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बुधवार, 27 मई 2020

जागरूक माँ बनें !

                              माँ बनना हर स्त्री के लिए गौरव की बात होती है और स्वस्थ संतान की कामना भी हर माँ करती है। मैंने लगातार बच्चों के विकास को देखते हुए इस बात पर दृष्टि रखी हुई है। समय और विचारों के अनुरूप साथ ही अपने करियर के प्रति जागरूकता ने विवाह की उम्र बढ़ा दी है।  आज 80 फीसदी माताएं नौकरीपेशा होती हैं।  इस स्थिति में उनको करीब करीब 8 -9 घंटे तक  ऑफिस में काम करना होता है और इनमें भी अधिकतर लैपटॉप , कंप्यूटर और मोबाइल के संपर्क में रहती हैं । इनका उनके शारीरिक रूप से उन पर प्रभाव होता है।  कभी कभी वह शिफ्ट में भी काम कर रही होती हैं।
                        ऐसा नहीं है कि उनके लिए छुट्टियों का प्रावधान नहीं है लेकिन अधिकतर माताएँँ मिलने वाली छुट्टियों को डिलीवरी के बाद लेना चाहती हैं और लेती भी हैं।  वे इस बात से वाकिफ नहीं होती हैं कि उनके आराम करने से ही गर्भस्थ शिशु को आराम मिलता है।  प्रसव के ठीक पहले एक महीने में बच्चे का पूर्ण विकास हो चुका होता है और उसको हर चीज की बहुत  जरूरत होती है।  लैपटॉप, मोबाइल से निकलने वाली रेडिएशन भी उनको प्रभावित करता है।

प्रसव पूर्व माँ की जीवन शैली :--

                                                 आज की आधुनिक कही जाने वाली पीढ़ी अपने से बड़ों की सलाह को दकियानूसी बातें मानती है. क्योंकि उनके हाथ में जो मोबाइल होता है और उस पर मिलने वाली जानकारी ही उनके लिए मील का पत्थर बन जाती है और गूगल बाबा सबसे ज्ञानी होते हैं। वे इस बात से अनभिज्ञ होती हैं कि  हमारी संस्कृति में चले आ रहे कुछ अनुभव निरर्थक तो नहीं होते हैं।  उनका कोई आधार होता है और वे समय के साथ प्रभावित भी करते हैं।

संरक्षकों की सतर्कता :--

                                               प्रसव के तुरंत बाद प्राकृतिक रूप से शिशु रोता है और इस रोने के पीछे जो लॉजिक है वह पुराने समय में बच्चे बाहर आकर घबरा जाता है और जोर जोर से रोने लगता है लेकिन इसका मुख्य सम्बन्ध बच्चे के सम्पूर्ण जीवन से होता है।  गर्भ में शिशु माँ से ही भोजन और साँँस ग्रहण करता है लेकिन गर्भ से बाहर आते ही उसका रोना शिशु के जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।  बच्चे के रोने से ऑक्सीजन अंदर ग्रहण करता है और उससे उसके मस्तिष्क की जो रक्तवाहिनी सम्पूर्ण शरीर के लिए जाती हैं वे खुल जाती हैं और रक्त प्रवाह सम्पूर्ण शरीर में सुचारु रूप से होने लगता है , जो शिशु के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
                 कभी कभी शिशु के रोने में कुछ समय लगता है तो डॉक्टर और नर्स बच्चे को मार कर रुलाने का प्रयास करते हैं और यदि समय रहते ये काम हो जाता है तो कोई खतरा नहीं होता लेकिन अगर अंतराल बढ़ जाता है तो जहाँ जहाँ से सम्बंधित रक्तवाहिनियां सुचारु रूप से खुल नहीं पाती हैं , वे अंग असामान्यता के शिकार हो जाते हैं।  इस स्थिति में संरक्षकों को सतर्क रहना होता है और बच्चे पर नजर रखते हुए समय से डॉक्टरों से सलाह लेनी चाहिए।

बुजुर्गों की सोच :--

                             प्रसूता के प्रति घर में बुजुर्गों का रुख कैसा है ? ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा होता है।  कहीं पर बड़ों की बातों में पिता या माँ कोई दखल नहीं दे पाते हैं और वे अपने अनुभवी होने की दलील से सबको चुप करा देते हैं।  इस स्थिति में बच्चे के बड़े होने के साथ साथ माँ और पिता को सतर्क रहने की जरूरत होती है। बच्चे की प्रगति में बुजुर्ग हस्क्षेप करते हैं लेकिन माँ को ये ध्यान रखना चाहिए कि  समय के साथ और बदलते प्राकृतिक परिवर्तन से शारीरिक व मानसिक मानकों में परिवर्तन हो रहे हैं और उन पर नजर रखते हुए सतर्क रहना होता।  अगर बच्चे में कोई भी असामान्यता दिखलाई देती हैं तो विशेषज्ञ से राय ले लेना होता है। यद्यपि बच्चे की दादी और नानी अपने अनुभव बाँँटने लगती हैं कि हमारे बच्चे तो ऐसे थे और भी चीजें हैं :-

बच्चे के चेतनता :--
                                  इस  विषय में उनका कहना होता है
कि इस उम्र में हमारे बच्चे भी नहा धोकर घंटों सोया करते थे।  बच्चों को सोना अच्छी बात है। लेकिन समय के साथ साथ सब कुछ परिवर्तित हो रहा है , तब बच्चों की माँ को नियमित चेकअप और अल्ट्रासॉउन्ड और डॉक्टर की बराबर नजर नहीं रहती थी।  सरकारी अस्पताल में भी डॉक्टर के बुलाने के बाद भी दिखाने के लिए  नहीं जाती थी बल्कि सिर्फ डिलीवरी कार्ड बनवाने के दिखाने जाती थी और फिर डिलीवरी के लिए।  आज बच्चों की सक्रियता बढ़ रही है और उनके  कार्य कलाप भी।  इस पर माँ को ध्यान देना चाहिए।

बच्चे की प्रतिक्रिया :--

                                बच्चे कुछ ही महीने होने पर अपनी प्रतिक्रिया शुरू कर देते हैं।  उनसे हँसकर बात करने पर वे भी हँसकर उत्तर देने लगते हैं।  आपके बुलाने पर सिर घुमा कर देखने का प्रयास करते हैं और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए। डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए। उनके विकास के लिए प्रति महीने होने वाले विकास का एक प्रामाणिक चार्ट है , जिसे आगे प्रस्तुत किया जाएगा।


रविवार, 24 मई 2020

प्रवासियों का दर्द !


           कोरोना ने सम्पूर्ण देश में ऐसे पैर पसारे कि हर तरफ त्राहि त्राहि मच रही है। लम्बे लॉक डाउन ने उनको खाने पीने के लिए मजबूर कर दिया , जब भूखों मरने की नौबत आ गयी तो उन्हें घर याद आया और सोचा कि  अगर मरना ही है तो अपने घर पहुँच कर अपनों के बीच मरेंगे।  उनकी जिजीविषा ही  थी , जो उनको बिना साधनों के सैकड़ों मील के दूरी पैदल नापने के लिए तैयार हो गए।  चल दिए अपने सारे साजो सामान लेकर।  गर्भवती पत्नी , दुधमुंहे बच्चे , वृद्ध माता - पिता को लेकर जहाँ से जो साधन मिला चले आ  रहे हैं।

                        इनके सामने कल अपने घर पहुँच कर भी ढेरों समस्याओं का सामना करने का एक भयावह सवाल खड़ा होगा ।    अभी तो एक नरक से छूट कर अपने घर की शीतल छाँव में पहुँच कर चैन की साँस लेंगे, कम से कम पेट भर कर खाना तो नसीब होगा। इसी तरह के सपनों में डूबे सभी चले जा रहे थे , घर की डगर बहुत दूर लग रही थी लेकिन मन में  खुशी तो थी।

अपनों का बदला रुख :-  
                                       अपना आशियाना छोड़ कर वह लोग आ रहे हैं यह सूचना तो उनको मिल ही चुकी है लेकिन  घर में अफरा तफरी मची हुई होगी कि ये लोग जितना लम्बा रास्ता तय करके आ रहे हैं --
- कहीं कोरोना किसी के साथ न आ जाय?
- हमारे अपने भी तो बाल बच्चे हैं , कहीं कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे ?
- पता नहीं कितने लोग साथ आ रहे होंगे ?
- क्या पता  उनमें किसी कोरोना न हो फिर हम क्या करेंगे ?
- क्या उतनी आत्मीयता से मिल पायेंगे ?
                आने वाले इन सारे  प्रश्नों के बारे में सैकड़ों मील की पैदल  या  विभिन्न साधनों से आ रहे हैं , एक शांति लिए मन में कि घर पहुँच जाएँ तब चैन की सांस लेंगे। वो जिस  चैैन की साँस की आशा लेकर आ रहे हैं वह मिलेगी या नहीं। ये तो उनका भाग्य ही निश्चित करेगा ।

  कोरन्टाइन की अवधि :-
                                      कोरंटाइन की अवधि भी किसी अग्नि  परीक्षा से कम न थी. अपने गाँव शहर से बाहर किसी भी जगह  रखा जाएगा , जहाँ न खाने पीने का की समय होगा और न रहने सोने की पर्याप्त व्यवस्था। एक लम्बी अग्नि परीक्षा। इस वक़्त न वे  बाहर के ही हैं और न ही घर गाँव के।  कब वह पहुँच पाएंगे ?  उन्हें लग रहा था कि वे इस देश के निवासी ही नहीं हैं।  फिर भी घर जमीन तक पहुँचने में अभी कुछ और बाकी था। 

घर का कोरन्टाइन :- 

                              घर पहुँच कर सब   घर  बाहर ही मिले और उसको कह दिया गया कि वह ऊपर बनवाए हुए कमरे में अपने सामान सहित चले जाएँ।  
- देखो अभी अभी तुम बाहर आ रहे हो, पता नहीं कितने लोगों के साथ में सफर करके आ रहे हो तो अभी फिलहाल कुछ दिनों तक तो तुमको हम सबसे दूर रहना ही चाहिए। 
- खाना तुम्हें ऊपर ही मिल जाया करेगा।  पूरे घर में घूमने के जरूरत नहीं है। 
-  फिर तुम्हें कौन सा यहाँ हमेशा रहना है , बीमारी ख़त्म हो जायेगी तो वापस चले ही जाना है। 
                       कितने कष्टों से जूझते हुए वह लोग घर आये थे और घर में आकर ये नया कोरन्टाइन भी झेलना पड़ेगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी।  वहाँँ से चले थे कि  बस अब और नहीं अपने घर में चलकर ही रहेंगे। अपनी मेहनत को घर में लगा कर काम कर लेंगे तो फिर दर दर नहीं भटकना पड़ेगा। पर यहाँ पर अछूतों जैसा व्यवहार कर रहे हैं घर वाले।  ये पक्का आँगन , कमरे , कुँए की जगत सब कुछ उसके भेजे पैसे से ही बने हैं लेकिन लग ये रहा है कि वे अवांछित मेहमान होंं।                              

सम्बन्धों में दरार :-
                             यह वही घर और  माता-पिता और भाई, बहन हैं , जो इससे पहले घर आने पर आगे पीछे घूमते रहते थे। किसी को भाई के कपड़े पसंद है तो ले लिए , भाभी की साड़ी जिसे पसंद आई ले ली कि वे वहाँ  जाकर और ले लेंगे । आज सब कटे कटे फिर रहे हैं। अब वापस नहीं जाना है । ये सुन कर सब चुप हैं

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         इस महामारी के काल में जब इंसान के लिए खाने पीने का ठिकाना न रहे तो वह वापस तो अपने घर ही आएगा। लेकिन और भाई जो खेती पर ऐश कर रहे थे , भाई के आने से उनका हिस्सा भी लगेगा , ये सोचकर दुखी थे । बार बार सभी उसको यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि महामारी ठीक होने तक वह गाँव में रहे फिर वापस चले जाएँ।  वहाँँ ज्यादा कमाई है और यहाँ पर खेती में क्या होता है ? सैकड़ो मील पैदल , ट्रक, ट्रैक्टर पता नहीं कैसे कैसे सफर की ? अभी पैरों के छाले रिस ही रहे थे कि दिल के छाले पड़ने लगे । उसे जमीन पर घर पर उसका भी तो अधिकार बनता है लेकिन जिस चीज को कुछ लोग पूरे अधिकार से प्रयोग कर रहे थे और उसका कोई दूसरा भी प्रयोग करने वाला आ जाय तो अगले  को खलेगा ही। जो सैकड़ों मील की सफर करके किसी तरह से घर पहुंचा हो और घर में वो पहले वाला  सम्मान और प्यार अपने लोगों से न मिले तो स्वाभाविक है कि उसके लिए दूसरा झटका सहना आसान नहीं हो सकता है।  ये त्रासदी भी सहना आसान नहीं है।

भविष्य का प्रश्न :-
                           अब जो घर लौटे हैं तो वापस जाने के लिए नहीं । शहर की चकाचौंध गाँव वालों को समझ आती है । वहाँ की हाड़ तोड़ मेहनत किसे दिखेगी ? अब गाँव में स्कूल हैं, सड़कें हैं तो दुकान भी डाल लेंगे तो वहाँ से अच्छे तब भी रह लेंगे।  न मकान का किराया लगना है ।  खाने पीने के लिए खेती से मिल ही जाएगा।  बहुत दिनों तक घर और घर वालों से दूर रह लिए, अब  अपनी घर जमीन पर ही रहेंगे।  खुदा न खास्ता कोरोना हो जाता तो ये पत्नी , बच्चे तो कहीं के न रहते।  कहाँ किस अस्पताल में पड़ा होता और अगर मर मरा जाता तो फिर किसी को शक्ल भी देखने को न मिलती। यही रोड के किनारे कोई दुकान डाल लूँगा।   इतनी कमाई तो हो ही जायेगी कि सारे खर्चे आराम से निबट जायेगे। अगर दुकान न चली तो फिर क्या करेंगे? घर पहुँच कर भी उन लोगों को चैन नहीं मिल रहा है। एक यक्ष प्रश्न अभी प्रवासी मजदूरों के सामने भयानक रूप लिए आज खड़ा है और जब तक हल न मिले ये खड़ा ही रहेगा।
              सरकारी प्रयास कितना काम दे पायेंगी ? इसके लिए इंतजार करना पड़ेगा । अभी सब भविष्य के गर्भ में है ।



शुक्रवार, 15 मई 2020

विश्व परिवार दिवस !

आज विश्व परिवार दिवस है और यह भी पाश्चात्य सभ्यता से परिचय के बाद मनाने की हमारे देश में आवश्यकता हुई क्योंकि हम सदैव से संयुक्त परिवार और वृहत् परिवार को मान्यता देते रहे और इसीलिए परिवार की यह परिकल्पना विदेशों में बहुत ही इज्जत के साथ  देखी जाती है,  लेकिन जैसे-जैसे हम विदेशी सभ्यता के संपर्क में आए और हमारे ऊपर  उच्च शिक्षा के बाद शहरी संस्कृति का प्रभाव पड़ा तो नई पीढ़ी ने एकल परिवार की परिभाषा  समझी।  वे संयुक्त परिवार  की बजाए एकल परिवार में ज्यादा सुख खोजने लगे,  ऐसे में हमारे देश की प्राचीन संस्कृति की धरोहर संयुक्त परिवार टूटने लगे । उनके बीच जो प्रेम और सद्भावना थी उसका ह्रास होने लगा, धीरे धीरे सुख और दुख सभी में शामिल होने के लिए लोगों ने भागीदारी से कटना आरंभ कर दिया और हमारी उस परिवार की जो छवि थी वह धूमिल हो गई। लेकिन हमारी जहाँ जहाँ जड़ें हैं, शाखाएं चाहे जितनी दूर-दूर तक फैल जाए हमें अपना जीवन अपनी जड़ों से ही प्राप्त होता है । उनके बिना हम जी नहीं सकते । 
          आज जब एक भयंकर स्थिति ने  संपूर्ण विश्व को घेर रखा है तो लॉक डाउन के कारण और घर से बाहर निकले परिवारों को फिर से अपना घर याद आने लगा और धरती मां या जन्मभूमि कभी इतनी निष्ठुर नहीं होती कि  यदि उनके बच्चे उन्हें छोड़कर चले जाएं और संकट में वे लौटें तो उन्हें शरण देने से इनकार कर दे और इसी का परिणाम है कि हजारों लाखों की संख्या में प्रवासी अपने घर की ओर चल दिए  क्योंकि उनको विश्वास है  कि मजदूर या कामगर वापस अपने घर की ओर आ रहे हैं , पैदल चलकर, ट्रेनों में भरकर, बसों में भरकर या जिसको जो भी साधन मिला वह अपनाकर  जन्म भूमि की ओर चल दिए। उनको यह विश्वास था कि उन्हें अपने परिवार में शरण मिलेगी और उनके भूखे मरने की  नौबत नहीं आएगी चाहे पूरा परिवार आधी आधी रोटी खाए लेकिन परिवार के हर सदस्य को खाना मिलेगा, कपड़े मिलेंगे और एक छत के नीचे छाया मिलेगी । हो सकता है घर के अंदर परिवार की  तीन या चार पीढ़ियाँ आज की आपको मिले और उनके अंदर मतभेद भले ही हो लेकिन मनभेद नहीं हो । जब व्यक्ति अपना-अपना स्वार्थ देखने लगता है तंभी परिवार में दरार आना शुरू हो जाती  और परिवार बिखरने लगता है , लेकिन आपातकाल में वही परिवार किसी न किसी रूप में साथ देता है और जो साथ नहीं देता है वह अपने को इस दुनिया की भीड़ में अकेला खड़ा हुआ पाता है । आज जबकि इंसान के जीवन कोई भी निश्चित नहीं रह गई तब वह वापस अपनी जड़ों की ओर भागने लगा है क्योंकि अगर परदेश में उसको कुछ हो जाता है तो उसका परिवार घर में शरण पाएगा और महानगरों की सड़कों पर उसको ठोकर नहीं खानी पड़ेगी । इसीलिए परिवार को  महत्व दिया जाता है ।
          विश्व की इस त्रासदी ने कुछ भी न किया हो , इंसान को अपनी जड़ों से मिला दिया है ।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

श्रमिक दिवस ! (कानपुर के संदर्भ में )


                 आज का दिन  कितने नाम से पुकारा जाता है ? मई दिवस , श्रमिक दिवस और महाराष्ट्र दिवस।  अगर विश्व के दृष्टिकोण  देखें तो मजदूर दिवस ही कहा जाएगा।  हम कितने उदार हैं ? हमारा दिल भी इतना बड़ा है कि हमने पूरा का पूरा दिन उन लोगों के नाम कर दिया।  सरकार ने तो अपने कर्मचारियों को छुट्टी दे दी लेकिन क्या वाकई ये दिन उन लोगों के लिए नहीं तय है जो अनियमित मजदूर हैं।  इस दिन की दरकार तो वास्तव में उन्हीं लोगों के लिए हैं - चाहे वे रिक्शा चला रहे हों या फिर बोझा ढो रहे हों।   आज के दिन मैं कानपुर की बंद मिलों और उनके मजदूरों की याद कर उनके चल रहे संघर्ष को सलाम करना चाहूंगी।         
               कभी कानपुर भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था और यहाँ पर पूरे उत्तर भारत से मजदूर काम करने आते थे और फिर यही बस गए। कहते हैं न रोजी से रोजा होता है। यहाँ पर दो एल्गिन मिल, विक्टोरिया मिल , लाल इमली , म्योर मिल , जे के कॉटन मिल , स्वदेशी कॉटन मिल , लक्ष्मी रतन कॉटन मिल , जे के जूट मिल और भी कई मिलों में हजारों मजदूर काम करते थे। रोजी रोटी के लिए कई पालिओं में काम करते थे। सिविल लाइन्स का वह इलाका मिलों के नाम ही था। रोजी रोटी के लिए यहाँ पर काम करने वाले मजदूर या बड़े पदोंपर काम करने वाले अपने गाँव से लोगों को बुला बुला कर नौकरी में लगवा देते थे। जिस समय शाम को मिल का छुट्टी या लंच का हूटर बजता था तो मजदूरों की भीड़ इस तरह से निकलती थी जैसे कि बाँध का पानी छोड़ दिया गया हो। ज्यादातर मजदूरों का प्रयास यही रहता था कि मिल के पास ही कमरा ले लें।वह समय अच्छा था - मेहनत के बाद पैसा मिलता तो था कोई उसमें बिचौलिया तो नहीं था। 

बंद पड़ी एल्गिन मिल

                            वह मिलें बंद हुई , एक एक करके सब बंद हो गयीं। वह सरकारी साजिश थी या कुछ और मजदूर सड़क पर आ गए कुछ दिन उधार लेकर खर्च करते रहे इस आशा में कि मिल फिर से खुलेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वे अपनी लड़ाई आज भी लड़ रहे हैं , कितने दुनियां छोड़ कर जा चुके हैं और कितने उस कगार पर खड़े हैं। मजदूरों की पत्नियां घरों में काम करके गुजर करने लगीं। कभी पति की कमाई पर बड़े ठाठ से रहती थीं। 
                            इन सब में लाल इमली आज भी कुछ कुछ काम कर रही है और मजदूर काम न सही मिल जाते जरूर हैं। इस उम्मीद में कि हो सकता है सरकार फिर से इन्हें शुरू कर दे. इनका कौन पुरसा हाल है।



एल्गिन मिल खंडहर हो रही है और सरकार उसकी बिल्डिंग को कई तरीके से प्रयोग कर रही है लेकिन उस बंद मिल के मजदूर आज भी क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं। कितनी सरकारें आई और गयीं लेकिन ये आज भी वैसे ही हैं। यह चित्र बयान कर रहा है कि उनके अनशन का ये 3165 वाँ दिन है।बताती चलूँ मैंने भी  इस मिल के पास सिविल लाइन्स में कुछ वर्ष गुजारे हैं। वर्ष १९८२-८३ का समय मैंने इन मजदूरों के बीच रहकर गुजारा है। तब उनके ठाठ और आज कभी गुजरती हूँ वहां से सब कुछ बदल गया है। मिलें खंडहर में बदल चुकी है ।

कभी जवान थे वक्त ने हड्डी का ढांचा बना के रख दिया
                              

         
वीरान पड़ा म्योर मिल का प्रवेश द्वार


रविवार, 26 अप्रैल 2020

अक्षय तृतीया !





                         हमारे अन्दर परोपकार की भावना का ह्रास हो रहा है और निजी स्वार्थ की भावना बलवती होती चली जा रही है . सिर्फ हम आत्मनिरीक्षण करके देखें तो इनमें से कुछ खूबियाँ हमारे अपने अन्दर ही मिल जायेंगी .   भावनाओं के चलते हुए हमारे ऋषि - मुनियों ने वर्ष में कुछ ऐसे दिन रखे हैं जिनमें हम अपने संचित से कुछ दान कर पुण्य कमाते हैं . वैसे तो जरूरतमदों की सहायता करने के लिए किसी भी तिथि या पर्व की जरूरत नहीं होती है , निस्वार्थ भाव से किया गया दान और उस दान के सुपात्र का होना सबसे बड़ा पुण्य है. 
ऐसे ही पर्वों में वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया  को अक्षय तृतीया  कहा गया है और इस दिन दान , जप - तप , हवन और तीर्थ स्थानों पर जाने का अक्षय फल देने वाला पर्व कहा गया है . 
                    ग्रीष्म ऋतु  में पड़ने वाले इस पर्व पर दान का विशेष  महत्व है लेकिन इस पर्व पर शास्त्रों में वे वस्तुएं दान योग्य बताई गयीं है जिनसे मनुष्य पशु पक्षी गरमी से प्रकोप से बच सकें . इस दिन धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग सड़क के किनारे पानी के लिए प्याऊ लगवाते हैं . पक्षियों के लिए पेड़ की डाल पर मिटटी के बर्तनों में पानी भर कर टांग दिया जाता है . ग्रीष्म ऋतु  में सर्वप्रथम आवश्यकता पानी और उसके बाद सत्तू को महत्व दिया गया है. इस तृतीया से ठीक पहले अमावस्या को सत्तू का सेवन आवश्यक माना  गया है (उनके लिए जो इस बात को मानते हों ) वैसे  बच्चे आज कल पिज़्ज़ा , बर्गर , चाउमीन को ही जानते हैं . ये देशी फ़ास्ट फ़ूड है जो सदियों से चलता चला आ रहा है . इस दिन सत्तू के दान का भी बहुत महत्व है क्योंकि सत्तू की स्वभाव ठंडा होता  है और इसको पानी शक्कर या गुड के साथ घोल कर खाने से भूख के साथ गर्मी भी शांत होती है. 
इसके अतिरिक्त छाता , चप्पल , सुराही आदि गर्मी से बचाने  वाले जितने भी साधन होते हैं विशेष रूप से दान करने का विशेष पुण्य मिलता है और पुण्य न भी मिले एक मानव होते के नाते इस भीषण गर्मी में नंगे पैर धूप  में चलने वाले को चप्पल या छाता  मिल जाए तो उसकी जान को तो एक राहत  मिलेगी और यही राहत किसी गरीब की आत्मा से निकले हुए भाव, उस दानकर्ता की मानवता को एक प्रणाम है .
                          इस अक्षय तृतीया का महत्व इसी  रूप में जाना जाता है कि इस दिन किया गया दान , जप - ताप सभी अक्षय होता है और इससे प्राप्त पुण्य भी अक्षय होता  है लेकिन समय के साथ और मानव की बढती हुई लालसा ने इसके स्वरूप को समय के अनुसार बदल लिया और आज चाहे इसे हम मार्केटिंग का एक तरीका कहें कि बड़े बड़े विज्ञापनों द्वारा जन सामान्य को इस दिन सोने की खरीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और इस दिन विशेष छूट और लाभ का लालच देकर स्वयं के लिए संग्रह करने की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहन  दिया जाने लगा है और भाव अभी वही है कि  जो इस दिन जिस वास्तु का क्रय करेगा वह भी उसके लिए अक्षय बनी रहेगी .सोना खरीदो तो वह सदैव अक्षय रहेगा लेकिन अब ये औरों के लिए नहीं बल्कि अपनी जरूरत और अपनी संपत्ति को अक्षय रखने के लिए लिया जाता है. अपनी संपत्ति या स्वर्ण आभूषणों को अक्षय अवश्य रखिये लेकिन उस धन से कुछ प्रतिशत दान के लिए भी रखा जाय तो इसका अर्थ और भाव सार्थक होता नजर आयेगा . लेकिन इस पर्व का भाव और अर्थ कल और आज बदले है लेकिन वह व्यक्ति की बढाती हुई आर्थिक उपलब्धियों के अनुसार - एक सामान्य व्यक्ति आपको दान करता मिल जाएगा लेकिन एक संपन्न व्यक्ति बड़ी बड़ी कारों में ज्वेलर्स के यहाँ आभूषण खरीदते हुए मिल जाएंगे ।
         इस बार बड़ी आफत ये है कि लॉकडाउन के कारण आम आदमी सत्तू , शक्कर और छाता दान करने में तो असमर्थ है लेकिन अमीरों के लिए ऑन लाइन सोने या जेवरात की खरीदारी करने के पूरे अवसर हैं । वह अक्षय रहेगा लेकिन सबसे बड़े पुण्य के भागीदार वे हैं जो इस समय खाना खिलाने का काम कर रहे हैं ।
             अक्षय सिर्फ पुण्य, दान और जीव सेवा ही है , भौतिक वस्तुएं अक्षय नहीं हुआ करती ।

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

विश्व पृथ्वी दिवस !



"क्षिति जल पावक गगन समीरा"
                 ये पांच तत्त्व है जिनसे मिलकर हमारा शरीर बना है , इससे ही हमारा जीवन चलता है और वापस इन्हीं में उसको विलीन हो जाना है। धरती माँ इसको ऐसे ही नहीं कहा जाता है, ये माँ की तरह से हमको पालती है लेकिन कहा जाता है न कि एक माँ अपने कई बच्चों को पाल लेती है लेकिन जैसे जैसे उसके बच्चे बढ़ते जाते हैं,  माँ की दुर्गति सुनिश्चित हो जाती है। यही तो हो रहा है न, मानव जनसंख्या बढती जा रही है और पृथ्वी का विस्तार तो नहीं हो रहा है। मानव ये भी नहीं सोच पा रहा है कि हम अपनी बढती हुई जनसंख्या के साथ कहाँ रहेंगे? उसने विकल्प खोज लिया और उसने तो बहुमंजिली इमारतें बनाने की पहल शुरू कर दी और बसने लगे बगैर ये सोचे कि इस धरा पर बोझ चाहे हम एक दूसरे के ऊपर चढ़ कर रहे या फिर अकेले बराबर बढेगा।

                  उसके गर्भ को हमने खोखला करना शुरू कर दिया। इतना दोहन किया कि भू जल स्तर बराबर नीचे जाने लगा और हमने मशीनों की शक्ति बढ़ा कर पानी और नीचे और नीचे से खींचना शुरू कर दिया। परिणाम ये हुआ कि  जब पृथ्वी के ऊपर पानी की बर्बादी बढ़ रही है तो फिर नीचे जल कहाँ से आएगा? हम अपना आज देख रहे हैं और कल जो भावी पीढ़ी का होगा उसके लिए क्या छोड़ कर जा रहे हैं? उस भविष्यवाणी , कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा, को जीवंत करने के विकल्प। उसके विषय में हम अभी भी सोचने की जरूरत नहीं समझते हैं। जो समझते हैं और इस विषय में किसी को सजग करने का प्रयास करते हैं तो ये उपदेश अपने पास ही रखें , क्या हम ही अकेले बर्बादी कर रहे है? उन्हें रोकिये जो बहा रहे हैं। ये किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है कि उसका सारा फायदा उसी को मिलने वाला है। ये शिक्षित समाज है और ऐसा नहीं है कि इन चीजों से वाकिफ नहीं है।हम  सब जानते  हैं लेकिंन जान कर अनजान बने रहते हैं और कल किसने देखा की तर्ज पर जी रहे हैं।
                     धरती कुछ नहीं कहती लेकिन क्या उसकी क्रोध की अग्नि से बढ़ता उसका तापमान हमारे लिए घातक नहीं बनता जा रहा है। तप्त पृथ्वी की ज्वाला ने मौसम के क्रम को बिगाड़ कर रख दिया है और इसी लिए ये साल के दस महीने में तपती ही रहती है। अब तो इतनी भी बारिश नहीं होती कि उसका आँचल भीग जाये और उसको तपन शांत हो जाए। नदियाँ अपने किनारे छोड़ने लगी हैं और कुछ तो विलुप्त होने की कगार पर आ गयी हैं।
                  भूकंप आया तो हम सिहर गए, उसके वैज्ञानिक कारणों की खोज में लग गए किन्तु खुद को तब भी नहीं संभाल पाए। धरती का संतुलन नहीं बनेगा तो भूकंप आना सुनिश्चित है। समुद्र में सुनामी आई और मानव उस समय खिलौने की तरह बह गए लेकिन जो बह गया वह उसकी नियति थी हम बच गए और हम इससे कुछ सीख भी नहीं पाए । फिर अपने ढर्रे पर चलने लगे।
                        जब उर्वरक नहीं आये थे , तब भी ये धरती सोना उगलती थी और फसलें लहलहाती थी। सब का पेट भी भरती थी। हम उन्नत उपज की चाह में उर्वरकों को ले आये और धरती को बंजर बना दिया। क्या मिला? फसल खूब होने लगी लेकिन खड़ी फसल में बेमौसम की आंधी, बरसात और ओले की वृष्टि ने सब कुछ तबाह कर अपने साथ हो रहे खिलवाड़ का एक सबक दे दिया। उर्वरकों से उगी फसल खाकर हम कैंसर जैसी बीमारी के शिकार होने लगे ।
                     जंगल पर जंगल उजड़ते जा रहे हैं और कागजों में सारी सुरक्षा बनी हुई है। वृक्षारोपण के नाम पर बहुत काम हो रहा है, लेकिन एक बार लगाने के बाद कितने बचे इसकी किसी को चिंता नहीं है। कहाँ से शुद्ध वायु और वर्षा की उम्मीद करें? पेड़ लगाने की भी सोची जाती है तो वह जिसे बाद में बेच कर धन कमाया जा सके। यूकेलिप्टस  जैसे पेड़ जो पानी भी सोखते हैं और इंसान के लिए लगे हुए न छाया देते है और न ही फल।
              अपनी कमियों का बखान बहुत हो चुका है अब अगर हम स्वयं संयमित होकर अपना जीवन बिताने की सोचें तो शायद इस धरती माँ को बचाने की दृष्टि में एक कदम बढ़ा सकते हैं। हम किसी को उपदेश क्यों दें? हम सिर्फ अपने लिए सोचें और अगर कोई पूछे तो उसको भी बता दें की अगर आप ऐसा करें तो हमारे और हमारी भावी पीढ़ी के भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा।
                    जल का प्रयोग अपनी जरूरत के अनुसार ही करें। अगर सबमर्सिबिल  लगा ही रखा है तो उसका सदुपयोग करें न कि दुरूपयोग करते हुए उससे घर की दीवारें और सड़क धोने में उसको बर्बाद करें। घर के सभी नलों को सावधानी से बंद रखें उनसे टपकता हुआ पानी भी बर्बादी की ही निशानी है। जल ही जीवन है इस बात को हमेशा याद रखें।
                  प्रदूषण की दृष्टि से भी पृथ्वी को सुरक्षित रखना होगा। हमारी आर्थिक सम्पन्नता बढती चली जा रही है और वह इस बात से दिखाई देती है कि घर के हर सदस्य के पास गाड़ी का होना। उससे उत्सर्जित होने वाली गैस के बारे में किसी ने नहीं सोचा है कि ये पर्यावरण को कितना विषैला बना रहा है। वायु प्रदूषण हमको रोगी और अल्पायु बना रहा है। बढती हुई गाड़ियों की संख्या से ध्वनि प्रदूषण को नाकारा नहीं जा सकता है। इस लिए गाड़ियों का उपयोग करने में सावधानी बरतें । एक गाड़ी में दो लोगों का काम चल सकता है तो उसको उसी तरह से प्रयोग करें।एक घर में कई कई एसी का होना कितने प्रदूषण का कारण बन रहा है ? लोग नहीं जानते ऐसा नहीं है बल्कि अपने जीवन स्तर को ऊँचा  दिखाने के लिए भी ऐसा किया जा रहा है।
                   वृक्ष पृथ्वी का श्रंगार भी हैं तो उनको अगर रोपें तो उनको बड़ा होने तक देखें भी, ताकि ये पृथ्वी पुनः हरी भरी हो सकें। आने वाली पीढ़ी को कुछ सिखायें और खुद अपनी बताई बातों पर चलें भी ।
                     पृथ्वी दिवस को सार्थक बनायें।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

ब्लॉगिंग : कल , आज और कल !

ब्लॉगिंग : कल , आज और कल !


                       जैसे किसी चीज का आरम्भ मंदिम गति से होता है और फिर वह एक चरम पर पहुँच जाता है और फिर अवसान, लेकिन ये ब्लॉगिंग कोई ऐसी कला नहीं है कि जिसको बिना किसी के चाहे अवसान हो जाये। जब  नया नया कंप्यूटर के साथ अंतरजाल शुरू हुआ तो ब्लॉगिंग भी अपने अस्तित्व में आयी।  सबसे पहले ब्लॉग का श्रेय आलोक कुमार जी को जाता है।   2003 में "नौ दो ग्यारह " नाम से ब्लॉग बनाया था लेकिन यूआरएल की समस्या के चलते उन्होंने अंकों( 9211 में) अपना ब्लॉग को पता दिया था।   धीरे धीरे लोगों ने खोज की और ब्लॉगर के संख्या में वृद्धि होने लगी। प्रारंभिक दिनों में ये कुछ धीमी ही रही लेकिन 2007 - 2008 तक ब्लॉगर की संख्या हजारों में पहुँच चुकी थी।
                       हम उसे ब्लॉगिंग का स्वर्णिम काल भी कह सकते हैं।  सारा सारा दिन ब्लॉग ही लिखे और पढ़े जाते थे।  पढ़ने की सूचना उसे समय ऑरकुट पर मिला करती थी।  साथी मित्र सूचना देते थे कि ये लिखा है जरा पढ़ो और राय दें।  ये मैं महिलाओं की बात कर रही हूँ क्योंकि तब एग्रीग्रेटर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। एक एक   पोस्ट पर बहस का जो माहौल बनता था तो लगता था कि युद्ध हो जाएगा।  हम उस बहसबाजी में कम  ही पड़ते थे, लेकिन पढ़ सब को लेते थे क्योंकि हम पूरे समय बारे ब्लॉगर नहीं थे।  सिर्फ ऑफिस में ही वह भी खाली वक्त में होता था।  अपना डेस्कटॉप था तो कोई समस्या  नहीं थी।  घर में न लैपटॉप था और न तब स्मार्ट फ़ोन का जमाना था यानि कि इतने सामान्य लोगों के पास मोबाइल होते भी थे तो वही छोटे वाले।  सो घर पर देखने या देख पाने की कोई गुंजाईश भी नहीं रह जाती थी।  वापस दूसरे दिन जाकर ऑफिस में जाकर ही होता था दर्शन।  फिर भी बहुत लिखा जाता था सब लिखते थे और हम भी लिखते जरूर थे।  मैंने वर्ष 2008 में ब्लॉग बनाया था और उसको भी हमारी सखियों ने एक एक चरण पर काम करना सिखाया था।  ढेर सारे ब्लॉग खुद बना डाले थे।  हर काम के लिए अलग अलग ब्लॉग।  कविता , कहानियों , सामाजिक सरोकार , निजी राय और जीवन के कटु यथार्थ को बयान करने वाली घटनाओं के लिए।  बाद में सभी को चलाती रही और अभी भी सब जीवित हैं और उन पर लेख जाते रहे।  2009 -2012 तक खूब जम कर लिखा।  2010 में लैपटॉप लिया क्योंकि  अगस्त के महीने में मेरा एक्सीडेंट हुआ हाथ और पेर दोनों ही दुर्घटनाग्रस्त हुए।  न चलना संभव था और न हाथ से टाइप करना।  एक टाइपिस्ट को दो घंटे के लिए बुला लेती और मैं बोलती जाती और वह टाइप करती जाती।  वह वर्ष था जब कि मैं बिस्तर  पर थी और  ब्लॉग में सबसे ज्यादा रचनाएँ प्रकाशित हुई थी।
                             वह सभी के लिए सक्रियता वाला वर्ष था।  करीब करीब तीन हजार ब्लॉगर उस समय सक्रिय थे।  ब्लॉगिंग का स्वर्णकाल था।  इसके साथ ही फेसबुक अस्तित्व में आई और फिर उस पर धड़ाधड़ अकाउंट बनाने शुरू हो गए और लोगों ने उस पर भी अपने विचारों लोगों को  संक्षिप्त रूप में डालना ज्यादा सुविधाजनक लगा और ब्लॉग पर लिखने के स्थान पर लोगों ने फेसबुक को अच्छा मंच समझा और यहाँ शिफ्ट हो गए।  ऐसा नहीं कि ब्लॉगिंग बिलकुल ख़त्म हो गयी लिखने वाले ईमानदार ब्लॉगर उसपर लिखते रहे और फेसबुक पर भी डालते रहे।  मैं खुद अपनी कहूँ कि इस बीच एक पत्र से जुड़कर आलेख, कहानी और कवितायेँ वहां भेजनी शुरू कर दी और गलती ये की कि उनको ब्लॉग पर नहीं डाला।
                            इस बीच एक काम और होने लगा कुछ महत्वकांक्षी ब्लॉगर साथियों ने अपने मित्रों से लेकर साझा कविता संग्रह , कहानी संग्रह , लघुकथा  संग्रह का संपादन करना शुरू कर दिया।  ये काम भी अच्छा लगा क्योंकि ब्लॉग की दुनिया ब्लॉगर तक ही सीमित होती थी।  उससे इतर लोग उसमें काम ही पढ़ने आते थे लेकिन किताब के प्रकाशन में उसके अतिरिक्त भी लोगों को पढ़ने और लिखने का मौका मिलने लगा और फिर होड़ लग गयी।  साल में कई कई संग्रह आने लगे।  जिसने रचनाएँ माँगी दे दीं और जितने पैसे माँगे दे दिए।  किताब छप गई और मिल गयी।  इसी बीच मुलाकात हुई वरिष्ठ ब्लॉगर से उनको मैंने एक साझा संग्रह दिया तो उन्होंने ज्ञान दिया कि अपनी रचनाएं भी देती हैं , पैसे  भी देती हैं  और फिर मुफ़्त में किताब बाँटी भी।  क्या मिला ? इस काम को बंद कर दीजिये।  कुछ अक्ल आ गयी लेकिन फिर बहुत आत्मीय और करीबी लोगों ने अगर रचनाएँ मांगी तो दीं और पैसे भी।  किताब भी आयीं लेकिन वो संतुष्टि नहीं मिली।
                            फिर से ब्लॉगिंग शुरू करने का विचार ठांठे मारने लगा। ब्लॉगर साथियों से मित्रता तो आजीवन की हो चुकी थी।  वे फेसबुक पर भी मिले तो आभासी मित्र से न लगे और उन्हीं  ने राय दी कि कितनी सारी परिचर्चाएं आयोजित की थीं उनको संग्रह के रूप में छपवा डालो और वैसा ही किया।  हाँ सहयोग राशि  जो कटु अनुभव था सो मैंने वह काम नहीं किया।  संस्मरण सब से लिए। कुछ और नए लोगों को भी शामिल कर लिया। जब पुस्तक छप कर आ गयी तो फिर तय किया कि गृह नगर के स्थान पर दिल्ली में ब्लॉगर साथी ज्यादा हैं तो उनकी किताब उन सबके बीच ही विमोचन रखा जाय और सिर्फ विमोचन ही नहीं बल्कि "ब्लॉगिंग : कल , आज और कल" पर परिचर्चा भी रखी गयी सभी वरिष्ठ ब्लॉगर साथियों ने भरपूर सहयोग दिया और जो विचारों का आदान प्रदान हुआ उससे ब्लॉगिंग के लिए एक नयी आशा का संचार हुआ और वहां पर सब ने फिर से ब्लॉगिंग के लिए समर्पित प्रयास करने का वचन दिया और उसको पूरा करने के लिए जुट गए।  अब हम आज गंभीर होकर कल को संवारेंगे।  अभी हमें आने वाली पीढ़ी को भी इस ब्लॉगिंग से जोड़ना है और हर लिखने वाला जो मेरे संपर्क में है अभी तक ब्लॉगर तो नहीं है लेकिन प्रतिबद्ध है।  कल जरूर सुनहरा होगा ऐसी आशा करती हूँ।
                          आने वाला कल तभी सफल होगा जब हम लिखने के साथ साथ पढ़ेंगे भी।  ब्लॉग सिर्फ लिखने के लिए नहीं होता है बल्कि पढ़ने के लिए भी होता है।  हर लेख , कहानी , कविता कुछ कहती है और हमें ज्ञान के रूप में हमारे संवेदनशील मन को कुछ दे जाती है।  कल को सवाँरने में कल और आज के साथी आने वाले कल की भूमिका बनाएंगे और नयी पौध को तैयार करेंगे तभी इस को हम अमर कर सकेंगे.
                             
                   फिर लगा कि फेसबुक , पेपर या कहीं और लिख कर हम डाल तो सकते हैं , प्रकाशन और पैसे भी मिलते हैं लेकिन ब्लॉगिंग अपनी एक निजी संपत्ति है, जिसको जब चाहे तब आप देख और पढ़ सकते हैं।  कोई खोज नहीं और कोई संकोच नहीं।  फिर वापस ब्लॉगिंग को  जारी रखने के बारे में विचार आया तो  जुट गये और नए नए विषयों पर लिखने की सोची है।  आगे हरि इच्छा।