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बुधवार, 6 जनवरी 2021

वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं। 

रविवार, 20 दिसंबर 2020

ये अनमोल रिश्ते !

 ये अनमोल रिश्ता!



                                जीवन में कुछ रिश्ते तो जन्म से बन जाते हैं और कुछ रिश्ते बस भावात्मक रूप से बने होते हैं और वे रिश्ते जो कि मेरे जीवन में इस साल मिले तो मेरा मन गदगद हो गया है। वो रिश्ता जो पापा और चाचा से जुड़े थे। उसे पैतृक घर और स्थान से जुड़े थे। जब मिला तो लगा कि पापा से ही मिल रही हूँ। 

                                ये फेसबुक की ही कृपा कहूँगी कि मुझे श्री रामशंकर द्विवेदी चाचाजी से मिलवाया। मैं उन्हें कितना जानती थी कि वे मेरे पापा पैतृक नगर जालौन में घर के पास ही रहते थे और आगरा विश्वविद्यालय के प्रशिक्षक थे। उसे समय में जब वह उरई में आगरा विश्वविद्यालय में ही लगता है। मैं बहुत छोटी थी - पापा ने ही बताया था कि घर के आगे से डिग्री कॉलेज जाते हैं कि ये कितने विद्वान हैं। वह छवि अभी भी मेरी आँखों के सामने है। धोती कुरता पहने हुए और एक हाथ में धोती का कोना पकड़े हुए जाते हुए वे कॉलेज के प्रोफेसर थे। कभी उसे समय पर गहन परिचय नहीं मिला। फिर फेसबुक पर मैंने उन्हें पाया और उनकी पूरी प्रोफाइल पढ़ी तो समझ गयी और मैंने उन्हें मैसेंजर पर बात की। पापा का नाम सुनकर उन्होंने बहुत सारी बातें बता डाली पापा के बारे में और तय किया कि अबकी बार जब भी उरई आउंगी जरूर मिलूंगी।  

                                 उस समय के बाद तो कभी न देखा न उनके बारे में जानकारी मिली।  आज उनकी विद्वता के समक्ष सिर झुक जाता है , इस उम्र में भी उनका लेखन जारी है और  अब तक उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या अनगिनत है और उनकी सक्रियता और विद्वता देख कर लगता है कि अभी बहुत कुछ माँ सरस्वती के इस वरद पुत्र को लिखना शेष है।                               

                               ये सौभाग्य मिला नवम्बर २०२० में ,  घर के पास ही उनका घर है और कानपुर निकलने के ठीक पहले मैं उनसे मिलने गयी।  मैं अपनी किताब उनको देने के लिए लेकर गयी थी। उनके घर पहुंची तो उनके बेटे से कह दिया वे घर पर नहीं है तो मैं अपनी किताब देकर चली आयी कि ये उनको दे दीजिएगा।  वह घर पर ही थे और जैसे ही उनको किताब दी होगी उन्होंने  पीछे से बेटे को भेजा कि उन लोगों को  बुलाकर लाओ।  हम वापस चल दिए और उन्हें देख कर अभिभूत  हो गयी।  पापा की याद आ गयी।  

                            फिर तो मैं बहुत देर तक रही।  उन्होंने अपने बचपन की यादें दुहराईं।  वे मेरे छोटे चाचा के मित्र थे और कहें कि पास पास घर होने से और हम उम्र भी उन्हें के थे।  वे बातें जो न कभी हमें पापा ने बतलायीं और न ही कोई औचित्य ही था।  चाचा जी ने पापा और मेरे दोनों चाचाओं के विषय में ढेर से यादें खोल कर सामने रख दीं। अपने बचपन की यादें - साथ साथ रहने के समय कैसे वक्त गुजारते थे ?  तब कोई  प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी और न ही आर्थिक स्तर की कोई दीवारें थी।  एक लम्बे अरसे से वे चाचा लोगों से भी नहीं मिले थे।  उनके मित्र चाचाजी का तो निधन हो चुका है लेकिन पापा से छोटे भाई बड़े चाचाजी का हाथ अभी  हमारे सिर पर  है।  उनसे हमने वादा किया कि  अगली बार उन्हें जरूर मिलवाएंगे। उन्होंने भी वादा किया कि जब वे कानपुर आएंगे तो मेरे घर जरूर आएंगे। 

                         ये रिश्ता मेरे लिए अनमोल है और हम छोटे  शहर वाले रिश्तों को जीते हैं , कोई अंकल , आंटी नहीं होता बल्कि चाचा, बुआ , भाई और भाभी होते हैं। हम चाहे फेसबुक पर हों या फिर किसी और तरह से जुड़े हों , मिले हों या न मिले हों लेकिन हमारे रिश्ते देश दुनियां में मिलते हैं और हम उतने ही अपनत्व से उनको स्वीकार करते हैं। हमें गर्व है अपनी संस्कृति और रिश्तों को प्यार देने वाले अपने बुजुर्गों , हमउम्र और छोटों पर।  

रविवार, 6 दिसंबर 2020

कोरोना वैक्सीन !

  कोरोना वैक्सीन 


                                  विगत महीनों से  कोरोना ने पूरे विश्व को अपनी अँगुलियों  पर नचा रखा  है और वह इंसान जिसने  कि सम्पूर्ण प्रकृति से  लेकर नक्षत्रों तक को अपने अनुसन्धान  का विषय ही नहीं बनाया बल्कि उन पर अपनी सफलता भी दर्ज की। लेकिन एक वायरस के आगे कठपुतली बन गया।  इसके लिए वैक्सीन सबसे बड़ी ढाल बनने जा रही है और उसके लिए पूरे विश्व में प्रयास चल रहे हैं। 

                                 सारे लोग उसके लिए बेसब्री से इन्तजार से इन्तजार कर रहे हैं।  लोगों ने कोरोना का सही हल मान लिया है , कुछ लोगों  विवाह जैसे कार्य आगे बढ़ा दिए कि वैक्सीन आ जाए तब करेंगे ताकि बड़े बुजुर्ग सभी शामिल हो सकें लेकिन ये भूल गए कि  वह कोई अलादीन का चिराग नहीं है कि आते ही सबको सुरक्षित कर देगी। उसकी सफलता भी देश , वातावरण और स्थानिक स्थितियों पर भी निर्भर करेगा।  हर व्यक्ति ये चाहता है कि वैक्सीन सफल हो और होगी भी लेकिन कितनी ये तो समय ही बताएगा।  

                              अब जब कि  वैक्सीन का ट्रायल शुरू हो चुका है तो उसके परिणामों का इन्तजार और अभी काम शुरू हुआ ही था कि एक झटका लगा आम आदमी की बात होती तो पता  नहीं चलता लेकिन जब एक मंत्री को ये वैक्सीन लगी और उसके दूसरी खुराक के लगने से पहले ही वह कोरोना से ग्रसित  हो गए।  इन सबकी एक निश्चित प्रक्रिया होती है और उसके पूर्ण होने के पश्चात् उसकी सफलता आँकी जा सकती है। हम बेफिक्र कभी भी नहीं जी सकते हैं क्योंकि ये वायरस अपने रूप और लक्षणों को भी बराबर बदलते रहते हैं। कभी ये होने पर  भी बराबर निगेटिव आता रहता है और इस गलतफहमी में मरीज मौत के मुंह  चला जाता है। कभी तो ये मरीज के छूने या फिर संपर्क में आने पर ग्रस लेता है और कभी बराबर साथ रहने बाद भी सुरक्षित रह जाता है।  कभी कभी पूरा का पूरा परिवार ग्रसित हो जाता है और ठीक भी हो जाता है।  कभी कभी सारी सावधानी के बाद भी वह ग्रसित हो जाता है।  विगत दिनों में 600 डॉक्टर्स के इस से ग्रस्त  होकर मरने का आंकड़ा सामने है , इसके साथ ही कितने कोरोना योद्धा इससे ग्रस्त होने के बाद भी लोगों की सेवा में लगे लगे ही अपने जीवन की पारी हार गए।  

                                  इस वैक्सीन के भरोसे रहना अपने को भुलावे में डालने जैसा ही है। वातावरण में बढ़ता प्रदूषण , कोरोना के वायरस के बदलते स्वरूप ने अपने आधिपत्य को अभी भी कायम रखा है।  परीक्षण में आज भी परिणाम सही प्राप्त ही हो रहे हैं ये हम पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकते हैं। वैक्सीन का  तैयार होना और लगाने के लिए सबसे अधिक जरूरतमंद व्यक्तियों को चुनना भी एक कठिन कार्य है।  हमें किसी भी भुलावे में नहीं रहना है।  अपने को इससे बचाने के लिए वह सारी सावधानियां जो हम बरतते चले आ रहे हैं , उन्हें जीवन को सही तरीके से चलाते रहने के लिए मास्क , सैनिटाइज़र और सामाजिक दूरी का पालन हमेशा के लिए अपना कर चलना होगा।  वैक्सीन की सफलता के बाद भी इन को अपनाना बुरा नहीं है। 

                                  ये भी कहते हुए लोगों को सुना है कि जितना  सावधानी बरती जाती है , उतना ही इसका खतरा बढ़ता है , नहीं तो फेरी वालों , भिखारियों और रिक्शे वालों को कोरोना होते कभी न देखा गया है।  अपना जीवन आपका अपने लिए और इसको कैसे जीना है ? ये आपकी अपनी जिम्मेदारी है।  आपका परिवार आपका है और उसके लिए  स्वयं को सुरक्षित रखना और उन्हें भी सुरक्षित रहना आपके ऊपर है। वैक्सीन मिल जाए तो बहुत अच्छा लेकिन इसके साथ ही आप अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क रहें तभी बचाव है। वैक्सीन कोई गारंटी वाली  चीज नहीं है कि वह आपको पूरी पूरी सुरक्षा देगी। जीवन शैली  अपनाये रहना होगा कि हम सुरक्षित रहें और दूसरों को भी रहने की दिशा की और प्रेरित करें। 

                               

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

हिंदी दिवस और हमारे इरादे !

     
 
                      हमने आज तक देखा कि हिंदी के प्रति बड़ी बड़ी बातें , बड़े बड़े संगठनों और फिर दम तोड़ते उनके इरादे , वादे और हौसले।  हिंदी की नींव  गीतों , कविताओं और कहानियों पर नहीं टिकी  है।  उसको अगर    हम भाषा की जड़ों में खाद पानी देने का कार्य आरम्भ करने की सोचे तो  सिर्फ एक वर्ग विशेष के नारे लगाने से हित  नहीं हो सकता है। हमें अलग तरीके से पहल नहीं करनी होगी।  पहले तो पूरे देश में हिंदी को लागू करने से पहले सभी भारतीय भाषाओँ का सम्मान और उनको समझने और समझाने की पहल करनी होगी।  हम सिर्फ हिंदी की ही बात क्यों करते हैं ? हमें अन्य भारतीय भाषाओँ को आत्मसात करने की बात करनी चाहिए और तभी देश के सभी कोनों से हिंदी , संस्कृत और अन्य भाषाओँ के प्रति रूचि नजर आएगी।
                          हिंदी सिर्फ वर्ग विशेष या सरकार का प्रयास नहीं हो ,   बल्कि इसके सभी के सहयोग की जरूरत है।  इस देश में रहने वाले क्यों भाषाई लकीरों को खींच कर अपने अपने पाले बनायें।  सब एक साथ आएं और सबके पुनर्जीवन का प्रयास करें. चाहे वह आंचलिक भाषाएँ हों या फिर हिंदी।  आंचलिक भाषाओँ को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा और तभी सभी हिंदी को आत्मसात कर पाएंगे। जब अपने स्तर पर ही सही विदेशों में बसे भारतीय हिंदी को स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं तो फिर देश में ही प्रशासनिक स्तर पर इतनी उदासीनता क्यों दिखलाई देती है ? निम्न मध्यम आय वर्ग के लोग बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने के लिए जी जान लगा रहे हैं।  अपना पेट काट रहे हैं , ओवरटाइम कर रहे हैं लेकिन बच्चे को वहीँ पढ़ाना  है।  आखिर कब तक ? जब वे बड़ी कक्षाओं में पहुँचते हैं तो उनकी जरूरतों और बढ़ने लगती हैं
                        इसमें सर्वप्रथम समस्त भाषाओँ के व्याकरण के समन्वयन से कार्य आरभ्य हुआ  और इसके लिए स्वर, व्यंजन , अंक प्रणाली से कार्य आरम्भ किया गया।  हम भूल चुके बारहखड़ी की प्रासंगिकता इस समय सिद्ध हुई की दक्षिण की भाषाएँ जो देव नागरी लिपि में नहीं है , उनकी मात्रा प्रणाली से हमारा परिचय इसी माध्यम से हो सकेगा। 
                      हम पूरे देश में हिंदी थोपने की बात नहीं कर रहे है और न अंग्रेजी को भागने की बल्कि सभी को हम साथ लेकर चलें तो देश में सर्वाधिक प्रयोग होने वाली हिंदी स्वतः आगे बढ़ जाएगी और स्वीकार की जायेगी।  हो सकता है कि इसमें समय लगे लेकिन आजादी से लेकर आज तक जो समय हम खो चुके हैं उससे कम समय में हम हिंदी पर गर्व कर रहे होंगे। 
                             हर बार सवाल उठता है कि दक्षिण भारत में हिंदी का विरोध होता है लेकिन ऐसा नहीं है , कई बार मैंने भी दक्षिण भारतीय लोगों के साथ काम किया है और वे सब टूटी फूटी ही सही हिंदी बोलते हैं और  अपनी बात समझा सकते हैं।  हाँ इस मुद्दे को राजनैतिक रंग लेकर भाषाई विवाद को हमेशा के लिए जिन्दा रखने वाले पूरे देश को एक होता हुआ देखना ही नहीं चाहते हैं।  हमें पूरे देश में हिंदी के प्रति प्रेम और ग्राह्यता  लाने के लिए पाठ्यक्रम में पूरे देश में हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने के लिए प्राथमिक स्तर  से ही कदम उठाना होगा और एक भारतीय भाषा की अनिवार्यता भी रखनी होगी ताकि पूरे देश में ये भाव पैदा हो कि उसके साथ ही शेष भाषाओँ को भी प्राथमिकता दी जा रही है और वे हिंदी को बेझिझक अपना सकेंगे।
                  एक बार हाथ तो बढ़ाएँ पूरा देश एकसूत्र में बँधा होगा ।
 
 

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

रास्ते खुद बनाने पड़ते हैं !

 #रास्ते_खुद_बनाने_पड़ते_हैं !


सच कहूँ अभी Surekha Gupta जी की आपबीती पढ़ी तो अपनी यादें भी फुदकने लगी और मन आया कि जिंदगी वक्त नहीं देगी , चल छीन लेते है और आज तो लिखना ही है ।

          

        पैदा उरई जैसे कस्बे में हुई और अपने घर में तो सब शेर होते हैं । हमारा इण्टर कॉलेज और डिग्री कॉलेज ठीक घर के सामने तो कदम उतने ही चले । लड़कियाँ अकेली कहीं नहीं जाती थीं , बाजार जाना है तो माँ के साथ या छोटी बहन के साथ । बाकी घर में पढ़ाई और लिखाई ।

   

         शादी हुई कानपुर में और ससुराल रही कानपुर विश्वविद्यालय का परिसर । एक तो विश्वविद्यालय ही शहर से दूर जंगल में बसा था । जीटी रोड तक अंदर से पैदल आओ । वैसे इनके पास दोपहिया वाहन था। पर जब कदम बाहर निकलने को हुए तो हम सड़क पर खड़े थे । बी.एड. में एडमीशन हुआ , हमें तो कॉलेज मालूम नहीं था । प्रवेश प्रक्रिया तो बगैर जाये पूरी हो गयी ।


            जिस दिन से कक्षाएँ शुरू होनी थी , इनका टूर था , अब नक्शा बनाकर दे गये GPS  कहेंगे 1981 का । विश्वविद्यालय गेट से टैम्पो ली तो नक्शे के अनुसार चुन्नीगंज उतरे और तीर के अनुसार बाईं ओर मुड़कर सीधे जाना , जब तक दायीं ओर डीडब्ल्यूटी कॉलेज न दिख जाय । चलते चलते थक गये तब कॉलेज मिला और फिर तो रोज का रुटीन हो गया लेकिन ज्यादा दिन नहीं चल सका क्योंकि बी.एड. तो हमको करना ही नहीं था , नहीं तो उरई में मेरिट में नाम आने के बाद भी मैंने नहीं किया था । बेटी दो महीने की थी , जाना और आना पूरा दिन लग जाता । तय रहा कि वही पास में अस्थायी निवास खोजा जाय ताकि समय न लगे । 

    

          विक्टोरिया मिल के पास मिल मजदूरों के बीच एक कमरा बरामदा मिला , सासु माँ मेरे साथ चली और जेठ जी ससुर जी के पास विश्वविद्यालय निवास पर रहे । लंच टाइम में लम्बे लम्बे डग भर कर घर आती बेटी को फीड कराती और तुरंत वापस कॉलेज । लंबा रास्ता छोड़कर शॉर्टकट खोजा और घर जल्दी आ जाती ।


        इसके बाद 1984 में हम इंदिरा नगर शिफ्ट हो गये और वह भी जीटी रोड से काफी दूर । कल्यानपुर तक पैदल आइये  फिर शहर की ओर टैम्पो मिलता था ।  फिर नौकरी मिली जुहारी देवी गर्ल्स डिग्री कॉलेज में । पहले दिन फिर पतिदेव की मीटिंग नक्शा थमा कर चले गये । उस तरफ कभी जाना भी नहीं हुआ था । चल दिये GPS के साथ पूछते पाछते पहुँच ही गये । 


                छः महीने बाद ही आईआईटी में नौकरी मिल गयी । वह काफी पास था और सीधे गेट तक टैम्पो और फिर रिक्शा । तो जिंदगी में सारे रास्ते खुद ही खोजने पड़ते हैं , चाहे जितनी भीड़ हो । 


          मंजिलें तो सबको मिलती हैं , कभी हथेली पर रखी और कभी पीछा करते करते छाले पड़ जाते हैं । हौसले बुलंद हों तो  हार नहीं होती । 





रविवार, 26 जुलाई 2020


कारगिल विजय दिवस !      

                   भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले युद्धों की शृंखला में 1965, 1971 के युद्धों में मुँह की खाने के बाद भी वह अपनी आतंकी गतिविधियों से बाज नहीं आया । घुसपैठ के नाम पर पाकिस्तान की नापाक गतिविधियां हमेशा चलती रहती हैं लेकिन शांति का छद्म आवरण ओढ़कर दोनों देशों के बीच फरवरी 1999 में लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गये , जिसमें कश्मीर मुद्दे को दोनों पक्षों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का वादा किया गया था ।
          इसके बाद भी पाकिस्तान हर बार की तरह वादा खिलाफी करके अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया और उसने चोरी छुपे अपने सैनिकों को नियंत्रण रेखा के पार भेजने का दुस्साहस भी करने लगा और अपने इस काम को उन्होंने "ऑपरेशन बद्र" नाम दिया । उनका इस कार्य के पीछे की मंशा कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़ना और सियाचिन ग्लेशियर से भारतीय सेना से हटा कर खुद कब्जा करने के बाद एक और विवाद खड़ा करके इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की थी ।
            भारत ने इसे साधारण घुसपैठ मानकर सोचा कि इन्हें कुछ दिनों में ही पीछे धकेल दिया जायगा । जब नियंत्रण रेखा पर पहुँचने के बाद पता चला कि उनकी सीमा में साधारण घुसपैठ नहीं थी बल्कि एक बड़े युद्ध की तैयारी कर रखी थी । वास्तविकता से वाकिफ होने के बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय नाम से 2,00,000 सैनिकों को भेजा गया ।
         कारगिल युद्ध मई 1999 को आरम्भ हुआ और लगभग दो महीने बाद 26 जुलाई 1999 को हमारे लगभग 527  सैनिकों की शहादत और 1300 जवानों को घायल करने के बाद समाप्त हुआ । इन जवानों में सब नवयुवा सैनिक थे , जिन्होंने जीवन के छोटे सी अवधि में इतना सब कर  डाला कि सम्पूर्ण विश्व में तारीफ की गई । इन सभी शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य या बलिदान की सदियों से चली आ रही परम्परा को कायम रखा , जिसकी सौगंध हर जवान वर्दी पहन कर राष्ट्रीय ध्वज के समक्ष लेता है । एक जुनून होता है इन वीरों में । जब दुश्मन इनके सामने होता है तो इनको सिर्फ करो या मारो की घुन सवार होती है और सिर पर कफन बाँध कर ही चलते हैं।  सभी का जज्बा देखने काबिल होता है।
               इन सभी जवानों के सरहद पर जाने से पहले अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी बच्चों से जल्दी ही आने का वादा किया होगा , और वापस आये भी लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए , जिसकी रक्षा करने हुए वे बलिदान हुए और नाम भारत के इतिहास में लिखवा कर अमर हो गये । हर भारतीय का रोम रोम उनका कर्जदार है और हमेशा रहेगा।

 श्रीमद्भगवद गीता के द्वितीय अध्याय के 37 वे श्लोक में  कृष्ण का अर्जुन को दिया गया सन्देश :

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।।2.37।।


(या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।)

गीता के इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को पाँव पीछे खींचने के लिए मजबूर कर दिया था।
      यह विजय दिवस उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का है,  जो अपना जीवन को दाँव पर लगा कर  मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। हिमालय से ऊँचा था साहस उनका हम उनको शत शत नमन करते हैं।  कुछ उन वीरों के विषय में संक्षिप्त में जान लेते हैं , जिन्होंने अपने को न्योछावर कर अपने परिवार, बटालियन , देश का नाम ऊँचा किया।

कैप्टेन मनोज कुमार पांडेय :
जन्म : 25 जून 1975, सीतापुर, उत्तर प्रदेश
शहीद हुए : 3 जुलाई 1999 (24 वर्षीय)
यूनिट : 11 गोरखा राइफल की पहली बटालियन (1/11 जीआर)
मरणोपरांत परम वीर चक्र
शौर्य गाथा:

 1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज पांडेय की बहादुरी की इबारत आज भी बटालिक सेक्टर के ‘जुबार टॉप’ पर लिखी है। अपनी गोरखा पलटन लेकर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ‘काली माता की जय’ के नारे के साथ उन्होंने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में लड़ते हुए मनोज पांडेय ने दुश्मनों के कई बंकर नष्ट कर दिए।

           कारगिल युद्ध के दौरान 11 जून को उन्होंने बटालिक सेक्टर से दुश्मन सैनिकों को खदेड़ दिया। उनके नेतृत्व में सैनिकों ने जुबार टॉप पर कब्जा किया। वहां दुश्मन की गोलीबारी के बीच भी आगे बढ़ते रहे। कंधे और पैर में गोली लगने के बावजूद दुश्मन के पहले बंकर में घुसे। हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट में दो दुश्मनों को मार गिराया और पहला बंकर नष्ट किया। उनके साहस से प्रभावित होकर सैनिकों ने दुश्मन पर धावा बोल दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना वे एक बंकर से दूसरे बंकर में हमला करते गए।

                      गम्भीर रूप से घायल होने के बावजूद मनोज अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। भारतीय सेना की ‘साथी को पीछे ना छोडने की परम्परा’ का मरते दम तक पालन करने वाले मनोज पांडेय को उनके शौर्य व बलिदान के लिए मरणोपरांत ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।


राइफलमैन संजय कुमार 
जन्म: 3 मार्च, 1976 को विलासपुर हिमाचल
यूनिट :13 JAK RIF
परमवीर चक्र
राइफलमैन संजय कुमार का जन्म 3 मार्च, 1976 को विलासपुर हिमाचल प्रदेश के एक गांव में हुआ था। मैट्रिक पास करने के तुरंत बाद वह 26 जुलाई 1996 को फौज में शामिल हो गए। कारगिल युद्ध के दाैरान संजय 4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप प्वाइंट 4875 की ओर कूच करने के लिए राइफल मैन संजय ने इच्छा जताई की कि वह अपनी टुकड़ी के साथ अगली पंक्ति में रहेंगे।
संजय जब हमले के लिए आगे बढ़े तो एक जगह से दुश्मन ओटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी और टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसे में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए संजय ने तय किया कि उस ठि
राइफल मैन इस मुठभेड़ में खुद भी लहूलुहान हो गए थे, लेकिन अपनी ओर से बेपरवाह वह दुश्मन पर टूट पड़े। इस आकस्मिक आक्रमण से दुश्मन बौखला कर भाग खड़ा हुआ और इस भगदड़ में दुश्मन अपनी यूनीवर्सल मशीनगन भी छोड़ गया। संजय कुमार ने वह गन भी हथियाई और उससे दुश्मन का ही सफाया शुरू कर दिया।
संजय के इस चमत्कारिक कारनामे को देखकर उसकी टुकड़ी के दूसरे जवान बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने बेहद फुर्ती से दुश्मन के दूसरे ठिकानों पर धावा बोल दिया। इस दौर में संजय कुमार खून से लथपथ हो गए थे लेकिन वह रण छोड़ने को तैयार नहीं थे और वह तब तक दुश्मन से जूझते रहे थे, जब तक वह प्वाइंट फ्लैट टॉप दुश्मन से पूरी तरह खाली नहीं हो गया। इस तरह राइफल मैन संजय कुमार ने अपने अभियान में जीत हासिल की।
ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव 
जन्म: 10 मई 1980, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर
यूनिट : 18वीं ग्रेनेडियर्स
ग्रेनेडियर, बाद में सूबेदार मेजर
परमवीर चक्र
सबसे कम आयु में ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाले इस वीर योद्धा योगेंद्र सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के औरंगाबाद अहीर गांव में 10 मई, 1980 को हुआ था। 27 दिसंबर, 1996 को सेना की 18 ग्रेनेडियर बटालियन में भर्ती हुए योगेंद्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सेना की ही रही है, जिसके चलते वो इस ओर तत्पर हुए। उनके पिता भी करन सिंह यादव भी भूतपूर्व सैनिक थे वह कुमायूं रेजिमेंट से जुड़े हुए थे और 1965 तथा 1971 की लड़ाइयों में हिस्सा लिया था।
कारगिल युद्ध में योगेंद्र का बड़ा योगदान है। उनकी कमांडो प्लाटून 'घटक' कहलाती थी। उसके पास टाइगर हिल पर कब्जा करने के क्रम में लक्ष्य यह था कि वह ऊपरी चोटी पर बने दुश्मन के तीन बंकर काबू करके अपने कब्जे में ले। इस काम को अंजाम देने के लिए 16,500 फीट ऊंची बर्फ से ढकी, सीधी चढ़ाई वाली चोटी पार करना जरूरी था।
इस बहादुरी और जोखिम भरे काम को करने का जिम्मा स्वेच्छापूर्णक योगेंद्र ने लिया और अपना रस्सा उठाकर अभियान पर चल पड़े। वह आधी ऊंचाई पर ही पहुंचे थे कि दुश्मन के बंकर से मशीनगन गोलियां उगलने लगीं और उनके दागे गए राकेट से भारत की इस टुकड़ी का प्लाटून कमांडर तथा उनके दो साथी मारे गए। स्थिति की गंभीरता को समझकर योगेंद्र ने जिम्मा संभाला और आगे बढ़ते बढ़ते चले गए। दुश्मन की गोलाबारी जारी थी। योगेंद्र लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहे थे कि तभी एक गोली उनके कंधे पर और दो गोलियां जांघ व पेट के पास लगीं लेकिन वह रुके नहीं और बढ़ते ही रहे। उनके सामने अभी खड़ी ऊंचाई के साठ फीट और बचे थे।
उन्होंने हिम्मत करके वह चढ़ाई पूरी की और दुश्मन के बंकर की ओर रेंगकर गए और एक ग्रेनेड फेंक कर उनके चार सैनिकों को वहीं ढेर कर दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना यादव ने दूसरे बंकर की ओर रुख किया और उधर भी ग्रेनेड फेंक दिया। उस निशाने पर भी पाकिस्तान के तीन जवान आए और उनका काम तमाम हो गया। तभी उनके पीछे आ रही टुकड़ी उनसे आकर मिल गई।
आमने-सामने की मुठभेड़ शुरू हो चुकी थी और उस मुठभेड़ में बचे-खुचे जवान भी टाइगर हिल की भेंट चढ़ गए। टाइगर हिल फतह हो गया था और उसमें योगेंद्र सिंह का बड़ा योगदान था। अपनी वीरता के लिए ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह ने परमजजवीर चक्र का सम्मान पाया और वह अपने प्राण देश के भविष्य के लिए भी बचा कर रखने में सफल हुए यह उनका ही नहीं देश का भी सौभाग्य है।

कैप्टन विक्रम बत्रा
जन्म: 9 सितंबर, 1974, पालमपुर, हिमाचल प्रदेश
शहीद हुए : 7 जुलाई, 1999 (24 वर्ष)
यूनिट : 13 जेएंडके राइफल
परम वीर चक्र
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पासआउट होने के बाद 6 दिसंबर, 1997 को लेफ्टिनेंट के तौर पर सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बटालियन 13 जम्मू एंड कश्मीर रायफल 6 जून को द्रास पहुंची। 19 जून को कैप्टन बत्रा को प्वाइंट 5140 को फिर से अपने कब्जे में लेने का निदेश मिला। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन के लगातार हमलों के बावजूद उन्होंने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए और पोजीशन पर कब्जा किया। उनका अगला अभियान था 17,000 फीट की ऊंचाई पर प्वाइंट 4875 पर कब्जा करना। पाकिस्तानी फौज 16,000 फीट की ऊंचाई पर थीं और बर्फ से ढ़कीं चट्टानें 80 डिग्री के कोण पर तिरछी थीं।
7 जुलाई की रात वे और उनके सिपाहियों ने चढ़ाई शुरू की। अब तक वे दुश्मन खेमे में भी शेरशाह के नाम से मशहूर हो गए थे। साथी अफसर अनुज नायर के साथ हमला किया। एक जूनियर की मदद को आगे आने पर दुश्मनों ने उनपर गोलियां चलाईं, उन्होंने ग्रेनेड फेंककर पांच को मार गिराया लेकिन एक गोली आकर सीधा उनके सीने में लगी। अगली सुबह तक 4875 चोटी पर भारत का झंडा फहरा रहा था। इसे विक्रम बत्रा टॉप नाम दिया गया। उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन अनुज नायर
जन्म : 28 अगस्त, 1975 दिल्ली
शहीद हुए : 7 जुलाई, 1999 (24 वर्ष)
यूनिट : 17 जाट रेजीमेंट
मरणोपरांत महावीर चक्र
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पासआउट होने के बाद जून, 1997 में जाट रेजिमेंट की 17वीं बटालियन में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उनका पहला अभियान था प्वाइंट 4875 पर कब्जा करना। यह चोटी टाइगर हिल की पश्चिमी ओर थी और सामरिक लिहाज से बेहद जरूरी। इसपर कब्जा करना भारतीय सेना की प्राथमिकता थी। अभियान की शुरुआत में ही नैयर के कंपनी कमांडर जख्मी हो गए। हमलावर दस्ते को दो भागों में बांटा गया। एक का नेतृत्व कैप्टन विक्रम बत्रा ने किया और दूसरे का कैप्टन अनुज ने। कैप्टन अनुज की टीम में सात सैनिक थे, जिनके साथ मिलकर उन्होंने दुश्मन पर चौतरफा वार किया।
कैप्टन अनुज ने अकेले नौ पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और तीन दुश्मन बंकर ध्वस्त किए। चौथे बंकर पर हमला करते समय दुश्मन ने उनकी तरफ रॉकेट से चलने वाली ग्रेनेड फेंका जो सीधा उनपर गिरा। बुरी तरह जख्मी होने के बाद भी वे बचे हुए सैनिकों का नेतृत्व करते रहे। शहीद होने से पहले उन्होंने आखिरी बंकर को भी तबाह कर दिया। दो दिन बाद दुश्मन सेना ने फिर से चोटी पर हमला किया जिसका जवाब कैप्टन विक्रम बत्रा की टीम ने दिया। कैप्टन नायर को मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया।

कैप्टन नीकेजाकुओ कैंगुरूसे
जन्म: 15 जुलाई, 1974 नरहेमा, कोहिमा जिला, नगालैंड
शहीद हुए : 28 जून, 1999
यूनिट : 2 राजपूताना राइफल
मरणोपरांत महावीर चक्र
शौर्य गाथा: 12 दिसंबर, 1998 में सेना में भर्ती हुए। जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, वे राजपूताना रायफल बटालियन में जूनियर कमांडर थे। उनकी दृढ़ता और दिलेरी के कारण उन्हें अपनी बटालियन के घातक प्लाटून का नेतृत्व सौंपा गया। 28 जून की रात कैप्टन कैंगुरूसे के प्लाटून को ब्लैक रॉक नामक टीले से दुश्मन को खदेड़ने की जिम्मेदारी मिली। टीले पर चढ़ाई के दौरान ऊपर से दुश्मन के लगातार हमले में कई सैनिक शहीद हुए और खुद कैप्टन को कमर में गोली लगी, लेकिन वे रुके नहीं।
ऊपर पहुंचकर वे एक पत्थर की आड़ में टीले के किनारे लटके रहे। 16,000 फीट ऊंचाई और -10 डिग्री तापमान में बर्फ पर लगातार उनके जूते फिसल रहे थे। लौटकर नीचे आना ज्यादा आसान था, लेकिन वे अपने जूते उतारकर नंगे पैर टीले पर चढ़े और आरपीजी रॉकेट लांचर से सात पाकिस्तानी बंकरों पर हमला किया। दो दुश्मनों को कमांडो चाकू से मार गिराया और दो को अपनी रायफल से। दुश्मनों की गोलियों से छलनी होकर वे टीले से नीचे आ गिरे, लेकिन इतना कर गए कि उनके प्लाटून ने टीले पर कब्जा कर लिया। इस दिलेरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा
जन्म: 22 मई, 1963 कोटा, राजस्थान
शहीद हुए : 27 मई 1999
यूनिट : गोल्डन ऐरोज, स्क्वाड्रन नंबर 17
मरणोपरांत वीर चक्र
शौर्य गाथा: नेशनल डिफेंस एकेडमी से पासआउट होने के बाद 14 जून, 1985 को फाइटर पायलट के तौर पर भारतीय वायु सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान नियंत्रण रेखा के इस तरफ की स्थिति का जायजा लेने के लिए ऑपरेशन सफेद सागर लांच किया गया। इसमें शामिल फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता के मिग-27एल विमान के इंजन में आग लगने के बाद वह उसमें से बाहर कूदे।
स्क्वाड्रन लीडर आहूजा अपने मिग-21एमएफ विमान में दुश्मन की पोजीशन के ऊपर उड़ान भरते रहे ताकि बचाव दल को नचिकेता की लोकेशन की जानकारी देते रहें। उन्हें अच्छी तरह पता था कि दुश्मन कभी भी उन पर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल दाग सकता है। हुआ भी ऐसा ही, कुछ ही देर में उनके विमान पर एमआइएम-92 स्ट्रिंगर से वार हुआ। वे अपने विमान से बाहर कूदे। अब वायु सेना को एक नहीं दो बचाव अभियानों को अंजाम देना था। लेकिन वायु सेना को उनकी लोकेशन की जानकारी नहीं मिली। पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें बंदी बनाकर बेरहमी से उनकी हत्या कर दी। उनके पार्थिव शरीर पर कई गंभीर घावों के निशान दिखे। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

हवलदार यश वीर सिंह तोमर
जन्म: 04 जनवरी, 1960 सिरसाली, उत्तर प्रदेश
शहीद हुए : 13 जून, 1999
यूनिट : 2 राजपूताना राइफल
मरणोपरांत वीर चक्र
शौर्य गाथा: कारगिल युद्ध के दौरान 18 ग्रेनेडियर्स को तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का निर्देश मिला। ग्रेनेडियर्स के कई विफल प्रयासों के बाद राजपूताना रायफल की दूसरी बटालियन को हमले के लिए आगे किया गया। ग्रेनेडियर्स ने तीन प्वाइंट से राजपूताना को कवर दिया। मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में 90 सैनिक अंतिम हमले के लिए आगे बढ़े। इसी पलटन में यश वीर भी शामिल थे। यह पलटन प्वाइंट 4950 को अपने कब्जे में लेने के आखिरी चरण में थी।
12 जून को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलाबारी के बीच जब भारतीय सैनिक एक एक कर शहीद हो रहे थे, तो हवलदार यश वीर सिंह ने ग्रेनेड लेकर पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोला। उन्होंने बंकरों पर 18 ग्रेनेड फेंके और दुश्मनों को मार गिराया। उनके साहस को देखकर दुश्मनों के छक्के छूट गए। उनके पैर उखड़ने शळ्रू ही हुए थे कि इस दौरान वे गंभीर रूप से जख्मी हुए और शहीद हो गए। जब उनका शरीर मिला तो उसके एक हाथ में रायफल और दूसरे में ग्रेनेड थे। तोलोलिंग फतह करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन सौरभ कालिया
जन्म: 29 जून, 1976 अमृतसर, पंजाब
शहीद हुए : 9 जून, 1999
यूनिट : 4 जाट रेजीमेंट
शौर्य गाथा: कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज के जरिए दिसंबर, 1998 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी में भर्ती हुए। जाट रेजिमेंट की चौथी बटालियन में पहली पोस्टिंग कारगिल में मिली। जनवरी, 1999 में उन्होंने कारगिल में रिपोर्ट किया। मई के शुरुआती दो हफ्तों में कारगिल के ककसर लांग्पा क्षेत्र में गश्त लगाते हुए उन्होंने बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों और विदेशी आतंकियों को एलओसी के इस तरफ देखा।
15 मई को अपने पांच साथियों- सिपाही अर्जुन राम, भंवर लाल बगारिया, भीका राम, मूला राम और नरेश सिंह के साथ लद्दाख की पहाड़ियों पर बजरंग पोस्ट की तरफ गश्त लगाने गए। वहां पाकिस्तानी सेना की तरफ से अंधाधुंध फार्यंरग का जवाब देने के बाद उनके गोला- बारूद खत्म हो गए। इससे पहले की भारतीय सैनिक वहां मदद लेकर पहुंच पाते, पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें बंदी बना लिया। पाकिस्तानी रेडियो स्कार्दू ने खबर चलाई कि कैप्टन सौरभ कालिया को बंदी बना लिया गया है। उन्हें 15 मई से 7 जून (23 दिन) तक बंदी रखा गया और घृणित अमानवीय बर्ताव किया गया। 9 जून को उनके शरीर को भारतीय सेना को सौंपा गया।

मेजर राजेश सिंह अधिकारी
जन्म: 25 दिसंबर, 1970 नैनीताल, उत्तराखंड
शहीद हुए : 30 मई, 1999 (उम्र 28 वर्ष)
यूनिट : 18 ग्रेनेडियर्स
मरणोपरांत वीर चक्र 
शौर्य गाथा: इंडियन मिलिट्री एकेडमी से 11 दिसंबर, 1993 को सेना में भर्ती हुए। कारगिल युद्ध के दौरान 30 मई को उनकी यूनिट को 16,000 फीट की ऊंचाई पर तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह पोजीशन भारतीय सेना के लिए बेहद अहम थी क्योंकि यहीं पर भारतीय सेना बंकर बनाकर टाइगर हिल पर बैठे दुश्मनों पर निशाना साध सकती थी। जब मेजर अधिकारी अपने सैनिकों के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे तो दुश्मनों ने दो बंकरों से उनपर हमला करना शुरू किया।
12 जून को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलाबारी के बीच जब भारतीय सैनिक एक एक कर शहीद हो रहे थे, तो हवलदार यश वीर सिंह ने ग्रेनेड लेकर पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोला। उन्होंने बंकरों पर 18 ग्रेनेड फेंके और दुश्मनों को मार गिराया। उनके साहस को देखकर दुश्मनों के छक्के छूट गए। जब उनका शरीर मिला तो उसके एक हाथ में रायफल और दूसरे में ग्रेनेड थे। तोलोलिंग फतह करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

 
* शहीदों के विषय में जानकारी का स्रोत गूगल है।


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गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरियाली तीज !


                 



  हरियाली तीज का उत्सव सावन के महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह नाग पंचंमी के दो दिन पहले होता है और यह उत्सव भी सावन  के अन्य उत्सवों की तरह से महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी हरी दिखलाई देती है और ऐसे में किसी का भी मन उस प्रकृति के बीच नाचने और गाने का करता है। इसमें स्वभाव के अनुसार महिलायें उल्लसित मन से इस तीज पर सज संवर कर , हाथों और पैरों में मेंहदी सजा कर अधिकतर हरी या रंग बिरंगी साड़ियों में और आभूषणों से सजी पेड़ों पर पड़े झूले पर झूलती हुई आपस में चुहल करती उत्सव को और हास परिहास से पूर्ण बनाती हैं।
                    सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत काफी मायने रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों तरफ हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। रिमझिम फुहारों के बीच तन-मन जैसे नृत्य करने लगता है। महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और खुशियां मनाती हैं। इस उत्सव में हर उम्र की महिलायें और लडकियाँ शामिल होती है।  नव विवाहित युवतियां प्रथम सावन में मायके आकर इस हरियाली तीज में सम्मिलित होने की परम्परा है। हर‌ियाली तीज के द‌िन सुहागन स्‍त्र‌ियां हरे रंग का ऋृंगार करती हैं। नवविवाहिता लड़कियां अगर अपने मायके में होती है तो ससुराल से उनके लिए श्रृंगार का सामान , आभूषण , सजे हुए कपड़े और मिठाई आदि भेजी जाती है और अगर वह अपनी ससुराल में होती है तो मायके से उसके लिए यही सब सामान भेजा जाता है , जिसे वह अपनी सास या घर की अन्य बुजुर्ग महिलाओं को देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।  उत्तर प्रदेश में जो सामान वधु या बेटी के लिए भेजा जाता है उसे श्रावणी कहते हैं।             
                               हरियाली  तीज के अनेक भागों में मनाई जाती है, परन्तु राजस्थान के जयपुर में इसका विशेष महत्त्व है। तीज का आगमन भीषण ग्रीष्म ऋतु के बाद पुनर्जीवन व पुनर्शक्ति के रूप में होता है। यदि इस दिन वर्षा हो, तो यह और भी स्मरणीय हो उठती है। लोग तीज जुलूस में ठंडी बौछार की कामना करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होने पर काले - कजरारे मेघों को आकाश में घुमड़ता देखकर पावस के प्रारम्भ में पपीहे की पुकार और वर्षा की फुहार से आभ्यंतर आनन्दित हो उठता है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन  हरियाली तीज का पर्वोत्सव मनाता है।