www.hamarivani.com

शनिवार, 20 जून 2015

पितृ दिवस पर -- मेरे पापा !



                              वैसे माँ पापा क्या किसी एक दिन ही याद किये जाते हैं लेकिन हाँ इस बहाने अपने जनक से सबको रूबरू करा सकते हैं। हमारा अस्तित्व रहने तक तो हम उन्हें यादों में किताबों में और अपनी कलम से कुछ लिख कर उन्हें उस रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं जिसे हर कोई नहीं जान सका।





                           मेरे पापा बिलकुल मस्त कोई चिंता उन्हें सालती नहीं थी। वे चाहे अपना भला न कर पाएं अगर उनके वश में है तो दूसरे के हित के लिए सबसे आगे रहते थे। दया , ममता और परमार्थ के किस्से तो मैं गिना नहीं सकती लेकिन एक बहुत छोटी सी बात उनकी तस्वीर को उजागर कर देगी। तब मेरी शादी हो चुकी थी सो मैं उस घटना की चश्मदीद गवाह तो नहीं हूँ लेकिन पता चला तो मन में बहुत गर्व महसूस हुआ।
                             हमारे घर के आस पास एक बूढा बन्दर जो उछलने कूदने में असमर्थ हो चूका था। पापा उसको खाना और पानी बराबर देते रहे। आसपास के लोग भी देते रहते थे लेकिन उसका पूरा ध्यान रखना जैसे पापा का काम था। कई सालों तक वह वहां रहा और धीरे धीरे वह परिवार के सदस्य की तरह हो चूका था। आखिर एक दिन उसने अंतिम साँस ली। जैसा कि जानवरों के मामले में होता है कि उन्हें कहीं शहर के बाहर फ़ेंक दिया जाता है और वे चील और गिद्ध का भोजन बन जाते। यही नियति रही है। जब उस बन्दर के लिए भी यही कहा गया तो पापा ने मना कर दिया और उन्होंने किसी बुजुर्ग की तरह उसकी अर्थी तैयार करवाई और घंटे घड़ियाल के साथ उसकी शव यात्रा निकाल कर उसका अंतिम संस्कार करवाया। (अभी भी छोटी जगहों पर बहुत बुजुर्ग लोगों की अंतिम यात्रा गाजे बाजे या घंटे घड़ियाल के साथ श्मशान तक ले जाइ जाती है। )
                           मुझे अपने पापा के जीवन की कई घटनाएँ ऐसी भी याद हैं जिनमें बाद में उन्हें हम लोगों ने ही कहा कि क्यों आप भलाई करते हैं और नुक्सान अपना कर बैठते हैं। लेकिन वो तो जैसे थे वैसे ही रहे।
                        

मंगलवार, 16 जून 2015

धीमा जहर हम ले रहे हैं !

              
 
                         हम धीमा जहर खा रहे हैं, ये बात हम लोगों को पता भी है और नहीं भी है क्योंकि अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए हम कितने मसाले प्रयोग कर रहे हैं और उनके अंदर क्या है? ये भी हमें मालूम नहीं है। हमारी रोजमर्रा की चीजों को हम कंपनी के नाम को ही विश्वनीयता मान कर प्रयोग करते हैं बल्कि हम चाहे ऑनलाइन या ऑफलाइन कैसे भी खरीदारी करें, कंपनी के नाम से ही करते हैं और अगर वह नामी गिरामी कंपनी भी अपने नाम के साथ या फिर अपने उपभोक्ताओं के विश्वास के साथ खिलवाड़ करें तो आम आदमी जाएगा कहाँ? 
                    धीरे धीरे हर क्षेत्र में धांधली और मिलावट, वह भी ऐसी मिलावट की जिससे आदमी के जीवन के साथ ही धोखा किया जाने लगा जाय तो फिर जीवन के साथ होने वाले इस खेल का क्या किया जा सकता है? 
                   सिर्फ कानपुर शहर की ही नहीं बल्कि धीरे धीरे सारी नामी गिरामी कम्पनियाँ एमडीएच , एवरेस्ट , अशोक मसाले , गोल्डी मसाले  भोला मसाले , कैच मसाले सभी के कुछ न कुछ उत्पाद परीक्षण में फेल हो गए क्योंकि उनमें पेस्टिसाइड और कुछ ऐसे आपत्तिजनक केमिकल्स पाए गए जो मानव शरीर के लिए घातक है।  ये यह नहीं देखेंगे की उसका असर बच्चों , युवाओं , प्रौढ़ या फिर वृद्धो पर हो रहा है या फिर पूरी की पूरी पढ़ी ही इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हो रहे हैं। 
                  आज से पीछे की तरफ अगर नजर डाले तो जब घर में खड़े मसलों का प्रयोग होता था ऐसा नहीं अभी भी होता है।  वे ज्यादा स्वस्थ हैं और ज्यादा सुरक्षित हैं।
                  एक बार मैगी का हंगामा एक तूफान की तरह उठा और इतने वेग से कि उसमें उसके ब्रांड एम्बेसडर भी हिल गए। जबकि जहाँ तक मेरा ज्ञान है की किसी भी  उत्पाद की गुणवत्ता कंपनी ही बताती है और आम आदमी उस प्रतिनिधि के प्रभावशाली प्रस्तुति और व्यक्तित्व से सबसे अधिक प्रभावित होता है। वह विज्ञापन करने के पहले उसकी परिक्षण रिपोर्ट नहीं देखते हैं।  उनको सिर्फ अपने पैसों से मतलब होता है और कंपनी को अपने व्यापार के बढ़ने से। 
                            कौन सा उत्पाद अपनी गुणवत्ता के साथ समझौता करने लगे इसके बारे में ब्रांड एम्बेस्डर नहीं जान पाता है और वह उसी प्रमाणिकता पर विश्वास करके अपना करार पूरा करता रहता है। अगर उन्हें भी वास्तविकता का ज्ञान हो तो वे भी इससे समझौता नहीं करेंगे. लेकिन इसके लिए हमारे उत्पाद गुणवत्ता प्राधिकरण भी अपनी ढुलमुल नीति के तहत कितनी चीजों को अनदेखा कर रहा है।
                              ये जरूरी नहीं कि ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक चीजों का सम्मिश्रण विदेशी उत्पादों में ही मिले। हमारे देशी उत्पाद बल्कि रोज मर्रा की जरूरी चीजें से इससे बची नहीं है। आज की खबर के अनुसार मदर डेयरी के दूध में डिटर्जेंट की मिलावट पायी गयी। ये तो रोजमर्रा की चीज है और काम या ज्यादा हर व्यक्ति प्रयोग करता है। दिल्ली जैसे शहरोँ में गाय या भैंस का दूध आसानी से उपलब्ध नहीं और न सुबह नौकरी के लिए निकलने वाले लोग उसको प्राप्त कर सकते हैं। 
                              मैंने तरबूज का प्रयोग खुद देखा है उसमें से लाल पानी के स्थान पर सफेद पानी निकल रहा था और बुरी महक भी आ रही थी। बाद में एक विडिओ भी देखा कि किस तरह से उसमें शक्कर और लाल रंग का इंजेक्शन लगते देखा जिसके वजह से वह लाल और अधिक मीठा भी दिखाई दे रहा है। उनको रातों रात विकसित करने के लिए केमिकल के  प्रयोग ने उसमें पड़ने वाले बीजों के रूप को ही ख़त्म कर दिया। हम शौक से खा रहे हैं क्या इसकी कोई जांच नहीं होनी चाहिए। विक्रेता से पूछने पर है हाई ब्रीड कह कर टाल देते हैं।                                                          
                             अब क्या खाया जाए और क्या नहीं ? लेकिन ये केमिकल का प्रयोग करने वाले क्या अपने उत्पाद के अतिरिक्त किसी और चीज के केमिकल के शिकार नहीं होंगे. होंगे और जरूर होंगे लेकिन फिर भी दूसरों के जीवन को सिर्फ पैसे की हवस में खतरनाक रोगों की और धकेल रहे हैं। हर इंसान हर चीज को खुद तो पैदा करके नहीं खा सकता है फिर क्यों नहीं हम दूसरों के लिए अच्छा सोचते हैं।
                              

मंगलवार, 2 जून 2015

पंचायतें और अँधा न्याय !

                                           पंचायती राज का सपना जिस रूप में दशकों पूर्व देखा गया था , मुझे नहीं लगता कि वह साकार हो सका है। जिस रूप में उसको परिभाषित किया गया था वह अपने अस्तित्व को खो चुका  है क्योंकि वहां भी तो सञ्चालन दबंगों की इच्छानुसार ही होता है। आज स्वतन्त्र भारत में पंचायतों की विकृत न्याय प्रणाली ने शर्मसार कर दिया है। वहां भी दबंगों का राज है क्योंकि पद हथियाने वाले राजनैतिक दलों के आकाओं की छत्रछाया  संरक्षण प्राप्त होते हैं, बल्कि कहें ये पद उन्हें काबिलियत के बदौलत नहीं बल्कि वे अपनी हनक के बल पर हथियाते हैं। और फिर कठपुतली बन कर काम भी करते हैं। पंचायत सदस्य उनकी अंटी  में रहते है. गाँव वालों के लिए पंचायत का निर्णय वेद वाक्य होता है। निर्णय चाहे उचित हो या अनुचित , मान - मर्यादा जैसी कोई चीज वहां नहीं होती है। उस निर्णय के खिलाफ कोई और विकल्प या प्रतिरोध करने वाला  नहीं होता है। 
             कितनी घटनाएँ और शर्मसार होती हुई मानवता के उदाहरण निरंतर सामने आ रहे हैं और पढने के बाद विवश से बैठे हम हाथ मल कर रह जाते हैं। आपको भी परिचित होने का पूरा पूरा अधिकार है और अपनी राय देने का भी ---
1. एक गाँव की पंचायत ने सास बहू के झगड़े में बहुओं को पेड़ से बाँध कर पीटने का निर्णय दिया और वैसा ही किया गया।पूरा गाँव तमाशा देखता रहा और जब तक वे बेहोश नहीं हो गयीं। घर की दीवारों से बाहर मामला न्याय के लिए आता है तब  पहला प्रयास होता है कि परिवार की लड़ाई में समझौते का प्रयास किया जाय , न कि उसे तमाशा बना कर हैवानियत का रूप दे दिया जाय। 

2 . एक पंचायत ने बेटे को एक विधवा से विवाह करने के कारण उसे बस्ती से निकल दिया गया और माँ की मृत्यु पर भी उसको बस्ती में नहीं घुसने दिया गया। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बस्ती के बाहर रात भर बैठा रहा कि शायद लोगों को उसको तरस आ जाय और उसे अंतिम दर्शन करने को मिल जाए। फिर पता नहीं उस अभागन माँ को अपने बेटे के हाथ से अंतिम संस्कार का सौभाग्य प्राप्त भी हुआ होगा या वह भी तुगलकी फरमान की बलि चढ़ गया होगा। 

3 . एक गाँव में गैर जाति के लडके के संग शादी करने पर पंचायत ने उस लडके की बहन की शादी दूसरे परिवार के पुरुष के साथ करने का फरमान सुनाया। जो उससे उम्र में दोगुना और विधुर भी था। 

4 . पंचायत के आदेश पर 60 वर्षीया महिला और 80 वर्षीय पुरुष का निकाह करवा कर गाँव के बाहर निकाल दिया गया। पंचायत का अंदेशा था कि दोनों के मध्य अवैध सम्बन्ध थे और महिला की बेटी की मृत्यु के पीछे यही कारण रहा होगा। कोई गवाह नहीं कोई सबूत नहीं और सीधे निर्णय। 
                                  इन पंचायतों द्वारा दिए गए निर्णय के खिलाफ कहाँ सुनवाई हो सकती है ? पुलिस कोई रूचि नहीं लेती है और उन्हें जब तक तहरीर न मिले तो वो कुछ करने वाले नहीं और फिर दबंगों के चलते पीड़ित कहीं गुहार लगा ही नहीं सकते हैं। ये कैसा लोकतंत्र और कैसी स्वतन्त्रता  का खुला मखौल है ?

सोमवार, 11 मई 2015

पहला और आखिरी मदर्स डे !

मैं और मेरी माँ ( पिछला मदर्स डे )
                      माँ  पहला शब्द होता है जो बच्चा बोलता है और जिसका पहला अहसास बच्चा करता है  वो माँ ही होती है। वह सिर्फ एक होती है और वह सब कुछ देती है जो इस दुनियाँ में कोई नहीं दे सकता है। वह होता है, जीव को उसका अस्तित्व प्रदान कर इस धरती पर लाना।
                          ये मेरी माँ के साथ तस्वीर पिछले मदर्स डे पर ली गयी पहली और आखिरी तस्वीर है। मैं भी नहीं जानती थी कि , सिर्फ इस दिन के लिए बगैर उन्हें सूचित किये उनके पास पहुंची थी, उनके साथ मैं अपना पहला और आखिरी मदर्स डे मना  रही हूँ.
                           माँ मैंने तुमसे जीवन में संघर्ष , सेवा ,त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ा है  और उसको निभाते हुए मैंने जीवन की लम्बी लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ते हुए जीत ली है और मेरी जीत देख कर ही तुम्हें परम संतोष मिला था।उससे पहले जब भी तुम्हारे पास जाती तो वही चिंता भरे सवाल और मेरे लाख आश्वस्त करने के बाद भी कहीं संशय पालती रहती थी। मेरे बाद तुम छोटी बहनों से पूछती। सब वही उत्तर देते और फिर मेरी दोनों बेटियों को अपनी मंजिल तक पहुंचा देख तुम कितनी खुश हुई थीं? उसके बाद दोनों की शादी देख कर तुम्हें लगा कि अब तुम्हारी आत्मा सब तरफ से निश्चिन्त हो चुकी थी.  सबसे ज्यादा मेरी चिंता रहती थी न  तुम्हें. अब कोई चिंता करने वाला नहीं रहा और पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि सारे लोगों की चिंता मुझे दे गयी हो। 

                           अब माँ उस घर और उस कमरे में जाने का कभी मन नहीं करता घर तो जाऊँगी  ही लेकिन उस कमरे की हर चीज में मुझे तुम ही नजर आती हो। वही तुम्हारी साड़ियां , कपडे सब उसी तरह से अलमारी में रखे हुए। उन्हें छू कर तुम्हारे होने का अहसास होता है लेकिन तुम तो हमेशा अपनी बच्चों के साथ हो और हमेशा रहोगी ।

शुक्रवार, 8 मई 2015

अभिव्यक्ति की अवसर !

                                             कुछ दिन पहले हमने पढ़ा था कि एक लडके ने अपनी आत्महत्या का लाइव वीडियो अपनी गर्ल फ्रेंड को भेजा और खुद फाँसी पर लटक गया। ये अपनी निजी जिंदगी का ही नहीं बल्कि औरों की नजर में दूसरों का भी अपमान कहा जाएगा.
            अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें संविधान में प्रदान की गयी है लेकिन एक हमारा अपना नैतिक और भावात्मक दायरा होता है। ये जरूरी नहीं है कि  जिसे हम लिखें या बोलें वो सबको पसंद ही हो. लेकिन अगर हम सोशल मीडिया या सोशल प्लेटफॉर्म पर अपनी निजी बातें डालें तो सभी को पसंद ही आए या पसंद भी आएं तो हमें संवेदनहीन करने वाली तो न हों। खुशियां तो हम सभी से बाँट सकते हैं लोग खुश होते हैं। हम एक दूसरे से जुड़े होते हैं और ऐसी यादें और पल हम खुद संचित करके रखना चाहते हैं। 
                          शादी , सगाई , या जन्मदिन की यादें अपने बच्चों के बचपन की तस्वीरें हम सभी रखते हैं और समय समय पर फेसबुक जैसे मंच पर शेयर भी करते हैं। एक दूसरे को बधाई देते हैं शुभकामनाएं भी देते हैं। लेकिन अपने किसी बहुत करीब की मृत्यु की घोषणा या उसका आँखों देखा हाल हम खुद ही डालने लगें क्या ऐसा संभव है ? 
                    मृत्यु चाहे जिसकी भी हो अगर वह बहुत नजदीकी है तो इंसान अपने आप को खुद नहीं संभाल पाता है और फिर वह उसका सजीव चित्रण खुद कर रहा हो तो उसकी संवेदनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है। वह भी जब किसी के भाई , बहन , माँ या पिता के निधन हो चूका हो। ऐसा करना तो लगता है जैसे कि सहानुभूति को तौलने का प्रयास किया जा रहा हो ? दोस्ती या शुभचिंतको को अपनत्व की कसौटी पर कसा जा रहा हो। ऐसे अवसरों पर अगर कोई दूसरा भी फ़ोन पर तेज तेज आवाज में बात करता सुनाई देता है तो सुनाने वाले को बुरा लगता है और अगर कोई बेटा , बेटी , भाई या बहन मोबाइल पर अपना स्टेटस अपडेट करे या कर रहा हो तो उसे हम क्या कहेंगे?              
                        यादें हमेशा सुखद संजो कर रखी जाती हैं ताकि जब उन्हें देखें तो पुराने समय की याद कर सकें। लेकिन पार्थिव शरीर की तस्वीर या उसके साथ खिंचवाई गयीं तस्वीरें सिर्फ और सिर्फ कष्ट देने वाली होती हैं।यादों में हमेशा अच्छे पल ही संजोये जाने चाहिए। 

शुक्रवार, 1 मई 2015

मज़दूर दिवस ! (आज कानपुर के मजदूरों के नाम)


                 आज का दिन  कितने नाम से पुकारा जाता है ? मई दिवस , मजदूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस।  अगर विश्व के दृष्टिकोण  देखें तो मजदूर दिवस ही कहा जाएगा।  हम कितने उदार हैं ? हमारा दिल भी इतना बड़ा है कि हमने पूरा का पूरा दिन उन लोगों के नाम कर दिया।  सरकार ने तो अपने कर्मचारियों को छुट्टी दे दी लेकिन क्या वाकई ये दिन उन लोगों के लिए नहीं तय है जो अनियमित मजदूर हैं।  इस दिन की दरकार तो वास्तव में उन्हीं लोगों के लिए हैं - चाहे वे रिक्शा चला रहे हों या फिर बोझा ढो रहे हों।   आज के दिन मैं कानपुर की बंद मिलों और उनके मजदूरों की याद कर उनके चल रहे संघर्ष को सलाम करना चाहूंगी।         
               कभी कानपुर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था और यहाँ पर पूरे उत्तर भारत से मजदूर काम करने आते थे और फिर यही बस गए। कहते हैं न रोजी से रोजा होता है। यहाँ पर दो एल्गिन मिल, विक्टोरिया मिल , लाल इमली , म्योर मिल , जे के कॉटन मिल , स्वदेशी कॉटन मिल , लक्ष्मी रतन कॉटन मिल , जे के जूट मिल और भी कई मिलों में हजारों मजदूर काम करते थे। रोजी रोटी के लिए कई पालिओं में काम करते थे। सिविल लाइन्स का वह इलाका मिलों के नाम ही था। रोजी रोटी के लिए यहाँ पर काम करने वाले मजदूर या बड़े पदोंपर काम करने वाले अपने गाँव से लोगों को बुला बुला कर नौकरी में लगवा देते थे। जिस समय शाम को मिल का छुट्टी या लंच का हूटर बजता था तो मजदूरों की भीड़ इस तरह से निकलती थी जैसे कि बाँध का पानी छोड़ दिया गया हो। ज्यादातर मजदूरों का प्रयास यही रहता था कि मिल के पास ही कमरा ले लें।वह समय अच्छा था - मेहनत के बाद पैसा मिलता तो था कोई उसमें बिचौलिया तो नहीं था। 

बंद पड़ी एल्गिन मिल

                            वह मिलें बंद हुई , एक एक करके सब बंद हो गयीं। वह सरकारी साजिश थी या कुछ और मजदूर सड़क पर आ गए कुछ दिन उधार लेकर खर्च करते रहे इस आशा में कि मिल फिर से खुलेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वे अपनी लड़ाई आज भी लड़ रहे हैं , कितने दुनियां छोड़ कर जा चुके हैं और कितने उस कगार पर खड़े हैं। मजदूरों की पत्नियां घरों में काम करके गुजर करने लगीं। कभी पति की कमाई पर बड़े ठाठ से रहती थीं। 
                            इन सब में लाल इमली आज भी कुछ कुछ काम कर रही है और मजदूर काम न सही मिल जाते जरूर हैं। इस उम्मीद में कि हो सकता है सरकार फिर से इन्हें शुरू कर दे. इनका कौन पुरसा हाल है।



एल्गिन मिल खंडहर हो रही है और सरकार उसकी बिल्डिंग को कई तरीके से प्रयोग कर रही है लेकिन उस बंद मिल के मजदूर आज भी क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं। कितनी सरकारें आई और गयीं लेकिन ये आज भी वैसे ही हैं। यह चित्र बयान कर रहा है कि उनके अनशन का ये 3165 वाँ दिन है।बताती चलूँ मैंने भी  इस मिल के पास सिविल लाइन्स में कुछ वर्ष गुजारे हैं। वर्ष १९८२-८३ का समय मैंने इन मजदूरों के बीच रहकर गुजारा है। तब उनके ठाठ और आज कभी गुजरती हूँ वहां से सब कुछ बदल गया है। 

कभी जवान थे वक्त ने हड्डी का ढांचा बना के रख दिया
                              

          
वीरान पड़ा म्योर मिल का प्रवेश द्वार

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

अक्षय तृतीया !

          अक्षय तृतीया हम बचपन में तभी जानते थे जब माँ लोग कहती थीं ये बिना पूछी शादी की साइत होती है और कुछ दान पुण्य के काम किये जाते थे। सबसे बड़ा काम हम गुड़ियों का ब्याह रचाते थे। 
                            

 http://media.santabanta.com/images/picsms/2014/hindi-4397.jpg
                                 अब तो व्यापारीकरण और बाजारीकरण के साथ साथ इंटरनेट के बढ़ाते प्रकोप से हम इसके सही अर्थ को तो भूलते ही जा रहे हैं. बड़े बड़े अक्षरों में ज्वैलर्स के विज्ञापन ,सोने और हीरे के जेवरातों में मिलाने वाली छूट का आकर्षण लोगों को खींच लेता है। अक्षय का शाब्दिक अर्थ जिसका क्षय न हो और इसी लिए सोना खरीदों तो वह बढ़ता ही रहेगा. दुकानदारों की जरूर चाँदी हो जाती है वह जितना पूरे साल में कमाते होंगे उसका काम से कम पचास प्रतिशत सिर्फ एक दिन में कमा लेते हैं। 
                                  जब की इसका वास्तविक अर्थ अगर समझें तो ये है भौतिक वास्तु का क्षय सुनिश्चित है फिर इस दिन खरीदी गयी वास्तु को अक्षय कैसे मान सकते हैं ? जीवन में हम कितना संचय करके उसका सुख उठा सकते हैं। ये हमारे मन का भ्रम है की हमने इतना संचित कर लिया चार पीढ़ियां बैठ कर खायेंगी। वास्तव में इस दिन अगर व्यक्ति अच्छे कार्य करे तो उससे अर्जित पूर्ण अक्षय जरूर हो सकता है। इस समय भयंकर गर्मी का मौसम आ चूका होता है और अगर करना है तो प्याऊ लगवाइये , गरीबों को सत्तू, शक्कर , छाता , पंखा , सुराही आदि दान देनी चाहिए। वह देकर जो आत्मा संतोष आपको मिलेगा वह अक्षय होगा। गर्मी में चिड़ियों के लिए पानी पेड़ पर टांगना ,जानवरों के लिए पानी भरवाना वह अक्षय होगा। आत्मा सभी में होती है और उस आत्मा की संतुष्टि के लिए जो भी प्रयास करता है , वह अक्षय है और अक्षय तृतीया इसी का पर्याय है।
                    पुराणों में लिखा है कि इस दिन पूर्वजों  को किया गया तर्पण अथवा  पिण्डदान या फिर किसी और प्रकार का दान अक्षय फल प्रदान करनेवाला होता   है। इस दिन गंगा स्नान करने का भी विधान है ,हमारी आस्था सदैव से धर्म कर्म से जुडी है इसीलिए कहा गया है कि भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया  जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है।