मेरा सरोकार

ये मेरा सरोकार है, इस समाज , देश और विश्व के साथ . जब भी और जहाँ भी ये अनुभव होता है कि इसको तो सबसे बांटने और पूछने का विषय है, सब में बाँट लेने से कुछ और ही परिणाम और हल मिल जाते हैं. एकस्वस्थ्य समाज कि परंपरा को निरंतर चलाते रहने में एक कण का क्या उपयोग हो सकता है ? ये तो मैं नहीं जानती लेकिन चुप नहीं रहा जा सकता है.

शनिवार, 23 जुलाई 2011

सी बी आई की उपयोगिता !

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अपने रोज रोज के खुलते जा रहे काले कारनामो के तले दबी हमारी केंद्र सरकार अपनी बौखलाहट निकालने की सोच रही थी । कई ...
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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

गर्मियों की छुट्टिय और अपना बचपन (२२)

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घर , परिवार और सामाजिक दायित्वों के बोझ तले दब कर कलम भी रुक गयी और फिर हमारी ये संस्मरणों कि यात्रा भी पड़ाव के लिए मजबूर हो गयी. ये तो सब ...
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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

सांप्रदायिक हिंसा निषेध बिल

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हमें गर्व है कि हम एक स्वतन्त्र भारत और धर्मनिरपेक्ष भारत के निवासी हैं. हमारे संविधान में किसी भी धर्म या आस्था को लेकर भेदभाव न करने की ...
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शनिवार, 9 जुलाई 2011

Share keejiye.

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mujhe isa bare men koi khas janakari nahin hai lekin phir bhi mere mitra Arun Kumar Jha dvara mujhe bheji gayi ...
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सोमवार, 4 जुलाई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (२१)

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कौन नहीं चाहता है की फिर से अपने बचपन में झांक लें लेकिन कहाँ जिन्दगी इतनी रफ्तार से भागी चली जा रही है की पलट कर द...
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गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (२०)

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मेरा सरोकार की ये सौवीं पोस्ट जा रही है आप सबके पास , हमारी इस श्रृंखला ने इसको बढ़ाने में बहुतमदद की। वैसे तो इस पर अनीता कुमार जी आह रही ...
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मंगलवार, 28 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१९)

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आज मैं उस शख्स के संस्मरण आपके सामने पेश कर रही हूँ , जिससे मुझे शुरू से डर लगता रहा , क्यों ? मैं खुद नहीं जानती कहीं ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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