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शुक्रवार, 15 मई 2026

विश्व परिवार दिवस! (15 मई)

 

परिवार के स्वरूप :                   
                  
          परिवार संस्था आदिकाल से चली रही है और उसके अतीत को देखें तो दो से चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थीपारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती-बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता थाउनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भीधीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गयाजब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे। वे वापस गाँव आना या रहना या खेती करना पसंद नहीं करते , परिणाम कि घर वालों के बीच में दूरियां आनी शुरू हो गयीं और परिवार के विखंडन की प्रक्रिया यही से शुरू हो गयी।  आरम्भ में ये सब बहुत अच्छा लगा नयी पीढ़ी को लेकिन बाद में या कहें आज जब एकल परिवार के परिणाम सामने आने लगे हैं।

टूटते परिवार :
                 

     आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढ़ती महत्वाकांक्षायें, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है। वह भी आजकल भय के साये में जी रहा है।  बच्चों को लेकर माता पिता निश्चिन्त नहीं हैं। आज अधिकांश दंपत्ति दोनों ही लोग नौकरी करते हैं और इस जगह पर  बच्चे या तो आया के साथ रहते या  फिर किसी 'डे केअर सेंटर' में. छोटे बच्चे इसी लिए माता-पिता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं रह जाते हैं।  वे नौकर और आया के द्वारा शोषण के शिकार भी किये जाते हैं और कभी कभी तो माता पिता की स्थिति के अनुसार अपहरण तक की साजिशें रच दी जाती हैं।  

 एकाकी परिवार में भय :

                इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे और बच्चे भी सुरक्षित रहते थे।  अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघट की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं। बच्चे भी स्वयं को असुरक्षा की भावना में घिरे जी रहे हैं। एक तो बच्चों को परिवार का सम्पूर्ण संरक्षण नहीं मिल पाता है और साथ ही वह पढ़ाई के लिए बराबर माता-पिता के द्वारा दबाव बनाया जाता है क्योंकि वे अच्छे स्कूल में भारी भरकम फीस भर कर पढ़ाते हैं और उनसे पैसे के भार के अनुसार अपेक्षाएँ भी रखते हैं। 

विखंडित परिवार का परिणाम :

                   एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहेंइससे बेहतर है कि मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '                            
             आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैंआत्मनिर्भर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे                 
              एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर करने की भावना से ग्रस्त हो जाता हैदूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं हैजब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?                   
                         परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने लगेगाऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक कि  उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है।  अगर अपनी सोच को विकसित करें और उसको परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा इसके लिए हमें अपनी सोच को 'मैं' से निकल कर 'हम' पर लाना होगाये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी
       'मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'

        '
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें?'
 
                                                
           तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक हैइसके लिए प्रौढ़ और युवा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगाघर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहेवैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे हैं  तो माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उनसे बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजियेयही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैंदो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नमक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा

          कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थींआज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा हैफिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैंइसको बचाने में ही सभ्यता , संस्कृति और समाज की भलाई है।

गुरुवार, 14 मई 2026

मां तुम्हें सलाम!


 अपने अपने भाव और अपनी अपनी अभिव्यक्ति, मां जिसमें दुनिया बसती है और मां की दुनिया भी उसी में बसती है। कैसे कोई मां के चित्र को शब्दों में उकेरता है? एकदम वैसा ही जैसा मन पर अंकित है। आज कविता और ग़ज़ल की धनी  #सौम्या श्रीवास्तव की अभिव्यक्ति।


यूँ तो माँ के प्रति भावनाएं मात्र एक दिन की मोहताज नहीं हैं...लेकिन फिर भी जो भावनाएं मन में ही घुमड़ती रहती हैं ...आज उन्हें जताए बिना नहीं रहा गया...!!!


माँ.......

जो स्वयं जीवट बन गई ,

और....

मेरे साहस के पंखों को भी

अधिक प्रबल और सबल करती गई...!


माँ ...

जो ख़ुद जागती रही 

लेकिन 

जिसे हमेशा ये ध्यान रहा ,

कि मेरी नींद तो नहीं खुल गई ..!


माँ ...

जो मेरे लड़खड़ाने पर मुझे ,

आगे बढ़कर हँसते हुए थामती है ..!

माँ ...

जो मेरी मुस्कुराहट के पीछे छिपे

अनकहे से मेरे सारे दर्द जानती है ..!


माँ ...

जिसके स्पर्श/ अनुभूति मात्र से ,

एक अद्भुत शक्ति का आभास होता है...!

माँ ...

जिसके पास मेरी सारी खुशियों ,

और हर उदासी का हिसाब होता है...!


माँ ...

जो स्वयं एक योद्धा है ,

और ...

जो मुझे भी दुविधाओं से ,

निरंतर संघर्ष करना सिखाती है ..!

माँ ...

जो विषम परिस्थितियों में भी ,

मुझे शहंशाह जैसा अनुभव कराती है...!


माँ ...

एक व्यक्तित्व जो मेरे जीवन का ,

सबसे सुखमय स्नेहिल अनुभव है...!

माँ ...

जिसकी महत्ता और त्याग को

मात्र शब्दों में वर्णित करना ,

इस संपूर्ण सृष्टि को 

सीमाओं में बाँधने जितना असंभव है....!

सौम्य वर्षा 

मां तुम्हें सलाम !

          मां के लिए जो भाव मन में होते हैं लेकिन अभिव्यक्ति जब बेटे या बेटी को खुद ही कटघरे में खड़ा कर दे और वह अपराधबोध भी उसके मन की निश्छलता को दिखलाया है। वह मां न इसे जानती है और न ही सुन सकती है फिर भी मां और बेटे के भावों के तार अहसास जरूर करवा रहे होंगे। सबसे अलग कुछ लिखा है - #शिखर चंद जैन जी ने।


मां! मैं अच्छा बेटा नहीं !


समय की धूल जब स्मृतियों के पन्नों पर जमने लगती है, तो अक्सर धुंधलाहट में हम उन चेहरों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमारे जीवन के कैनवास पर रंग भरे थे। लेकिन आज, कोलकाता की इस व्यस्त और शोर भरी दोपहर में,  मैं जब भी अपनी खिड़की से बाहर देखता हूँ, तो मुझे अपनी माँ का चेहरा याद आता है—वह चेहरा जो जीवन की तपती धूप में भी मेरे लिए शीतल छाँव बना रहा। मैं आज खुद को एक कटघरे में खड़ा पाता हूँ। यह कटघरा किसी अदालत का नहीं, बल्कि मेरी अपनी अंतरात्मा का है।


अभावों के बीच संपन्न बचपन!


मुझे याद है पिताजी की वह सीमित आय, जिसमें महीने के आखिरी दस दिन अक्सर हिसाब-किताब की ऊहापोह में बीतते थे। लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि मुझे या मेरे बड़े भाई को कभी उस 'कमी' का अहसास तक नहीं हुआ। उस समय माँ एक जादुई कलाकार की तरह थीं। वह कम में भी 'सब' जुटा लेती थीं। हमारी हर फरमाइश, हर वह पकवान जिसकी हमने बस ज़िक्र भर किया हो, थाली में हाज़िर हो जाता था।माँ ने अभावों को कभी घर की दहलीज़ के अंदर नहीं आने दिया, उन्होंने हमें अभावों में भी बहुत अच्छी तरह  पाला।


रसोई वाला कोना !


 100 वर्ग फीट के छोटे से कमरे के एक कोने में बनी “रसोई” के उस ताखे पर रखे वे छोटे-छोटे  डिब्बे जिनमें तमाम मसाले, दालें भरी रहती थीं आज भी मेरी आँखों के सामने तैर जाते हैं। इन्हीं में से 5 डिब्बों में पाँच तरह के अचार होते थे—आम, नींबू, मिर्च, लसोड़े और कैर का मिक्स अचार। वे सिर्फ अचार नहीं थे, वह माँ का हमारे प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक थे। वह जानती थीं कि हमें कब क्या स्वाद चाहिए। आज जब मैं बड़े-बड़े होटलों में 'बुफे' देखता हूँ या किसी बड़े रेस्टोरेंट के भोजन को देखता हूं तो पराठों के साथ मां के हाथ की सब्जी और उन पाँच डिब्बों के अचार में से किसी एक के स्वाद के आगे सब फीका लगता है। मेहमान भी उनके आचार के स्वाद को खूब सराहते थे।


बचपन का हादसा और मां !


मेरी स्मृतियों के गलियारे में एक मंज़र पत्थर की लकीर की तरह अंकित है। मैं तब मात्र सात साल का था। एक अलमारी से गिरकर मेरे जबड़े बुरी तरह टूट गए थे। वह दर्द असहनीय था, लेकिन उस दर्द से कहीं ज़्यादा तड़प माँ की आँखों में थी। उस वक्त न कोई गाड़ी थी, न आज जैसी सुविधाएं। माँ ने बिना एक पल गँवाए, मुझे अपनी गोद में उठाया और बदहवास होकर अस्पताल की ओर भागीं।

वह दोपहर, वह तपती सड़क और माँ की वह सांसे—मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ। सात साल का बच्चा अपनी माँ की गोद में भारी होता है, लेकिन उस दिन माँ के लिए मैं पंख जैसा हल्का था, क्योंकि उनकी ममता ने उन्हें फौलाद बना दिया था। अस्पताल पहुँचने तक उनके पैरों में छाले पड़ गए थे, मगर उनकी नज़रें सिर्फ मेरे चेहरे पर टिकी थीं। मेरा जबड़ा तो डॉक्टरों ने जोड़ दिया, लेकिन बाद के छह महीनों में माँ ने जो अपना सर्वस्व मुझ पर न्यौछावर किया, उसका जोड़ शायद पूरी कायनात में कहीं नहीं है।


कोलकाता की दूरी और मन का अपराध बोध!


आज मैं जयपुर से हज़ारों किलोमीटर दूर कोलकाता में हूँ। दो साल बीत गए हैं। दो साल... सुनने में छोटा लगता है, लेकिन एक माँ के लिए जो अपनी संतान की राह तकती है, यह दो सदियों जैसा है। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा, यह सच है। शरीर ने साथ नहीं दिया, यह भी हकीकत है। लेकिन जब मैं अपनी अंतरात्मा में गहराई से झाँकता हूँ, तो एक टीस उठती है—क्या मैंने वाकई कोशिश की? क्या मेरा प्रेम इतना कमज़ोर था कि वह स्वास्थ्य की बाधाओं को पार न कर सका?कोलकाता की इस नमी में मुझे जयपुर की वह सूखी हवा और माँ के आँचल की खुशबू याद आती है। मुझे लगता है कि मैं एक 'कृतघ्न संतान' की श्रेणी में खड़ा हूँ। वह माँ, जिसने मुझे तब गोद में उठाकर जीवन दिया जब मैं टूट चुका था, आज वह शायद खुद को अकेला पा रही होगी। मैं उनका ऋणी तो था ही, अब मैं खुद को अपराधी भी मानता हूँ। अपराधी—उस समय का जो बीत गया, उन शब्दों का जो मैंने उनसे नहीं कहे, और उस स्पर्श का जो उनसे दो साल से दूर है।


एक अधूरा संवाद!


पहले अक्सर फोन पर बात होती थी, तो वह पूछती थीं, "शिखर, तू ठीक तो है ना?" उनकी आवाज़ में वही पुरानी ममता होती है, कोई उलाहना नहीं, कोई शिकायत नहीं। उनकी यही निस्वार्थता मुझे और भी लज्जित करती है। काश वह मुझ पर चिल्लातीं, काश वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करतीं, तो शायद मेरा बोझ हल्का हो जाता। अब तो बात भी नहीं हो पाती क्योंकि मां फोन की घंटी या आवाज नहीं सुन पातीं।मैं यहाँ कोलकाता में अपनी सुख-सुविधाओं और बीमारियों के बीच घिरा हूँ, और वहाँ जयपुर के किसी कोने में वह पता नहीं ठीक हैं या नहीं।


यह संस्मरण मेरी माँ के लिए मेरा एक माफीनामा है। माँ, मैं जानता हूँ कि शब्दों से घाव नहीं भरते और न ही दूरी मिटती है। मैं आपका ऋणी हूँ और शायद सात जन्मों तक रहूँगा। मेरा स्वास्थ्य एक बहाना हो सकता है, लेकिन मेरा मन अब और बहाने नहीं बनाना चाहता।मैं अपराधी हूँ, पर मैं अपनी सज़ा का हकदार भी हूँ। और मेरी सज़ा यह है कि मैं जल्द से जल्द उन सारी दूरियों को मिटा दूँ जो मेरे और आपकी ममता के बीच आ गई हैं। मैं फिर से सात साल का वह बच्चा बनना चाहता हूँ, जिसका जबड़ा भले ही टूटा हो, लेकिन जिसका पूरा संसार आपकी गोद में सुरक्षित था।


*


शिखरचंदजैन*

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

आपदा में अवसर।

आपदा में अवसर !


                                 बहुत दिनों से देखते चले आ रहे है कि प्राकृतिक आपदा हो या फिर मानव जनित - लोगों को कमाई के अवसर मिलने लगते हैं।  भौतिक रूप से मिला तो लोगों ने संचयन करना शुरू कर दिया, ताकि आगे चलकर उसको ब्लैक में बेचकर धनवान बना जा सके। इस काम से आम आदमी के लिए संकट पैदा होने लगता  है। यहाँ तक तो ठीक है लेकिन आदमी आभासी दुनिया का इतना गुलाम हो चुका है कि उसका जीवन इनसे ही निर्देशित होने लगा है। सभी को इस विषय में गहन जानकारी नहीं होती और वे सहज विश्वास कर उसको अपनाने लगते हैं। इससे ठगों के भाग्य खुलने लगे हैं। 

                          इस समय विश्व की जो स्थिति है, उसको लेकर रोज नयी भविष्यवाणी होने लगी हैं और फिर अगर देखना शुरू कीजिये तो उसी विषय विशेष से सम्बंधित आपको सैकड़ों रील और वीडिओ मिलने लगेंगे।  

                          इस विषय पर कई महीनों तक अध्ययन के बाद इसकी तह तक पहुँची हूँ, बल्कि इसके साथ ही कुछ परिचित मेरे कार्य को जानते हुए सलाह लेने के लिए आये कि वे चारों तरफ से आने वाली खबरों न कहें तो वह जो अपना समय रील और वीडिओ देखने में बिताते हैं , डिप्रेशन के शिकार होने लगे हैं।  जब उनसे इसकी वजह पूछी तो स्पष्ट रूप से पता चला कि चारों तरफ से यही बात सुनने को मिल रही है कि किसी दिन ऐसा केमिकल वार शुरू हो जायेगी कि कुछ भी न बचेगा। इससे बचने के उपाय भी बताये जा रहे हैं और जब वे जिस विषय की रील या वीडिओ देखते हैं उससे सम्बंधित ढेर सारी रील और वीडियो आते चले जा रहे हैं।

             रही सही कसर एआई  पूरी कर रही है, समझदार तो समझ रहे हैं लेकिन वे जो सिर्फ समय बिताने के लिए मोबाइल को साधन बना चुके हैं और फिर श्लीलता  और अश्लीलता कुछ भी परोसा जाने लगा है और मानसिक व्याभिचार की संतुष्टि पा रहे हैं। उससे भी मूर्खतापूर्ण कार्य यह है कि हजारों लोग लाइक और शेयर करते जा रहे हैं। आप समय दे रहे हैं और मिल क्या रहा है?

           शायद सबको नहीं मालूम कि आपके अवचेतन मस्तिष्क में जाकर यह सब बातें अपनी जगह बना रहीं हैं और फिर आपका अपनी विचारशीलता इससे प्रभावित होती है और आपकी निर्णय क्षमता भी क्षीण होती है। सावधान हो जाइए अब भी समय है, मत बनिए इसके गुलाम। इन रील के अतिरिक्त स्वास्थ्य, कलात्मक अभिरुचि, शैक्षिक एवं साहित्यिक रील और वीडियो भी है, उनको देखिए और ज्ञान बढ़ाइये।






शुक्रवार, 6 जून 2025

नया स्टार्ट अप!

           फेसबुक अब पूरी तरह से ठगने के विज्ञापनों से भर चुकी है, इसमें काम करने वाले तथाकथित लेखक, पब्लिशर भी है । उनके नाम बड़े हैं या नहीं यह नहीं जानते लेकिन इतना जरुर जानते हैं कि अवसर का फायदा उठाकर पैसा इकट्ठा करने का एक बहुत अच्छा साधन है। 

            अभी हाल ही में एक घटना घटी - हमारे पास फेसबुक के माध्यम से प्रस्ताव मिला कि अमुक मासिक पत्रिका मां विशेषांक निकालने जा रही है उसके लिए आप अपना लेख और मां के साथ या अलग-अलग फोटो भेजिए जैसा कि अक्सर होता है,  मैंने अपना एक आलेख और मां के साथ फोटो वहां पर भेजा। उसके प्राप्त होते ही मुझे वाट्सएप पर मैसेज मिला कि आप ₹100 भेजें , मैंने सोचा कि विशेषांक होगा तो मूल्य हो सकता है।  फिर भी मैंने पूछा कि पत्रिका के लिए? उत्तर हां में मिला। मैंने सौ रुपये ऑनलाइन भेज दिये। 

             एक दो दिन बाद पीडीएफ भेज दी कि अपने आलेख को देख लें कोई परिवर्तन कराना तो लिखें।

            मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। दो दिन बाद फिर मेरे कुछ उत्तर न देने पर उनका दूसरा मैसेज आया कि कृपया ₹50+₹200 भेजिए।  मेरा दिमाग एकदम चकरा गया पत्रिका के पैसे हमसे पहले ही ले चुके हैं, अब यह किस चीज के पैसे मांग रहे हैं?  मैंने उनसे पूछा यह किस चीज के पैसे आपको चाहिए? उन्होंने कहा ₹50 पोस्टेज के और ₹200 मैगजीन के। मैंने कहा जब मैगजीन के पैसे आप फिर ले रहे हैं तो आपने पहले ₹100 किस चीज के लिए थे । उन्होंने कहा - वह मैंने पब्लिशिंग के लिए थे। मुझे लगा कि पब्लिशिंग के पैसे लेने का क्या मतलब? माना पत्रिका कोई मानदेय नहीं देती है लेकिन पैसे लेकर पब्लिश करने वाली पत्रिका का कोई भी वजूद होता ही नहीं। फिर भी मैंने कहा मैं नहीं दूंगी और मुझको पत्रिका भी नहीं चाहिए। इस पर लिखा अच्छा ₹50 मत दीजिए ₹200 दे दीजिए, आपको हम पत्रिका दे देंगे । ठीक है मैंने उनको ₹200 भेज दिए।

                उसके बाद उनका मैसेज आया कि हम भोपाल में बहुत बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं,  जिसमें ऑनलाइन ऑफलाइन कवि सम्मेलन, पुस्तक विमोचन, नृत्य-संगीत सारी प्रतियोगिताएं रखी जाएगी और आप उसमें किसी भी तरीके से शामिल हो सकते हैं तो मैंने सोचा कि ऑफलाइन शामिल हो जाते हैं। मैंने कहा - मैं सिर्फ ऑफलाइन शामिल हो सकती हूं।   बोले अच्छा ठीक है आप ऑफलाइन शामिल हो जाइए और दूसरे दिन मैसेज आता है कि ₹250+₹2100 आप भेज दीजिए । मैंने पूछा यह पैसे किस चीज के चाहिए ?  उत्तर मिला वह ऑफलाइन के , आप उसमें शामिल होना चाहती हैं तो उसके लिए आपको ₹250 रजिस्ट्रेशन के और ₹2100 ऑफलाइन का योगदान दीजिए । जिससे आपको पुरस्कार और यह सब चीज मिलेगी।  आपको सुविधा प्रदान की जाएगी आपके घर आपका अवार्ड भेजा जाएगा उन सब चीजों के लिए सुनकर तो मुझे ऊपर से नीचे तक आग लग गई।  मैंने कहा कि मुझे किसी भी तरह की सहभागिता नहीं चाहिए ना मैं ऑनलाइन और ना मैं ऑफलाइन कोई भी सहभागिता नहीं करुंगी।  फिर उनके तरह-तरह के प्रलोभन दिए और वह वेन्यू भी उन्होंने फोटो से भेजा जहां पर प्रोग्राम करने वाले थे, देखिए कितना भव्य प्रोग्राम हो रहा है ।  ट्रॉफी का चित्र भी भेजा देखी ट्रॉफी हर एक को दी जाएगी और बड़ा सम्मान होगा। अगर आप ऑफलाइन रहेंगे तो आपके घर में ट्रॉफी आएगी। मैंने सोच लिया था कि नहीं  लेना है। मैंने कहा मुझे यह खरीदा हुआ कप या कोई भी सम्मान पत्र नहीं चाहिए। मेरी सहभागिता नहीं  होगी। अगर आप पत्रिका भेज सके तो भेज दे अन्यथा वह ₹300 भी आप अपने पास रखें।  इसके बाद मैं सब  खत्म कर दिया।  कुछ दिन बाद फिर आया की पिता विशेषांक की तैयारी हो रही है और आप कृपया अपने पिता की फोटो के साथ अपना एक आलेख भेजिए। मुझे बहुत तेज हंसी भी आई और यह भी फिर लगा कि उन्होंने तो व्हाट्सएप पर पूरा बिजनेस उसे डाला होगा मैसेज तो वह मेरे पास भी आ गया । ठीक है मैंने उसको इग्नोर कर दिया मैंने क्या मुझको भाग नहीं लेना है। 

          एक दिन मुझको वह पत्रिका प्राप्त हुई । मैं उसका चित्र यहां भी नहीं डाल रही हूं लेकिन फिर भी मैं बता रही हूं मुझको पत्रिका प्राप्त हुई,  एक किताब उसमें मासिक पत्रिका लिखा हुआ था अंदर जब खोला तो उसका कोई संपादकीय विवरण नहीं, और नहीं,  सीधी अनुक्रमणिका उसमें दी गई थी और पूरी पुस्तक में कहीं भी पृष्ठ संख्या नहीं है। 

               अनुक्रमणिका में भी रचना का कोई जिक्र नहीं सिर्फ़ लेखकों के नाम थे। अनुक्रमणिका की फोटो में यहां पर संलग्न कर देती हूं, जिससे कि समझ में आ सके कि किस तरह के अनुक्रमणिका है । प्रथम पृष्ठ सीधा अनुक्रमणिका है उसके बाद जब अंतर दिखा तो फोटो के साथ एक रचना दो रचना पीछे चलते-चलते पता चला कि एक लेखक की 10-10 रचनाएं हैं उसमें और किसी की दस किसी की पांच किसी की चार करके उसमें कुल 110 रचनाएं थी और उसमें लेखक कल शायद 80 थी । अगर हम आकलन करें तो इस एक किताब की बाबत उन्होंने दो लाख 40 हजार रुपए कमा उसमें सिर्फ नाम दिया किस शहर से प्रकाशित हुई? किस प्रकाशन से।  इसका कोई भी विवरण नहीं दिया एक ईमेल एड्रेस था जिसका कोई भरोसा नहीं होता एक कब दिया जाए और कब हटा दिया जाए और कौन से जवाब देता है या नहीं देता है लेकिन पत्रिका के नाम पर इतना बड़ा मजाक मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा और इससे सबक भी मिला कि पैसे लेकर पुस्तक के छपने वाले कितने बड़े व्यापारी होते हैं । और इसको वह अपनी आमदनी का एक साधन बना लेते हैं इन्होंने सारा कलेक्शन एक फोन नंबर पर लिया था और नहीं मालूम कि उसे अकाउंट से जैसा कि आजकल हो रहा है उन्होंने सारा पैसा निकाल के वह अकाउंट बंद कर दिया और फिर नए आलेख को लेकर कोई और नया अकाउंट खोला जाए या कुछ और किया जाए अगर ऐसा कुछ हुआ तो आगे विवरण के अनुसार लेकिन यह सब लोगों से आग्रह है कि इस तरह की चीजों से सावधान रहे।

सोमवार, 31 मार्च 2025

 मायके के चंद घंटे ! (3)

 

                                         उरई की संक्षिप्त यात्रा में सबसे ज्यादा प्रतीक्षित मुलाकात मुझे करनी थी अपने चाचाजी श्री रामशंकर द्रिवेदी जी से। कई बार वह भी कह चुके थे कि मिलना है , लेकिन जिस उद्देश्य से हम मिलना चाहते थे , उसे पूरा करने का समय नहीं मिला। मैं उनको बता चुकी थी कि मैं आ रही हूँ। उनकी कुछ अस्वस्थतावश हम दिन में नहीं मिल सके और मैं चाचीजी के घर चली गयी और वहां तो सारे दिन रहना ही था। अतः हमने समय शाम को मिलने का रखा। 

                                  हमारी मुलाकात तो पहले भी हो चुकी हैं, और हर बार मिलना हमें पापा और चाचा के ज़माने में ले जाता है। उनसे पुरानी यादें सुन कर लगता है कि मैं फिर उसी काल में पहुँच गयी हूँ। 

                              इतने बुजुर्ग होने पर भी उन पर माँ सरस्वती का वरद हस्त सदैव रहा है और आज भी उनकी सक्रियता नमनीय है। हमारे लिए वे प्रेरणा के स्रोत हैं। वे सुबह अस्वस्थ थे और शाम जब मैं पहुंची तो वे हमें अपनी आने वाली किताब की प्रूफ रीडिंग करते मिले। लैपटॉप या ऑनलाइन काम करने के वे अभ्यस्त नहीं है, इसलिए वे प्रिंट आउट से प्रूफ रीडिंग करते हैं। उनके चारों तरफ ईंट की दीवारों के साथ किताबों के दीवारे में खड़ी थीं। सिर्फ किताबें और किताबें लेकिन बहुत ही संयोजित। 

                             हमारे साथ बैठ कर वे अपने ज़माने की बातें हमें बताते रहे।  बांग्ला भाषा के प्रति उनका समर्पण कैसे हुआ? ये किस्सा भी उन्होंने हमें सुनाया कि जब वे कानपुर में पढ़ने के लिए गए तो उनका एक सहपाठी बंगाल से से था , जिसने उन्हें "बांग्ला कैसे सीखें " नामक किताब दी थी। एक हिंदी भाषी की कितनी रूचि होगी? उन्होंने ले तो ली लेकिन इस भाव से कौन पढ़ता है? फिर पता नहीं कौन सी प्रेरणा से उन्होंने उसे पढ़ा ही नहीं बल्कि पूरी तरह से आत्मसात कर लिया और फिर उनका शोध भी बांग्ला भाषा पर ही था। फिर भविष्य में भी उन्होंने बांग्ला भाषा की कितनी किताबों का अनुवाद किया और कार्य सतत रूप से जारी है। सबसे स्मरण रखने वाली बात ये हैं कि वह सहपाठी उन्हें फिर कभी मिला नहीं लेकिन अपने से जोड़ कर रखा है। यह प्रसंग मुझे बहुत ही स्मरणीय लगा। 

                           हमारी चर्चा में पुराने साहित्कारों की बैठकों और उनसे जुड़े संस्मरण भी रहे। अपने कॉलेज के सहकर्मियों चाहे वे वरिष्ठ हों या फिर कनिष्ठ, जिन्हें मैं भी जानती रही , के बारे में बातें होती रहीं। उन्हें भी बहुत अच्छा लगा क्योंकि घर के लोगों के रूटीन अलग होते हैं और मिलने आने वाले अपनों के साथ जो वार्ता होती है उसके विषय अच्छे होते हैं और फिर अतीत को जी लेने का सुख जो होता है वह बड़ा ही सुकून देता है। 

                          घर से छोटी बहन का फोन आना शुरू जो गया कि उनकी सहेली आशा आयी है और दीदी से मिलने के लिए बैठी है। हम चाचाजी से विदा लेकर चल दिए, आशा मेरा इन्तजार कर रही थी क्योंकि मैं ही उससे बहुत सालों से नहीं मिली थी। उसने कह दिया कि आज दीदी से मिलकर ही जाऊँगी।  मुझे तो याद नहीं अब लेकिन उसी ने बताया कि मैंने उसके हाईस्कूल के लिए होमसाइंस का टी सेट ( कपडे का बना टेबल क्लॉथ ,ट्रे कवर और टीकोज़ी) बनाई थी। वह समय कुछ और ही था। मैं निश्छल भाव से सबके कामों के लिए उपलब्ध होती थी। चाहे किसी बच्चे की टीचर की फेयरवेल के लिए कविता लिखनी हो या लेख लिखना हो। तब कोई अंकल आंटी वाली बात नहीं थी। पूरा मोहल्ला , माँ की सहेलियाँ हों या पापा के मित्र चाचाजी,चाचीजी थे और उरई की बेटियाँ बुआ। वैसे हमारी उरई में आज भी ये शेष है। मैं बुआ वालों के लिए बुआ हूँ और दीदी वालों के लिए दीदी। 

                           एक पूरे दिन को मैंने इसी तरह से खुले वातावरण में जी कर दूसरे दिन सुबह ही कानपूर के लिए निकल लिए। व्यस्तता थी इसीलिए काफी लोगों को बता ही नहीं पाई कि मैं आ रही हूँ। सबसे क्षमा के साथ फिर से आने का अवसर तलाशती हूँ।  

मायके के चंद घंटे (2)

      मायके के चंद घंटे (2)

 

                                मायके का सफर अभी ख़त्म नहीं हुआ था क्योंकि वह तो पहुँचने के कुछ घंटे बाद से सोने के बाद का समय था। दूसरे दिन हम लोगों को अपनी चाची के पास जाना था, जो कई महीनों बाद उरई वापस आयीं थी। हमें उनसे मिलना था। हमारे उरई जाने का मुख्य ध्येय अपनी चाची , भाई भाभी और भतीजी से मिलना ही था। 

                              मेरे लिए हर रिश्ता चाहे वह खून का हो या फिर दिल का हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। भले ही हमको उरई छोड़े हुए 45 वर्ष हो चुके हों लेकिन कुछ भी भूला या गुजरा हुआ नहीं लगता है। हमारी चाची हमारी ही हमउम्र हैं लेकिन उनकी शादी बहुत जल्दी हो गयी थी। हमारी उम्र के अनुरूप पटती बहुत थी। माँ-पापा ही उनके संरक्षक थे। वही हाल रहा कि दो चार दिन बाद चाची के पास बैठे होते हम। कहीं भी  जाना हो,  हम दो साथ साथ। तब लड़कियों का अकेले जाना सिर्फ कॉलेज तक अनुमत था। उसके बाद संरक्षक चाहिए सो मेरी चाची के पास लाइसेंस था और हम कहीं भी जाएँ, जब माँ  मेरे जाने के लिए पापा से पूछें तो वहीं सवाल और कौन जा रहा है? चाची का लाइसेंस आगे कर दिया जाता। पिक्चर हो , बाजार हो या फिर प्रदर्शनी ( तब उरई में प्रदर्शनी लगाती थी , हाँ  यही बोला जाता था। 

                              चाची से मिलना भी उतने ही साल बाद हो रहा था, जितने वर्ष बाद मैं उरई आयी थी। काऱण हमारे चाचाजी दो महीने पहले ही हम सब को छोड़ कर चले गए थे। उन्होंने या चाची ने कभी ये नहीं समझा कि हम उनकी बेटियाँ नहीं है। वही रिश्ता हमारे भाइयों के बीच है। यद्यपि दोनों भाई मेरी शादी के बाद पैदा हुए लेकिन रिश्ते तो रिश्ते हैं। हमें प्यार और इज्जत सभी से खूब मिलती है।  वे चाहे कहीं भी रहें लेकिन जुड़े हैं और हमेशा जुड़े रहेंगे। 

                              हमने सारा दिन चाची के साथ गुजारा। नयी पुरानी बातें , सुख-दुःख तो हम पहले से ही बाँटते रहे हैं। एक कष्ट उन्हें भी और मुझे भी कि उरई से धीरे धीरे डेरे उठ रहे हैं।  घर हैं या मकान हैं लेकिन उसमें अपने रहने वाले दूर बेटों के पास जाकर रहने को मजबूर हैं क्योंकि जब दो में से एक रह जाता है तो बच्चे उन्हें अकेले यहाँ रहने की अनुमति नहीं देते हैं। और आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ये हमारे परिवार के संस्कार हैं कि बच्चों को इतनी फिक्र है। हम बच्चे दूर हों या फिर पास लेकिन अपने से बड़ों के संतुष्ट और सुरक्षित होने का अहसास एक निश्चिंतता का अहसास बहुत हैं।