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मंगलवार, 28 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (१९)

आज मैं उस शख्स के संस्मरण आपके सामने पेश कर रही हूँ, जिससे मुझे शुरू से डर लगता रहा, क्यों? मैं खुद नहीं जानती कहीं और इनकी गुस्से वाली टिप्पणी पढ़ी होगी । बहरहाल मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं अरविन्द जी से अपने अनुरोध के बारे में कहती लेकिन फिर हिम्मत जुटाई और उनको अनुरोध लिख डाला। मुझे बहुत ख़ुशीहुई कि अगली ही पोस्ट से अरविन्द जी ने मुझे अपने संस्मरण भेज दिए। अब डर दूर। और आपके नजर है ये कड़ी: डॉ अरविन्द मिश्र रेखा जी, आपने तो मानो किसी टाईम मशीन में बैठने को कह दिया हो जो बचपन केदिनों की गर्मी की छुट्टियों के किसी मौके पर ननिहाल में लैंड करने वाली हो ....अब भला ननिहाल से बेहतर गर्मी कीछुट्टियां कहाँ बितायी जा सकती हैं -खूब जी भर के शैतानी और उधम करो मगर कोई डांटने वाला नहीं ...चहुँ ओर स्नेहऔर वात्सल्य का वातावरण ...ऐसे में शैतानी को तो कल्पना के पंख लग जाने ही थे....मेरा ननिहाल जौनपुर जिले केपास आज भी अचर्चित से गाँव आमदहां में है ...और आज से ४०-४५ वर्ष पहले वह किसी चम्बल के बीहड़ से कम न थाऊंचे ऊंचे टीले ,नीचे तरह तरह की झाड़ियाँ - वनस्पतियाँ और उनसे निकल कर स्वच्छंद विचरण करते जंगली जीवजंतु ...शेर बाघ भले ही वहां उस समय नहीं थे शायद (क्योकि हमें तो दिखे नहीं ) मगर बिलावों की कई प्रजातियाँ ,साहीहिरन लकडबग्घा ,सियार ,लोमड़ी आदि तो खूब दिख जाती थी, वनौषधियों की तो जमात ही थी जिनकी पहचान मैंकाफी बाद में कर पाया ...आज भी ऐसे परिक्षेत्र को हमारे यहाँ बोल चाल की भाषा में नार खोर(ravines -बीहड़ ) कहते हैंमैं बच्चों की एक भीड़ की अगुआई करते हुए बिना नाना नानी या मामा मामी को बताये घर के पिछवाड़े तक आ धमकेउसी उसी नार खोर में चल पड़ते थे-काफी देर लुका छिपी ,मटरगश्ती ,छोटे जानवरों की धर पकड़ और जंगली फूलों ,फलोंको चुनने का काम होता और थक हार कर यह टीम दोपहर होते होते खाने के वक्त वापस आ जाती ..आज मैं सोचता हूँ वहसब किसी दुस्साहस से कम नहीं था ...अगर भेडिया और लकडबग्घा का कोई भी आक्रमण होता तो बड़ी दुर्घटना होसकती थी --मगर शायद वन्य पशु भी मासूमियत को भांप जाते हैं ..कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी ..मेरे ननिहाल केसबसे घने दोस्त प्रमेश से तो एक लम्बे अरसे के बाद अभी बीते दिनों ही मुलाकात हुई .इस समय वे कोटा में हैं भारतीयरेलवे से जुड़े एक प्रतिष्ठान में उच्च पद पर हैं ..वे भी किसी डेयर डेविल से कम न थे..उनके साथ तो अक्सर बीहड़ों की सैरहो जाती थी....और हम ढेर सारी लाल लाल घुमचियाँ इकठ्ठा करके लाते थे.... .. , ...
मैंने अपने जीवन की पहली रेल यात्रा भी ननिहाल जाने के लिए ही की थी..यद्यपि तब आवागमन के दीगर साधनों केहिसाब से वह एक बहुत पिछड़ा इलाका था मगर एक जौनपुर से इलाहाबाद को जोड़ने वाली एकमात्र रेलवे लाईन बगलसे गुजरती थी और उसपर इकलौती ट्रेन ऐ जे पैसेंजर सुबह शाम आती जाती थी....सल्खापुर रेलवे स्टेशन से मेराननिहाल बस पंद्रह मिनट की तेज पदयात्रा पर था .....मुझे याद है कि कई बार तो कोई मुझे जौनपुर के मुख्य रेलवेस्टेशन भंडरिया से ऐ जे में बैठा देता और मैं छुक छुक गाडी से ननिहाल के आधे घंटे की सैर पर चल पड़ता ..मगर उनदिनों तो वही आधा घंटा मानो युग जैसा लगता .....इतनी व्यग्रता जो रहती बाल -टीम से मिलने की ...
मेरे पैतृक निवास से मेरा ननिहाल दक्षिण को पड़ता है और दक्षिण की ओर की यात्रा तब भी बड़ी अशुभ मानी जातीथी...मेरे बाबा जी मुझे ननिहाल न जाने के लिए कितने प्रलोभन देते मुझे याद है ..बढियां रसगुल्ले लाते ..मगर मेरो मनकहाँ अनत सुख पावे ..और बाबा जी के लिए तो मेरी खुशी ही सर्वोपरि थी ..थक हार कर मुझे ननिहाल जाने की अनुमतिमिल जाती ...ननिहाल के घर से बीहड़ भी दक्षिण की दिशा में था ..बचपन में भी मेरे मन में यह बात कौंधती थी..मगरमैं तब से ही ऐसी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था ... एक वाकया बड़ा मजेदार रहा ..मेरे मामा जी इंटर मीडिएट के शिक्षक थे ..आज कल लखनऊ में रिटायर्ड जीवन बिता रहेहैं ..मैं उन दिनों सात में पढता था .मेरी हिन्दी जितनी अच्छी थी
गणित उतनी ही कमजोर ....कारण पिता जी का कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ऐ होना था ...और उनका वहझन्नाटेदार थप्पड़ भी जब मैंने 'विनिमय' का अर्थ विनय सहित बता दिया था जबकि सही अर्थ है -अदला बदली -विचारविनिमय ...खैर था तो मैं सातवीं में मगर आठवीं नौवीं की हिन्दी के पाठ कंठस्थ थे....मामा के स्कूल के आठवीं कीहिन्दी परीक्षा की कापियां आई हुई थीं - सौ सवा सौ रही होंगीं --मैंने एक दुपहरी को बीहड़ कार्यक्रम स्थगित करके प्रमेशके साथ उन सारी कापियों को मामा से चोरी छिपे जांचकर फाईनल नंबर भी दे दिए .....यह सब काम दुबके दुबकेगोपनीय संपन्न हो गया ...सोचिये मामा जी का क्या हाल हुआ होगा जब उन्होंने यह कारस्तानी देखी होगी ..? सही सोचरहे हैं आप ..यह सब देखकर तो उन्हें काठ मार गया था कि यह सब हुआ कैसे ...मगर उन्हें यह समझने में देर नहीं लगीकि वह करतूत किसने की होगी ...हम तो यही भांप ही रहे थे..भाग कर नानी की सुरक्षित गोंद में जा पहुंचे ..मामा जी कोबार बार यह बात बतायी गयी कि भांजे को मारने पर बुढापे में हाथ कांपते हैं तो वे मार पीट तो नहीं पाए हाँ आग्नेय नेत्रोंसे मुझे घूरते रहे ..मगर उसी वक्त मेरे छोटे मामा के स्नेहसिक्त हाथों ने सर पर हाथ फेर मानो मुझे अभयदान दे दिया हो .....
कितनी ही ऐसी बचपन की छुट्टियों की यादें हैं जो आज हरी भरी सी हो आई हैं आपकी बदौलत .....आभार! (सफर अभी जारी है)