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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

बेटियों का दंश !

                             बेटियों होना माँ बाप के लिए कम और लोगों के लिए बोझ दिखना सिर्फ आज से नहीं बल्कि सदियों से चला आ रहा है और उन सदियों की स्थिति को हम इतिहास में पढ़ते आ रहे हैं।  दशकों से तो हम खुद ही इसको महसूस करते आ रहे हैं लेकिन आज लिखने का साहस मैं तब जुटा पायी जब कि मेरी बेटियों को अपना बोझ समझने वाले लोगों को दिखा दिया कि हमने अपनी पाँचों बेटियाँ को वांछित करियर में सफल होने के बाद सुयोग्य वरों के सुपुर्द करने का कार्य पूर्ण कर लिया है।
                           जब अपने माता - पिता के घर में चार बहनें थे हम और एक बड़े भाई साहब। ये तो अच्छा था कि एक भाई था तो माँ का चार बेटियों की माँ होने का गुनाह माफ था। पापा तीन भाई और संयुक्त परिवार में तीनों भाइयों में नौ बेटियां और चार बेटे थे लेकिन सबके पास एक बेटा तो था ही। बहनों का ढकौना होने के कारण उन लोगों की सामाजिक स्थिति सम्मानीय रही थी , ज्यादा बेटियां होने का ताना तो सुना उन्होंने  भी लेकिन एक बेटा होने का गौरव प्राप्त था उन्हें सो सौ खून माफ।
                            जब मेरी शादी हुई तो जेठजी की दो बेटियां थीं। लेकिन घर में कई पीढ़ियों के बाद बेटियां हुई थी तो घर वालों को कोई मलाल न था। जब मैं पहली बार माँ बनने वाली थी तो घर में ही नहीं बल्कि बाहर वालों को पूरी उम्मीद थी कि इस बार घर में बेटा होगा। लेकिन मैं तटस्थ थी क्योंकि बचपन से ही मैं अतीत को कभी ढोती नहीं , वर्तमान को रोती नहीं और भविष्य को बोती नहीं। लेकिन घर वालों ने कुछ और सोच रखा था। उस दिन पतिदेव टूर पर थे और घर वाले मुझे हॉस्पिटल लेकर गए। कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। मैं तो अपनी बेटी को देख कर सारी पीड़ा भूल गयी।
                          पतिदेव रात ग्यारह बजे लौटे तो पता चला कि बेटी हुई है। अस्पताल घर से बहुत दूर था। घर वाले बोले - 'अब रात में जाने की क्या जरूरत ? लड़की ही तो हुई है सुबह जाना। "लड़की ही तो हुई है " जैसे कि बेटी हाड मांस की न होकर कोई बेजान गुड़िया हो। मुझे नौ महीने की पीड़ा नहीं सहनी पड़ी बल्कि कहीं सड़क पर पड़ी मिल गयी हो।
                          बेटी हो या बेटा माँ बाप के लिए सिर्फ अपना अंश होता है और जान से ज्यादा प्यारा भी। फिर रात में ही इन्होने अपना स्कूटर उठाया और साढ़े बारह बजे हॉस्पिटल पहुंचे तो मुझे बताया कि घर में ये कहा जा   रहा था। मुझे लगा कि  मेरी पीड़ा और ख़ुशी से किसी का कोई वास्ता नहीं है। 
सबसे बड़ा दुःख तो तब लगा जब सुबह कैंपस में भी किसी ने इन्हें बेटी होने की बधाई नहीं दी। इनका का पूरे कैंपस में बहुत अच्छा व्यवहार था। आज की ही तरह सबके सुख दुःख में साथ देना। अरे बेटी हमारे घर में हुई थी न किसी ने मिठाई मांगी और न बधाई दी क्योंकि बाबूजी के घर में तीसरी पोती हुई थी। न बाबूजी दुखी थे और न घर वाले बल्कि खुश थे कि अगर बेटा हो जाता तो शायद उनकी स्थिति निम्न न हो जाये । 


 
 (क्रमशः)

शनिवार, 4 जुलाई 2015

अन्धविश्वास और किवदंतियां !

                          वर्षों पहले जब हमारी माँ ने अपने बच्चों को जन्म दिया था , तब की काल , परिस्थितियाँ और शिक्षा का परिदृश्य कुछ और था। लेकिन रोज रोज सामने आने वाली स्थितियाँ और घटनाएँ हमें फिर सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या हम वाकई एक तरफ चाँद से बातें कर रहे हैं और दूसरी तरफ अन्धविश्वास के दलदल से अभी तक बाहर नहीं आ पा रहे हैं। 
                           वर्षों पहले जब हम भाई बहनों का जन्म हुआ था तो मेरी माँ को विटामिन 'ए ' की कमी से रतौंधी (रात में रोगी को दिखाई नहीं देता ) आती थी। कम उम्र , संयुक्त परिवार के काम खान पान वही सब की तरह कोई विशेष परवाह नहीं। चूल्हे पर रोटियां सेकते वक़्त दिखाई न देने के कारण कितनी बार अंगुलियां रोटी पलटने में तवे पर पड  जाती और जल जाती। एक 17 - 18 साल की लड़की कुछ बोलने के लायक तो वैसे भी नहीं होती थी। घर की बड़ी बुजुर्ग कहती 'बच्चा गुनाह होता है ' इसी लिए रतौधी आने लगती है जब बच्चा हो जाएगा तो ठीक हो जायेगी। लेकिन तब न डॉक्टर को दिखाना होता था और न अस्पताल में डिलीवरी होती थी , परिणाम जब तक हम लोगों का जन्म हुआ हम पहले तीन भाई बहन दूर दृष्टि के कमजोर होने के शिकार हो गए। लेकिन तब इस बात से हम भी वाकिफ न थे। सोचते रहे कि जैसा हमको दिखता है वैसा ही सबको दिखता होगा। हम माँ के प्रति पल रहे अन्धविश्वास की कीमत जीवन भर चुकाते रहे। 
                             वो जमाना और था न शिक्षा थी न गर्भिणी के प्रति जागरूकता। लेकिन जब हम शिक्षित हो गए तब भी इस अन्धविश्वास से मुक्त कहाँ हो पाये ? मैं जिस घर में ब्याह कर आई थी उसमें चिकित्सा जगत से जुड़े लोग थे लेकिन अपनी देख रेख के प्रति जागरूक बराबर रहे , पूरा पूरा उचित संरक्षण मिला , समय से टीकाकरण और मेडिकल चेक अप सब कुछ होता रहा । लेकिन अन्धविश्वास यहाँ भी कम न हुआ। मेरी जिठानी को एक बच्चे के जन्म के समय घुटनों में दर्द की शिकायत रहने लगी। सारी दवाएं उपलब्ध थीं लेकिन वह कम नहीं हो रहा था। आस पास की अनुभवी महिलायें वही जुमला सुनाने लगीं - जब बच्चा होगा तो सब ठीक हो जाएगा। नौ महीने तक इन्तजार किया। बच्चा हुआ और भयंकर पीलिया का शिकार , चंद दिनों में चल बसा। दर्द फिर भी ठीक न हुआ। तब एक्सरे और बाकी  टेस्टिंग कराई गयी तो पता चला कि उनको बोन टी बी है और पीलिया भी। फिर एक साल तक बिस्तर पर। ये मध्य काल था। लेकिन अन्धविश्वास और किवदंतियों का प्रभाव कहीं भी कम नहीं था। 
                              इसके बाद आज की बात कर सकती हूँ -मेरे एक बहुत करीबी की बेटी जो एक कंपनी में सेक्रेटरी थी। पति ने प्रसव  के कुछ महीने पहले अपनी माँ के पास भेज दिया। माँ स्वयं स्कूल में प्रिंसिपल उच्च शिक्षित और प्रगतिशील विचारों वाली लेकिन बहू के मामले में अन्धविश्वास और किवदन्तियों से ग्रस्त दिखाई दीं। उनके घर की स्थिति ऐसी है कि वहां धूप बिलकुल भी नहीं आती। सारे दिन बिजली जला कर रखी जाती। सर्दियों के समय में हीटर या ब्लोअर चला कर रखती। धीरे धीरे उसको विटामिन 'डी '  की कमी होने लगी और उसको कमर में दर्द होने लगा और एक समय ऐसा भी आया कि वह उठने बैठने के लिए लाचार हो गयी। जब वह अपनी समस्या सास से कहती तो वह कहती -अरे बच्चा गुनाह होता है , इतनी पीरें तो आती ही हैं। चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। जब सहन शक्ति से बाहर हो गया तो उसने पति को बाहर से बुलाया और उसके साथ डॉक्टर के पास गयी। तब तक बच्चे का पूर्ण विकास हो चुका था। डॉक्टर ने पति को डांटा कि आप लोग कैसे पढ़े लिखे हैं ? इसको विटामिन डी की बहुत कमी है , इसको धूप  मिलना बहुत जरूरी है। उसको विटामिन डी की हाई डोज दी। तब उसको आराम मिला लेकिन बच्चा होने के बाद जब उसने चलना शुरू किया तो पता चला कि उसमें भी विटामिन डी की कमी के कारण पैरों में कुछ कमजोरी है। वह सीधे नहीं चल पा रहा था और उसको भी विटामिन डी देनी पड़ी , तब जाकर वह ठीक से चल पाया ।
                                 ये तीन पीढ़ियों की सच्ची घटनाएँ मैंने इसलिए लिखी ताकि चिकित्सा सम्बन्धी कमियों को अन्धविश्वास और किवदंतियों की बलि चढ़ कर माताओं को कोई शारीरिक और मानसिक कष्ट न झेलना पड़े। 

                             

शनिवार, 20 जून 2015

पितृ दिवस पर -- मेरे पापा !



                              वैसे माँ पापा क्या किसी एक दिन ही याद किये जाते हैं लेकिन हाँ इस बहाने अपने जनक से सबको रूबरू करा सकते हैं। हमारा अस्तित्व रहने तक तो हम उन्हें यादों में किताबों में और अपनी कलम से कुछ लिख कर उन्हें उस रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं जिसे हर कोई नहीं जान सका।





                           मेरे पापा बिलकुल मस्त कोई चिंता उन्हें सालती नहीं थी। वे चाहे अपना भला न कर पाएं अगर उनके वश में है तो दूसरे के हित के लिए सबसे आगे रहते थे। दया , ममता और परमार्थ के किस्से तो मैं गिना नहीं सकती लेकिन एक बहुत छोटी सी बात उनकी तस्वीर को उजागर कर देगी। तब मेरी शादी हो चुकी थी सो मैं उस घटना की चश्मदीद गवाह तो नहीं हूँ लेकिन पता चला तो मन में बहुत गर्व महसूस हुआ।
                             हमारे घर के आस पास एक बूढा बन्दर जो उछलने कूदने में असमर्थ हो चूका था। पापा उसको खाना और पानी बराबर देते रहे। आसपास के लोग भी देते रहते थे लेकिन उसका पूरा ध्यान रखना जैसे पापा का काम था। कई सालों तक वह वहां रहा और धीरे धीरे वह परिवार के सदस्य की तरह हो चूका था। आखिर एक दिन उसने अंतिम साँस ली। जैसा कि जानवरों के मामले में होता है कि उन्हें कहीं शहर के बाहर फ़ेंक दिया जाता है और वे चील और गिद्ध का भोजन बन जाते। यही नियति रही है। जब उस बन्दर के लिए भी यही कहा गया तो पापा ने मना कर दिया और उन्होंने किसी बुजुर्ग की तरह उसकी अर्थी तैयार करवाई और घंटे घड़ियाल के साथ उसकी शव यात्रा निकाल कर उसका अंतिम संस्कार करवाया। (अभी भी छोटी जगहों पर बहुत बुजुर्ग लोगों की अंतिम यात्रा गाजे बाजे या घंटे घड़ियाल के साथ श्मशान तक ले जाइ जाती है। )
                           मुझे अपने पापा के जीवन की कई घटनाएँ ऐसी भी याद हैं जिनमें बाद में उन्हें हम लोगों ने ही कहा कि क्यों आप भलाई करते हैं और नुक्सान अपना कर बैठते हैं। लेकिन वो तो जैसे थे वैसे ही रहे।
                        

मंगलवार, 16 जून 2015

धीमा जहर हम ले रहे हैं !

              
 
                         हम धीमा जहर खा रहे हैं, ये बात हम लोगों को पता भी है और नहीं भी है क्योंकि अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए हम कितने मसाले प्रयोग कर रहे हैं और उनके अंदर क्या है? ये भी हमें मालूम नहीं है। हमारी रोजमर्रा की चीजों को हम कंपनी के नाम को ही विश्वनीयता मान कर प्रयोग करते हैं बल्कि हम चाहे ऑनलाइन या ऑफलाइन कैसे भी खरीदारी करें, कंपनी के नाम से ही करते हैं और अगर वह नामी गिरामी कंपनी भी अपने नाम के साथ या फिर अपने उपभोक्ताओं के विश्वास के साथ खिलवाड़ करें तो आम आदमी जाएगा कहाँ? 
                    धीरे धीरे हर क्षेत्र में धांधली और मिलावट, वह भी ऐसी मिलावट की जिससे आदमी के जीवन के साथ ही धोखा किया जाने लगा जाय तो फिर जीवन के साथ होने वाले इस खेल का क्या किया जा सकता है? 
                   सिर्फ कानपुर शहर की ही नहीं बल्कि धीरे धीरे सारी नामी गिरामी कम्पनियाँ एमडीएच , एवरेस्ट , अशोक मसाले , गोल्डी मसाले  भोला मसाले , कैच मसाले सभी के कुछ न कुछ उत्पाद परीक्षण में फेल हो गए क्योंकि उनमें पेस्टिसाइड और कुछ ऐसे आपत्तिजनक केमिकल्स पाए गए जो मानव शरीर के लिए घातक है।  ये यह नहीं देखेंगे की उसका असर बच्चों , युवाओं , प्रौढ़ या फिर वृद्धो पर हो रहा है या फिर पूरी की पूरी पढ़ी ही इसके दुष्प्रभाव से ग्रसित हो रहे हैं। 
                  आज से पीछे की तरफ अगर नजर डाले तो जब घर में खड़े मसलों का प्रयोग होता था ऐसा नहीं अभी भी होता है।  वे ज्यादा स्वस्थ हैं और ज्यादा सुरक्षित हैं।
                  एक बार मैगी का हंगामा एक तूफान की तरह उठा और इतने वेग से कि उसमें उसके ब्रांड एम्बेसडर भी हिल गए। जबकि जहाँ तक मेरा ज्ञान है की किसी भी  उत्पाद की गुणवत्ता कंपनी ही बताती है और आम आदमी उस प्रतिनिधि के प्रभावशाली प्रस्तुति और व्यक्तित्व से सबसे अधिक प्रभावित होता है। वह विज्ञापन करने के पहले उसकी परिक्षण रिपोर्ट नहीं देखते हैं।  उनको सिर्फ अपने पैसों से मतलब होता है और कंपनी को अपने व्यापार के बढ़ने से। 
                            कौन सा उत्पाद अपनी गुणवत्ता के साथ समझौता करने लगे इसके बारे में ब्रांड एम्बेस्डर नहीं जान पाता है और वह उसी प्रमाणिकता पर विश्वास करके अपना करार पूरा करता रहता है। अगर उन्हें भी वास्तविकता का ज्ञान हो तो वे भी इससे समझौता नहीं करेंगे. लेकिन इसके लिए हमारे उत्पाद गुणवत्ता प्राधिकरण भी अपनी ढुलमुल नीति के तहत कितनी चीजों को अनदेखा कर रहा है।
                              ये जरूरी नहीं कि ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक चीजों का सम्मिश्रण विदेशी उत्पादों में ही मिले। हमारे देशी उत्पाद बल्कि रोज मर्रा की जरूरी चीजें से इससे बची नहीं है। आज की खबर के अनुसार मदर डेयरी के दूध में डिटर्जेंट की मिलावट पायी गयी। ये तो रोजमर्रा की चीज है और काम या ज्यादा हर व्यक्ति प्रयोग करता है। दिल्ली जैसे शहरोँ में गाय या भैंस का दूध आसानी से उपलब्ध नहीं और न सुबह नौकरी के लिए निकलने वाले लोग उसको प्राप्त कर सकते हैं। 
                              मैंने तरबूज का प्रयोग खुद देखा है उसमें से लाल पानी के स्थान पर सफेद पानी निकल रहा था और बुरी महक भी आ रही थी। बाद में एक विडिओ भी देखा कि किस तरह से उसमें शक्कर और लाल रंग का इंजेक्शन लगते देखा जिसके वजह से वह लाल और अधिक मीठा भी दिखाई दे रहा है। उनको रातों रात विकसित करने के लिए केमिकल के  प्रयोग ने उसमें पड़ने वाले बीजों के रूप को ही ख़त्म कर दिया। हम शौक से खा रहे हैं क्या इसकी कोई जांच नहीं होनी चाहिए। विक्रेता से पूछने पर है हाई ब्रीड कह कर टाल देते हैं।                                                          
                             अब क्या खाया जाए और क्या नहीं ? लेकिन ये केमिकल का प्रयोग करने वाले क्या अपने उत्पाद के अतिरिक्त किसी और चीज के केमिकल के शिकार नहीं होंगे. होंगे और जरूर होंगे लेकिन फिर भी दूसरों के जीवन को सिर्फ पैसे की हवस में खतरनाक रोगों की और धकेल रहे हैं। हर इंसान हर चीज को खुद तो पैदा करके नहीं खा सकता है फिर क्यों नहीं हम दूसरों के लिए अच्छा सोचते हैं।
                              

मंगलवार, 2 जून 2015

पंचायतें और अँधा न्याय !

                                           पंचायती राज का सपना जिस रूप में दशकों पूर्व देखा गया था , मुझे नहीं लगता कि वह साकार हो सका है। जिस रूप में उसको परिभाषित किया गया था वह अपने अस्तित्व को खो चुका  है क्योंकि वहां भी तो सञ्चालन दबंगों की इच्छानुसार ही होता है। आज स्वतन्त्र भारत में पंचायतों की विकृत न्याय प्रणाली ने शर्मसार कर दिया है। वहां भी दबंगों का राज है क्योंकि पद हथियाने वाले राजनैतिक दलों के आकाओं की छत्रछाया  संरक्षण प्राप्त होते हैं, बल्कि कहें ये पद उन्हें काबिलियत के बदौलत नहीं बल्कि वे अपनी हनक के बल पर हथियाते हैं। और फिर कठपुतली बन कर काम भी करते हैं। पंचायत सदस्य उनकी अंटी  में रहते है. गाँव वालों के लिए पंचायत का निर्णय वेद वाक्य होता है। निर्णय चाहे उचित हो या अनुचित , मान - मर्यादा जैसी कोई चीज वहां नहीं होती है। उस निर्णय के खिलाफ कोई और विकल्प या प्रतिरोध करने वाला  नहीं होता है। 
             कितनी घटनाएँ और शर्मसार होती हुई मानवता के उदाहरण निरंतर सामने आ रहे हैं और पढने के बाद विवश से बैठे हम हाथ मल कर रह जाते हैं। आपको भी परिचित होने का पूरा पूरा अधिकार है और अपनी राय देने का भी ---
1. एक गाँव की पंचायत ने सास बहू के झगड़े में बहुओं को पेड़ से बाँध कर पीटने का निर्णय दिया और वैसा ही किया गया।पूरा गाँव तमाशा देखता रहा और जब तक वे बेहोश नहीं हो गयीं। घर की दीवारों से बाहर मामला न्याय के लिए आता है तब  पहला प्रयास होता है कि परिवार की लड़ाई में समझौते का प्रयास किया जाय , न कि उसे तमाशा बना कर हैवानियत का रूप दे दिया जाय। 

2 . एक पंचायत ने बेटे को एक विधवा से विवाह करने के कारण उसे बस्ती से निकल दिया गया और माँ की मृत्यु पर भी उसको बस्ती में नहीं घुसने दिया गया। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बस्ती के बाहर रात भर बैठा रहा कि शायद लोगों को उसको तरस आ जाय और उसे अंतिम दर्शन करने को मिल जाए। फिर पता नहीं उस अभागन माँ को अपने बेटे के हाथ से अंतिम संस्कार का सौभाग्य प्राप्त भी हुआ होगा या वह भी तुगलकी फरमान की बलि चढ़ गया होगा। 

3 . एक गाँव में गैर जाति के लडके के संग शादी करने पर पंचायत ने उस लडके की बहन की शादी दूसरे परिवार के पुरुष के साथ करने का फरमान सुनाया। जो उससे उम्र में दोगुना और विधुर भी था। 

4 . पंचायत के आदेश पर 60 वर्षीया महिला और 80 वर्षीय पुरुष का निकाह करवा कर गाँव के बाहर निकाल दिया गया। पंचायत का अंदेशा था कि दोनों के मध्य अवैध सम्बन्ध थे और महिला की बेटी की मृत्यु के पीछे यही कारण रहा होगा। कोई गवाह नहीं कोई सबूत नहीं और सीधे निर्णय। 
                                  इन पंचायतों द्वारा दिए गए निर्णय के खिलाफ कहाँ सुनवाई हो सकती है ? पुलिस कोई रूचि नहीं लेती है और उन्हें जब तक तहरीर न मिले तो वो कुछ करने वाले नहीं और फिर दबंगों के चलते पीड़ित कहीं गुहार लगा ही नहीं सकते हैं। ये कैसा लोकतंत्र और कैसी स्वतन्त्रता  का खुला मखौल है ?

सोमवार, 11 मई 2015

पहला और आखिरी मदर्स डे !

मैं और मेरी माँ ( पिछला मदर्स डे )
                      माँ  पहला शब्द होता है जो बच्चा बोलता है और जिसका पहला अहसास बच्चा करता है  वो माँ ही होती है। वह सिर्फ एक होती है और वह सब कुछ देती है जो इस दुनियाँ में कोई नहीं दे सकता है। वह होता है, जीव को उसका अस्तित्व प्रदान कर इस धरती पर लाना।
                          ये मेरी माँ के साथ तस्वीर पिछले मदर्स डे पर ली गयी पहली और आखिरी तस्वीर है। मैं भी नहीं जानती थी कि , सिर्फ इस दिन के लिए बगैर उन्हें सूचित किये उनके पास पहुंची थी, उनके साथ मैं अपना पहला और आखिरी मदर्स डे मना  रही हूँ.
                           माँ मैंने तुमसे जीवन में संघर्ष , सेवा ,त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ा है  और उसको निभाते हुए मैंने जीवन की लम्बी लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ते हुए जीत ली है और मेरी जीत देख कर ही तुम्हें परम संतोष मिला था।उससे पहले जब भी तुम्हारे पास जाती तो वही चिंता भरे सवाल और मेरे लाख आश्वस्त करने के बाद भी कहीं संशय पालती रहती थी। मेरे बाद तुम छोटी बहनों से पूछती। सब वही उत्तर देते और फिर मेरी दोनों बेटियों को अपनी मंजिल तक पहुंचा देख तुम कितनी खुश हुई थीं? उसके बाद दोनों की शादी देख कर तुम्हें लगा कि अब तुम्हारी आत्मा सब तरफ से निश्चिन्त हो चुकी थी.  सबसे ज्यादा मेरी चिंता रहती थी न  तुम्हें. अब कोई चिंता करने वाला नहीं रहा और पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि सारे लोगों की चिंता मुझे दे गयी हो। 

                           अब माँ उस घर और उस कमरे में जाने का कभी मन नहीं करता घर तो जाऊँगी  ही लेकिन उस कमरे की हर चीज में मुझे तुम ही नजर आती हो। वही तुम्हारी साड़ियां , कपडे सब उसी तरह से अलमारी में रखे हुए। उन्हें छू कर तुम्हारे होने का अहसास होता है लेकिन तुम तो हमेशा अपनी बच्चों के साथ हो और हमेशा रहोगी ।

शुक्रवार, 8 मई 2015

अभिव्यक्ति की अवसर !

                                             कुछ दिन पहले हमने पढ़ा था कि एक लडके ने अपनी आत्महत्या का लाइव वीडियो अपनी गर्ल फ्रेंड को भेजा और खुद फाँसी पर लटक गया। ये अपनी निजी जिंदगी का ही नहीं बल्कि औरों की नजर में दूसरों का भी अपमान कहा जाएगा.
            अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें संविधान में प्रदान की गयी है लेकिन एक हमारा अपना नैतिक और भावात्मक दायरा होता है। ये जरूरी नहीं है कि  जिसे हम लिखें या बोलें वो सबको पसंद ही हो. लेकिन अगर हम सोशल मीडिया या सोशल प्लेटफॉर्म पर अपनी निजी बातें डालें तो सभी को पसंद ही आए या पसंद भी आएं तो हमें संवेदनहीन करने वाली तो न हों। खुशियां तो हम सभी से बाँट सकते हैं लोग खुश होते हैं। हम एक दूसरे से जुड़े होते हैं और ऐसी यादें और पल हम खुद संचित करके रखना चाहते हैं। 
                          शादी , सगाई , या जन्मदिन की यादें अपने बच्चों के बचपन की तस्वीरें हम सभी रखते हैं और समय समय पर फेसबुक जैसे मंच पर शेयर भी करते हैं। एक दूसरे को बधाई देते हैं शुभकामनाएं भी देते हैं। लेकिन अपने किसी बहुत करीब की मृत्यु की घोषणा या उसका आँखों देखा हाल हम खुद ही डालने लगें क्या ऐसा संभव है ? 
                    मृत्यु चाहे जिसकी भी हो अगर वह बहुत नजदीकी है तो इंसान अपने आप को खुद नहीं संभाल पाता है और फिर वह उसका सजीव चित्रण खुद कर रहा हो तो उसकी संवेदनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है। वह भी जब किसी के भाई , बहन , माँ या पिता के निधन हो चूका हो। ऐसा करना तो लगता है जैसे कि सहानुभूति को तौलने का प्रयास किया जा रहा हो ? दोस्ती या शुभचिंतको को अपनत्व की कसौटी पर कसा जा रहा हो। ऐसे अवसरों पर अगर कोई दूसरा भी फ़ोन पर तेज तेज आवाज में बात करता सुनाई देता है तो सुनाने वाले को बुरा लगता है और अगर कोई बेटा , बेटी , भाई या बहन मोबाइल पर अपना स्टेटस अपडेट करे या कर रहा हो तो उसे हम क्या कहेंगे?              
                        यादें हमेशा सुखद संजो कर रखी जाती हैं ताकि जब उन्हें देखें तो पुराने समय की याद कर सकें। लेकिन पार्थिव शरीर की तस्वीर या उसके साथ खिंचवाई गयीं तस्वीरें सिर्फ और सिर्फ कष्ट देने वाली होती हैं।यादों में हमेशा अच्छे पल ही संजोये जाने चाहिए।