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मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

ब्लॉगिंग : कल , आज और कल !

ब्लॉगिंग : कल , आज और कल !


                       जैसे किसी चीज का आरम्भ मंदिम गति से होता है और फिर वह एक चरम पर पहुँच जाता है और फिर अवसान, लेकिन ये ब्लॉगिंग कोई ऐसी कला नहीं है कि जिसको बिना किसी के चाहे अवसान हो जाये। जब  नया नया कंप्यूटर के साथ अंतरजाल शुरू हुआ तो ब्लॉगिंग भी अपने अस्तित्व में आयी।  सबसे पहले ब्लॉग का श्रेय आलोक कुमार जी को जाता है।   2003 में "नौ दो ग्यारह " नाम से ब्लॉग बनाया था लेकिन यूआरएल की समस्या के चलते उन्होंने अंकों( 9211 में) अपना ब्लॉग को पता दिया था।   धीरे धीरे लोगों ने खोज की और ब्लॉगर के संख्या में वृद्धि होने लगी। प्रारंभिक दिनों में ये कुछ धीमी ही रही लेकिन 2007 - 2008 तक ब्लॉगर की संख्या हजारों में पहुँच चुकी थी।
                       हम उसे ब्लॉगिंग का स्वर्णिम काल भी कह सकते हैं।  सारा सारा दिन ब्लॉग ही लिखे और पढ़े जाते थे।  पढ़ने की सूचना उसे समय ऑरकुट पर मिला करती थी।  साथी मित्र सूचना देते थे कि ये लिखा है जरा पढ़ो और राय दें।  ये मैं महिलाओं की बात कर रही हूँ क्योंकि तब एग्रीग्रेटर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। एक एक   पोस्ट पर बहस का जो माहौल बनता था तो लगता था कि युद्ध हो जाएगा।  हम उस बहसबाजी में कम  ही पड़ते थे, लेकिन पढ़ सब को लेते थे क्योंकि हम पूरे समय बारे ब्लॉगर नहीं थे।  सिर्फ ऑफिस में ही वह भी खाली वक्त में होता था।  अपना डेस्कटॉप था तो कोई समस्या  नहीं थी।  घर में न लैपटॉप था और न तब स्मार्ट फ़ोन का जमाना था यानि कि इतने सामान्य लोगों के पास मोबाइल होते भी थे तो वही छोटे वाले।  सो घर पर देखने या देख पाने की कोई गुंजाईश भी नहीं रह जाती थी।  वापस दूसरे दिन जाकर ऑफिस में जाकर ही होता था दर्शन।  फिर भी बहुत लिखा जाता था सब लिखते थे और हम भी लिखते जरूर थे।  मैंने वर्ष 2008 में ब्लॉग बनाया था और उसको भी हमारी सखियों ने एक एक चरण पर काम करना सिखाया था।  ढेर सारे ब्लॉग खुद बना डाले थे।  हर काम के लिए अलग अलग ब्लॉग।  कविता , कहानियों , सामाजिक सरोकार , निजी राय और जीवन के कटु यथार्थ को बयान करने वाली घटनाओं के लिए।  बाद में सभी को चलाती रही और अभी भी सब जीवित हैं और उन पर लेख जाते रहे।  2009 -2012 तक खूब जम कर लिखा।  2010 में लैपटॉप लिया क्योंकि  अगस्त के महीने में मेरा एक्सीडेंट हुआ हाथ और पेर दोनों ही दुर्घटनाग्रस्त हुए।  न चलना संभव था और न हाथ से टाइप करना।  एक टाइपिस्ट को दो घंटे के लिए बुला लेती और मैं बोलती जाती और वह टाइप करती जाती।  वह वर्ष था जब कि मैं बिस्तर  पर थी और  ब्लॉग में सबसे ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हुई थी।
                             वह सभी के लिए सक्रियता वाला वर्ष था।  करीब करीब तीन हजार ब्लॉगर उस समय सक्रिय थे।  ब्लॉगिंग का स्वर्णकाल था।  इसके साथ ही फेसबुक अस्तित्व में आई और फिर उस पर धड़ाधड़ अकाउंट बनाने शुरू हो गए और लोगों ने उस पर भी अपने विचारों लोगों को  संक्षिप्त रूप में डालना ज्यादा सुविधाजनक लगा और ब्लॉग पर लिखने के स्थान पर लोगों ने फेसबुक को अच्छा मंच समझा और यहाँ शिफ्ट हो गए।  ऐसा नहीं कि ब्लॉगिंग बिलकुल ख़त्म हो गयी लिखने वाले ईमानदार ब्लॉगर उसपर लिखते रहे और फेसबुक पर भी डालते रहे।  मैं खुद अपनी कहूँ कि इस बीच एक पत्र से जुड़कर आलेख, कहानी और कवितायेँ वहां भेजनी शुरू कर दी और गलती ये की कि उनको ब्लॉग पर नहीं डाला।
                            इस बीच एक काम और होने लगा कुछ महत्वकांक्षी ब्लॉगर साथियों ने अपने मित्रों से लेकर साझा कविता संग्रह , कहानी संग्रह , लघुकथा  संग्रह का संपादन करना शुरू कर दिया।  ये काम भी अच्छा लगा क्योंकि ब्लॉग की दुनिया ब्लॉगर तक ही सीमित होती थी।  उससे इतर लोग उसमें काम ही पढ़ने आते थे लेकिन किताब के प्रकाशन में उसके अतिरिक्त भी लोगों को पढ़ने और लिखने का मौका मिलने लगा और फिर होड़ लग गयी।  साल में कई कई संग्रह आने लगे।  जिसने रचनाएँ माँगी दे दीं और जितने पैसे माँगे दे दिए।  किताब छप गई और मिल गयी।  इसी बीच मुलाकात हुई वरिष्ठ ब्लॉगर से उनको मैंने एक साझा संग्रह दिया तो उन्होंने ज्ञान दिया कि अपनी रचनाएं भी देती हैं , पैसे  भी देती हैं  और फिर मुफ़्त में किताब बाँटी भी।  क्या मिला ? इस काम को बंद कर दीजिये।  कुछ अक्ल आ गयी लेकिन फिर बहुत आत्मीय और करीबी लोगों ने अगर रचनाएँ मांगी तो दीं और पैसे भी।  किताब भी आयीं लेकिन वो संतुष्टि नहीं मिली।
                            फिर से ब्लॉगिंग शुरू करने का विचार ठांठे मारने लगा। ब्लॉगर साथियों से मित्रता तो आजीवन की हो चुकी थी।  वे फेसबुक पर भी मिले तो आभासी मित्र से न लगे और उन्हीं  ने राय दी कि कितनी सारी परिचर्चाएं आयोजित की थीं उनको संग्रह के रूप में छपवा डालो और वैसा ही किया।  हाँ सहयोग राशि  जो कटु अनुभव था सो मैंने वह काम नहीं किया।  संस्मरण सब से लिए। कुछ और नए लोगों को भी शामिल कर लिया। जब पुस्तक छप कर आ गयी तो फिर तय किया कि गृह नगर के स्थान पर दिल्ली में ब्लॉगर साथी ज्यादा हैं तो उनकी किताब उन सबके बीच ही विमोचन रखा जाय और सिर्फ विमोचन ही नहीं बल्कि "ब्लॉगिंग : कल , आज और कल" पर परिचर्चा भी रखी गयी सभी वरिष्ठ ब्लॉगर साथियों ने भरपूर सहयोग दिया और जो विचारों का आदान प्रदान हुआ उससे ब्लॉगिंग के लिए एक नयी आशा का संचार हुआ और वहां पर सब ने फिर से ब्लॉगिंग के लिए समर्पित प्रयास करने का वचन दिया और उसको पूरा करने के लिए जुट गए।  अब हम आज गंभीर होकर कल को संवारेंगे।  अभी हमें आने वाली पीढ़ी को भी इस ब्लॉगिंग से जोड़ना है और हर लिखने वाला जो मेरे संपर्क में है अभी तक ब्लॉगर तो नहीं है लेकिन प्रतिबद्ध है।  कल जरूर सुनहरा होगा ऐसी आशा करती हूँ।
                          आने वाला कल तभी सफल होगा जब हम लिखने के साथ साथ पढ़ेंगे भी।  ब्लॉग सिर्फ लिखने के लिए नहीं होता है बल्कि पढ़ने के लिए भी होता है।  हर लेख , कहानी , कविता कुछ कहती है और हमें ज्ञान के रूप में हमारे संवेदनशील मन को कुछ दे जाती है।  कल को सवाँरने में कल और आज के साथी आने वाले कल की भूमिका बनाएंगे और नयी पौध को तैयार करेंगे तभी इस को हम अमर कर सकेंगे.
                             
                   फिर लगा कि फेसबुक , पेपर या कहीं और लिख कर हम डाल तो सकते हैं , प्रकाशन और पैसे भी मिलते हैं लेकिन ब्लॉगिंग अपनी एक निजी संपत्ति है, जिसको जब चाहे तब आप देख और पढ़ सकते हैं।  कोई खोज नहीं और कोई संकोच नहीं।  फिर वापस ब्लॉगिंग को  जारी रखने के बारे में विचार आया तो  जुट गये और नए नए विषयों पर लिखने की सोची है।  आगे हरि इच्छा।  

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

नया शिक्षा सत्र : सतर्कता और सावधानी!

                          वर्तमान समय  बच्चों , अभिभावकों , शिक्षकों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।  वैसे तो अब शिक्षा सत्र के बदल जाने से  कुछ परिवर्तन आ ही गया है लेकिन फिर भी एक लम्बी छुट्टी के बाद बच्चों को स्कूल आने पर कुछ नया उत्साह रहता है। यद्यपि सत्र अप्रैल से शुरू होने लगा है लेकिन जुलाई का महीना भी प्रवेश की दृष्टि से , नए स्कूल की दृष्टि से और नए माहौल में नए बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है।
                            अबोध बच्चों को एक नया ज्ञान और एदिशा शिक्षक को देनी होती है और बच्चों के लिए घर की चहारदीवारी से निकल कर और माँ को छोड़ कर कहीं और, किसी और के साथ रहना और रुकना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन समय के साथ शिक्षक माँ बन कर , दोस्त बन कर और भाई बहन की भूमिका निभा कर बच्चों को स्कूल में मन लगाने में सहायक होती है।
                            आज के सन्दर्भ में जब कि स्कूल , शिक्षा , शिक्षक , बच्चों की सुरक्षा , स्कूल वाहन , उस वाहन के चालक , स्कूल का पाठेतर कर्मचारी , स्कूल की इन चीजों के बारे  जिम्मेदारी को सुनिश्चित करना बहुत जरूरी हो गया है।  अभिभावक आपने नौनिहालों को घर से स्कूल की सुरक्षा में भेजते हैं तो घर से निकल कर घर पर आने तक की जिम्मेदारी सम्बद्ध लोगों की बनती है।  इसके लिए अभिभावकों , स्कूल , शिक्षक की जिम्मेदारियों को किस तरह से सुनिश्चित करना है , इसको एक विहंगम दृष्टि डाल कर देखेंगे।

1.  अभिभावक की सतर्कता :  स्कूल बच्चे को एक सुनहरे भविष्य को देने का वो रास्ता है जिसमें रहकर वह बहुत कुछ सीख कर आगे बढ़ता है , लेकिन आप को अपने बच्चे को प्रवेश देने से पहले इन बातों को ध्यान रखना होगा :--

(i )    स्कूल के पिछले सालों की साख के बारे में पता कर लें।  वहां के शिक्षक /शिक्षिकाओं की शैक्षिक पृष्ठभूमि के विषय में जानकारी लें। कुछ पुराने अभिभावकों से मिल लें ।और स्कूल के बारे में जान लें ।
(ii ) स्कूल का अगर अपना वाहन है तो उसके चालक और परिचालक के अतिरिक्त और उसमें  जो सहायक रहता हो , उसकी पृष्ठभूमि के विषय में जानकारी लें।  उनकी आदतों के विषय में जानकारी लें कि उनमें से कोई मादक पदार्थों का सेवन करने वाला न हो। साथ में एक महिला संरक्षिका के रहने की अनिवार्यता हो ।
(iii )  स्कूल वाहन के विषय में भी जानकारी  रखें।  वह कितना पुराना है ? उसमें आवश्यकता से अधिक बच्चे तो  नहीं ले जाए जा रहे हैं। छोटे वाहन जैसे वैन , ऑटो रिक्शा , बैटरी रिक्शा या विशेष रूप से तैयार करवाए गए स्कूल रिक्शे की भी पूरी जानकारी होनी चाहिए।  पुराने वाहन कमजोर और सुरक्षा तिथि के बाद भी आवश्यकता से अधिक बच्चे भर कर चलाये जाते हैं वे खतरे से खाली नहीं होते, इनमें दुर्घटना की संभावना अधिक होती है।।  
(vi ) आप अपने बच्चे को भी पूरी तरह से सतर्क रहने के लिए कहें।  अबोध बच्चे कभी कभी वाहन चालकों या स्कूल के कर्मचारियों के द्वारा विभिन्न तरीके से शोषित किये जा सकते हैं , अतः उन्हें इस दिशा में समझा कर रखें। 
(v ) स्कूल छुट्टी में बच्चों के जाने के बारे में कितने सतर्क हैं।  वहां के सतर्कता विभाग के मोबाइल नंबर लेकर रखें।  अपने बच्चे को छुट्टी में अगर वह स्कूल वाहन से नहीं आता है तो आने के साधन और व्यक्ति के विषय में पूरा विवरण वहां जमा कर रखें ताकि कोई गलती न हो। 

स्कूल की सतर्कता :-
                               स्कूल की भी एक गहन जिम्मेदारी होती है , उन बच्चों के प्रति जो स्कूल में आते हैं।  उनकी सुरक्षा , उनका स्वास्थ्य , उनका भविष्य और उनका चरित्र निर्माण सब उनकी जिम्मेदारी है।  इसके लिए स्कूल के जिम्मेदार लोगों को तीव्र सतर्कता बरतनी चाहिए।  वे इस देश के भविष्य को एक आकार देने के प्रति जवाबदेह होते हैं।  सिर्फ निजी स्वार्थ और लाभ का साधन स्कूल नहीं होते हैं।  

(i )  बच्चों के प्रति स्कूल वैसे तो सभी  सावधानी बरत रहे हैं कि बच्चों को स्कूल की छुट्टी से पहले या बाद में किसी भी अपरिचित के साथ न भेजा जाय।  अभिभावकों के विषय में जानकारी दर्ज करके रखते हैं कि बच्चे को वाहन न होने की स्थिति में किसके साथ भेजा जाय । बस होने की स्थिति में शिक्षक या शिक्षिका इसके लिए जिम्मेदार हों और बस में अपने सामने बच्चों को बस के अंदर बिठायें। 
(ii )  जहाँ तक संभव हो हर बस में एक शिक्षिका का होना भी जरूरी हो ताकि बच्चे अगर कोई तकलीफ या भय महसूस करें तो उनसे कह सकें। शिक्षिका के होने से बस के चालक और परिचालक पर अंकुश रहता है। न वे मादक द्रव लेते हैं और न ही बस में तेज ध्वनि में संगीत चला कर बस चलाते हैं। जो कि दुर्घटना का प्रमुख कारण बन जाता है। 
(iii )  बच्चों पर अनावश्यक पुस्तकों का बोझ न बढ़ाएं।  शिक्षण पद्धति इस प्रकार की होनी चाहिए ताकि अभिभावकों को अलग से कोचिंग का अनावश्यक भार न उठाना पड़े। होमवर्क का अनावश्यक भार भी न हो , जिससे कि बच्चों के लिए खेलने कूदने का समय भी मिल सके। 
(vi ) शिक्षकों द्वारा बच्चों के आर्थिक स्तर को लेकर भेदभाव न किया जाय।  बच्चों को  भेदभाव का सामना स्कूल में किसी भी स्तर पर न करना पड़े क्योंकि यहीं से बच्चों में हीन भावना और उच्चता की भावना का विकास होने लगता है। 
(v )  विद्यालय में नैतिक शिक्षा और शारीरिक शिक्षा को भी महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए।  बच्चों  के विकास में शिक्षण के साथ साथ इन गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण स्थान भूमिका होती है
  छात्रों की भूमिका :- स्कूल में अभिभावक या स्कूल के अतिरिक्त छात्रों का भी कुछ दायित्व होता है।  वे छात्र जो ऊँची कक्षाओं में होते हैं , उन्हें छोटे बच्चों का सहयोग करना चाहिए  न कि रैगिंग जैसी निंदनीय व्यवहार का उन्हें शिकार बनाया जाय।  आपकी तरह से वे भी शिक्षा ग्रहण करने आये हैं तो उनका मार्गदर्शन करके उन्हें भी आगे का मार्ग दिखाना चाहिए।  स्कूल को एक परिवार की तरह मानना चाहिए जिसमें बड़े आदर्श  प्रस्तुत करते हैं। 
                      स्कूल चाहे छोटे हों या बड़े , सरकारी हों या फिर निजी उनका स्तर और सुविधाएँ देख कर ही बच्चों को प्रवेश दिलवाएं।  ये कल के भविष्य है , इन्हें समुचित विकास और ज्ञान वाली शिक्षा मिलनी चाहिए।  

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

कोरोना और महिलाओं की भूमिका !

           कोरोना के बारे में बहुत कुछ पढ़ रहे हैं लेकिन इसके पीछे घर , लॉक डाउन , कामकाजी लोगों का घर में सीमित हो जाना - उनकी जान बचने के लिए पर्याप्त है , लेकिन इस जान के साथ इंसान की बहुत सारी जरूरतें होती हैं और वह क्या हो सकती हैं? कल - कल क्या होगा और हम क्या करेंगे ? देश की आर्थिक स्थिति भी बहुत बड़ी करवट लेने के लिए तैयार हो चुकी है।
                     सरकार निम्न वर्ग के लिए व्यवस्था कर रही है और वे जी भी रहे हैं लेकिन कई वर्ग ऐसे भी हैं , जो करने की स्थिति में भी नहीं है और कल की चिंता में तनाव अवसाद की स्थिति में जा रहे हैं।  महिलायें भी जा रही हैं लेकिन फिर भी महिलाओं से अधिक पुरुषों को उबरने के लिए कुछ ठोस आश्वासन भी चाहिए क्योंकि वे उस उहापोह की स्थिति में आ जाते हैं कि इतने लम्बे समय के बाद वे क्या और कैसे मैनेज कर पाएंगे ?
                     कल मेरे पास एक महिला का फ़ोन आता है , जब से उसने मेरे नाती और बेटी की महीनों मालिश की थी , वह मुझे अपनी आत्मीय समझने लगी थी और फिर वह सब कुछ अपनी समस्याएं शेयर  कर लेती थी।  पति एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता है।  वह मालिश और शादी ब्याह का काम करती है।  तीन बेटियां हैं - जो हाई स्कूल , सातवें और पांचवी में पढ़ती हैं. उसको कुछ पैसों की जरूरत थी क्योंकि मालिश , शादी ब्याह सब बंद है।  कुछ कर्ज लेकर उसने मकान बनवा लिया था और हाथ खाली हो गया था।  इतने दिनों का लॉक डाउन और फिर बढ़ गया।  वैसे तो दूर दूर जाकर जच्चा और बच्चे की मालिश करके उसको एक घर से १०० रुपये मिल जाते थे लेकिन ऐसे में कोई काम नहीं है।  उसको सहायता कर दी लेकिन वह खुद्दार महिला बहुत ज्यादा लेना भी नहीं चाहती और उससे बड़ी समस्या पति की।  वह रात दिन सोचता रहता है कि अब क्या करूंगा ? फैक्ट्री वाले इसके बाद कितने लोगों को रखेंगे , उनके अगर आर्डर कैंसिल हो गए तो फिर नौकरी के भी लाले।
                      एक माध्यम वर्गीय परिवार की समस्या - एक अच्छे खासे चलते हुए व्यवसाय के लोग  आराम पसंद जिंदगी जीने के आदी होते हैं।  घर की महिलायें भी उसी वातावरण की आदी होती हैं।  इतने दिन से शोरूम बंद , आमदनी तो बंद है ही , साथ  शोरूम के कर्मचारियों को भी  पूरा नहीं तो आधा वेतन देना ही पड़ेगा।  घर के काम वालों को कम कर दिया , वह तो सुरक्षा की दृष्टि से किया गया लेकिन वेतन उन्हें देना है आखिर वह कहाँ से लायेंगे? आमदनी बंद खर्च कमोबेश वही । परिणाम कमाने वाला वर्ग तनाव और अवसाद में जा रहा है ।

अवसाद पुरुषों में :-
                           भारतीय समाज की संरचना और मानसिकता कभी बदल नहीं सकती । कमा कर लाना और खर्च पूरा करना पुरुष वर्ग की जिम्मेदारी है । व्यावसायिक वर्ग का पुरुष लॉक डाउन में अवसाद का शिकार हो रहे है । वह सुबह से रात तक शॉप या शोरूम में रहता है और आमदनी की गणना करके ही योजना बनाता है । अब आमदनी बंद और खुलने पर भी सामान्य होने में महीनों लगेंगे ।

महिलाओं की भूमिका :--   

           इस समय परिवार की महिलाओं का दायित्व बढ़ रहा है कि वे पति की काउंसलिंग करें कि वे उस अवसाद से निकल सकें । घर के खर्चे में कमी का आश्वासन दे सकती हैं , गृहस्थी वही चलाती है और स्वाभाविक है कि वे उसमें कमी करके मैनेज कर लेती है ।
            आने वाले समय में भी अपनी पार्टी, खरीदारी, सैर सपाटे पर अंकुश लगाने का आश्वासन भी पुरुषों की चिंताओं को कम कर सकता है । ये जो समय है वह वापस एक नये सिरे से बाजार के रुख को बदल देगा । इसे पुरुष से अधिक महिलायें अपने स्तर पर स्थिर स्थिति को सहजता से झेल सकती हैं ।

बच्चों की भूमिका :--
         
                              परिवार में आमदनी के जरिये कितने भी हों खर्चे के रास्ते भी उतने ही होते हैं । बच्चों के अपने अलग खर्च होते हैं । वे अपनी बाइक प्रयोग करते हैं या संस्थान की बस । वे अपने स्तर से मुखिया को आश्वस्त कर सकते हैं कि सामान्य होने तक वे अपने  मित्रों के साथ शेयर करके जायेंगे । अपने जेबखर्च को भी सीमित कर सकते हैं । पार्ट टाइम  जॉब कर अपना खर्च निकाल सकते हैं ।

          यह समय ऐसा है कि सिर्फ और सिर्फ परिवार वाले दृढ़ संबल बन सकते हैं । वक्त ये भी नहीं रहेगा । अपने परिवार का संबल बन कठिन समय निकालिये ।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

वर्तमान परिप्रेक्ष्य : साहित्यकार की भूमिका!


                 
               
                     वर्तमान परिप्रेक्ष्य में साहित्यकार की भूमिका बहुत  महत्वपूर्णं है क्योंकि आज जो सामाजिक और सांस्कृतिक मूूू्ल्यों  का अवमूल्यन हो रहा है, इसके लिए साहित्यकार का सृजन ही समाज में एक प्रभावी परिवर्तन या फिर उसके सही विश्लेषण के लिए सहायक हो सकता है।  साहित्य समाज का दर्पण होता है और वो हम उस काल की बात साहित्य से ही जान सकते हैं क्योंकि हम उस समय नहीं होते हैं और आने वाली पीढ़ी तो वही स्वीकार करती है , जो उसके सामने प्रस्तुत किया जाता है।  लेकिन इसकी पूरी जानकारी हमें उस काल मेेंं साहित्यकारों के द्वारा रचित साहित्य में करके रख दिया है और उस समय भी उन्होंने वही रचा जो कि उचित समझा था।  परिपाटियों और पूर्वाग्रहों का अंधभक्ति से समर्थन नहीं किया था।  वो सदैव उचित ही हो ऐसा नहीं समझा जा सकता है।   उन्होंने जो रचा वह  हमने पढ़ा और जिसे स्वीकार कर सके किया अन्यथा उसको नकार कर या फिर उसको परिमार्जित करके रच दिया।
                        साहित्य ही वह साधन है जिसके द्वारा संस्कृति और सभ्यता को एक पीढ़ी से दूसरी  पीढ़ी के मध्य हस्तांतरित करता है।  ये एक वो सत्य है जिसे हम अतीत को स्वीकार करने की बात कर सकते हैं लेकिन समय के साथ साथ हमारा दायरा बढ़ा है और हम बाहरी संस्कृतियों के संपर्क में आते रहते है जिससे साहित्यकार की भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।  नैतिक और सामाजिक मूल्यों के अवमूल्यन के चलते साहित्यकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है।  गलत को सही रूप से व्याख्यायित करने के प्रभावी तरीके को साहित्यकार ही प्रस्तुत कर सकता है।  आज जब कि युवा ही नहीं किसी भी उम्र के लोगों की सोच दिग्भ्रमित हो रही है तो उनको सही दिशा कैसे मिलेगी ? एक ऐसे साहित्य की जरूरत है जो देेेशहित, मानवहित की विचारधारा रखने वाला हो । लेकिन उसको किसी भी पूर्वाग्रह या विचारधारा से प्रभावित नहीं होना चाहिए , उसको तो एकदम तटस्थ और समाज हित की सोचने वाला होना चाहिए। हम  कुछ भी रच कर साहित्यकार नहीं बन सकते हैं और अगर बन भी जाते हैं तो अपनी कलम के प्रति ईमानदार नहीं हो सकते हैं।
                   लेखन का कोई भी क्षेत्र हो लेकिन साहित्यकार को  अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से लिखने का दायित्व होता है। राजनीति ,  धर्म और  कोई भी वर्ग हो , सब के लिए एक नैतिक मूल्य होते हैं और जो सर्वमान्य होते हैं तो एक साहित्यकार को उनका पालन करते हुए रचना चाहिए।  आज दिशा भ्रमित होते हुए जीवन के हर क्षेत्र को आपके दिशा निर्देश की जरूरत है और भटक रही जनमानस की सोच को सकारात्मक दिशा में मोड़ने की जरूरत है और वह अनुकरणीय तभी बन सकती है , जब कि साहित्यकार का उस क्षेत्र के आधारभूत मूल्यों को हमेशा जीवित  रखने का दायित्व निभा रहा  हो । ऐसा नहीं कि हम देश के इतिहास को अपनी इच्छानुसार तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करके अपने दायित्व को पूरा नहीं कर रहे हैं। साहित्यकार के द्वारा रचित साहित्य से ही हम आने वाली पीढ़ी के लिए बनाये गए पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं और अगर साहित्यकार ने आपने दायित्व को ईमानदारी से पूरा न किया तो हम अपने दायित्व को पूरा नहीं कर रहे हैं।
                 लेखक समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री , मनोवैज्ञानिक , विधिवेत्ता , राजनीतिशास्त्री या धर्मशास्त्री कोोई भीी हो उसका अपने क्षेत्र के प्रति एक ईमानदार सोच और लेखन के प्रति भी ईमानदारी होनी जरूरी है।  एक विखंडित और विघटित समाज की  परिकल्पना किसी भी साहित्यकार की ईमानदार भूमिका नहीं हो सकती है।  साहित्यकार भी याद किया जाता तो उसके लेखन के लिए और गलत या भ्रमित करने वाला साहित्य आलोचना का भी शिकार होता है। समाज और देश को सही दिशा में न कानून ले जाता है और न ही राजनीति बल्कि उसे संचित और वर्तमान रचित साहित्य ले जाता है ।
                 समाजशास्त्री होकर अगर साहित्यकार सामाजिक मूल्यों की अवहेलना करे या फिर ऐसे मूल्यों को बढ़ावा दे जो कि समाज हित  में ही न हो तो ऐसे साहित्यकार का दायित्व कौन निश्चित करेगा?  वो साहित्य जो सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं का पोषक हो और गलत आचरण का समर्थक न हो , वही अपने दायित्व को पूरा कर रहा होता है। हम चाहे लेख , कहानी या कविता कोई भी प्रस्तुति करें लेकिन मानव हित में हो। हर साहित्यकार की रचना एक सुशिक्षित , सुसंस्कृत और सभ्य समाज की रचना के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी होता है।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

गुड़ी पड़वा / नव संवत्सर /युगादि !

                     फाल्गुन के जाने के बाद उल्लासित रूप से चैत्र मास का आगमन होता है। प्रकृति ने चारों और पीत  रंग बिखेर कर मन उल्लास से भर दिया होता है। मौसम भी दिन में अगर थोड़ी सी गर्मी लिए होता  तो सुबह और शाम में गुलाबी ठंडक मन को सुकून भी देती है।         
                   भारतीय संस्कृति में गुड़ी पड़वा को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि से पौराणिक व ऐतिहासिक दोनों प्रकार की ही मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। 
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। इसी दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती हैं।  यह आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र में तो विशेष रूप से लोकप्रिय पर्व है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हिंदू नववर्ष का आरंभ भी माना जाता है। इसी दिन से संवत्सर का आरम्भ होता है।

 गुड़ी पड़वा:  गुड़ी पड़वा यदि शाब्दिक रूप से देखा जाये तो गुड़ी कहते हैं  , गुड़ी का अर्थ है विजय पताका तो वहीं पड़वा प्रतिपदा तिथि को कहा जाता है। इसीलिये इस दिन लोग घरों में गुड़ी फहराते हैं। आम के पत्तों की बंदनवार से घरों को सजाते हैं।

गुड़ी पड़वा कहानी   
गुड़ी पड़वा पर्व पर पौराणिक ग्रंथों में कई कहानियां मिलती हैं उनमें से प्रचलित कहानी है वह है भगवान श्री राम की बाली पर विजय की। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री राम ने दक्षिण में लोगों को बाली के अत्याचारों व कुशासन से मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में हर घर में गुड़ी यानि कि विजय पताका फहराई गई। यह परंपरा तभी से कई स्थानों पर आज तक जारी है।
                   इसी पर्व से जुड़ी एक और कहानी है जो शालिवाहन शक से भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि किसी जमाने में शालिवाहन नामक एक कुंभकार के पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई व पानी छिड़कर उस सेना में प्राण फूंक दिये। फिर इसी सेना की मदद से उसने शक्तिशाली शत्रुओं का नाश किया। शालिवाहन की शत्रुओं पर प्राप्त की गई इसी विजय के प्रतीक स्वरूप शालिवाहन शक का भी आरंभ हुआ। इसी विजय के उपलक्ष्य में गुड़ी पड़वा का यह पर्व भी मनाया जाता है। 

 कैसे मनाते हैं गुड़ी पड़वा पर्व? 
             हिंदू लोग इस दिन गुड़ी का पूजन तो करते ही हैं साथ ही घर के दरवाजे आम के पत्तों से बनी बंदनवार से सजाये जाते हैं। ऐसा करने के पीछे  यही मान्यता है कि बंदनवार घर में सुख-समृद्धि व खुशियां लेकर आती है। पर्व की खुशी में विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के व्यंजन भी तैयार किये जाते हैं। पूरनपोली नाम का मीठा व्यंजन इस पर्व की खासियत है। महाराष्ट्र में श्रीखंड भी विशेष रूप से बनाया जाता है। वहीं आंध्रा में पच्चड़ी को प्रसाद रूप मे बनाकर बांटने का प्रचलन भी गुड़ी पड़वा के पर्व पर है। बेहतर स्वास्थ्य की कामना के लिये नीम की कोपलों को गुड़ के साथ खाने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इससे सेहत ही नहीं बल्कि संबंधों की कड़वाहट भी मिठास में बदल जाती है।

नव संवत्सर प्रारम्भ :    चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा 'वर्ष प्रतिपदा' कहलाती है। इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनकी निर्माण की हुई सृष्टि के मुख्य-मुख्य देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीटाणुओं का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है।
                    संवत्सर अर्थात बारह महीने का कालविशेष। संवत्सर उसे कहते हैं, जिसमें सभी महीने पूर्णतः निवास करते हों।नवसंवत्सर का आरम्भ भी इसी दिन से होता है।  नववर्ष का आरम्भ होता है और हिन्दू पंचांग का आरम्भ इसी  दिन से होता है और इसको बड़े उत्सव की तरह ही मनाया जाता है।  चैत्र नवरात्रि का आरम्भ भी इसी दिन से होता है। 

चेटीचंड :      सिंधी समाज का नववर्ष के रूप में चैत्र की प्रतिपदा को ही  झूलेलाल जी के जन्मोत्सव के रूप में ही मनाया जाता है।

युगादि पर्व :  उगादी या युगादि  नव वर्ष की ख़ुशी में मनाया जाता है।जैसे की इस शब्द से प्रकट होता है युग आदि अर्थात युग या वर्ष का प्रारम्भ।   यह पर्व दक्षिण राज्यों में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। यह माना जाता है ब्रह्मा जिन्होंने इस सृष्टि की रचना की ,  उन्होंने इसी दिन इस ब्रह्माण्ड को बनाना शुरू किया था। इस दिन को कर्णाटक और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में नव वर्ष की शुरुआत भी माना जाता है।
               इस दिन लोग अपने घरों और आस पास की अच्छे से साफ सफाई करते हैं और अपने घरों के प्रवेश द्वार में आम के पत्ते लगाते हैं। लोग इस दिन अपने लिए और अपने परिवार जनों के लिए सुन्दर कपडे खरीदते हैं। इस दिन सभी लोग सवेरे से उठते हैं और तिल के तेल को अपने सर और शारीर में लगाते हैं और उसके बाद वे मंदिर जाते हैं और प्रार्थना करते हैं।  लोग इस दिन बहुत ही स्वादिष्ट खाना और मिठाइयाँ बनाते हैं और अपने परिवार और आस पास के लोगों को बाँटते भी हैं। तेलंगाना में इस त्यौहार को 3 दिन तक लगातार मनाया जाता है   
             

सोमवार, 23 मार्च 2020

शहीद दिवस - 23 मार्च !

         



         
आज २३ मार्च उन तीन वीरों  भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के बलिदान होने का दिन हैं,  जिन्होंने अंग्रेजी सरकार की चूलें हिला दी थीं। हम कुछ लोग नम आखों से उनको याद करते हैं  और उनकी क़ुर्बानी को नमन करते हैं।  बस हम कुछ संवेदनशील ही न - बाकी वे जो संसद में बैठे हें , जो विधान सभा में बैठे हें और वे जो बड़े बड़े मंत्रालयों को संभाल रहे हें उनके लिए ये दिन पता नहीं कैसा गुजरता होगा? उनके पास समय नहीं होगा इन वीरों को याद करने का क्योंकि अब वे बीते कल के नायक हो चुके हें और आज के नायक तो यही है हर स्याह और सफेद करने के लिए।
           ये पत्र पत्रिका में कुछ संवेदनशील लेखक और मीडिया इसको याद कर लेती है . हो सकता है कि हमारे सांसदों और विधायकों को ये पता भी न हो कि आज के दिन को शहीद दिवस कहा क्यों जाता है? आने वाले समय में हमारी भावी पीढ़ी इस बात को बिल्कुल ही याद नहीं कर पायेगी क्योंकि कभी स्कूलों में ऐसे दिन कोई याद करने जैसी बात तो होती ही नहीं है कि प्रारंभिक कक्षाओं में ही बच्चों को शिक्षक इन शहीदों के बलिदान दिवस पर कुछ मौखिक ही बता में भी कभी लघु कथा के रूप में और कभी पूरे पाठ के रूप में देश के इन शहीदों की कहानी होनी चाहिए। इस देश की स्वतंत्रता के इतिहास के ये नायक गुमनाम न रह जाएँ।
इन्होने किस जुल्म में अपने को फाँसी पर चढ़ा दिया ये भी तो बच्चों को पता होना चाहिए। कहीं ये सब कालातीत तो नहीं हो चुकी है । क्योंकि कहीं कहीं पाठ्यक्रम में इन्हें आतंकवादी भी उल्लिखित किया जा चुका है । ऐसा विचार मेरे मन में क्यों आया? ये भी मैं आप सबको बताती चलूँ- आज डॉ राम मनोहर लोहिया जी का भी जन्मदिन है , जिन्होंने इस समाज के लिए बहुत कुछ किया । समाजवादी विचारधारा के जनक उन्हीं को माना जाता है ।
           आज कोरोना के चलते सिर्फ मानव जाति को बचाने की जद्दोदहद में सब लगे हैं और हम शायद फुर्सत में हूँ और उन शहीदों को नमन करती हूँ , जो इस स्वतंत्र भारत के लिए न्योछावर हो गये थे ।

गुरुवार, 12 मार्च 2020

ईगो एक मनोविकार !

       अखबार में एक खबर पढ़ी थी - "पति ने "सॉरी" नहीं कहा तो गर्भवती ने आग लगा ली।" पढ़ा और उसकी तस्वीर भी देखी और फिर एक घटना समझ कर बंद कर दिया। आज ही पता चला कि वह मेरे एक करीबी रिश्तेदार की चचेरी बहन थी।

            जैसा कि समाचार में लिखा गया था, वाकई सत्यता वही थी। पति रेलवे में नौकरी करता था और अभी एक साल पहले ही शादी हुई थी। उसको अपने ऑफिस से आने में देर हो गयी और आने पर उसने पत्नी से "सॉरी" नहीं बोला और उसकी पत्नी के अहम् को इतनी चोट लगी कि उसने न आगा सोचा और न पीछा और जाकर मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा ली। उसे बुझाने में पति भी झुलस गया लेकिन उसको और उसके गर्भस्थ शिशु को नहीं बचाया जा सका।

       एक यही नहीं बल्कि अक्सर सुनते हैं कि माता-पिता , भाई या बहन के डाँटने पर फाँसी लगा ली । ये घटनाएं अक्सर किशोरावस्था के बच्चों के बीच होती हैं । बड़ी जल्दी इनकी इगो आहत हो जाती है।

क्या है इगो या अहम् ?

  ये है अहम् या इगो । कहते हैं वास्तव में एक मनोरोग है । यह व्यक्ति में अपने को अतिरिक्त गुणों से युक्त होने का भ्रम भी पैदा कर देता है। जिसके कारण ही वह विशेष व्यवहार की आशा करता हैं । ये इगो लड़कियों में आमतौर पर अधिक पायी जाती है। वे अपने को घर में सबसे खूबसूरत समझने पर , अधिक धनवान परिवार की होने पर, इकलौती संतान होने पर या फिर परिवार में उसको अधिक महत्व देने पर पैदा हो जाती है। ये मनुष्य के स्वभाव का एक सामान्य गुण नहीं है और तब तो बिल्कुल ही नहीं जब कि वह अपने आगे किसी को भी कुछ न समझती हो।

                  ऐसे गुण बच्चों में थोड़ा बड़े होते ही प्रस्फुटित होने लगते हैं। इस समय जरूरत होती है कि बच्चों को बहुत सावधानी से समझाया जाए और ये भी नहीं होना चाहिए कि माँ ने उसको समझाने का प्रयास किया और पिता या दादी और दादा ने उसको शह दे दी। ये आदतें  बचपन में बहुत अच्छी लगती हैं,  लेकिन बड़े होने पर वे इतने गहरे जड़ें जमा चुकी होती हैं कि वह जीवन में ऐसे निर्णय भी लेने में संकोच नहीं करती हैं ।

ईगो से मुक्ति या नियंत्रण कैसे हो ?

                 अगर इगो की ये समस्या पारिवारिक जीवन में या फिर वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करने में आड़े आने लगे तो मनोचिकित्सक से सलाह ली जा सकती है और उसको काउंसलिंग के द्वारा भी समझाया जा सकता है। वैवाहिक जीवन में दोनों में से किसी भी एक का अहमवादी होना दूसरे के जीवन को नरक बनाने में पूर्ण रूप से जिम्मेदार होता है।

कुछ लोग इस इगो को स्वाभिमान के रूप में परिभाषित करते हैं लेकिन ये गलत है, स्वाभिमान और अहम् दोनों ही अलग अलग मनोभाव होते हें। जहाँ स्वाभिमान सकारात्मक भाव है वहीं इगो नकारात्मक भाव है। स्वाभिमान के लिए व्यक्ति खुद को संयमित भी रखता है और उसके आहत होने पर वह विपरीत प्रतिक्रिया कम ही करता है , लेकिन इगो में वह संयमित नहीं होता है बल्कि उसके आहत होने पर कभी खुद को और कभी दूसरे को भी हानि पहुंचा सकता है। उसके लिए अहम् पर चोट पहुँचना जीवन मरण का प्रश्न बन जाता है ।

इस लेख के लिखने का मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि हम अपने घर में , अपने परिचितों के घर में अगर बच्चों में इस तरह की भावना को पलते हुए देखें तो उनको आगाह किया जा सके। ये काम घर में और स्कूल में दोनों ही जगह पर किया जा सकता है क्योंकि घर में फिर भी कम लेकिन स्कूल में बच्चे इस तरह के भावों का प्रदर्शन बहुत अधिक करते हें। कालेजों में छात्रों में होने वाले संघर्ष के पीछे कभी कभी ये भी भाव रहता है। जिसे हम वर्चस्व की लड़ाई कहते हें उसके पीछे काम करने वाली भावना यही अहम् या इ
ईगो होती है।

         अगर समय रहते इसको संयमित कर लिया गया तो घर और परिवार दोनों के लिए अच्छा होगा, नहीं तो बच्चे की ये ईगो माँ बाप , भाई , बहन या किसी भी पारिवारिक सदस्य के लिए कोई भी मुरव्वत नहीं करती है। वे ऐसे निर्णय ले बैठते हैं , जिससे कि एक और कभी कभी दो परिवार जीवन भर के लिए कष्ट पाते हैं।
           बचपन में ही अगर इस ईगो का पता चल जाता है तो काउंसलिंग के द्वारा उसको सामान्य स्तर पर लाया जा सकता है । किशोरावस्था में भी ईगो का शमन करने के लिए भी काउंसलिंग की जानी चाहिए। एकमात्र यहीं रास्ता हैं।