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सोमवार, 4 जुलाई 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (२१)


कौन नहीं चाहता है की फिर से अपने बचपन में झांक लें लेकिन कहाँ जिन्दगी इतनी रफ्तार से भागी चली जा रही है कीपलट कर देखने की फुरसत कहाँ है? आज के काम निपट गए तो रात में सोने से पहले ही कल की रूपरेखा तैयार कर लेतेहैं। लेकिन मैंने न सबको मजबूर कर दिया की चलिए अपने बचपन में झांकिए और फिर सोच कर मुस्करा लीजिएअपनी शरारतें और अपनी कारस्तानियों को फिर से आईने में देखा तो खुद को लगता है की हम ऐसा करते थे। लेकिनफिर भी प्यारा लगता है कितने बचपन के चरित्र बिछुड़ गए और इतिहास में सिमट गए लेकिन एक क्षण के लिएलिखते समय याद बहुत आये।
उन्हीं यादों को समेटे खड़ी हैं अनीता कुमार जी।

अनीता कुमार :




वो बचपन की यादें ........


बहुत दिन के बाद ब्लॉग पर आई हूँ और आपका संस्मरण पढ़ कर मजा आह गया । वो कहते हैं न कि खरबूजेको देख कर खरबूजा रंग बदलता है वैसे ही संस्मरण पढ़ कर यादों का काफिला चल निकला तो सोचा कि इसको मंजिल तक पहुंचा ही दूं सो ये आपके लिए........
सबके संस्मरण पढ़ते हुए एक बात मेरे दिमाग में ये कौंधी थी कि गर्मियों की छुट्टी में सभी गाँव की ओर कूच करते थे और देहात की प्राकृतिक सम्पदा का मजा लूटते थे। हम इस मामले में गरीब ही रहे , शहरी जो ठहरे। फिर भी गर्मी की छुट्टियाँ हमारे लिए कुछ काम रोमांचक न होती थीं। हर गर्मियों की छुट्टी में दो ही जगह जाना होता था या तो दिल्ली (ददिहाल) या फिर मुरादाबाद (नौनिहाल) दोनों ही जगह के अपने मजे थे।
मुरादाबाद में मेरे नाना का सिनेमा हाल था और घर और सिनेमा हॉल के बीच में एक छोटा सा मैदान था। गाना शुरू होता तो आवाज घर तक आती थी। सिनेमा हाल में नाना जी ने एक कमरा सिर्फ अपने परिवार के लिए बनवाया हुआ था। जिसमें बड़ा सा सोफा झूले के रूप में लगा हुआ था। इधर पिक्चर शुरू हुई और उधर हम नाश्ता पानी सब छोड़ कर भागे चले जाते थे। कभी फैमिली बॉक्स में झूले पर बैठ कर और कभी प्रोजेक्टर रूम में ओपेरटर की नाक में दम करके पिक्चर देखा करते थे। मुरादाबाद छोटा शहर था एक ही सड़क पर ५ थियेटर थे।
सभी थियेटरों में हमें विशेषाधिकार प्राप्त थे। पांच छः बरस के रहे होंगे. एक लेमन वाला (मेरा मतलब सिर्फ कोल्ड ड्रिंक ही बेचा करता था) जिसकी दुकान नाना के सिनेमा हाल के पास थी. घर आता था और मेरी जिद पर अपने साथ ले जाता था. एक हाथ गाड़ी और उसपर बोरी से ढकी रखी बर्फ की सिल्ली और उस पर बैठ कर मैं पूरे शहर का नजारा देखा करती थी.उसी के साथ जाकर पहली बार बर्फ बनाने की फैक्टरी देखी. उस अँधेरे कमरे में ऊँचाई से गिरती पानी की रिमझिम बूँदें आज भी जेहन में ताजा हैं. मेरी नानी जैसे पराठे तो कोई बना ही नहीं सकता था. जिस दिन घर में मांस बनता हम बच्चों के लिए बड़ा रोमांचक होता था. नानी शुद्ध शाकाहारी, नाना मीट बनाने का काम करते थे. वो भी रसोई के बाहर - उन्हें एक अंगीठी जला कर दे दी जाती थी. और जब वे मसाले माँगते तो नानी उन्हें मसालादानी में हाथ नहीं लगाने देती और हम बच्चों से मसाले की कागज की पुडिया बनाकर भेजी जाती. नानी और नाना के शाकाहारी और मांसाहारी होने की तनातनी देखने में बड़ा मजा आता था.
हर साल गर्मियों की छुट्टी में दिल्ली जाना तय था. अलीगढ से दिल्ली पापा के चाचा के घर जाने के लिए हम छुट्टियाँ होते ही पीछे पद जाते. हमारा ददिहाल वही था. जैसे ही हमारा स्कूटर कोठी के गेट पर रुकता शशि दीदी जल्दी से नीचे उतर कर आती और हमें बाँहों में भर लेती. शशि दीदी यूँ तो पापा की चचेरी बहन थीं लेकिन वे हमारी हमउम्र थीं. उनका छोटा भाई राहुल जिसे हम आज भी काके कहकर बुलाते हैं गजब का उधमी था. उसका जोड़ मेरे छोटे भाई के साथ था. रात को बिस्तर छत पर लगते थे और छत पर पानी डाल कर उसको ठंडा करना मुझे बहुत अच्छा लगता था. रात में जिद करके हम और शशि दीदी एक ही बिस्तर पर सोते थे. देर रात तक हम लोग न जाने क्या खुसुर पुसुर किया करते थे और बीच बीच में चाची की आवाज सुनाई देती अब सो जाओ सुबह सैर को जाना है. सुबह उठते ही हम बच्चे और घर के मर्द पांच बजे अजमल खां रोड की ओर चल पड़ते थे. इतबार को दुकान बंद रहती थी सो उस दिन नाश्ता छोले और पूरी का होता था. हम बच्चों को भेजा जाता था स्टैण्डर्ड की दुकान से छोले और पूरी और दही लाने के लिए.घर पहुँचाने तक हम बच्चे दही के ऊपर की मोटी मलाई चट कर चुके होते थे. दोपहर से फेरी वाले फेरी लगाने लगते और मजाल है की कोई फेरी वाला हमारे घर रुके बिना चला जाए -- फालसे, उबली हुई मसालेदार छल्ली, और न जाने क्या क्या? गर्मियों के दिन होते - दिल्ली में ये रिवाज था की सभी गृहणियां तंदूर पर रोटी लगवाने भिजवा देती. शाम पड़ते ही मैं और दीदी परत में आता गीले कपड़े से और फिर थाली से ढाका हुआ लेकर तंदूर पर रोटी लगवाने के लिए लेकर जाते. वहाँ बहुत भीड़ होती थी ज्यादातर बच्चे ही आते थे आता लेकर. फिर क्या था की तंदूर वाले को बता कर की कितनी रोटी बनानी और हम झूले पर चढ़ जाते और तब तक झूलते रहते जब तक की तंदूर वाला आवाज न दे की अपनी रोटियां ले जाओ. लाल बहादुर शास्त्री का जमाना था. देश में अज्ज की किल्लत थी. शास्त्री जी के कहे अनुसार रविवार की रात को खाना नहीं बनता था. घर के बड़े लोग एक वक्त का फाका करते थे लेकिन बच्चे कब मनाने वाले थे सो बच्चों के लिए ढेर सारे फल ,चाट पकौड़ियों का इंतजाम किया जाता था.
शाम को खाना खाने के बाद सब बैठक में बैठ कर गपियाते थे. मेरी मम्मी चाचा जी के सामने घूंघट किये रहती थी. अगर चाचा जी कमरे में होते तो बहुत धीमी आवाज में बोला करती थी. चाची जी अक्सर कहा करती थी की निर्मला छड परे हुन ए घूंघट वूंघट पर मम्मी उनकी बात टाल जाया करती थीं. हम सब बच्चों के लिए मम्मी का घूंघट खींचना एक खेल हो जाता था. जब हम ज्यादा परेशान करते तो चाचा जी खुद उठ कर छत पर सोने चले जाया करते थे. मेरे पापा के छोटे चाचा भी उसी मकान के ऊपरी हिस्से में रहते थे. उनकी पत्नी मलयाली थी ( हाँ पचास के दशक में उनके चाचा ने लव मैरिज की थी.) छोटी चाची हम सब बच्चों की सबसे चहेती आंटी थी - अनीता आंटी. मुझे उनका नाम इतना पसंद था की मैंने जिद की की मेरा नाम भी अनीता होना चाहिए मुझे क्या पता था की नियति अपना खेल खेल रही है और आज मैं भी एक मलयाली की पत्नी हूँ. अनीता आंटी के घुंघराले बाल चाँदी सा रंग और सुरीला गला आज भी मेरे जेहन में उतना ही ताजा है जितना की उस समय हुआ करता था. उनके हाथों का बन राइ और जीरे के तड़के वाला आम का अचार का स्वाद आज भी मेरी जिव्हा पर है. और मैं कभी वैसा अचार नहीं बन पायी. इतवार के दिन हमारे घर सुबह से ही लोगों के आने का तांता शुरू हो जाता . हमारे छोटे चाचा सत्संग के लिए मशहूर थे. हम सबको हिदायत रहती की दो घंटे किसी की हंसी की आवाज नहीं निकालनी चाहिए. हम हाल में बैठे सत्संग के अंत में अनीता चाची के भजनों में इतना डूब जाते की शैतानी का सवाल ही नहीं उठता था. इतवार छोड़ कर बाकी सब दिन हम बच्चों का घर पर राज रहता था. बरामदे में एक तरफ एक हौज में हैंडपंप लगा हुआ था. नहाने के नाम पर हम बच्चे हौज की नाली में कपड़ा फंसा कर बारी बारी से हैंडपंप चला कर हौज को पानी से भर लेते और फिर उसमें नहाने में स्विमिंग पूल की कमी न लगती. बड़ी चाची हमें झूठा गुस्सा दिखा कर जब एक डेढ़ घंटे तक बाहर आने के लिए कहती रहती और हम उनकी बात न सुनते तो वे हमें धमकी देती की फिर जब उनको लगता की ये नहीं मानेगे तो आखिरी हथियार फेंका जाता की मैं अभी ऊपर से अनीता चाची को बुलाती हूँ. हम अनीता चाची से जितना प्यार करते थे उतना डरते भी थे.वे मरती नहीं थी लेकिन कह देती की ऊपर नहीं आना और अगर हम ऊपर नहीं जायेंगे तो फिर गाना कैसे सुनेंगे और केरल के किस्से कैसे सुनेंगे? और उनके हाथ का डोसा कैसे छोड़ देते सो हम एक एक करके बाहर आ जाते. बरामदे के दूसरे तरफ सीमेंट का डिब्बा बन हुआ था वो शायद कचरे के लिए बनाया गया था. हम उस पर खड़े होकर दूर गंदे नाले के ऊपर से जाती हुई रेलगाड़ी देखा करते थे. बचपन में हम सब बच्चों को गंदे नाले की तरफ जाने की मनाही थी. नाला भी एक नहर जितना बड़ा था. उस गंदे नाले के उस पार कौन लोग रहते हैं इस रहस्य को न तब किसी ने खोला और न आज तक हमें पता चल पाया. अजीब अजीब कल्पनाएँ मन में उठती थीं. नाले की विशालता देख कर हमारा बाल मन भयभीत हो जाया करता था. दोपहर को गेंद , गोते और कैरम खेलते और शाम को चाट पकौड़ी उड़ाते महिना कब गुजर जाता हमें पता ही नहीं लगता था. हमारे वापस जाने के दिन आ जाते और हमारे साथ सभी लोग उदास हो जाते . चाची हमारे साथ ढेरों समान बांध देती.
एक बार शशि दीदी ने जिद पकड़ ली की वे भी हमारे साथ अलीगढ जायेंगी. चाचा जी ने बहुत समझाया की तुम कभी घर से दूर नहीं रही हो तुम नहीं रह सकोगी. (हमारे अलीगढ के किराये के मकान और कोठी में बहुत अंतर था. ) पर हमारे साथ कुछ और दिन बिताने के लालच में वे बोली की मैं एडजस्ट कर लूंगी हम लोग अलीगढ आ गए . अलीगढ में हमारा मकान पहले माले पर था. दो कमरे और बीच में बड़ा सा आँगन आगन के दूसरे छोर पर टायलेट . सुबह जब उनको जाना था तो वे उसको देख कर डर गयी क्योंकि दिल्ली में तो पाश्चात्य टाइप का टायलेट था और अलीगढ में ऊपर के माले पर टायलेट के नाम पर एक छेद था और ग्राउंड फ्लोर पर एक छोटे से पतले से कमरे में एक बड़ा सा घड़ा रखा होता था. ग्राउंड फ्लोर के कमरे का दरवाजा गाली में खुलता था. और मेहतर हाथगाड़ी में मैला खाली करके ले जाते थे. लेकिन जब कोई उस शौच को इस्तेमाल करता था तो नीचे घड़े से इतनी जोर की आवाज आती थी जैसे कोई बम फूट रहा हो. शशि दीदी ने उसी दिन वापसी की गाड़ी पकड़ ली. ) ही ही ही ही ..........
ये यादें तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं और मुझे तो कहीं न कहीं रुकना ही है न.................

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (२०)

मेरा सरोकार की ये सौवीं पोस्ट जा रही है आप सबके पास , हमारी इस श्रृंखला ने इसको बढ़ाने में बहुतमदद की। वैसे तो इस पर अनीता कुमार जी आह रही थी लेकिन कुछ तकनीकी गड़बड़ी के कारण उनकी पोस्ट हमआपको बाद में देते हैं तो फिर आज मिलते हैं वाणी गीत जी से।





वाणी गीत :

शरारत मंहगी पड़ी


स्कूली बच्चों के लिए ग्रीष्म ऋतु का बड़ा आकर्षण स्कूल की लम्बी छुट्टियाँ हुआ करती है . ना सुबहजल्दी स्कूल जाने की किचकिच ,ना होम वर्क की टेंशन . खूब सारा खेलना ,टी वी देखना , कंप्यूटर पर गेम खेलना . भरीदुपहरी में कूलर या ए.सी. की ठंडी हवा में कलेजे तक ठंडी कुल्फियों के साथ आम ,खरबूजे और तरबूज के स्वाद का लुत्फ़फिर भी बच्चे और बड़े शिकायत करते मिल जायेंगे , उफ़ , कितनी गर्मी है .
हमलोगों के बचपन के उन दिनों में कूलर और ए. सी. हर घर की शोभा नहीं होते थे , ना ही टीवी और कंप्यूटर , ना कोईहौबी क्लास जाने की आवश्यकता और ना ही छुट्टियाँ मनाने हिल स्टशन जाने की रवायत ही थी .भरी गर्मी में पसीने सेतर खेलते रहने के कारण पूरे शरीर में अलाईओं के दाने से बेपरवाह बच्चों के लिए छुट्टियों में नानी या दादी का घर हीकिसी पर्वतीय स्थल से भी बड़ा आकर्षण हुआ करता था ...बच्चे पूछ लेते हैं कई बार , जब इतना कुछ नहीं होता था तोआप लोंग छुट्टियों में करते क्या थे . सोचा मैंने भी कि ढेर सारा खेलने के बाद भी गर्मी की दुपहरियां कितनी बड़ी लगतीथी .आज कल बच्चों से से पूछ लो तो झट कह देंगे ." दिन कितनी जल्दी दिन बीत जाता है ".
हमारी गर्मी की छुट्टियाँ बिहार , राजस्थान और आंध्रा के बीच झूलती रहती थी .भरी दुपहरी में माँ या दादी /नानी केआँख लगते ही चुपके से दरवाजे खोल कर निकल जाना और मित्र मंडली के साथ कॉलोनी के आम के पेड़ों से कच्चीअमिया तोड़ कर उन पर कई तरह के एक्सपेरिमेंट करना , कभी पना बना कर तो कभी पतली फांकों पर नमक लगा करचटखारे लेना , दांत खट्टे हो रहे हैं अभी तो सोच कर. कभी फालसे , शहतूत के पेड़ों के नीचे डेरा जमाना . राजस्थान मेंनानी के घर छुटियाँ बिताने जाते तो छाछ- राबड़ी छक कर बेरों की झाड़ियाँ हमारा निशाना बनती थी . राजस्थान में दिनकी भयंकर गर्मी में रेत जितनी तपती है , रात में उतनी ही ठंडी हो जाती है . ठंडी रातों में देर तक रेत के लड्डू या घरबनाने में महारत हासिल करते कौन किसी इन्जिनीअर से कम समझते रहे होंगे .
वहीं बिहार में कॉलोनी के बीचों बीच बना मिल मालिक के बंगले में लगे सुन्दर फूलों और फलों के पौधे /पेड हमें बहुतलुभाते थे ,जिसके गेट पर खड़ा सिक्योरिटी गार्ड हमें हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नजर आता था . सायं- सांय करतीसुनसान दुपहरियों में जब सब बड़े मीठी नींद के झोंके ले रहे होते , हम हैरान होते कि इन गार्ड्स को नींद क्यों नहीं आती . जरा उसकी आँख चुके तो घुस जाएँ बंगले में , और हनुमान जी के समान अशोक वाटिका के फूलों और फलों का सौन्दर्यआँखों और जीभ तक गटक लें . इन दुपहरियों में सारे बच्चे मिलकर कभी गुड्डे- गुड़ियों की शादी रचाते तो कभीरामलीला का नाटक खेलते. अब नहीं दिखते हैं कभी भी बच्चे इस तरह खेलते .
एक दुपहरी में भी ऐसे ही आँख बचाकर निकले घर से फालसों के पेड़ों को निशाना बनाने . छोटी चंचल बहन भी साथ थी . एक पेड के नीचे काला कुत्ता सुस्ता रहा था . छुटकी ने आव देखा ना ताव , घर के बाहर लगी हेज़ से तोड़ी एक डाल औरउसके कान में घुसा दी . कुत्ते को अपनी नींद में व्यवधान बर्दाश्त नहीं हुआ , उसने छुटकी के पंजे में अपने पूरे दांत गडादिए . हम छोटे बच्चों का उस कुत्ते से उसका हाथ छुडाना बड़ा मुश्किल हो गया . छुटकी के रोने और हमारे चीखने कीआवाज़ सुन कर गार्ड दौड़ा और बड़ी मुश्किल से उसका हाथ छुड़ाया , मगर जब तक कुत्ते महाशय उसकी हथेली में चारदांत आर- पार कर चुके थे और दर्द और दहशत से छुटकी बेहोश हो चुकी थी . हमारा दुश्मन देवदूत ही नजर आ रहा थाउस समय . जल्दी से मम्मी और पापा को खबर की . उन दिनों उस छोटे कस्बे में चिकित्सा सुविधाएँ इतनी नहीं थी , फटाफट हलकी ड्रेसिंग कर छुटकी को गाडी में लेकर पास के बड़े कस्बे में डॉक्टर के पास ले जाया गया .उस दिन माँ सेपड़े चांटे और भगवान् के सामने मत्था टेकती छुटकी के ठीक हो जाने की फ़रियाद करती माँ आज भी अच्छी तरह याद हैछुटकी के पेट में चौदह बड़े इंजेक्शन और उसके लिए अपने आपको कुसूरवार मानते हम भाई -बहन , नतीजन कुछदिनों तक डरते सहमते गर्मी की छुटियाँ घर में कैद हो कर बिताने को मजबूर होना पड़ा .
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मंगलवार, 28 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१९)

आज मैं उस शख्स के संस्मरण आपके सामने पेश कर रही हूँ, जिससे मुझे शुरू से डर लगता रहा, क्यों? मैं खुद नहीं जानती कहीं और इनकी गुस्से वाली टिप्पणी पढ़ी होगी । बहरहाल मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं अरविन्द जी से अपने अनुरोध के बारे में कहती लेकिन फिर हिम्मत जुटाई और उनको अनुरोध लिख डाला। मुझे बहुत ख़ुशीहुई कि अगली ही पोस्ट से अरविन्द जी ने मुझे अपने संस्मरण भेज दिए। अब डर दूर। और आपके नजर है ये कड़ी: डॉ अरविन्द मिश्र रेखा जी, आपने तो मानो किसी टाईम मशीन में बैठने को कह दिया हो जो बचपन केदिनों की गर्मी की छुट्टियों के किसी मौके पर ननिहाल में लैंड करने वाली हो ....अब भला ननिहाल से बेहतर गर्मी कीछुट्टियां कहाँ बितायी जा सकती हैं -खूब जी भर के शैतानी और उधम करो मगर कोई डांटने वाला नहीं ...चहुँ ओर स्नेहऔर वात्सल्य का वातावरण ...ऐसे में शैतानी को तो कल्पना के पंख लग जाने ही थे....मेरा ननिहाल जौनपुर जिले केपास आज भी अचर्चित से गाँव आमदहां में है ...और आज से ४०-४५ वर्ष पहले वह किसी चम्बल के बीहड़ से कम न थाऊंचे ऊंचे टीले ,नीचे तरह तरह की झाड़ियाँ - वनस्पतियाँ और उनसे निकल कर स्वच्छंद विचरण करते जंगली जीवजंतु ...शेर बाघ भले ही वहां उस समय नहीं थे शायद (क्योकि हमें तो दिखे नहीं ) मगर बिलावों की कई प्रजातियाँ ,साहीहिरन लकडबग्घा ,सियार ,लोमड़ी आदि तो खूब दिख जाती थी, वनौषधियों की तो जमात ही थी जिनकी पहचान मैंकाफी बाद में कर पाया ...आज भी ऐसे परिक्षेत्र को हमारे यहाँ बोल चाल की भाषा में नार खोर(ravines -बीहड़ ) कहते हैंमैं बच्चों की एक भीड़ की अगुआई करते हुए बिना नाना नानी या मामा मामी को बताये घर के पिछवाड़े तक आ धमकेउसी उसी नार खोर में चल पड़ते थे-काफी देर लुका छिपी ,मटरगश्ती ,छोटे जानवरों की धर पकड़ और जंगली फूलों ,फलोंको चुनने का काम होता और थक हार कर यह टीम दोपहर होते होते खाने के वक्त वापस आ जाती ..आज मैं सोचता हूँ वहसब किसी दुस्साहस से कम नहीं था ...अगर भेडिया और लकडबग्घा का कोई भी आक्रमण होता तो बड़ी दुर्घटना होसकती थी --मगर शायद वन्य पशु भी मासूमियत को भांप जाते हैं ..कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी ..मेरे ननिहाल केसबसे घने दोस्त प्रमेश से तो एक लम्बे अरसे के बाद अभी बीते दिनों ही मुलाकात हुई .इस समय वे कोटा में हैं भारतीयरेलवे से जुड़े एक प्रतिष्ठान में उच्च पद पर हैं ..वे भी किसी डेयर डेविल से कम न थे..उनके साथ तो अक्सर बीहड़ों की सैरहो जाती थी....और हम ढेर सारी लाल लाल घुमचियाँ इकठ्ठा करके लाते थे.... .. , ...
मैंने अपने जीवन की पहली रेल यात्रा भी ननिहाल जाने के लिए ही की थी..यद्यपि तब आवागमन के दीगर साधनों केहिसाब से वह एक बहुत पिछड़ा इलाका था मगर एक जौनपुर से इलाहाबाद को जोड़ने वाली एकमात्र रेलवे लाईन बगलसे गुजरती थी और उसपर इकलौती ट्रेन ऐ जे पैसेंजर सुबह शाम आती जाती थी....सल्खापुर रेलवे स्टेशन से मेराननिहाल बस पंद्रह मिनट की तेज पदयात्रा पर था .....मुझे याद है कि कई बार तो कोई मुझे जौनपुर के मुख्य रेलवेस्टेशन भंडरिया से ऐ जे में बैठा देता और मैं छुक छुक गाडी से ननिहाल के आधे घंटे की सैर पर चल पड़ता ..मगर उनदिनों तो वही आधा घंटा मानो युग जैसा लगता .....इतनी व्यग्रता जो रहती बाल -टीम से मिलने की ...
मेरे पैतृक निवास से मेरा ननिहाल दक्षिण को पड़ता है और दक्षिण की ओर की यात्रा तब भी बड़ी अशुभ मानी जातीथी...मेरे बाबा जी मुझे ननिहाल न जाने के लिए कितने प्रलोभन देते मुझे याद है ..बढियां रसगुल्ले लाते ..मगर मेरो मनकहाँ अनत सुख पावे ..और बाबा जी के लिए तो मेरी खुशी ही सर्वोपरि थी ..थक हार कर मुझे ननिहाल जाने की अनुमतिमिल जाती ...ननिहाल के घर से बीहड़ भी दक्षिण की दिशा में था ..बचपन में भी मेरे मन में यह बात कौंधती थी..मगरमैं तब से ही ऐसी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था ... एक वाकया बड़ा मजेदार रहा ..मेरे मामा जी इंटर मीडिएट के शिक्षक थे ..आज कल लखनऊ में रिटायर्ड जीवन बिता रहेहैं ..मैं उन दिनों सात में पढता था .मेरी हिन्दी जितनी अच्छी थी
गणित उतनी ही कमजोर ....कारण पिता जी का कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ऐ होना था ...और उनका वहझन्नाटेदार थप्पड़ भी जब मैंने 'विनिमय' का अर्थ विनय सहित बता दिया था जबकि सही अर्थ है -अदला बदली -विचारविनिमय ...खैर था तो मैं सातवीं में मगर आठवीं नौवीं की हिन्दी के पाठ कंठस्थ थे....मामा के स्कूल के आठवीं कीहिन्दी परीक्षा की कापियां आई हुई थीं - सौ सवा सौ रही होंगीं --मैंने एक दुपहरी को बीहड़ कार्यक्रम स्थगित करके प्रमेशके साथ उन सारी कापियों को मामा से चोरी छिपे जांचकर फाईनल नंबर भी दे दिए .....यह सब काम दुबके दुबकेगोपनीय संपन्न हो गया ...सोचिये मामा जी का क्या हाल हुआ होगा जब उन्होंने यह कारस्तानी देखी होगी ..? सही सोचरहे हैं आप ..यह सब देखकर तो उन्हें काठ मार गया था कि यह सब हुआ कैसे ...मगर उन्हें यह समझने में देर नहीं लगीकि वह करतूत किसने की होगी ...हम तो यही भांप ही रहे थे..भाग कर नानी की सुरक्षित गोंद में जा पहुंचे ..मामा जी कोबार बार यह बात बतायी गयी कि भांजे को मारने पर बुढापे में हाथ कांपते हैं तो वे मार पीट तो नहीं पाए हाँ आग्नेय नेत्रोंसे मुझे घूरते रहे ..मगर उसी वक्त मेरे छोटे मामा के स्नेहसिक्त हाथों ने सर पर हाथ फेर मानो मुझे अभयदान दे दिया हो .....
कितनी ही ऐसी बचपन की छुट्टियों की यादें हैं जो आज हरी भरी सी हो आई हैं आपकी बदौलत .....आभार! (सफर अभी जारी है)

सोमवार, 27 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१८)

सफर चल रहा है धीरे धीरे लेकिन सुहाना है, कितना अच्छा लगता है कि हम दूसरों के बचपन को जीनेकि कल्पना करने लगते हैं और अपना जी चुके बचपन को उसमें खोजने लगते हैं। ये यादों कि कड़ियाँ बहुत ख़ुशी देरही हैं मुझे और इस के लिए आप सब के प्रति आभारी भी हूँ जो मुझसे इतने स्नेह के साथ आप सबने अपनी यादें सौंप दीं। चलिए नाम लिखा है तो आप पहचान ही लेंगेलेकिन मीनाक्षी जी कि ये तस्वीर वाकई उस समय कि साक्षी और इसके लिए अमूल्य निधि है।




मीनाक्षी धन्वन्तरी



गर्मी की छुट्टियाँ सपने सुहाने बचपन के!




गर्मी की छुट्टियाँ और बचपन के दिन भूलते कहाँ है....वक्त की धूल साफ करो तो फिर सारी यादें ताज़ा हो जाती हैं..यहाँ तो 27 मई से ही ताज़ा हो गई थी.....हर रोज़ बचपन की यादों को पढ़ना और अपनी यादों में डूब जाना..इतने दिनों इतने मित्रों के बचपन को पढ़ते हुए सोचिए यादों का सैलाब कैसे रुक पाएगा...बेतरतीब सा बहने दूँ या बाँध लूँ .... यह सोचे बिना लिखने बैठी हूँ ....

हर साल गर्मियों की छुट्टी का पहला दिन बहुत लम्बा लगता.. बार बार आँगन में जाकर सूरज को गुस्से से देखना कि छिपता क्यों नहीं क्यों कि शाम की बस से कुल्लू मौसी के पास जाने की बेसब्री होती...बचपन से ही मैदान से पहाड़ों की ओर जाना ऐसा लगता जैसे स्वर्ग मे जा रहे हों.... सुबह सवेरे कुल्लू घाटी पहुँच जाते.. वहाँ पहले से ही मौसी बस अड्डे पर इंतज़ार करती दिखाई देती...

चारों तरफ हरे भरे पहाड़..दूर की चोटियाँ बर्फ से ढकी देख कर जी करता कि उड़ कर वहाँ पहुँच जाओ...मौसी के घर जाने का खुशबूदार रास्ता....लकड़ी का तीन मंजिला घर ...काली स्लेट की छतें सब मन को बाँध लेता.. मौसी सयुंक्त परिवार में रहती थीं....मौसाजी आर्मी में थे.. उनके पिताजी, तीन भाई और एक बहन वहीं रहते थे...मेरे से छोटे मौसेरे भाई दो और एक बहन..इधर हम दो बहने और एक छोटा भाई ... सबकी लीडर सबसे बड़ी मैं....घंटों ब्यास नदी के किनारे बैठते.. बहती नदी का गीत सुनते और ऊँची आवाज़ में खुद भी गाने लगते...वहीं बैठ कर आम, नाशपाती, खुमानी , आढू , सेब और अखरोट खाते...

अच्छा लगता घर की खिड़की से नाशपाती और सेब तोड़ कर खाना....फिर ऊपर से डाँट खाना क्यों कि सयुंक्त परिवार होने के कारण किसी को भी सेब, नाशपाती, अखरोट और बादाम तोड़ने की इजाज़त नहीं थी....पेड़ों से जो भी फल उतरते वे सबमें बराबर बराबर बँटते लेकिन चोरी करने से हम बच्चे कहाँ बाज़ आते....रात होते ही चुपके से हम सब बच्चे खिड़की से नाशपाती और सेब तोड़ ही लेते...वहीं बाल्कनी में बैठकर अपने हाथों से ही साफ करके खाते और गपशप करते....मौसी और मम्मी जब अपने कमरे से पूछते कि अभी सोए नहीं तो कहते कि सूसू करने के लिए जा रहे हैं...और न चाहते हुए भी नीचे उतर जाते...नीचे उतर कर सबसे पहले दादाजी के कमरे के बाहर दरवाज़े पर दस्तक देकर भाग जाते... मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा आता उन पर... घर एक अन्दर एक भी टॉयलेट नहीं बनवाने दिया था..सब घर से बाहर बना टॉयलेट इस्तेमाल करते...”घर के बड़े हैं..उनका घर है...वे जैसा कहेंगे हमें मानना पड़ेगा” यह कर मौसी और मम्मी शांत कर देते हमें...जब तक दादाजी रहे घर के अन्दर टॉयलेट नहीं बना..हर साल बस यही एक मुश्किल होती जिसे मौसी यह कह कर टाल देती...”दिन में एक बार तो जाना होता...उस बारे मे ज्यादा न सोचो...”

एक महीना पंख लगा कर खत्म हो जाता और फिर तैयारी होती नाना नानी के घर जाने की.....ननिहाल बल्लभगढ़ में था..नाना नानी के घर से कुछ दूरी पर सबसे बड़ी मौसी रहती...मामाजी फरीदाबाद में रहते थे... सभी मिल कर धमाल करते नाना नानी के घर ... नाना का घर बाज़ार में ही था...पहले दुकान फिर पीछे घर...रिटायर वार्डन और गणित के मास्टर सबके लिए मास्टर जी हो गए थे....नानी गीता का पाठ करने में माहिर...मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगता उनका गीता पाठ सुनना..दौड़ दौड़ कर उनके हर काम में हाथ बँटाना...गेहूँ साफ करना, चक्की चलाना, कुएँ से पानी भरना, पहली बार गोबर के उपले बनाना मेरे लिए चमत्कारी काम होते थे....नानी के साथ काम करते देख नानाजी सिर्फ मुझे ही बद्री हलवाई की दुकान पर ले जाते...मिट्टी के कसोरे में मलाई वाला दूध और देसी घी की जलेबी का स्वाद आज भी याद है...

बड़ी मौसी के घर जाते तो सबसे छोटी होने के कारण सब भाई और दीदी मुझे ही कुछ भी मँगवाने के लिए बाज़ार भेजते..बाकि सब जो मुझसे छोटे थे दुबक जाते इधर उधर...कई बार साथ चलने को कहती तो मना कर देते तो मै कट्टी करके चली जाती अकेली.....तीन भाई और एक बहन ... मतलब चार चक्कर तो लगाने ही होते दही लाने के लिए...किसी को दही मे मलाई अच्छी लगती तो किसी को नहीं लेकिन मैं सबमें मलाई डलवा कर रास्ते में ही चट कर जाती..कभी कभी डाँट भी खाती कि दही सही तुलवा कर नहीं लाती कम लग रही लेकिन कैसे बताती कि मलाई का स्वाद जो कराए कम....

मौसाजी बहुत प्यार करते... मौसाजी शौकिया तौर पर कई तरह के अर्क बनाते...उनके हाथ के बने अलग अलग अर्क का तीखापन भी अच्छा लगता..जाने आज वे सभी अर्क बनते भी है कि नहीं....उनके छोटे छोटे तोहफे आज भी नही भूलते...सतू और शक्कर, भुना हुआ भुट्टा, टाँग़री, राम लड्डू, आम पापड़, मीठी फुलियाँ सबसे ज्यादा मुझे ही मिलता....वही चीज़ें छोटे भाई बहन से बाँट कर खाने के लिए उनके पास जाती तो वे मुँह फुला कर बैठे होते, मुझसे बात ही न करते....मुझे भूल जाता कि दोपहर को तो मैने खुद ही कट्टी की थी...आज भी यही होता है कुछ देर के लिए किसी से नाराज़ होकर फिर सब भुला कर सामने जा खड़ी होती हूँ मुस्कुराते हुए...सामने वाले को जबरन मुस्कुराना ही पड़ता है ..... J

दसवीं के बाद की छुट्टियाँ यादगार बन गई जब डैडी ने मुझे अकेले ही दीदी (मौसेरी बहन) के घर श्रीनगर जाने की तैयारी करने को कहा...खुशी खुशी में पैक किया हुआ खाना घर भूल आई...जम्मू तवी की ट्रेन में बिठाते हुए डैडी पैसे देना भूल गए...तब पैसे की किसे चिंता थी बस कश्मीर की वादियों में खो जाने की धुन थी...उन दिनों रात 9 बजे के लगभग दिल्ली से ट्रेन चलती तो सुबह जम्मू पहुँच जाती..आधी रात को दीदी जीजाजी के दोस्त दूसरे कम्पार्टमेंट से आए कि मुझे कुछ चाहिए तो नहीं...अपनी शक्ल दिखा कर चले गए कि सुबह जम्मू मे मिलते हैं..

कैसे दिन थे जब किसी तरह का कोईडर छू न गया था...एक अजनबी केसाथ जम्मू उतर कर नाश्ता किया औरश्रीनगर जाने वाली बस में बैठगए...सूरज डूबने के बाद गहरी शामहोते होते श्रीनगर पहुँचे थे जहाँ पहलेसे ही दीदी और जीजाजी इंतज़ार कररहे थे...घर जाने के लिए मेरी पसन्दका ध्यान रखते हुए ताँगे पर गएथे....अगले दिन के सूरज के साथ साथएक सपने का भी जन्म हुआ था .... जिस पर फिर कभी चर्चा ....पढने केलिए कुछ ज्यादा ही हो गयाहै....लेकिन लिखने के लिए तो अथाहसागर है यादों का....

(सफर अभी जारी है )

गुरुवार, 23 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१६)



आखिर कब तक मैं अपने को रोकती,इस लिए खुद को ही पेश कर दिया.



इस
बार मैं ही खड़ी हूँ।


सबके बचपन की यादें संजोते संजोते अब अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहा। उन सबके बचपन से थोड़ा थोड़ा सा मेरा बचपन भी जुड़ा है और कितना अच्छा लगता है फिर कुछ पलों के लिए उनमें डूब जाना।
उस समय २० मई को रिजल्ट मिलता था और २१ मई को हम मामा के घर के लिए रवाना। मेरे ३ मामा में दो के बच्चे न थे इसलिए उन्हें हम लोगों का इन्तजार रहता था। बाकी जितने भी चचरे मामा थे उनमें सबके बेटियाँ थीं किस के ३ किसी के ४ और किसी के ६ बस यही आकर्षण रहता था। वैसे भी पहले चचेरे और सगे की कोई परिभाषा मेरी समझ नहीं आती थी क्योंकि मेरी माँ से दो तीन मामा ही बड़े थे बाकी सब छोटे थे। मेरी ननिहाल मध्य प्रदेश के भिंड जिले के अचलपुरा नामक गाँव में है। तब उरई से गिनी घुनी बसें भिंड के लिए जाती थीं और जो जाती वे भी भूसे की तरह से भरी हुई।
हम रात में बहुत सतर्क होकर सोते की कहीं देर न हो जाये। जल्दी से तैयार हुए और मामा के साथ निकल लेते। रास्ते भर इस कल्पना में की कौन कौन मिलेगा? इस समय क्योंकि कुछ मामियां भी अपने मायके चली जाती थी। भिंड से पहले हम मिहोना में बस से उतर जाते और वहाँ पर बैलगाड़ी हमारे लिए तैयार होकर आती थी। उसमें ऊपर से छाया, नीचे गद्दे बिछे रहते थे और तकिया भी रखा होता। जैसे कोई नवाब आ रहा हो, वैसे हम नवाब से कम नहीं माने जाते थे। मैं और मेरे भाई साहब दो लोग ही जाते। आराम से बैठ कर सफर शुरू होता। बैलगाड़ी से सब समझ जाते की मेहमान आये हैं। वहाँ एक नहीं कई गाँवों में सब मामाजी को जानते थे। गाड़ीवान से पूछते - 'भैया किनके मेहमान है?'
'
लम्बरदार के भानेज हैं।' गाड़ीवान परिचय कराता चलता और कहीं कहीं कुँए पर रुक कर ठंडा पानी पिलाता जाता और पानी खाली नहीं जिसके दरवाजे पर गाड़ी रुक जाती पानी के लिए अन्दर से गुड आ जाता ।
अचलपुरा में सबको इन्तजार रहता कि कब आयें। बखरी के बाहर सारी बहने खड़ी मिलती और कभी कभी तो हम घर बाद में पहुँचते वही खेलने लगते । बखरी इसलिए लिखा क्योंकि एक बड़ा सा आँगन जिसमें सभी लोगों के घरों के मूक मुख्य द्वार खुलते थे और दरवाजे के दोनों ओर बड़े बड़े चबूतरे थे। उस बखरी में बहुत बड़ा सा दरवाजा था जिससे बाहर से सुरक्षा होती।
उस समय वहाँ सिर्फ चना और बाजरा ही पैदा हुआ करता था और मैं बाजरा की रोटी को मिट्टी की रोटी कहती थी और खाने का तो सवाल ही नहीं उठता था। इसलिए मामा हम लोगों के आने के पहले बाहर से गेंहूँ मंगवा कर रखते थे। अब उस बाजरा के लिए तरस जाते हैं। हमारे लिए पहले से ही दरजी के यहाँ से गुड़ियाँ बनवा कर मंगवा ली जाती थी। खूब बड़ी बड़ी से गुड़ियाँ होती। लड़कियों की भरमार थी सो सारे दिन गुड़ियाँ खेली जाती।
कभी छोटू मामा के नेतृत्व में आम के बाग़ में चले जाते, कच्चे आम ले आते और उन्हें अनाज के कुठले में दबा देते बस दो दिन में पक कर तैयार हो जाते और हम जी भर कर खाते. कभी कभी तो सारी दोपहर जब घूम कर लौटते तो मामी से धमकी मिलती आने दो मामा को शिकायत करेंगे। मामा कानूनगो थे सो अपने हैड क्वार्टर पर रहते थे। सिर्फ छुट्टी में आते।
तब पैसे अधिक नहीं होते थे। अगर कोई सब्जी वाला या फिर फल वाला आता तो अनाज देकर खरीदारी होती थी। बनिया के यहाँ भी एक झोले में अनाज लेकर जाते और जो लाना होता ले आते। वैसे मुझे ये कभी समझ नहीं आया की उसकी कीमत कैसे लगाते थे? दोपहर में ताश जरूर खेले जाते थे। इसके अलावा वहाँ लूडो या कैरम जैसे खेल न होते थे। हम घर की अटरिया में छुपा छुपी का खेल भी खूब खेले. नीचे की मंजिल के ऊपर जो कमरे होते थे उन्हें ही अटरिया कहा जाता था। ये भी मिट्टी की दीवारों वाली होती और वहाँ पर पक्के फर्श नहीं होते थे. घर के फर्श गोबर से लीपे जाते थे. पता नहीं कैसे छत पक्की होती थी? वहाँ पर खूब ठंडी ठंडी हवा आती और खिड़की से चारों तरफ का नजारा भी दिखाई देता। जहाँ निकल जाते अलग नजर आते थे क्योंकि हम तो शहर से गए होते थे। फिर भी गाँव के हर ठिकाने पर घूम आते। हमें अपनी ननिहाल इतनी पसंद थी की वहाँ से आने का मन नहीं करता और जब चलते तो सारी ममेरी बहनें खूब रोती थी।बस वही यादें रह गयीं अब तो जमाना गुजर गया। गाँव में बसें भी चलने लगी हैं लेकिन बैलगाड़ी में बैठने का जो मजा था वह अब नहीं।