंकवादी शब्द  पुनर्परिभाषित करने की सोचें क्या ? देश में दहशत फैलाने वालों को हम नक्सली , उग्रवादी , अलगाववादी, माफिया  और दबंग कहते हैं , क्या ये  किसी न किसी तरीके से आम नागरिक के जीवन में मुश्किल पैदा नहीं करते हैं। नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में वे खुले आम घोषणा करते हैं कि हमें हर परिवार  सदस्य अपनी विद्रोही सेना में बढ़ोत्तरी करने  लिए चाहिए।  हमने कभी सोचा है कि उन परिवारों में कितनी दहशत फैली होगी।  हमें आतंक के चेहरे से इतने मुखौटे हटा कर सिर्फ एक नाम देना है और  उससे निबटना भी बहुत जरूरी है क्योंकि आतंक सिर्फ एक होता है और उसका सहारा लेकर---- 
  • जो दहशत फैलाये , 
  • लोगों का जीवन मुश्किल कर दे , 
  • उनका शोषण करे ,
  •  उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर उन्हें अपनी मर्जी  अनुसार जीने को विवश करे।  
  •  आम आदमी के घर की बहू और बेटियां जहाँ सुरक्षित न हों।  बहू बेटियां तो बड़ी हो जाती हैं , यहाँ  दुधमुंही बच्चियों से लेकर बचपन के आगोश में बेखबर बच्चियों का जीवन तक सुरक्षित न हो , 
  • बलात श्रम करवाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोगों को हम किस श्रेणी में रख सकते हैं। 
  • माफिया चाहे वे किसी भी क्षेत्र के क्यों न हों ? 
 ये सभी तो अपने दबदबे को प्रयोग करके लोगों को आतंकित कर रहे हैं।  फिर इसको भी हमें  आतंकवादी  की श्रेणी में क्यों नहीं रखना चाहिए ? 
                               आम तौर पर तो हम देश की सीमाओं में बलात घुस कर आने वाले पडोसी देशों या एक विचारधारा विशेष के शिकार लोग, क़ानून भंग  करके लोगों में दहशत फैलाने वालों,  को  ही आतंकवादी कहते आ रहे हैं।  इस अलगाववादी विचारधारा वाले लोग देश के नागरिकों को भी बरगला कर अपने कामों को अंजाम देने के लिए मजबूर करने वाले , या फिर नयी पीढ़ी को धन का लालच देकर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले , उनका ब्रेन वाश करके अपने घर के विरुद्ध खड़े करने वाले भी इसी श्रेणी में आते हैं लेकिन वे धर्म विशेष से जुड़े हुए लोग हैं , जो सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि अपनी अलग क़ानून व्यवस्था को स्थापित करने के लिए दूसरे देशों में भी सक्रिय हैं।  
                                 उनसे निपटने के लिए हमारी सेना है ,  हमारी खुफिया एजेंसी हैं जो हमें इसके आगमन और इसके बुरे इरादे से अवगत करा कर सतर्क करती हैं।  कई बार हम बच जाते हैं और इन आतंकवादियों के मंसूबे ध्वस्त कर देते हैं और कई बार हमारे जवान इनकी चालों का शिकार होकर शहीद हो जाते हैं।
                            हमारे अपने देशवासी , इसी जमीन पर जन्मे , पले और जीवन जीने वाले जब उपरिलिखित कामों को अंजाम देते हैं तो उन्हें आतंकवादी क्यों न कहा जाय ?  उनके लिए ही सजा मुक़र्रर क्यों न की जाय ? देश के इन आतंकवादियों को बचाने के लिए - राजनैतिक हस्तियां , दबंग , बड़े बड़े पैसे वाले और रसूख वाले खड़े होते हैं।  उन्हें सजा तो क्या बाइज्जत बरी तक दिया जाता है।  खतरा हमें बाहर के दुश्मनों से जितना है उससे कहीं अधिक देश में फैले हुए सफेदपोश आतंकवादियों से है।  उनको बेनकाब करने का काम न पुलिस कर पाती है और न ही मीडिया। क्योंकि इन लोगों के शरणदाता  रसूखवाले होते हैं।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

पितृ पक्ष : वर्तमान में औचित्य !

               सिर्फ हिन्दू धर्म में ही वर्ष  में १५ दिन पूर्वजों को समर्पित होते हैं  इन दिनों में हम अपने पूर्वजों को पूर्ण श्रद्धा से स्मरण करते हुए तर्पण और श्राद्ध करते हैं . हमारे पूर्वजों को इन दिनों किये गए हमारे कार्यों (  तर्पण , श्राद्ध भोज आदि ) संतुष्टि और तृप्ति प्राप्त होती है।  हम भी अपने पितृ ऋण से मुक्त होने का संतोष अनुभव करते हैं।  हम अपनी संस्कृति और मान्यताओं का सम्मान करते हैं और अपने दायित्वों को पूर्ण करते हैं। जबकि इसकी भी आज के तथाकथित पढ़े लिखे और उच्च स्तरके लोग आलोचना करते हैं और इसको दकियानूसी सोच और लकीर का फकीर बताते हैं लेकिन उसके पीछे के तर्कों को जानते तक नहीं हैं । क्लब जाना , रेसकोर्स जाना ,फिल्में देखने से समय नहीं तो क्या करेंगे ? ददे रात लौटना और देर तक सोना । बिस्तर पर बैड टी चाहिए , तर्पण कौन करेगा ? 


                            वैसे श्राद्ध कर्म का मुख्य तत्व है -  श्रद्धा।  श्राद्ध कर्म में पिंडदान और तर्पण करने से अधिक आवश्यक है कि हमारे मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा हो।  जो आज का चलन हो चुका है कि जीते जी माता पिता को इज्जत न दो क्योंकि ये मानी हुई बात है बेटा पिता से कुछ अच्छे और संपन्न जीवन जीने योग्य बना दिया जाता है ( इसका पूर्ण श्रेय पिता को ही जाना चाहिए किन्तु ??) फिर पिता अपने स्तर से नीचे के नजर आने लगते हैं।  उसके मित्रों के साथ बैठने की लियाकत नहीं रखते हैं । उसकी माँ बहू की किटी पार्टी वाली सहेलियों के सामने आने लायक नहीं होती है । उनके लिए ऊपर या पीछे  कहीं एक कमरा बना होता है।  बेटा ऑफिस से थका हुआ लौटता है तो उसके पास अपने बच्चों और पत्नी के लिए ही समय होता है।  उनके हाल चाँ लेने का समय कहाँ ? कहीं कहीं तो खाना भी अलग ही बनाते हैं ।
                           यही बच्चे माता-पिता के श्राद्ध को बड़े ही सम्मान के साथ करना चाहते हैं। इस अवसर पर एक कहानी याद आ रही है - पिता के श्राद्ध के कारण खाने पीने में देर हो रही थी और कमरे  में अपाहिज माँ खाना मांग रही थी लेकिन बहू - 'आपको अभी खाना कैसे दे दें ? अभी पंडित जी श्राद्ध करवाने आने वाले हैं उसके बाद मिलेगा। ' ऐसे में बहू और बेटे जिन्हें जीवित माँ को खाना देने के लिए एक बहाना मिल गया।  मरने के बाद उनकी भी श्राद्ध करेंगे।  ऐसे श्राद्ध से क्या फायदा ? क्या पितर हमारे ही घर में एक जीवित आत्मा को भूख से परेशान देख कर हमारे द्वारा किये जा रहे पिंडदान से संतुष्ट और तृप्त हो रहे होंगे।  मुझे तो ऐसा नहीं लगता है।  आप जीवित बुजुर्गों के लिए कुछ और खाने की व्यवस्था करके दे सकते हैं  लेकिन ऐसे उत्तर देकर आप अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते हैं। 
                            पितरों को भी जैसा कि  हम मानते हैं , इन दिनों अपने वंशजों से कुछ आशाएं होती हैं लेकिन वे ये कभी नहीं चाहते कि  उनके पड़पोते उनके नाम पर जीवित लोगों के प्रति निष्ठुर व्यवहार करें।  सबसे पहले होता है कि आपके मन में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए।  कर्मकांड और दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है।  पूर्वज तभी प्रसन्न होने जब आप उनके वंशजों को भी खुश रखेंगे।  उनसे आशीष की आशा भी तभी कर सकते हैं।  इस कार्य को बोझ समझ कर न ढोयें बल्कि श्रद्धा के साथ तिल युक्त जल की तिलांजलि देकर भी आप अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं।जीवित आत्माओं को संतुष्ट रखेंगे तभी मृत आत्माएं या हमारे पूर्वज संतुष्ट रहेंगे।  
                           

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

यादें : शिक्षकों की !

                       आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों जो मुझे प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक या कार्य स्थल पर मिले, मुझे शिक्षित करते रहे  सबको नमन करती हूँ और उनमें से कुछ के साथ जुडी यादें भी स्मरण कर रही हूँ। मुझे वो अपने सारे शिक्षक अच्छे तरह से याद हैं। 

                        मेरी प्रारम्भिक शिक्षा सनातन धर्म स्कूल , उरई में हुई।  स्कूल  शिक्षक तो नहीं लेकिन  मुझे घर पर उसी स्कूल में चपरासी का काम करने वाले गुप्ता जी पढ़ाने आते थे।  उस समय शिक्षकों को भाई साहब और शिक्षिकाओं को बहनजी कहा जाता था।  गुप्ता जी ने हमारी नींव मजबूत की थी और जब वे स्कूल में क्लास में चाक और डस्टर रखने आते थे तो मैं उठ कर खड़ी हो जाती थी।  एक दिन उन्होंने समझाया कि क्लास में खड़े मत हुआ करो।  मैं घर का टीचर हूँ न।  मुझे उनकी बात आज भी याद है। 
                         मेरी इण्टर तक की शिक्षा आर्य कन्या इण्टर कॉलेज , उरई में हुई।   हाईस्कूल तक की शिक्षा में मेरी क्लास टीचर और होम साइंस टीचर प्रवेश प्रभाकर ने मुझे बहुत प्रभावित किया और यही नहीं मेरी अभिव्यक्ति की क्षमता  को उन्होंने ही पहचाना था।  उनका प्रयास रहता कि मैं क्लास के पढाई से इतर कामों में भी सक्रीय रहूँ।  इत्तेफाक से वे हमारे घर के बगल वाले घर में रहती थी।  उनके पापा सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर थे।  मेरी आज भी इच्छा है कि वे मुझे मिल जाएँ तो मैं उनसे कहूँ - 'मैं वह बन चुकी हूँ , जो वह चाहती थीं। ' 
                         मेरी इण्टर कॉलेज की प्रिंसिपल प्रेम भार्गव भी मुझे हमेशा याद रहेंगी। वैसे तो मैं जिस कॉलेज में जिस स्तर तक पढ़ी , शिक्षक और कॉलेज में शक्ल और नाम से सब जानते थे।  एक कड़क टीचर थी वो।  मैं उन्हें हमेशा याद रही।  शादी के बाद भी कभी भाई साहब से उनका मिलना होता तो पूछती 'रेखा कहाँ है ? क्या कर रही है ?' अफ़सोस की वो अब नहीं हैं।  
                            डिग्री स्तर पर -को-एजुकेशन वाला था और छोटी जगह का माहौल सीधे  कॉलेज जाना और वापस आना।  हाँ उस समय तक मैंने लिखना और स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित होना शुरू कर दिया था।  फिर भी किसी विशेष शिक्षक के बारे में इस स्तर पर उल्लिखित नहीं कर सकती।  
                              शादी के बाद मैंने बी एड किया और वहां की शिक्षिकाएं सभी अच्छी थी लेकिन सिर्फ एक मुझे प्रिय थी और उन्हें मैं  डॉ प्रीती श्रीवास्तव ( दुर्भाग्य से वो अब नहीं रहीं। ) और वहां की प्रिंसिपल डॉ अमर कुमार हमेशा याद रहेंगी क्योंकि मैंने एम एड भी उसी कॉलेज से किया था।  वहां भी मेरी अपनी एक पहचान बनी हुई थी। कॉलेज छोड़ने के बाद जब मैंने पी एच डी के लिए रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो आखिरी शिक्षण संस्थान के प्रमुख के साइन होना चाहिए।  मैं नहीं गयी मेरे  पतिदेव अपने  प्रो. मित्र के साथ गए तो उन्होंने  साइन करने से मना कर दिया।  बोली रेखा को भेजो। 
                                 जब मैं गयी तो बोली - 'मैं अपनी स्टूडेंट को देखना चाहती थी , नहीं तो साइन की कोई बात नहीं थी। ' बस वो कड़क छवि वाली मेरी शिक्षिका फिर कुछ ही वर्ष बाद कैंसर से चल बसी। 
                             
                                   इसके बाद मैंने कानपूर विश्वविद्यालय से  'डिप्लोमा इन कंप्यूटर साइंस ' का कोर्स किया।  बस मौज मौज में नहीं तो आई आई टी में जॉब कर रही थी और सब कुछ जो पढ़ाया जाना था मुझे पहले से आता था।  फिर पढ़ाने वाली सारी  फैकल्टी आई आई टी की ही थी। क्लास में बैठ कर उनसे पढ़ती और आई आई टी में उनके साथ गप्पें भी मारा करती थी।  फिर भी मेरे शिक्षकों में वाई डी एस आर्य , निर्मल रोबर्ट , रजत मूना(संप्रति आइआइटी, गांधी नगर के निदेशक), बी एम शुक्ला  और सुषमा तिवारी बहुत अच्छे थे।  इनमें से कुछ तो सेवानिवृत्त हो कर चले गए और कुछ अभी भी हैं, लेकिन वे जो उम्र में हमसे छोटे हैं और तारीफ की बात उन्होंने मुझे क्लास हो या आईआईटी हमेशा रेखाजी से ही सम्बोधित किया।  
                                     सबसे अंत में और श्रद्धा से जिन्हें मैं याद करती हूँ वे हैं मेरे कार्य स्थल और मेरे कंप्यूटर साइंस  के प्रोजेक्ट मशीन ट्रांसलेशन के मुख्य दिग्दर्शक  डॉ विनीत चैतन्य - जिन्होंने हमें कंप्यूटर पर हाथ रखने से लेकर उसकी सारी प्रक्रिया बहुत धैर्य के साथ सिखाई , कभी गुस्सा नहीं किया क्योंकि हम तो कला क्षेत्र के लोग थे लेकिन हमारी अच्छी हिंदी और लेखन क्षमता के कारण ही हमें चुना गया था।  सो डेस्कटॉप से लेकर नेट के साथ काम करने  शिक्षा उनसे ही ग्रहण की।  मैं उनकी चिर ऋणी रहूँगी और ऐसे गुरु को हमेशा और सभी नमन करते हैं।  
                                         आज शिक्षक दिवस पर मेरे सभी शिक्षको को मेरा शत शत नमन।  



         

बुधवार, 27 अगस्त 2014

बुजुर्गों का भविष्य !

                                         
 अखबार में पढ़ी हुई कई घटनाएँ हमें विचलित कर जाती हैं लेकिन कुछ तो  अपने पीछे इतने सारे प्रश्न छोड़ जाती हैं कि उनके उत्तर खोजने में और कितने सवाल सामने उठ खड़े होते हैं।  सभी प्रश्न हमारे समाज के हो रहे नैतिक अवमूल्यन से जुड़े होते हैं।  हमें झकझोर  देते हैं लेकिन फिर भी उन घटनाओं को पढने वालों में से कितने अभी भी पुरातन मूल्यों के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं --
* कुलदीपक बेटा ही होता है। 
* वंशबेल बढ़ानेवाला बेटा ही हो सकता है। 
* बेटा चाहे आवारा , बदमाश या कुल के नाम को डुबाने वाला ही क्यों न हो ? लेकिन होना चाहिए। 
                      बेटे की चाह में चाहे कितनी ही बेटियों की बलि चढ़ा दी जाय , उनको गर्भ में ही मार दिया जाय।  बेटी पैदा करने वाली माँ को कभी सम्मान नहीं मिलता।  बेटियां चाहे अपने घर के साथ दोनों घर की फिक्र करती रहें लेकिन वह बेटे की जगह नहीं ले सकती है। 

        आज सुबह सुबह जब अखबार में पढ़ा तो लगा कि उनके एक नहीं तीन तीन बेटे हैं।  सभी इतना तो कमाते ही हैं कि मिल कर माता पिता का पेट पाल सकें।   उन्होंने  खेतों में हल चला कर बेटों को पाला होगा , पढ़ाया लिखाया भी होगा क्योंकि बड़ा बेटा फौज से रिटायर्ड है और शेष दोनों  फैक्ट्री में नौकरी करते हैं।  
९० वर्ष के रोशन लाल और ८५ वर्ष की उनकी पत्नी कटोरी देवी को बेटों द्वारा प्रताड़ित करने की बात रोज की थी।  लेकिन इस उम्र में वे  सहन करने को मजबूर थे फिर एक  दिन कुछ ऐसा हुआ कि उनकी सहनशक्ति ने शायद जवाब दे दिया।  वे घर से निकल कर कसबे पहुंचे और सड़क के किनारे दोनों रोते रहे और फिर अपने जीवन का फैसला  ले लिया।  वे एक सड़क से कुछ दूर  खाली पड़े प्लाट में मृत मिले।  सल्फास की  गोलियों  की शीशी उनके पास मिली , जिसमें दोनों ने ६ गोलियां खायीं थी।  गाँव वालों ने बताया कि  रोशन लाल के तीन बेटे तो थे लेकिन रोटियां देने वाला कोई न था।   लम्बे समय से वे दोनों पड़ोसियों की दया पर जी रहे थे।  वही उनको खाना देते थे।  
                                 जो बेटे जीते जी पेट भरने को न दे सके हो सकता है कि वे उनकी अंतिम क्रिया और तेरहवीं बड़े धूम धाम से करें और समाज के लिए कल उनका श्राद्ध भी करें लेकिन क्या जीते जी उनको भूखा रखने वालों के घर किसी को तेरहवीं और श्राद्ध में भोजन ग्रहण करना चाहिए।  
                                 मेरे विचार से तो बिलकुल भी नहीं।  जिन्हें  समाज की न सही अपने जनक जननी के प्रति अपने दायित्व के प्रति जिम्मेदारी न बनती हो तो ऐसे लोगों को वो पैसा अपने लिए बचा कर रखना चाहिए क्या पता कल उनका भी यही भविष्य हो ?  अरे इस जगह ये तो भूल ही गयी बेटों का ये गुमान कि उनको तो जब तक जिन्दा रहेंगे सरकार पैसे देगी ही , वे किसी के मुंहताज नहीं होंगे जब कि  उनके किसान पिता को कोई पेंशन देने वाला नहीं था।  बेटों के रूप में जो दौलत उन्होंने तैयार की थी वह तो उन्हें धोखा दे गयी।  फिर बेटे किस लिए ? ऐसे ही कितने बुजुर्ग हैं ,  जो रहते तो बेटे के पास हैं लेकिन बीमार होने पर बेटी के घर भेज दिए जाते हैं और बेटी उनका उपचार भी करवाती हैं और कुलदीपक  कहे जाते हैं बेटे।  
                                  इस जगह हम संस्कारों की दुहाई नहीं दे सकते हैं  क्योंकि मानवता कोई संस्कार नहीं बल्कि हर व्यक्ति में पलने वाली भावना है।