www.hamarivani.com

शुक्रवार, 12 जून 2026

काउंसलिंग कैसी हो : बच्चों के संदर्भ में!

 काउंसलिंग कैसी हो : बच्चों के संदर्भ में! 

         वर्तमान परिवेश में बच्चों को काउंसलिंग की जरूरत है। बचपन से स्कूल जाने तक बच्चे का स्वभाव स्पष्ट हो जाता है। वैसे तो इस स्तर पर माता-पिता ही सबसे बड़े काउंसलर हो सकते हैं और कहा गया है कि बच्चों को जो बातें सिखाई जाती हैं, वे कोरी स्लेट की तरह उनके मन-मस्तिष्क पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं। यह तो है उन बच्चों के लिए जो घर में रहते हैं और परिवार में उन्हें हमेशा किसी न किसी  संरक्षण मिलता है। आज के परिवेश और स्थितियों में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है तो संभावनाएं तलाशना होगा। उसी दिशा में कुछ सोचने के बिंदु --

     काउंसलिंग और प्ले स्कूल जाने वाले बच्चे :--                 

            जितना बच्चे को घर में देखरेख की जरूरत होती है, उतनी ही स्कूल में भी होती है। वैसे तो शिक्षक बाल मनोविज्ञान समझते हैं और उन्हें बच्चों के मन को  किस तरह पढ़ना है. उनका अबोध मन क्या संजो कर बैठा ? उसको पढ़कर उनके भविष्य की रूपरेखा तय करती हैं। जहाँ माता पिता दोनों कामकाजी होते हैं, वहाँ बच्चे ज्यादा संवेदनशील होते हैं क्योकि अन्य बच्चों की तरह उनकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पाती हैं। तब काउंसलिंग ही उनको सही दिशा दिखती हैं और ये इस समय बहुत जरूरी होती है। 

            माँ बच्चे की प्रथम शिक्षक होती है लेकिन जब बच्चा स्कूल में कदम रखता है तो उसके लिए अपनी शिक्षिका की बात पत्थर की लकीर होती है। 

बाल मनोविज्ञान का ज्ञान : -- 


                      
छोटे बच्चों की शिक्षिका को बाल मनोविज्ञान का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। उसके समक्ष विभिन्न स्वभाव के बच्चे आते हैं और बच्चों के लिए यही एक स्थिति होती है जबकि उनके स्वभाव को पहचान कर उसे समाज के सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है। जो बच्चे सिर्फ प्ले में डाले जाते हैं, उनकी टीचर को बाल मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिए ताकि बच्चों की नींव सही से पड़ सके। जब बच्चे घर से बाहर जाने लगते हैं तो वे माँ से ज्यादा अपनी शिक्षिका की बात को महत्व देते हैं।
               इस उम्र के बच्चों को कोई साइंस , गणित या अन्य विषयों की पोथी नहीं पढानी होती हैं , बल्कि उनके मनो-मष्तिष्क को नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियां, आपसी प्रेम बढ़ाने वाले खेल , सहयोग की भावना बढ़ाने वाले पाठ पढ़ाना होता है। उनमें चरित्र निर्माण की नींव डाली जाती है।
              कभी कभी घर के माहौल के कारण बच्चा अंतर्मुखी हो जाता है और फिर उसको टीचर पहचान कर उसकी काउंसलिंग करे और घर के विषय में जानकारी लेकर माता पिता को आगाह कर सकती है क्योंकि ऐसे बच्चे छोटी छोटी बात पर आहत हो जाते हैं।

        काउंसलिंग माता-पिता की: बच्चों के संदर्भ में :--

        मां-बाप की काउंसलिंग भी बहुत जरूरी है क्योंकि ये जरूरी नहीं है कि धन से, शिक्षा से या अच्छी नौकरी से सम्पन्न होने पर माता-पिता बाल मनोविज्ञान को उतना ही समझते हों। कभी कभी कार्यस्थल का तनाव माता-पिता आपस में या कभी कभी बच्चों पर भी निकाल देते हैं, बगैर ये जाने कि इसका प्रभाव उन बच्चों पर क्या हो सकता है? इसलिए समय समय पर जब पेरेंट्स-टीचर मीटिंग हो तो उनको काउंसलिंग के द्वारा समझाया जा सके। 

      विशेष बच्चों की काउंसलिंग:-- 

          इस तरह के बच्चों के बारे में अभी भी अभिभावक इतने सजग नहीं है और विशेष बच्चों के विषय में एकदम पता नहीं लगता है। जिन बच्चों में कुछ प्रतिशत ही इस तरह का स्वभाव पाया जाता है, उनको भी काउंसलिंग की जरूरत होती है और इसके लिए हर बड़े स्कूल में इस तरह के विशेषज्ञ की नियुक्ति होती है। बच्चों के क्रिया-कलापों से जब साधारण शिक्षक कोई निर्णय नहीं ले पाए तो उन्हें विशेष बच्चों के काउंसलर से परामर्श करके या फिर उसके पास भेज कर बच्चे की काउंसलिंग करवानी चाहिए। जैसी घटनाएं आजकल छोटे बच्चों के साथ घट रही हैं, उनको देखते हुए बच्चों के स्वभाव में होने वाले परिवर्तन को वह बहुत अच्छी तरह से समझ सकती हैं।

      किशोरावस्था की काउंसलिंग :--
                              
किशोरावस्था उम्र का वह दौर होता है जब बच्चों में कुछ शारीरिक और मानसिक बदलाव आता है। आज के दौर में बच्चे नेट से या अन्य जरिये से इसके विषय में जानें, माँ को ही एक कुशल काउंसलर बन कर बच्चों को होने वाले परिवर्तन के विषय में समझाना चाहिए।
उनमें सुरक्षा की भावना का भी बीजारोपण करना होता है। वैसे तो इसकी जरूरत आज भी माँ समय से नहीं समझती है और यही कारण है कि अप्रत्याशित घटनाएं घट जाती हैं। इसके लिए बेटी और बेटे दोनों के प्रति बराबर सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि आज जो दौर समाज में चल रहा है उसके चलते भटकने में देर नहीं लगती है। इसीलिए माँ-बाप को बहुत सतर्क और पैनी नजर रखनी चाहिए। जो संयुक्त परिवार में नैतिकता का पाठ बच्चे पढ़ते थे, उसका आज सर्वथा अभाव है।

       सोशल मीडिया और नेट से प्राप्त होने वाली जानकारी और उसमें बच्चों की संलिप्तता उनको हमेशा सही दिशा नहीं देती बल्कि कई बार कुछ ऐसे स्रोत भी उनकी नजर में आ जाते हैं, जो उसको भटका देती है। कुछ वीडियो गेम बच्चों को भटका कर आत्महत्या तक के रास्ते पर ले जाते हैं। पहले तो माता पिता की अनदेखी मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देती है और फिर जब वे उनके हाथ से निकल जाते हैं तो उस समय उन्हें भी काउंसलिंग की जरूरत होती है।

     युवाओं की काउंसिलिंग :--
         

        आज के संदर्भ में बच्चों की आईक्यू (IQ) बहुत तेज है और वे कब बाल्यावस्था से किशोरावस्था में प्रवेश कर जाते हैं, पता नहीं चलता। इसके पीछे सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से युवावस्था जैसी सोच और क्रियाकलाप में संलिप्त होकर अपने को मां-बाप से ज्यादा समझदार समझने लगते हैं। इस समय काउंसलिंग हर कदम पर चाहिए क्योंकि स्कूल के बाद कॉलेज या प्रोफेशनल इंस्टीट्यूट में पहुंच कर आत्महत्या जैसी घटनाओं का बढना इस बात का संकेत है कि काउंसलिंग की बहुत अहम् भूमिका हैं।

 

 

शुक्रवार, 15 मई 2026

विश्व परिवार दिवस! (15 मई)

 

परिवार के स्वरूप :                   
                  
          परिवार संस्था आदिकाल से चली रही है और उसके अतीत को देखें तो दो से चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थीपारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती-बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता थाउनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भीधीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गयाजब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे। वे वापस गाँव आना या रहना या खेती करना पसंद नहीं करते , परिणाम कि घर वालों के बीच में दूरियां आनी शुरू हो गयीं और परिवार के विखंडन की प्रक्रिया यही से शुरू हो गयी।  आरम्भ में ये सब बहुत अच्छा लगा नयी पीढ़ी को लेकिन बाद में या कहें आज जब एकल परिवार के परिणाम सामने आने लगे हैं।

टूटते परिवार :
                 

     आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढ़ती महत्वाकांक्षायें, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है। वह भी आजकल भय के साये में जी रहा है।  बच्चों को लेकर माता पिता निश्चिन्त नहीं हैं। आज अधिकांश दंपत्ति दोनों ही लोग नौकरी करते हैं और इस जगह पर  बच्चे या तो आया के साथ रहते या  फिर किसी 'डे केअर सेंटर' में. छोटे बच्चे इसी लिए माता-पिता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं रह जाते हैं।  वे नौकर और आया के द्वारा शोषण के शिकार भी किये जाते हैं और कभी कभी तो माता पिता की स्थिति के अनुसार अपहरण तक की साजिशें रच दी जाती हैं।  

 एकाकी परिवार में भय :

                इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे और बच्चे भी सुरक्षित रहते थे।  अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघट की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं। बच्चे भी स्वयं को असुरक्षा की भावना में घिरे जी रहे हैं। एक तो बच्चों को परिवार का सम्पूर्ण संरक्षण नहीं मिल पाता है और साथ ही वह पढ़ाई के लिए बराबर माता-पिता के द्वारा दबाव बनाया जाता है क्योंकि वे अच्छे स्कूल में भारी भरकम फीस भर कर पढ़ाते हैं और उनसे पैसे के भार के अनुसार अपेक्षाएँ भी रखते हैं। 

विखंडित परिवार का परिणाम :

                   एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहेंइससे बेहतर है कि मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '                            
             आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैंआत्मनिर्भर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे                 
              एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर करने की भावना से ग्रस्त हो जाता हैदूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं हैजब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?                   
                         परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने लगेगाऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक कि  उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है।  अगर अपनी सोच को विकसित करें और उसको परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा इसके लिए हमें अपनी सोच को 'मैं' से निकल कर 'हम' पर लाना होगाये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी
       'मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'

        '
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें?'
 
                                                
           तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक हैइसके लिए प्रौढ़ और युवा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगाघर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहेवैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे हैं  तो माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उनसे बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजियेयही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैंदो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नमक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा

          कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थींआज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा हैफिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैंइसको बचाने में ही सभ्यता , संस्कृति और समाज की भलाई है।

गुरुवार, 14 मई 2026

मां तुम्हें सलाम!


 अपने अपने भाव और अपनी अपनी अभिव्यक्ति, मां जिसमें दुनिया बसती है और मां की दुनिया भी उसी में बसती है। कैसे कोई मां के चित्र को शब्दों में उकेरता है? एकदम वैसा ही जैसा मन पर अंकित है। आज कविता और ग़ज़ल की धनी  #सौम्या श्रीवास्तव की अभिव्यक्ति।


यूँ तो माँ के प्रति भावनाएं मात्र एक दिन की मोहताज नहीं हैं...लेकिन फिर भी जो भावनाएं मन में ही घुमड़ती रहती हैं ...आज उन्हें जताए बिना नहीं रहा गया...!!!


माँ.......

जो स्वयं जीवट बन गई ,

और....

मेरे साहस के पंखों को भी

अधिक प्रबल और सबल करती गई...!


माँ ...

जो ख़ुद जागती रही 

लेकिन 

जिसे हमेशा ये ध्यान रहा ,

कि मेरी नींद तो नहीं खुल गई ..!


माँ ...

जो मेरे लड़खड़ाने पर मुझे ,

आगे बढ़कर हँसते हुए थामती है ..!

माँ ...

जो मेरी मुस्कुराहट के पीछे छिपे

अनकहे से मेरे सारे दर्द जानती है ..!


माँ ...

जिसके स्पर्श/ अनुभूति मात्र से ,

एक अद्भुत शक्ति का आभास होता है...!

माँ ...

जिसके पास मेरी सारी खुशियों ,

और हर उदासी का हिसाब होता है...!


माँ ...

जो स्वयं एक योद्धा है ,

और ...

जो मुझे भी दुविधाओं से ,

निरंतर संघर्ष करना सिखाती है ..!

माँ ...

जो विषम परिस्थितियों में भी ,

मुझे शहंशाह जैसा अनुभव कराती है...!


माँ ...

एक व्यक्तित्व जो मेरे जीवन का ,

सबसे सुखमय स्नेहिल अनुभव है...!

माँ ...

जिसकी महत्ता और त्याग को

मात्र शब्दों में वर्णित करना ,

इस संपूर्ण सृष्टि को 

सीमाओं में बाँधने जितना असंभव है....!

सौम्य वर्षा 

मां तुम्हें सलाम !

          मां के लिए जो भाव मन में होते हैं लेकिन अभिव्यक्ति जब बेटे या बेटी को खुद ही कटघरे में खड़ा कर दे और वह अपराधबोध भी उसके मन की निश्छलता को दिखलाया है। वह मां न इसे जानती है और न ही सुन सकती है फिर भी मां और बेटे के भावों के तार अहसास जरूर करवा रहे होंगे। सबसे अलग कुछ लिखा है - #शिखर चंद जैन जी ने।


मां! मैं अच्छा बेटा नहीं !


समय की धूल जब स्मृतियों के पन्नों पर जमने लगती है, तो अक्सर धुंधलाहट में हम उन चेहरों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमारे जीवन के कैनवास पर रंग भरे थे। लेकिन आज, कोलकाता की इस व्यस्त और शोर भरी दोपहर में,  मैं जब भी अपनी खिड़की से बाहर देखता हूँ, तो मुझे अपनी माँ का चेहरा याद आता है—वह चेहरा जो जीवन की तपती धूप में भी मेरे लिए शीतल छाँव बना रहा। मैं आज खुद को एक कटघरे में खड़ा पाता हूँ। यह कटघरा किसी अदालत का नहीं, बल्कि मेरी अपनी अंतरात्मा का है।


अभावों के बीच संपन्न बचपन!


मुझे याद है पिताजी की वह सीमित आय, जिसमें महीने के आखिरी दस दिन अक्सर हिसाब-किताब की ऊहापोह में बीतते थे। लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि मुझे या मेरे बड़े भाई को कभी उस 'कमी' का अहसास तक नहीं हुआ। उस समय माँ एक जादुई कलाकार की तरह थीं। वह कम में भी 'सब' जुटा लेती थीं। हमारी हर फरमाइश, हर वह पकवान जिसकी हमने बस ज़िक्र भर किया हो, थाली में हाज़िर हो जाता था।माँ ने अभावों को कभी घर की दहलीज़ के अंदर नहीं आने दिया, उन्होंने हमें अभावों में भी बहुत अच्छी तरह  पाला।


रसोई वाला कोना !


 100 वर्ग फीट के छोटे से कमरे के एक कोने में बनी “रसोई” के उस ताखे पर रखे वे छोटे-छोटे  डिब्बे जिनमें तमाम मसाले, दालें भरी रहती थीं आज भी मेरी आँखों के सामने तैर जाते हैं। इन्हीं में से 5 डिब्बों में पाँच तरह के अचार होते थे—आम, नींबू, मिर्च, लसोड़े और कैर का मिक्स अचार। वे सिर्फ अचार नहीं थे, वह माँ का हमारे प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक थे। वह जानती थीं कि हमें कब क्या स्वाद चाहिए। आज जब मैं बड़े-बड़े होटलों में 'बुफे' देखता हूँ या किसी बड़े रेस्टोरेंट के भोजन को देखता हूं तो पराठों के साथ मां के हाथ की सब्जी और उन पाँच डिब्बों के अचार में से किसी एक के स्वाद के आगे सब फीका लगता है। मेहमान भी उनके आचार के स्वाद को खूब सराहते थे।


बचपन का हादसा और मां !


मेरी स्मृतियों के गलियारे में एक मंज़र पत्थर की लकीर की तरह अंकित है। मैं तब मात्र सात साल का था। एक अलमारी से गिरकर मेरे जबड़े बुरी तरह टूट गए थे। वह दर्द असहनीय था, लेकिन उस दर्द से कहीं ज़्यादा तड़प माँ की आँखों में थी। उस वक्त न कोई गाड़ी थी, न आज जैसी सुविधाएं। माँ ने बिना एक पल गँवाए, मुझे अपनी गोद में उठाया और बदहवास होकर अस्पताल की ओर भागीं।

वह दोपहर, वह तपती सड़क और माँ की वह सांसे—मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ। सात साल का बच्चा अपनी माँ की गोद में भारी होता है, लेकिन उस दिन माँ के लिए मैं पंख जैसा हल्का था, क्योंकि उनकी ममता ने उन्हें फौलाद बना दिया था। अस्पताल पहुँचने तक उनके पैरों में छाले पड़ गए थे, मगर उनकी नज़रें सिर्फ मेरे चेहरे पर टिकी थीं। मेरा जबड़ा तो डॉक्टरों ने जोड़ दिया, लेकिन बाद के छह महीनों में माँ ने जो अपना सर्वस्व मुझ पर न्यौछावर किया, उसका जोड़ शायद पूरी कायनात में कहीं नहीं है।


कोलकाता की दूरी और मन का अपराध बोध!


आज मैं जयपुर से हज़ारों किलोमीटर दूर कोलकाता में हूँ। दो साल बीत गए हैं। दो साल... सुनने में छोटा लगता है, लेकिन एक माँ के लिए जो अपनी संतान की राह तकती है, यह दो सदियों जैसा है। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा, यह सच है। शरीर ने साथ नहीं दिया, यह भी हकीकत है। लेकिन जब मैं अपनी अंतरात्मा में गहराई से झाँकता हूँ, तो एक टीस उठती है—क्या मैंने वाकई कोशिश की? क्या मेरा प्रेम इतना कमज़ोर था कि वह स्वास्थ्य की बाधाओं को पार न कर सका?कोलकाता की इस नमी में मुझे जयपुर की वह सूखी हवा और माँ के आँचल की खुशबू याद आती है। मुझे लगता है कि मैं एक 'कृतघ्न संतान' की श्रेणी में खड़ा हूँ। वह माँ, जिसने मुझे तब गोद में उठाकर जीवन दिया जब मैं टूट चुका था, आज वह शायद खुद को अकेला पा रही होगी। मैं उनका ऋणी तो था ही, अब मैं खुद को अपराधी भी मानता हूँ। अपराधी—उस समय का जो बीत गया, उन शब्दों का जो मैंने उनसे नहीं कहे, और उस स्पर्श का जो उनसे दो साल से दूर है।


एक अधूरा संवाद!


पहले अक्सर फोन पर बात होती थी, तो वह पूछती थीं, "शिखर, तू ठीक तो है ना?" उनकी आवाज़ में वही पुरानी ममता होती है, कोई उलाहना नहीं, कोई शिकायत नहीं। उनकी यही निस्वार्थता मुझे और भी लज्जित करती है। काश वह मुझ पर चिल्लातीं, काश वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करतीं, तो शायद मेरा बोझ हल्का हो जाता। अब तो बात भी नहीं हो पाती क्योंकि मां फोन की घंटी या आवाज नहीं सुन पातीं।मैं यहाँ कोलकाता में अपनी सुख-सुविधाओं और बीमारियों के बीच घिरा हूँ, और वहाँ जयपुर के किसी कोने में वह पता नहीं ठीक हैं या नहीं।


यह संस्मरण मेरी माँ के लिए मेरा एक माफीनामा है। माँ, मैं जानता हूँ कि शब्दों से घाव नहीं भरते और न ही दूरी मिटती है। मैं आपका ऋणी हूँ और शायद सात जन्मों तक रहूँगा। मेरा स्वास्थ्य एक बहाना हो सकता है, लेकिन मेरा मन अब और बहाने नहीं बनाना चाहता।मैं अपराधी हूँ, पर मैं अपनी सज़ा का हकदार भी हूँ। और मेरी सज़ा यह है कि मैं जल्द से जल्द उन सारी दूरियों को मिटा दूँ जो मेरे और आपकी ममता के बीच आ गई हैं। मैं फिर से सात साल का वह बच्चा बनना चाहता हूँ, जिसका जबड़ा भले ही टूटा हो, लेकिन जिसका पूरा संसार आपकी गोद में सुरक्षित था।


*


शिखरचंदजैन*