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सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

पुरुष विमर्श - 3

 पुरुष विमर्श - 3 


निम्न मानसिकता 


              आज की कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मेरे गिर्द भी घट रहा था और मैं निर्विकार उसको समझ रही थी । तब तो इसे लिखने के बारे में नहीं सोचा था।

                रमित चार भाई बहनोंं मेंं दूसरे स्थान पर था। अच्छी कम्पनी में मैनेजर था । सभी एक अच्छी लड़की की खोज में थे और एक रिश्तेदार ने उन्हें ये रिश्ता बताया ।

                इसमें कोई दो राय नहीं थी कि लड़की खूबसूरत थी और डॉक्टर भी थी। लड़के के परिवार में बड़ी बहन को छोड़ कर सभी इंजीनियर थे और वे सभी खूबसरत थे।  बड़े उत्साह से शादी की गई । करीब एक महीने दीपिका ने छुट्टी ली और ठीक से रही लेकिन आधा समय तो घूमने में गुजर गया और आधा इधर उधर जाने आने में ।

                  अब शुरू हुई उसकी सोच का दाँव पेंच में उतारना क्योंकि वह माँ बनने की स्थिति में आ चुकी थी और फिर बिस्तर से उठना गवारा नहीं था । सास ससुर, ननद और देवर को भी घर में आने वाले नन्हें मुन्ने के आने का उत्साह आ गया था । बहू और भाभी हाथों हाथ ली जा रही थी । वह तो सोच रही थी कि इसी समय कुछ लड़ने झगड़ने का मौका मिलेगा और वह यहाँ से भाग लेगी । उसकी नौकरी भी पति के नौकरी स्थल से कुछ घण्टे की दूरी पर थी ।

                  इस बीच उसने कई मौके खोजे , अपनी चीजों की चोरी का आरोप घर वालों पर लगाया लेकिन चीज बरामद होने पर गलत साबित हुई तो खिसियानी बिल्ली बन कर वह मायके चली गई । फिर वहीं पर बेटा हुआ और उसने घर आने से इंकार कर दिया तो सारे घर वाले मनाने पहुँच गये कि घर की पूजा वगैरह तो वहीं होंगी तो उसकी माँ ने भेजने से मना कर दिया ।

                  सब वापस लौट आये । रमित कुछ दिन वहीं रहा और घर वाले बच्चे के मोह में आते जाते रहे । एक दिन जब ये लोग पहुँचे तो घर में ताला बंद था और फोन भी बंद था। पता नहीं लग पाया । रमित ने पता किया तो उसने अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली थी और बच्चे के लिए माँ को ले गई थी।

                  शनिवार और रविवार रमित वहाँ जाता रहता था कि कभी तो सही होगी, अब तो बच्चा भी हो गया है। वह छुट्टी में वहाँ जाने लगी । पाँच दिन अपनी नौकरी पर रहती । अपने घर का सपना पूरा करना चाह रही थी । ससुर पर दबाव डालने लगी कि मकान बेचकर आधा पैसा दो मैं अपना मकान लूँगी। ससुर ने मना कर दिया कि अभी मुझे अपनी बेटी और एक बेटे की शादी करनी है।

                 उसने पति को घर जाने से रोक दिया और जब भी गया उसने तमाशा खड़ा कर दिया। मैं और उसकी बहन एक साथ काम करते थे।  दिल्ली में हम लोग कांफ्रेंस के लिए गए , हम लोग एक ही रूम को शेयर कर रहे थे।  मैं सारी चीजों से वाकिफ थी।  वह मुझसे बोली कि मैं भैया से मिलने जा रही हूँ और लौट कर आयी तो वह मेरे गले लग कर फूट फूट कर रोयी। मैंने उसे चुप कराया और पूछा बात क्या हुई ? 

                  तब उसने बताया कि भैया मुझे घर नहीं ले गए बल्कि उन्होंने बताया कि जब मैं पिछली बार उनके घर गयी थी तो लौट कर उसने बहुत कहर बरपाया कि "तुम्हारी बहन मेरे घर में क्यों आयी थी ? इसी बैड पर बैठी होगी , उसने मेरे बेड को कैसे प्रयोग किया ? मेरी अनुपस्थिति में आने की जरूरत क्या थी ? आइंदा मेरे घर में आने की कोई जरूरत नहीं है।" 

                       मैंने उसे बहुत समझाया और उसकी काउंसलिंग करके ठीक किया।  भाभी उसकी शादी भी जहाँ बात चलती, गलत बातें फैला कर होने न देती बल्कि उसने चुनौती दे रखी थी कि बाकियों की मैं शादी न होने दूँगी। 

                     उसके रोज रोज के बढ़ते अत्याचारों से एक दिन पति ने आत्महत्या की कोशिश की , लेकिन डोज़ कुछ कम थी और वह तीन दिन बेहोश रहकर ठीक हो गया।  लेकिन अवसाद में इतना डूब चुका था कि उसने बगैर बताये होटल में कमरा लेकर रहने लगा।  उसके जीवन से ऑफिस वाले भी अवगत थे क्योंकि वह बहुत ही सुलझा हुआ इंसान था।  जब उसकी समस्या का कोई समाधान नहीं निकला तो उसने अपनी कंपनी में बात करके बाहर भेजने की बात की और कंपनी ने उसको बाहर भेज दिया।  फिर वह न भाई की शादी में आया और न ही बहन की शादी में। वह आज भी बाहर ही है। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वह कहाँ है ? सब यहाँ से वहीँ शिफ्ट हो गए।

बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

झांसे का मनोविज्ञान !

 झाँसे का मनोविज्ञान !

 

                          झाँसा आज के युग में ही नहीं बल्कि ये प्राचीन काल से चला आ रहा है और इससे जुड़ा हुआ रहता कोई एक अपराध , जो कि इसका जनक होता है। कुछ सीधे सादे लोग और कुछ धूर्त और चालाक लोग इसका फायदा उठाने की नियत का शिकार हमेशा से होते रहे हैं। जब सत्य सामने आता है तो कोई न कोई सिर पीट कर रह जाता हैं या फिर क़ानून के लम्बे पचड़े में फँस कर घुट घुट कर जीने को मजबूर होते हैं। 

विश्वास की हत्या :--

                             ये झाँसा किसी बहुत अपने द्वारा दिया जाता रहा है , तभी तो जल्दी विश्वास कर लिया जाया है और उन्हें पता नहीं होता है कि उनके विश्वास की हत्या हो रही है। जो झाँसा देने वाला होता है, उसको पूरा विश्वास होता है कि सामने वाला उसके ऊपर पूरा विश्वास  करता है और उसके पास शक करने की कोई भी गुंजाइश नहीं है। हम कुछ भी कर सकते हैं। वह झाँसा देने में पूरी तरह से सफल होगा। अपने विश्वास को वह कई तरह से प्रयोग करता है - कभी बेटे और बेटी की शादी में - किसी भी तरह की कमी युक्त लड़के या लड़की का रिश्ता करवाना और असलियत को छिपा देना , नौकरी का झाँसा देकर रकम वसूल कर लेना , शादी का झाँसा देकर लड़की का दैहिक शोषण करते रहना , प्रमोशन के लिए लड़की या लडके को झाँसे में रख कर शोषण करना या फिर रुपये ऐंठना। कुल मिला कर विश्वास की हत्या ही होती है।

लालच की प्रवृत्ति :- 

                           इस झाँसे का शिकार हमेशा लालच की प्रवृत्ति रखने वाले लोग होते हैं। बगैर मेहनत के कुछ पा लेने का लालच - कम समय में पैसे का दुगुना मिलना , सरकारी नौकरी का लालच , शादी का लालच (विशेषतौर पर बॉस या किसी पैसे वाले लडके के साथ सम्बन्ध करने का लालच) , विदेश में नौकरी का लालच , बच्चे को शहर से बाहर अच्छे काम दिलवाने के लालच में आना। अपनी कमिओं को कोई भी नहीं समझना चाहता है और बगैर किसी मेहनत के बहुत कुछ पा  लेने का लालच की प्रवृत्ति ही इसके लिए जिम्मेदार होती है। असलियत से परिचित होने पर सिर्फ सिर पीट कर रह जाते हैं और कभी भी खोई हुई चीज वापस नहीं मिलती है।

पीड़ित खुद जिम्मेदार :- 

                              झाँसे के लिए पीड़ित खुद जिम्मेदार होता है क्योंकि वह अपने स्वार्थ के लिए स्वयं समझौता करता है।  वह समझौता चाहे पैसे का हो , रिश्ते का हो।  इस जगह कोई भी जबरदस्ती नहीं होती है बल्कि लड़कियों के मामले में चाहे गरीबी हो , बड़े घर में शादी का मामला हो , प्रमोशन का मामला या फिर नौकरी का मामला हो।  आपको कोई मजबूर नहीं कर सकता है , अगर आप खुद कहीं भी समझौता न करना चाहे तो ? आपको अच्छी नौकरी चहिए होती है, तो मालिक के झाँसे में आ सकते हैं , यह बात दोनों पक्षों पर लागू होती है। जो शिकायत लेकर आते हैं , वे खुद ही स्वार्थ में लिपटे हुए होते हैं और अगर आप सही रास्ते पर चलने वाले हों तो आपको कोई झाँसे में ले नहीं सकता है।

दण्ड का प्राविधान :-                

                            अगर झाँसे देने वालों के लिए दण्ड का प्राविधान है तो फिर झाँसे के लालच में लिप्त होने वाले के लिए भी दण्ड का प्राविधान होना चाहिए।  जब तक आपको अपने स्वार्थ सिद्धि की आशा रही आप शोषित होते रहे और जब सफल होते न दिखाई दिए तो क़ानून की सहायता लेने पहुँच गए , आखिर क्यों ? जब आप अपने स्वार्थ सिद्धि होते देख रहे थे तब तो आपने क़ानून से सलाह नहीं ली थी। आप दोषारोपण के लिए जब आते हैं तो उतने ही अपराधी होते हैं जितना कि दूसरा। 

                           झाँसे का मनोविज्ञान है यही कि कोई फायदा उठा है और कोई किसी फायदे को अपनी स्वार्थसिद्धि की बैशाखी बना कर प्रयोग करता है।  लालची हमेशा झाँसे में आने वाला होता।  इस मनोविज्ञान को समझ कर दोनों ही आपराधिक श्रेणी में रखा जाना चाहिए। पहले तो इस झाँसे में आने की प्रवृत्ति को  मन में पनपने  नहीं देना चाहिए।

 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

पुरुष विमर्श - 2

बेटी की जगह !

               

             परिवार उससे जुड़ा था, जिसने दोनों को मुझसे मिलवाया। सीमा भी गई थी लड़की वालों के यहाँ गोद भराई में। बहुत बड़ा समारोह नहीं किया गया था। रिश्ते की नींव ही झूठ और फरेब पर रखी गई थी। शायद लड़की कुछ मानसिक रूप से स्वस्थ भी न थी और माँ-बाप दूर के रिश्तेदार का वास्ता देकर प्रस्ताव लेकर आये। 

               लड़के के परिवार में सिर्फ माता-पिता और दो भाई थे। सम्पन्न परिवार और दोनों बेटे पत्रकारिता से जुड़े थे। जब लड़के वाले आये तो उसको भी बुलाया गया था । कोई बात नहीं सहजता से बातचीत हुई । कोई माँग नहीं। लड़की की माँ नौकरी में थीं, पिता रिटायर्ड। तीन भाइयों में सबसे छोटी और माँ की दुलारी होना भी चाहिए ।

                गोद भराई के बाद माँ अपना घर दिखाने ले गईंं । ऊपर का पोर्शन दिखा कर बोली - "ये बिल्कुल खाली है, चाहें तो रवि यहीं रहकर अपना काम करें , कौन सी नौकरी में आफिस ही जाना है। ये बात उसी समय आभास दे गई कि कल कुछ गलत भी हो सकता है ।

                शादी हुई, घर में बेटी नहीं थी सो बेटी की तरह ही रखा गया । कुछ दिन रही फिर भूत प्रेत का नाटक शुरू हो गया और माँ को सूचित किया गया । माँ आकर जम गईंं , धूप, धूनी करना शुरू कर दिया और फिर बोली कि हम ले जा रहे हैं । ठीक हो जायेगी तो ले जाइएगा। वह बेटी को लेकर चली गयी। 

               फ़ोन  संपर्क चलता रहा लेकिन न उसने आने की बात कही और न उसको बुलाने की कोशिश की गयी।  लड़का बराबर कुछ अंतराल में जाता रहा।  उस पर दबाव डाला  जा रहा था कि वह वहीँ जाकर रहे ताकि माँ बाप की देख रेख में  बेटी बनी रहेगी।  उसके पीछे भी कुछ कारण रहे होंगे लेकिन लड़के ने जाने से इंकार कर दिया। 

              कुछ हफ़्ते बाद कोर्ट से नोटिस आ गया दहेज़ उत्पीड़न का , जब तक ये लोग कानूनी सलाह ले पाते।  वह पुलिस के साथ आ धमकी और उसके सिर में चोट जैसे निशान भी थे। उसमें उसने माता पिता , पति और देवर को नामित  किया था और इतने ही लोग घर में रहते थे।  लड़के को पुलिस ने तुरंत ही गिरफ़्तार कर लिया, लेकिन सास ससुर की उनके वकील मित्र ने तुरंत ही जमानत करवा  दी और उनको जेल जाने से राहत मिल गयी। देवर ने अपनी जॉब की वजह से बाहर रहने की स्थिति दिखा दी। 

                  बहुत मुश्किल के बाद एक महीने के बाद लड़के को जमानत मिली।  

                   मामला फैमिली कोर्ट में गया और उसमें सुनवाई शुरू हो गयी।  हर उपस्थिति में वह नया ही बयान  देती जैसे कि वह किसी के सिखाये हुए बोल रही हो।  वह अपने साथ किसी परिवार के सदस्य के बजाय भाई के किसी मित्र के साथ आती थी।  एक दिन उसने लिख कर दिया कि उसने गलत आरोप लगाए हैं और वह परिवार के साथ रहना चाहती है।  परिवार ने विश्वास नहीं किया और उसको फिलहाल अपने स्थानीय भाई के यहाँ रहने को कहा।  कोर्ट ने कहा कि लड़का वह जाकर उसका ध्यान रखेगा।  तभी पता चला कि वह गर्भवती है और यह उसे लड़के की पहली गलती थी।  जिस पर विश्वास न किया जा सके उसको कैसे ?

                   इस बात के जानने के बाद वह भाई के घर से अपने घर चली गयी।  उसको खर्च भेजने का दायित्व परिवार निभा रहा था क्योंकि वह गर्भवती थी और सुरक्षित प्रसव के लिए घर पर ही रहने दिया गया।  एक रात फ़ोन आया कि बेटा हुआ था और तुरंत ख़त्म हो गया। पहले से या फिर उसके आने का कोई भी इन्तजार नहीं किया गया और उसको दफना दिया गया।  जब तक वह पहुंचा सब ख़त्म हो चुका था। 

\                 रिकवरी के लिए वही छोड़ दिया गया और फिर एक महीने बाद भरण पोषण का मुकदमा लगा दिया गया  और एक नया मुक़दमा चलने लगा।  पूरे दस साल वह चलता रहा।  तारीख पर तारीख पड़ती रहीं। रवि मानसिक  तौर पूरी तरह से टूट चुका था , न काम करने का मन करता और न वह करता था।  आखिर दस साल बाद उसका वकील आपसी सहमति के बाद तलाक़ का प्रस्ताव लेकर आया। लेकिन इस पक्ष के वकील को बिलकुल भी विश्वास नहीं था क्योंकि वह  कई रूप देख चुका था।  आखिर दोनों वकीलों ने एक सहमति बनाई और दस लाख रुपये लेकर उसने तलाक़ देने का प्रस्ताव रखा।  

                रवि पूरी तरह से वकील और माँ बाप पर निर्भर हो गया। कुछ लतें भी लग गयीं। ये दस साल किसी की जिंदगी को तहस नहस करने के लिए बहुत थे।  वह कई नशों का आदी हो चुका था। जिन्हें वह आज तक नहीं छोड़ पाया। एक अच्छे खासे लड़ के का जीवन पूरी तरह से तबाह हो चुका है। 

                         


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

अभिशाप !

 पुरुष विमर्श - 1


    अभिशाप !


                ऋषि ने अपने पिता से प्रस्ताव रखा था , अपनी पसंद की शादी का । मध्यम वर्गीय पिता ने एक बार समझाया था कि कहाँ वो एक राजपत्रित अधिकारी की बेटी और कहाँ हम ? 

        लेकिन कुछ भाग्य होता है और कुछ भवितव्यता । बेटे की इच्छा के आगे वह भी झुक गये । हमारा क्या ? आज हैं कल तो उसे जीवन बिताना है, पसंद की है तो सुखपूर्वक जीवन चलेगा । माँ ने भी समझाया ।

        सब कुछ विधिवत हुआ । लड़की विदा होकर घर आ गई । पिता ने लड़के को उसकी हैसियत समझा दी । एक नौकर भी साथ भेजा , जो उसका पूरा ध्यान रखेगा। बेटी को लाड़ प्यार से पाला है तो कोई कष्ट न हो ।

         बेटी की खुशी सभी चाहते हैं लेकिन नौकर भेजना ऋषि को अपना अपमान लगा। कंचन उसके साथ पढ़ी थी , जॉब उसने नहीं की थी क्योंकि जितना वेतन मिलता उससे ज्यादा उसका जेबखर्च था।

      ये सब बातें तो ऋषि को बाद में समझ आईं। अपनी पसंद के द्वारा माँ बाप का अपमान न हो , वह कंचन को लेकर अपनी जॉब पर चला गया। 

      अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि ऋषि ऑफिस से आया तो उसकी आँखें फटी की फटीं रह गईं। कंचन शॉर्ट पहने ड्रिंक कर रही थी , ऋषि तो शुद्ध शाकाहारी ब्राह्मण परिवार का बेटा था।

       उसने जो प्रक्रिया दिखाई, ऋषि अवाक् । कंचन ने सीधे गालियाँ शुरू कर दीं - वह गालियाँ जो सभ्य परिवार की महिलाएं क्या पुरुष भी नहीं देते। 

    कुछ संवाद तो लिखे ही जा सकते है - 'साले भिखमंगे मेरे बाप की दौलत पर निगाह रखते हो , वह सब कुछ मेरा है । यह सब कुछ कभी देखा था अपने बाप के घर में।'

          उसको शराब उसका नौकर लाकर देता और वह बैठ कर पीती। कुछ दिन घुट घुट कर जिया । मार भी खाई और उसकी हरकतों की वीडियो भी बनाया लेकिन उसकी औकात उसके परिवार से टक्कर लेने की नहीं थी।

          एक दिन ऑफिस से लौटा तो घर में ताला बंद था , वह अपने बाप के पास उड़ गई थी, अपने नौकर सहित। घर पूरा तहस नहस कर गई थी। ऋषि ने फोन किया तो ससुर ने उठाया और बोले - 'अब वह तुम्हारी पत्नी है, उसको कैसे रख सकते हो , तुम जानो।'

        वह बेचारा क्या जाने ?

    पिता के घर साजिश रची और दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का मुकदमा कर दिया । अपने प्रभाव का प्रयोग करके नौकरी से भी निकलवा दिया और ऋषि वापस घर आ गया। पिता मुकदमे की पैरवी के लिए बार बार भागने लगे । हृदय रोग और उच्च रक्तचाप के मरीज पिता बार बार भागते सो शारीरिक और मानसिक रूप से टूट रहे थे , लेकिन बेटे को तनाव और अवसाद से बचाने के लिए खुद ही भाग रहे थे और अपने को मजबूत भी दिखा रहे थे।

           आखिर में वकील को सौंप कर घर में बैठ गये। वह तलाक देने को तैयार न थी और ऋषि साथ रख पाने में असमर्थ था।

        परिवार का हर सदस्य मानसिक तनाव में था । एक दिन माँ को ब्रेन हैमरेज हो गया । एक महीने तक जीवन और मृत्यु के बीच झूलते हुए वे विदा हो गईं। पिता की आधी शक्ति जाती रही। । बिल्कुल टूट गये और बच्चे भी।

        किसी तरह ऋषि को नौकरी मिल गई और वो पिता सहित गृहनगर छोड़कर नौकरी वाले शहर में जाकर बस गया । संब कुछ बिखर चुका था । पिता की लेखनी सूख गई, जिंदगी इतने टुकड़ों में बिखर चुकी थी कि भावनाओं के टुकड़े इधर उधर बिखर गए।

            ऋषि एक मुखौटा ओढ़े पिता को सांत्वना देता एक लड़ाई लड़ रहा है , एक अंतहीन लड़ाई ।

रविवार, 2 जनवरी 2022

अनियोजित नववर्ष !

                                               

                                               जब से होश सँभाला तब से हर वर्ष , वर्ष के पहले दिन का एक नियोजन बना कर रखती  थी।  मेरा विश्वास है कि जैसा वर्ष का पहला दिन गुजरेगा और जो  करेंगे उसकी पुनरावृत्ति पूरे साल बार बार होती रहती है।  मेरे विचार से हर बार ही होता था। अब जब जीवन के ६६ + होने पर अब सब कुछ वैसा ही करूंगी जैसा कि हो रहा है।  अनियोजित सा सामने आता जाएगा तो करती जाउंगी।  उठूंगी अपने मन से और काम करूंगी अपने मन से। 

                    बहुत चल लिए दूसरों और वक्त की रिद्म पर और मैं चलूंगी अपनी ही रिद्म पर। उठे तो मन से धीरे धीरे काम शुरू किया। सोचा मैं आज के दिन किसी को विश नहीं करूंगी , नेटवर्क नहीं मिलता है और देखती हूँ कि जिन्हें मैं हर बार करती रही , मुझे कौन कर रहा है ?  मन में कोई रोष लेकर नहीं बल्कि अपने मन की करने की सोच कर।  दिन अच्छा शुरू हुआ नाश्ता भी रोज से हट कर बनाया। धूप भी कई दिन बाद निकली तो उसका भी फायदा उठाना भी था। लंच भी रोज की तरह से दाल रोटी नहीं बनाई।  पालक की कचौड़ी और मिक्स वेज बनायीं और खाकर रजाई में घुस गए तीन बजे। 

                      अभी सोये भी नहीं थे कि जिनके जिगरी दोस्त रवि भाई साहब



का फोन आया कि शाम को रोटी साथ ही खाते हैं और बात ख़त्म।  मैं सोचूँ ये क्या बात हुई ? मेरे लिए न पूछा और न कहा।  मैंने इनसे पूछा कि सुमन भाभी नहीं है तो ये बोले मैंने तो ये पूछा ही नहीं। '

                       रवि भाई साहब ने सुमन भाभी को बताया कि  आदित्य हमारे साथ रात में डिनर लेंगे।  वो बोली कि भाभी नहीं है , उन्होंने भी कह दिया कि मैंने पूछा नहीं।  उन्होंने मुझे फ़ोन करके पूछा कि आप कहाँ है ? मैंने कहा कि मैं तो घर पर ही हूँ।  तब उन्होंने कहानी बताई और कहा कि हम भी साथ ही डिनर ले रहे हैं।


                      यह भी अनियोजित सा डिनर हुआ कि पहले सोचा ही नहीं था और दोनों ही दो ही लोग हैं। 

                       रात में जब पहुंची तो भाभी बोली कि  हम तो गले मिलेंगे एक मुद्दत गुजर गयी गले मिले हुए।  ये बोले सोच लीजिए - 'कोरोना फिर से पैर पसार रहा है। ' 

                         हम लोगों ने कहा - ' ऐसे की तैसी कोरोना की , हम तो गले ही मिलेंगे।' एक मुद्दत बाद हम गले मिले शायद दो साल बाद। 

                        खाते पीते जब दस बज गए तो रात्रि कर्फ्यू का ध्यान आया और हम वहां से सवा दस बजे चल दिए और ११ बजे घर। 

                                     इति वर्ष के प्रथम दिवस की कथा.

बुधवार, 6 जनवरी 2021

वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !

 वर्क फ्रॉम होम : सुखद या दुखद !


                                   आईटी  कंपनी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक अच्छा विकल्प था कि कर्मचारी को कभी आपात काल में घर में बैठ कर काम करने की सुविधा प्राप्त थी और वह इससे कुछ आराम भी महसूस कर सकता था। ये व्यवस्था हर कंपनी में थी  और  करीब करीब  सबको दी जा रही थी और कर्मचारी ले  रहे थे।  लेकिन हद से ज्यादा कोई  सुविधा भी अवसर की जगह गले की फांस बन जाती है। 

              कोरोना की दृष्टि से वर्क फ्रॉम होम एक सुरक्षित और सहज तरीका है , जिससे कार्य भी होता रहे और उनके कर्मचारी सुरक्षित भी रहें।  अब वर्क फ्रॉम होम करते करते लोगों के लिए एक वर्ष पूर्ण होने जा रहा है और कंपनी के काम तो सुचारु रूप से चल रहा है लेकिन उसके कर्मचारियों के लिए एक गले की फाँस बन चुका है। ऑफिस के कार्य करने के वातावरण में और घर के वातावरण में अंतर होता है। अब जब कि बच्चे भी घर में ही अपनी पढाई  कर रहे हैं और  पत्नी भी कामकाजी है तो वह भी अपने काम को किसी न किसी तरीके से सामंजस्य स्थापित करके जारी रख रही है।  

                   बच्चों के लिए स्कूल का वातावरण और घर में रहकर पढाई करने से सबके समय का तारतम्य बैठ नहीं  पाता है।  बच्चे अगर छोटे हैं तो माँ उन्हें साथ लेकर उनकी पढाई करवानी होती है।  ऐसे समय में जब कि न सहायिकाएं बुलाई जा रही हैं और न कोई और साथ दे सकता है तब ये वर्क फ्रॉम होम भी गले की फाँस ही  बना है।  एक गृहणी घर , काम और बच्चे सब का  सामान्य दिनों में प्रबंधन कर लेती हे लेकिन जब सारी जिम्मेदारियां  एक साथ आ खड़ी हों तो पति , अपना और बच्चे की पढाई सामान्यतया  संभव नहीं है।  परिणाम ये होता है कि पति का काम समय से पूरा न हो तो वह भी इसकी जिम्मेदारी परिवार पर ही डालता है , पत्नी भी यही सोचती है लेकिन वह  ही  क्यों खट रही है , क्योंकि हर हाल में सब को सही वातावरण देकर स्वयं को अधिक काम के बोझ तले दबा हुआ देख कर वह अपनी झुंझलाहट किस पर उतार सकती है , बच्चों पर , पति पर न।  इसके बाद घर का वातावरण तनाव पूर्ण ही बन जाता है।  फिर सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। 

                     स्थितियाँ इसके विपरीत भी बन रही हैं , अगर पति किसी व्यवसाय में है और पत्नी अन्य तरीके से कार्यरत है तो इसमें पति अवसाद का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवसाय लगभग बंद रहे हैं या फिर निश्चित समय  के लिए ही खुल पा रहे हैं।  अगर वह समझदार है तो वह पत्नी के  कार्यों में सहभागिता करके परिवार को एक अलग ही वातावरण दे रहा है और समझदारी भी यही है। लेकिन जरूरी नहीं है कि वह जो चाहता है वह कर सके क्योंकि हर जगह की  अलग कार्य शैली होती है। स्कूल में कार्य करने का समय अलग होता है , सरकारी कार्यालयों में अलग और आईटी कंपनियों में अलग होता है।  

                       इसमें सबसे अधिक होता है कंपनियों की कार्य  शैली में अंतर।  मीटिंग्स और कार्य का कोई समय नहीं होता है क्योंकि आपका मैनेजर या फिर बॉस कभी भी मीटिंग रख लेता है और वर्क फ्रॉम होम में कभी भी  करके आया काम सौप सकता है।  अपने सम्पर्क में आये  कई परिवारों के बच्चों के बारे में सुना है कि अब तो न कोई खाने का समय और न ही सोने का  , हर समय लैपटॉप पर बैठे काम  ही किया करते हैं।  कभी कभी तो  ३ बने तक भी काम होता रहता है।  इससे कर्मचारी के ऊपर कितना दबाव बढ़ जाता है।  ऐसे  कठिन समय ें में जब कि कंपनियों में भी काम करने वालों को निकला जा रहा है, अपनी नौकरी बचने के लिए कर्मचारी हर शर्त और हर हाल में काम करने के लिए मजबूर है। कितने घंटे काम के होते हैं इसकी कोई भी सीमा नहीं होती है। 

                      इससे पहले  कर्मचारी का एक निश्चित कार्यक्रम होता था कि उसको इतने बजे ऑफिस में रिपोर्ट करना है और  इतने बजे निकलना है।  इसके बाद वह अपने परिवार के लिए समर्पित होता था। अब स्थितियां उसके लिए अपने अनुसार नहीं चल रही हैं। कंपनी का पूरा काम हो रहा है, कर्मचारियों को दी जाने वाली यातायात सुविधा की   है लिहाजा उसके चालक या तो बेकार हो चुके हैं या फिर उसके मालिक को नुक्सान हो रहा है।  ऑफिस के रख रखाव का पूरा पूरा व्यय अब उनके लिए बचत ही हो चुकी है।  लेकिन वहीँ कर्मचारी के लिए सारे दिन वाई फाई का लोड और कई सारे व्यय बढ़ चुके हैं। 

                     कंपनी का नजरिया भी कई तरह से ठीक है वह अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को देखते हुए ये सुविधा प्रदान कर रही है  और जो बच्चे माँ-बाप से दूर शहरों में काम कर रहे हैं , उन्हें घर आकर एक मुद्दत बाद  उनके साथ रहने का मौका मिल रहा है।  घर में बंद  बच्चों को अपनों का साथ मिल रहा है और माँ-बाप को आंतरिक ख़ुशी भी मिल रही है।   हर सुविधा के दो पहलू होते हैं सुखद और दुखद - ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उसको हम अवसर के अनुकूल किस  दृष्टि से देख रहे हैं। 

रविवार, 20 दिसंबर 2020

ये अनमोल रिश्ते !

 ये अनमोल रिश्ता!



                                जीवन में कुछ रिश्ते तो जन्म से बन जाते हैं और कुछ रिश्ते बस भावात्मक रूप से बने होते हैं और वे रिश्ते जो कि मेरे जीवन में इस साल मिले तो मेरा मन गदगद हो गया है। वो रिश्ता जो पापा और चाचा से जुड़े थे। उसे पैतृक घर और स्थान से जुड़े थे। जब मिला तो लगा कि पापा से ही मिल रही हूँ। 

                                ये फेसबुक की ही कृपा कहूँगी कि मुझे श्री रामशंकर द्विवेदी चाचाजी से मिलवाया। मैं उन्हें कितना जानती थी कि वे मेरे पापा पैतृक नगर जालौन में घर के पास ही रहते थे और आगरा विश्वविद्यालय के shikrhit  थे। उसे समय में जब वह उरई में आगरा विश्वविद्यालय में ही लगता है। मैं बहुत छोटी थी - पापा ने ही बताया था कि घर के आगे से डिग्री कॉलेज जाते हैं कि ये कितने विद्वान हैं। वह छवि अभी भी मेरी आँखों के सामने है। धोती कुरता पहने हुए और एक हाथ में धोती का कोना पकड़े हुए जाते हुए वे कॉलेज के प्रोफेसर थे। कभी उसे समय पर गहन परिचय नहीं मिला। फिर फेसबुक पर मैंने उन्हें पाया और उनकी पूरी प्रोफाइल पढ़ी तो समझ गयी और मैंने उन्हें मैसेंजर पर बात की। पापा का नाम सुनकर उन्होंने बहुत सारी बातें बता डाली पापा के बारे में और तय किया कि अबकी बार जब भी उरई आउंगी जरूर मिलूंगी।  

                                 उस समय के बाद तो कभी न देखा न उनके बारे में जानकारी मिली।  आज उनकी विद्वता के समक्ष सिर झुक जाता है , इस उम्र में भी उनका लेखन जारी है और  अब तक उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या अनगिनत है और उनकी सक्रियता और विद्वता देख कर लगता है कि अभी बहुत कुछ माँ सरस्वती के इस वरद पुत्र को लिखना शेष है।                               

                               ये सौभाग्य मिला नवम्बर २०२० में ,  घर के पास ही उनका घर है और कानपुर निकलने के ठीक पहले मैं उनसे मिलने गयी।  मैं अपनी किताब उनको देने के लिए लेकर गयी थी। उनके घर पहुंची तो उनके बेटे से कह दिया वे घर पर नहीं है तो मैं अपनी किताब देकर चली आयी कि ये उनको दे दीजिएगा।  वह घर पर ही थे और जैसे ही उनको किताब दी होगी उन्होंने  पीछे से बेटे को भेजा कि उन लोगों को  बुलाकर लाओ।  हम वापस चल दिए और उन्हें देख कर अभिभूत  हो गयी।  पापा की याद आ गयी।  

                            फिर तो मैं बहुत देर तक रही।  उन्होंने अपने बचपन की यादें दुहराईं।  वे मेरे छोटे चाचा के मित्र थे और कहें कि पास पास घर होने से और हम उम्र भी उन्हें के थे।  वे बातें जो न कभी हमें पापा ने बतलायीं और न ही कोई औचित्य ही था।  चाचा जी ने पापा और मेरे दोनों चाचाओं के विषय में ढेर से यादें खोल कर सामने रख दीं। अपने बचपन की यादें - साथ साथ रहने के समय कैसे वक्त गुजारते थे ?  तब कोई  प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी और न ही आर्थिक स्तर की कोई दीवारें थी।  एक लम्बे अरसे से वे चाचा लोगों से भी नहीं मिले थे।  उनके मित्र चाचाजी का तो निधन हो चुका है लेकिन पापा से छोटे भाई बड़े चाचाजी का हाथ अभी  हमारे सिर पर  है।  उनसे हमने वादा किया कि  अगली बार उन्हें जरूर मिलवाएंगे। उन्होंने भी वादा किया कि जब वे कानपुर आएंगे तो मेरे घर जरूर आएंगे। 

                         ये रिश्ता मेरे लिए अनमोल है और हम छोटे  शहर वाले रिश्तों को जीते हैं , कोई अंकल , आंटी नहीं होता बल्कि चाचा, बुआ , भाई और भाभी होते हैं। हम चाहे फेसबुक पर हों या फिर किसी और तरह से जुड़े हों , मिले हों या न मिले हों लेकिन हमारे रिश्ते देश दुनियां में मिलते हैं और हम उतने ही अपनत्व से उनको स्वीकार करते हैं। हमें गर्व है अपनी संस्कृति और रिश्तों को प्यार देने वाले अपने बुजुर्गों , हमउम्र और छोटों पर।