www.hamarivani.com

गुरुवार, 30 मई 2019

आपदा प्रबंधन !

                            सूरत में घटी कोचिंग में लगी आग के कारण २० बच्चों का उसे हादसे में मौत के मुंह में चला जाना कोई हंसी खेल नहीं है।  भले ही वह मानवीय भूल नहीं थी लेकिन मानवीय लापरवाही तो थी ही और उस लापरवाही की कीमत चुकाई उन माता-पिता ने जिनके घर का चिराग बुझ गया और माँ की गोद सूनी हो गयी।  लोग खड़े वीडिओ बनाते रहे , शायद उन्हें मासूमों की चीखें नहीं सुनाई दे रही थीं या फिर वे बहरे हो चुके थे क्योंकि उन तड़पते हुए बच्चों में उनका कोई अपना बच्चा नहीं था। जो जरा से भी संवेदनशील थे उन्होंने प्रयास किया और बचाया भी।  अपनी जान की परवाह न करते हुए युवाओं ने उनको बचाया।  उस वक्त थोड़ी दूर पर स्थित फायर ब्रिग्रेड को आने में इतना समय लग गया और फिर  अधूरे साधनों के साथ आ पहुंचे। आपदा के लिए उनका चयन किया गया है और क्या आपदा में सिर्फ आग को बुझाना ही होता है , उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने के लिए कोई दूसरी वैकल्पिक  व्यवस्था भी होनी चाहिए।

आपदा प्रबंधन कहां पर हो ? :- जब हम एक तरह की आपदा से दो-चार होते हैं चारों तरफ चर्चा आरंभ हो जाती है कि आपदा प्रबंधन की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है,  लेकिन अगर इसको स्कूल या विश्वविद्यालय स्तर पर रखा जाता है तो इसका ज्ञान प्राप्त करने वाले सिर्फ वही लोग होंगे जो वहां पर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।  मेरे अनुसार आपदा प्रबंधन की शिक्षा समय-समय पर सरकार के द्वारा या फिर जन सेवार्थ काम करने वालों वाली संस्थाओं के द्वारा हर जगह दी जानी चाहिए क्योंकि हादसे कब कैसे हो जाए यह कोई नहीं जानता। पहले हम सुनामी आने पर बहुत जोर शोर से इस बात की चर्चा कर रहे थे कि आपदा प्रबंधन हर स्तर पर होनी चाहिए। उसके चंद दिन बाद ही हम यह भूल गए। आपदा प्रबंधन की आवश्यकता सुनामी, केदारनाथ आपदा , भूकंप , बाढ़ के बाद ही नहीं होती बल्कि यह कभी भी और किसी भी स्थान पर हो सकती है.
                      सूरत की घटना आम आदमी आपदा प्रबंधन से किसी न किसी तरीके से उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने का सामूहिक प्रयास कर सकते थे और जो हादसे में जीवन गए हैं उनमें से पूरे नहीं तो कुछ और को भी बचाया जा सकता जबकि हमारी सरकारी सेवाएं फायर बिग्रेड अपनी  आवश्यक चीजों में लंबी सीढ़ी आपातकालीन साधन लेकर नहीं चलती। उनको सिर्फ आग नहीं बुझाना होता है बल्कि जीवन बचाना भी होता है ।
मानकों की अनदेखी :- शहरों में ऊंची ऊंची इमारतें तो बनाई जा रही है , चाहे होटल , क्लब , ऑफिस , मॉल या रहने के लिए बने भवन हों।  न अग्निशमन के साधनों का पूरी तरह से नियोजन किया जाता है और न ही वहाँ आग बुझाने के साधन होते हैं।  इस घटना के बाद सभी शहरों में ध्यान दिया जाना चाहिए।  ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर जहाँ कि जन समूह इकठ्ठा होता हो।  कहीं कहीं तो अग्नि शमन यन्त्र लगे होते हैं लेकिन वहां के कर्मचारी उनको प्रयोग करना नहीं जानते हैं या फिर उनका प्रयोग कभी करने की नौबत नहीं आयी हो तो वे जाम हो जाते हैं और आपदा के वक्त वह कार्य ही नहीं करते हैं।
आपदा प्रबंधन की शिक्षा :- आपदा प्रबंधन की शिक्षा भी शिक्षा के स्तर के अनुरूप देनी चाहिए । आपदा से प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को अवगत कराया जाना चाहिए । फिर धीरे धीरे कक्षाओं के अनुरूप विस्तार से उनके पाठ्यक्रम में समाहित करना चाहिए । समय और पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण के कारण कौन सी आपदा कब आ सकती है इसका कोई निश्चित समय नहीं रहा । आज सर्दी तो नाममात्र के लिए दिनों में सिमट गई हैं और शेष भीषण गर्मी में झुलसती पृथ्वी किसी भी आपदा के लिए हमें पूर्व संकेत दे रही है ।
         .      पाठ्यक्रम में आकर इसे एक विषय का रूप दिया गया है लेकिन ये हमारी औपचारिक शिक्षा है । जनसामान्य को इससे अवगत होना चाहिए। समय समय पय प्रशिक्षण कैंप लगा कर शिक्षित किया जाना चाहिए । प्राथमिक जानकारी बचाव के लिए सहायक होगी ।
बहुमंजिली इमारतों के मानक :-  बहुमंजिली इमारतों के लिए निश्चित मानकों का सख्ती से पालन होना चाहिए । इंसान भेड़ बकरी नहीं है कि उन्हें रहने की जगह देकर जीवन को जोखिम में डाल दिया जाता है । हम खुद भी दोषी हैं जो आश्वासनों के ऊपर रहने चले जाते हैं , वह भी अपने जीवन की पूँजी लगाकर । इन इमारतों में रहने के लिए अधिकृत करने से पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र संबंधित विभाग को जारी करना चाहिए ।
             हम विदेशों के चलन का अनुकरण तो करने लगे हैं लेकिन इस दिशा में उनके उपकरणों और तरीकों के प्रति सदैव उदासीन रहे हैं । हमारी ये उदासीनता लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का कारण बन जाता है ।
              भविष्य के लिए हमें स्वरक्षा और पररक्षा दोनों के लिए प्रशिक्षित होना चाहिए ताकि सूरत जैसी दूसरी घटनाएं न हों । हम नेट के प्रयोग का काला पक्ष बहुत जल्दी सर्च करके दुरुपयोग करने लगते हैं लेकिन कभी उसके सदुपयोग को भी सीखें तो बहुत सारी आपदाओं से बचने का रास्ता जान सकते हैं । हमारी जानकारी हमारी ही नहीं बल्कि और कितनों का जीवन बचा सकती है । हमें स्वयं सीख कर मानवता की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे ।

मंगलवार, 14 मई 2019

विश्व परिवार दिवस !

परिवार के स्वरूप :                   
                  
          परिवार संस्था आदिकाल से चली आ रही है और उसके अतीत को देखें तो दो और चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थी। पारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता था। उनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भी। धीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गया। जब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे। वे वापस गाँव जाना या और रहना या खेती करना पसंद नहीं करते , परिणाम कि घर वालों के बीच में दूरियां आनी शुरू हो गयीं और परिवार के विखंडन की प्रक्रिया यही से शुरू हो गयी।  आरम्भ में ये सब बहुत अच्छा लगा नयी पीढ़ी को लेकिन बाद में या कहें आज जब एकल परिवार के परिणाम सामने आने लगे हैं।

टूटते परिवार :
                 

     आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढती महत्वाकांक्षाएं, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है। वह भी आज कल भय के साये में जी रहा है।  बच्चों को लेकर माता पिता निश्चिन्त नहीं हैं। आज अधिकांश दंपत्ति दोनों ही लोग नौकरी करते हैं और इस जगह पर  बच्चे या तो आया के साथ रहते या  फिर किसी 'डे केअर सेंटर' में.छोटे बच्चे इसी लिए माता-पिता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं रह जाते हैं।  वे नौकर और आया के द्वारा शोषण के शिकार भी किये जाते हैं और कभी कभी तो माता पिता की स्थिति के अनुसार अपहरण तक की साजिशें तक रच दी जाती हैं।  

 एकाकी परिवार में भय :

                इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है। पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे  और बच्चे उनकी अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघटन की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं। बच्चे भी स्वयं को असुरक्षा की भावना में घिरे जी रहे हैं। एक तो बच्चों को परिवार का सम्पूर्ण संरक्षण मिल पता है और साथ ही वह पढाई के लिए बराबर माता-पिता के द्वारा दबाव बनाया जाता है क्योंकि वे अच्छे स्कूल में भारी भरकम फीस भर कर पढ़ाते हैं और उनसे पैसे के भार के अनुसार अपेक्षाएँ भी रखते हैं। 

विखंडित परिवार का परिणाम :

                   एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है। उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहें। इससे बेहतर है कि मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '                            
             आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैं। आत्मनिर्भर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे।                 
              एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं । बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर न करने की भावना से ग्रस्त हो जाता है। दूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं है। जब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?                   
                         परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न न लगने लगेगा। ऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक कि  उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है।  अगर अपनी सोच को विकसित करें और उसको परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा। इसके लिए हमें अपनी सोच को 'मैं' से निकल कर 'हम' पर लाना होगा। ये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी।
       'मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'

        '
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें?'
 
                                                
           तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक है। इसके लिए प्रौढ़ और युवा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगा। घर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहे। वैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उन्हें बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजिये। यही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैं। दो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नमक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा।

          कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थीं। आज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा है। फिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैं। इसको बचाने में ही सभ्यता , संस्कृति और समाज की भलाई है।

सोमवार, 25 मार्च 2019

चरित्र सिर्फ नारी का क्यों ?

                               निर्मला को उसके घर वालों ने उसी समय  घर से निकाल दिया अगर  वह कमा कर सबको खिला न रही होती।  वह तेज बारिश के कारण पैदल नहीं आ सकती थी और उसको करीब 2  किमी. पैदल चल कर घर आना पड़ता था और उस दिन उसके एक सहकर्मी ने  उसको अपने साथ मोटर साईकिल पर बैठा कर सड़क तक छोड़ दिया था और सड़क के किनारे बनी दुकानों पर खड़े लोगों ने देख  लिया था और फिर उसके बारे में कितनी बाते बनायीं गयी कि शरीफ  महिला को पता नहीं कितने विशेषणों से विभूषित  किया गया।  चलते फिरते लोगों के कटाक्ष उसे सुनाई देने लगे और सब से बड़ी बात कि घर के लोगों ने भी उसको बहुत संगीन अपराध समझ कर उसका तिरस्कार करना शुरु कर दिया।  हाँ घर से नहीं निकल सके क्योंकि  उसके पति के बेरोजगार होने के कारण घर उसकी कमाई से ही चल रहा था। उसके साथ घर वालों का व्यवहार बदल चुका था  लेकिन बच्चों और एक घर की खातिर उसको रहना था।
                     ये बात किसी ने कभी सोची ही नहीं कि चरित्र क्या सिर्फ औरत का ही होता है और  चरित्र  जैसे शब्द का सबसे गहरा सम्बन्ध सिर्फ नारी से  क्यों  माना  जाता है ?  हर आँख उठती है उसी की ओर क्यों ? शक सबसे अधिक उसी के चरित्र पर पर किया जाता है , वह भी उससे कुछ भी पूछे बिना ही आरोप भी मढ  दिए जाते हैं।  वैसे तो  सदियों से ये परंपरा चली आ रही है कि  नारी सीता की तरह अग्निपरीक्षा देने के लिए बाध्य होती है। लेकिन अब ये अग्निपरीक्षा कौन देगा और कौन लेगा ? सीता आज भी मिल जाती है लेकिन अग्निपरीक्षा की बात कोई राम ही कह सकता है।  ये समाज जिसका खुद का कोई चरित्र नहीं, किस बूते पर एक औरत के चरित्र पर लांछन लगाता है।  बिना किसी के चरित्रहीन हुए नारी कैसे चरित्रहीन हो जायेगी और अगर इसका दोषारोपण उसके सिर है तो दूसरे पुरुष के सिर पर भी आना चाहिए।
                        चरित्र की सीमाओं में बंधी नारी सिर्फ पुरुष द्वारा ही नहीं बांधी गयी है  बल्कि नारी भी इसमें बराबरी की हिस्सेदार  है।  घर की औरतें हों या फिर समाज की उंगली उठाने में जरा सा भी संकोच नहीं कराती वह भी बगैर असलियत जाने।  जैसे कि  पूरे समाज की इज्जत का ठेका इन्हीं लोगों ने ले रखा है।  अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकता है, दूसरों के घरों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं।
                          वह अपने दम पर अपने घर को चला रही है और पति दुर्भाग्य से बेकार है तो वह लांछन लगे बिना रह ही नहीं सकती है और बेकार बैठे पति और  घर वालों को भी औरों की बात सच्ची लगने लगती है।  वह किस किस को सफाई दे और क्यों दे ? उसे अपने परिवार को पालना है और वह मेहनत कर रही है , इसका अर्थ ये तो नहीं है कि वह चरित्र की अग्निपरीक्षा दे ।
            अपने परिवार के संघर्ष में कोई साथ नहीं देता है , हाँ कितने बजे जाती है और कितने बजे लौटती है -- इसका हिसाब रखने वाले कई अपने और कई गैर होते हैं।  उसके मुंह से कोई नहीं सुनना चाहता कि आखिर सच क्या है ? उसको आने में देर क्यों हुई ? या उसने किसी सहकर्मी से लिफ्ट क्यों ली ? नौकरी से उसका नहीं बल्कि पूरे घर का जीवन पलता है तो उसको हर शर्त पर अपना काम पूरा करना होता है और अपने बॉस के दिए हुए हर काम को समय सीमा में भी पूरा करना होता है।  जब काम करने में देर हो जाती है तो फिर उसको जो भी पहचान का मिला उससे लिफ्ट लेना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि घर का चौका भी उसका इन्तजार करता होता है।  बच्चे से लेकर बड़े तक सभी को खाने के लिए भी  देना होता है।
           नारी सशक्तिकरण का जो मंत्र आज समाज जप रहा है , लेकिन ये कौंन सी  नारियाँ होती है , वे जिनके घर के लोगों की सोच बहुत उन्नत होती है , जिन्हें समाज की परवाह नहीं होती है या  सिर्फ अपना लक्ष्य दिखाई देता है और परिवार उनके पूरा विश्वास रखता है।  और ये समाज रुपी चौकीदार उनके ऊपर  नजर रखना तो दूर की बात नजर उठा कर देख नहीं पाता है।
                          चरित्र  शब्द सिर्फ औरत के साथ ही जुड़ा है , जब कि उसके इस चरित्र को दागदार बनाने वाला खुद कभी भी चरित्र की माप नहीं देता है और न ही समाज उससे सवाल करता है।  वह अकेले कभी भी चरित्रहीन नहीं होती है।  जब कोई पुरुष अग्निपरीक्षा देने लगेगा तब उस की भी अग्निपरीक्षा हो और चरित्र शब्द दोनों के साथ बराबर जोड़ने की हिम्मत  समाज जुटा लेगा , उसी दिन वह सही अर्थों में दोनों का प्रतिनिधित्व कर पायेगा।  

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

सबक !

                                  जीवन की दिशा कब और कौन बदल दे नहीं कह सकते हैं और मेरे जीवन की दिशा सिर्फ दो पंक्तियों ने बदल कर रख दी है।  मेरे पापा इसके सूत्रधार बने।
                     मैं हाई स्कूल में थी और मैंने तबला एक विषय के रूप में ले लिया .  बहुत सम्पन्न हम न थे और पांच भाई बहन पढ़ने वाले थे। स्कूल में संगीत का कोई  टीचर  नहीं था।  बाकी  लड़कियों ने संगीत स्कूल में सीखना शुरू कर दिया या फिर  घर पर टीचर रख लिया। मैं ऐसा कर पाने की स्थिति में न थी।  बोर्ड के प्रेक्टिकल के समय मेरा कोई शिक्षक न था जिसके साथ संगत  करने का मेरा अभ्यास हो। मैं प्रक्टिकल देने बैठी तो  संगत कर पाने का कोई सवाल ही न था।  परीक्षक ने मुझे 17/50 अंक देकर पास कर दिया और थ्योरी में मेरे 45/50 थे। जब रिजल्ट देखा तो मैं बहुत रोई। इस समय न मैं अपने न कर पाने पर दुखी थी न अपने लिए टीचर के न होने पर। बस बुरा लगा कि  मुझे इतने कम अंक मिले और मेरी परसेंटेज ख़राब हो गयी । मेरे पापा मेरे मन की बात को समझ रहे थे लेकिन एक दिशा में वे मजबूर थे। मैंने निर्णय किया कि  मैं इण्टर में तबला नहीं लूंगी और कोई विषय होगा तो पढाई करके अच्छे अंक तो ले सकती हूँ।
                     पापा ने मुझे एक कार्ड बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में --
  करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान ,
 रस्सी आवत जात ते सिल पर होत  निशान। 

लिख कर मुझे दिया और बोले कि  तुम इंटर में भी तबला लोगी। बाकी  चीजें मैं घर पर लाकर देता हूँ . इसे अपने सामने रखो और अभ्यास करो। उन्होंने मुझे एक तबला लाकर दिया और एक किताब भी, जिसमें तालों और उसके विषय में अभ्यास के लिए सारी  सामग्री थी । मैं उनकी बात को मान कर चलने लगी। बोर्ड के एक्जाम में मैंने अपना जो डेमो ताल रखा था वह सबसे अलग था . मैंने अपने बाहर  से आये हुए परीक्षक को बता दिया कि  मेरा कोई टीचर नहीं है और मैं जो भी बजाने  जा रही हूँ  हो सकता है कि संगत  ठीक ठीक न हो सके लेकिन फिर भी आप जिसे समझे मेरे साथ संगत  के लिए बैठा सकते हैं। वह परीक्षक अंधे थे और उनका एक शिष्य साथ में आया था . उन्होंने कहा कि  आप शुरू कीजिये और अपने शिष्य से कहा कि इनके संगत करने के लिए हारमोनियम बजाइए। 
                     मेरा प्रेक्टिकल कैसा हुआ? इसको तो वही अच्छी तरह से बता सकता है , जो मेरे साथ साथ बजा रहा था और जो संगीत शिक्षक वहां थे,  जो हमारे दूसरे सहपाठियों के सिखाने वाले थे . वह सब यह मानने  को तैयार न थे कि  मैंने बिना किसी शिक्षक के ये तैयार किया है। मुझे इंटर में 45/50 प्रक्टिकल में मिले थे और कुल विशेष योग्यता के मानक से बहुत आगे। 
                       इन पंक्तियों ने प्रेरणा बनाने का काम जीवन भर किया और आज भी कर रही हैं। जब मुझे  आई आई टी कानपुर में मानविकी विभाग तो समाजशास्त्र की एक परियोजना में लिया गया था और  मुझे सिर्फ  और सिर्फ मेरे लेखन के बारे में जानने वाले संकाय के प्रोफेसरों के कारण मानविकी से कंप्यूटर साइंस में भेज दिया गया। कंप्यूटर जिसे कभी देखा न था और छूना  तो बहुत दूर की बात थी। की बोर्ड पर हाथ रखने के लिए पहले कभी टाइपिंग जैसी कोई चीज नहीं जानती थी। लेकिन वहां के प्रोफेसर  , जिनके साथ मैं काम कर रही थी , उन्होंने मुझे उसमें पड़े हुए टाइपिंग के सॉफ्टवेयर से अवगत कराया। की बोर्ड पर हाथ रखते ही जो आवाज आती तो डर जाती कि कहीं कुछ गलत तो नहीं दबा दिया।  फिर इन्हीं पंक्तियों को सामने रख कर उसके हाथ की बोर्ड पर रखने से लेकर उसके अभ्यास गेम करने शुरू  किये तो एक महीने में मेरी स्पीड बहुत अच्छी हो चुकी थी। मैंने फिर  वहां पर २४ साल काम किया और जितनी टाइपिंग स्पीड मेरी थी कोई मानने को  तैयार नहीं होता कि मैंने कभी टाइपिंग नहीं सीखी है।  
                  पापा को याद सिर्फ किसी मौके पर नहीं किया जाता लेकिन मेरे जीवन के हर मोड़ पर उनकी शिक्षाएं मेरा संबल बनी रहीं और बनी रहेंगी।

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

विश्व कैंसर दिवस !

       
                                    कैंसर विश्व में इस समय सबसे बड़ी और गंभीर बीमारी बनी चुकी है और इसके रोगी दिन पर दिन बढ़ते चले जा रहे हैं बल्कि ये कहें कि हमारी मानसिकता इस बारे में ऐसी बन चुकी है कि  अगर किसी को इस रोग का शिकार बता दिया गया है तो सिर्फ मरीज ही नहीं बल्कि उसके परिवार वाले भी उसकी सुनिश्चित मौत के खौफ से भयभीत हो जाते हैं।  भले ही वह बाद में ठीक होकर अपना सामान्य जीवन व्यतीत करे।  कैंसर का होना आसानी से और प्राथमिक अवस्था में ज्ञात ही न inहीं हो पाटा  है क्योंकि जब वह अपने पूर्ण परिपक्व रूप में शरीर को अपने गिरफ़्त में ले लेता है तब उसके कुछ लक्षण प्रकट होते हैं।  इसके द्वारा शिकार बनाये गए लोगों के कोई विशेष लक्षण नहीं होते और न ही इसके लिए कोई उम्र का बंधन होता है।  कभी भी किसी को भी कैंसर हो सकता है।  
                        इस रोग का इलाज बहुत सस्ता भी नहीं होता है और सरकारी अस्पतालों में इसका इलाज करवाना शायद   कोई पसंद नहीं करता है।  अब तो बड़े बड़े शहरों में भी कैंसर के अस्पताल खुल चुके हैं और वहां पर भी इलाज हो रहा है।  लेकिन इसके बाद यह शरीर में नहीं फैलेगा इसकी कोई भी गारंटी नहीं ले सकता है।  यहाँ तक कि खुद कैंसर विशेषज्ञ इसा बारे में सुनिश्चित नहीं हो पाते हैं।  
                   इस रोग की जैसी भयावहता बढाती जा रही है  , वैसे ही इसके इलाज के लिए शोध हर स्तर  पर और हर देश में चल रहा है। अभी हाल ही में इस पर किये गए शोध  और उसके सफल परीक्षण ने आम आदमी के लिए एक आशा का दीप  जलाया है कि  हर गरीब और अमीर मरीज इसको कर सकेगा।      

        विश्व में कैंसर के इलाज के लिए अरबों खरबों रुपये  पानी की तरह बहा दिए गए हैं, लेकिन कोई भी दवा पूरी तरह से कैंसर को जड़ से ख़त्म करने का दबा नहीं कर सकती है । अब तक किसी भी चिकित्सा पद्यति में जो इलाज उपलब्ध है वह कैंसर को ख़त्म करने का दवा नहीं कर सकता है , सिर्फ कैंसर को बढ़ने से रोक देती हैं।

कैसे होता है कैंसर :--
                  डॉ. डैंग ने पूरी जानकारी देते हुए बताया कि हमारे शरीर में हर सेकेंड लाखों सेल्स खत्म होते हैं और नए सेल्स उनकी जगह ले लेते हैं। लेकिन कई बार नए सेल्स के अंदर खून का संचार रुक जाता है और ऐसे ही सेल्स एकसाथ इकट्ठा हो जाते हैं, जो धीरे-धीरे बढ़ता है। इसी को ट्यूमर कहा जाता है। 

             उन्होंने बताया, ट्यूमर सेल्स में आक्सिजन पूरी तरह खत्म हो जाती है, तो उसे मेडिकल भाषा में हिपोक्सिया कहते हैं। हिपोक्सिया की वजह से तेजी से उस हिस्से का पीएच लेवल गिरने लगता है और ट्यूमर के ये सेल एसिड बनाने लगते हैं। इस एसिड की वजह से पूरे शरीर में भयंकर दर्द शुरू हो जाता है। अगर इन सेल्स का तुरंत इलाज न किया जाए तो ये कैंसर सेल्स में तब्दील हो जाते हैं। डॉ. डैंग के मुताबिक, बेकिंग सोडा मिला पानी पीने से शरीर का पीएच लेवल भी मेंटेन रहता है और एसिड वाली समस्या न के बराबर होती है। डॉ. डैंग ने बताया कि कई बार कीमोथेरेपी के बावजूद भी ऐसे कैंसर सेल्स शरीर में रह जाते हैं, जो बाद में दोबारा से शरीर में कैंसर सेल्स बनाने लगते हैं। इन्हें T सेल्स कहते हैं। इन टी सेल्स को नाकाम सिर्फ बेकिंग सोडा से ही किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि हमने ब्रेस्ट और कोलोन कैंसर के ट्यूमर सेल्स पर बेकिंग सोडा के प्रभाव की जांच की और हमने पाया कि बेकिंग सोडा वाला पानी पीने के बाद जिस तेजी से ट्यूमर सेल्स बढ़ रहे तो वो काफी हद तक रुक गए।
                                अमेरिका के लडविंग इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर रिसर्च में  वैज्ञानिकों के दल ने हाल ही में कुछ नए शोध किए। इस टीम की अगुवाई मशहूर कैंसर वैज्ञानिक और जॉन हॉप्किंग यूनिवर्सिटी के ऑनकोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) डॉ. ची वान डैंग ने की। उन्होंने कहा कि हम सालों तक रिसर्च कर चुके हैं और अब तक कैंसर के जो भी इलाज मौजूद हैं वो काफी महंगे हैं। हमने जो शोध किया उसमें चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। आपके किचन में रखा बेकिंग सोड़ा कैंसर के लिए रामबाण औषधि है।  
                      
                    डॉ. डैंग के मुताबिक, हमने बेकिंग सोडा पर लंबी रिसर्च की और जो परिणाम हमें प्राप्त हुए हैं उनके बारे में हमने सोचा भी नहीं था। उन्होंने बताया कि यदि कैंसर का मरीज बेकिंग सोडा पानी के साथ मिलाकर पी ले तो कुछ ही दिनों में इसका असर दिखने लगेगा। उन्होंने बताया कि कीमोथेरेपी और महंगी दवाओं से भी तेजी से बेकिंग सोडा ट्यूमर सेल्स को न सिर्फ बढ़ने से रोकता है, बल्कि उसे खत्म भी कर देता  है।                                                      
. डॉ वॉन डैंग ने कहा कि पहले भी ये बात आप सुन चुके होंगे कि बेकिंग सोडा कैंसर समेत कई बीमारियों का इलाज है। लेकिन अब हम प्रमाणिक तौर पर कह सकते हैं कि कैंसर का सबसे सस्ता और अच्छा इलाज बेकिंग सोडा से मिला पानी है। उन्होंने बताया कि जिन लोगों पर हमने प्रयोग किए उन्हें दो हफ्तों पर पानी में बेकिंग सोडा मिलाकर दिया और सिर्फ 2 हफ्ते में उन लोगों के ट्यूमर सेल्स लगभग खत्म हो गई !