रविवार, 13 अक्तूबर 2019

शरद पूर्णिमा,कोजागरी पूर्णिमा रास पूर्णिमा

         शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं; हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन  मास की पूर्णिमा  को कहते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दू धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे 'रास पूर्णिमा' भी कहते हैं। ज्योतिष की मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा षोडश कलाओं का होता है। धर्मशास्त्रों में इस दिन 'कोजागर व्रत' माना गया है। इसी को 'कौमुदी व्रत' भी कहते हैं। रासोत्सव का यह दिन वास्तव में भगवान कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए निर्धारित किया है, क्योंकि कहा जाता है इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सुधा झरती है। इस दिन श्री कृष्ण को 'कार्तिक स्नान' करते समय स्वयं (कृष्ण) को पति रूप में प्राप्त करने की कामना से देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीर हरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरलीवादन करके यमुना के तट पर गोपियों के संग रास रचाया था। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा-पूजन किया जाता है।

कथा

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी।[1] दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
                 इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए १०० दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (३ घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
                  इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

दशहरा !

                               दशहरा या विजयादशमी हमारे देश का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है और साथ ही इसको संस्कृति से जोड़ते हुए समाज को एक सन्देश - बुराई पर भलाई की विजय या सत्य की असत्य पर विजय जाता है।  पूरे  देश में कहीं विजयादशमी का सम्बन्ध सिर्फ रामायण महाकाव्य की लीला से होता है और कहीं पर इसको दुर्गा पूजा के साथ जोड़ कर देखते हैं कि  दुर्गा जी के द्वारा महिषासुर का वध भी शक्ति की विजय दिखता है और दोनों का ही एक ही सन्देश जाता है। हमारे देश में ही दशहरा विभिन्न स्थानों पर अलग अलग तरीके से मनाया जाता है।  सबका उद्देश्य एक ही होता है लेकिन कहीं कहीं पर लोक कथाओं पर आधारित भी है।   

 बंगाल का दशहरा :-- बंगाल में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है, जो कि बंगालियों, ओडिओं तथा असमियों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है।   इसमें  दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसके अन्‍तर्गत स्त्रियाँ द्वारा नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।  देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर खेलती हैं और अंत में सभी देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता  है। उसके बाद दशहरा का त्यौहार मनाया जाता है। विसर्जन की ये यात्रा महाराष्‍ट्र के गण‍पति-उत्‍सव के गणेश-विसर्जन के समान ही भव्‍य, शोभनीय और दर्शनीय होती है जबकि इस दिन नीलकंठ पक्षी को दर्शन  बहुत शुभ माना जाता है।

कर्नाटक का दशहरा -  मैसूर का दशहरा अंतर्राष्ट्रीय उत्सव के रूप में अपनी अलग पहचान बना चूका है जिसमे शामिल होने के लिए विदेशो से पर्यटक आते है | इस दिन यहाँ कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जाते है लेकिन सबसे अधिक प्रसिद्ध है 12 हाथियों की इस इस उत्सव में उपस्थिति | इन हाथियों की अपनी अपनी विशेषता होती है | दशहरा उत्सव के अंतिम दिन यहा मैसूर महल से “जम्बो सवारी” का आयोजन किया जाता है जिसमे रंग बिरंगे आभूषण और कपड़ो से सजे हाथी एक साथ शोभायात्रा के रूप में इकट्ठे चलते है और इन सबका नेतृत्व करने वाल विशेष हाथी “अम्बारी ” है जिसकी पीठ पर चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा सहित 750 किलो का “स्वर्ण हौदा” रखा होता है | यह सवारी मैसूर महल से तीन किलोमीटर की दूरी तय करने एक बाद बन्नीमंडप पहुचकर समाप्त होती है | इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीप-मालिकाओं से दुल्‍हन की तरह सजाते हैं। साथ ही शहर में लोग टॉर्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा भी निकालते हैं।

 तमिलनाडू , तेलंगाना , आंध्रप्रदेश का दशहरा :--

इन सभी  राज्यों में दशहरा  नौ दिनों तक मनाते  है ,| यहाँ के लोग दशहरे पर तीनो देवियों लक्ष्मी ,सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते है | अगर कोई भी नया कार्य करना हो तो इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है | इन सभी राज्यों में लक्ष्मी माता की पूजा प्रथम तीन दिनों में की जाती है उसके अगले तीन दिनों में विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है और अंत के तीनो दिनों में शक्ति की देवी माँ दुर्गा का पूजन किया जाता है। |यहाँ नवरात्रि जैसी कोई परिकल्पना नहीं है लेकिन शक्तिपूजा का ही विधान है।

 उत्तर भारत का दशहरा --( उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , बिहार और पंजाब ):--

उत्तर भारत  में दशहरे के पर्व का सम्बन्ध सीधे सीधे असत्य पर सत्य की विजय माना जाता है। इस पर्व को मनाने से पूर्व रामलीला का जगह जगह पर आयोजन होता है।  यहाँ पर रामलीला बहुत लोकप्रिय है , जिसमें रामायण को आधार मान कर उसको नायकीय रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रामलीला इस तरह से आयोजित की जाती है कि दशहरे के दिन रावण वध का प्रसंग आता है और फिर रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े बड़े पुतले बना कर जलाये जाते हैं।   | यहा दशहरे की रौनक देखते ही बनती है | जहाँ  एक ओर रामनगर की लीला विश्वविख्यात है | वही बनारस में घट स्थापना से शुरू हुआ यह उत्सव दस दिन तक चल चलता है | दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, इन सभी राज्यों में दशहरे का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इन सभी प्रदेशों में इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। यहां दशहरे को विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में दशहरे के दिन नीलकंठ नामक चिड़िया और मछली के दर्शन करना विशेष शुभ माना जाता है।

  कुल्लू का दशहरा:--

                            हिमाचल प्रदेश में स्थित कुल्लू का दशहरा एक अनोखे और भव्य अंदाज में मनाये जाने के कारण विश्वविख्यात है  | कुल्लू का दशहरा पारम्परिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है | यहाँ  इस पर्व को मनाने की परम्परा राजा जगत सिंह के समय से चली आ रही है  |एक लोक कथा के अनुसार राजा जगत सिंह ने एक साधू की सलाह पर कुल्लू में अयोध्या से मंगवा कर भगवान रघुनाथ जी (राम जी ) की प्रतिमा स्थापित की थी | वास्तव में राजा किसी रोगग्रस्त से थे और इसी से मुक्ति पाने के लिए साधू ने उन्हें यह सलाह दी थी | मूर्ति स्थापना के बाद राजा धीरे धीरे स्वस्थ हो गए और  उन्होंने इसी वजह से अपना शेष जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। इस उत्सव के एक दिन पहले एक रथ यात्रा आयोजित की जाती है जिसमे रथ में भगवान रघुनाथ जी ,सीता जी एवं दशहरे की देवी मनाली की हिडिम्बा जी की प्रतिमाओं को रखा जाता है |सातवे दिन रथ से व्यास नदी के किनारे लाया जाता है जहा लंका दहन का आयोजन होता है | इसके बाद रथ पुन: वापस लाकर रघुनाथ जी को उनके मन्दिर में फिर से स्थापित कर दिया जाता है | दशहरे के दिन यहाँ की धूमधाम देखने योग्य होती है |

गुजरात का दशहरा

गुजरात में मिटटी का एक रंगीन घड़े को देवी का प्रतीक माना जाता है जिसको कुंवारी लडकिया अपने सिर पर रखकर गरबा करती है  जो गुजरात की शान है | गुजरात के सभी पुरुष और महिलाये दो डंडो से गरबे के संगीत पर गरबा नाचते है | इस अवसर पर भक्ति और पारम्परिक लोक संगीत का समायोजन भी होता है | आरती हो जाने के बाद यहा पर डांडिया रास का आयोजन होता है जो पूरी रात चलता है | | नवरात्रि  में सोने के गहनों को खरीदना बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है   राजस्थान और गुजरात दोनों एक दुसरे से सटे हुए राज्य है शायद यही कारण है कि यहां पर दशहरे से जुडी एक ही मान्यता को दोनों जगह समान माना जाता है यहां नवरात्रि के 9वें दिन के उपवास के बाद 10वें दिन व्रत को खत्म कर लोग अन्न खातें है। गुजरात में दशहरे के दिन सुबह उठ के लोग जलेबी और फाफडा खा के अपने दिन की शुरुवात करतें हैं।

बस्तर का दशहरा :--

बस्तर के दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय न मानकर लोग इसे माँ दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते है | दंतेश्वरी माँ बस्तर के निवासियों की आराध्य देवी मानी जाती है जो माँ दुर्गा का ही स्वरूप  है | यहाँ पर यह पर्व पूरे 75 दिन तक चलता है जो  दशहरा श्रावण मास की अमावस से लेकर आश्विन मास  की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है | पहले  दिन को काछिन गादी कहते है जिसमे देवी से समारोह आरम्भ की अनुमति ली जाती है | यहाँ पर देवी एक कांटो की शैय्या पर विराजमान होती है जिसे काछिन गादी कहते है | यह कन्या अनुसूचित जाति की है जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति की अनुमति लेते है | यह समारोह लगभग 500 साल पहले 15वी शताब्दी से शुरू हुआ था | इसके बाद जोगी बिठाई होती है | इसके बाद यहाँ पर भीतर रैनी (विजयादशमी) , फिर बाहर रैनी (रथ यात्रा ) और अंत में मुरिया दरबार होता है | इसपर्व का समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाडी पर्व से होता है |

महाराष्ट्र का दशहरा :--

महाराष्ट्र में माँ दुर्गा को नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा जाता है और दसवे दिन माता सरस्वती की पूजा की जाती है | यहा के लोगो का मानना है कि इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से स्कूल में नये नये पढने वाले बच्चो पर माँ का आशीर्वाद रहता है इसलिए इस दिन को विद्या के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना जाता है | महाराष्ट्र में लोग नया घर खरीदने के लिए भी इस दिन को बहुत शुभ मानते है | | यहा पर एक सामजिक उत्सव सिलंगण का आयोजन भी इस दिन होता है जिसमे गाँव के सभी लोग नये कपड़े पहनकर गाँव के दुसरी ओर जार्क शमी वृक्ष के पत्तो को अपने गाँव लाते है | एक पौराणिक कथा के अनुसार शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण से जोड़ा गया है | इन शमी वृक्ष के पत्तो को स्वर्ण के रूप में लोग एक दुसरे को देकर इस पर्व का आनन्द लेते है |

कश्मीर का दशहरा :--

वैसे तो कश्मीर में हिन्दुओ की संख्या बहुत कम है फिर भी यहा पर अल्संख्यक हिन्दू इस पवित्र त्यौहार को अपने अलग ही अंदाज में मनाते है | यहाँ के लोग नवरात्रि के दिनों में केवल पानी पीकर ही उपवास करते है | यहा के हिन्दू परिवार खीर भवानी माता में बहुत आस्था रखते है और इस दिन माता के दर्शन को बहुत शुभ मानते है | यहाँ के लोगो का मानना है कि दशमी के दिन जो तारा उगता है उस समय विजय मुहूर्त माजा जाता है जो सभी कार्यो को सफल करता है इसलिए उस विजय मुहूर्त के तारे के नाम पर इसे विजयादशमी कहते है |
 
इन सबके अतिरिक्त विदेशो में भी विजयादशमी का त्यौहार बड़ी उमंगो और धूमधाम से मनाते है  | नेपाल में नौ दिन तक माँ काली और माँ दुर्गा की पूजा की जाती है और दशहरे वाले दिन राज दरबार में राजा अपनी प्रजा को अबीर ,दही और चावल का तिलक लगाते है  | श्रीलंका ,चीन ,मलेशिया और इंडोनेशिया में भी अपने अपने रीति  रिवाजो से अनुसार यह पर्व मनाने की परम्परा है |
                 

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

विभिन्न राज्यों में नवरात्रि !


                      भारतीय हिन्दू समाज में जितने पर्व और त्यौहार मनाये जाते हैं , उनमें नवरात्रि का  विशिष्ट स्थान है।  नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है।  शक्ति ही सृष्टि का निर्माण करती है , उसका पालन  करती है और उसका संहार भी करती है।  इसीलिए देवी शक्ति को सर्वोपरि माना गया है।  शक्ति ही महालक्ष्मी , महासरस्वती और महाकाली के रूप में जानी  जाती हैं। नवरात्रि में इन्हीं व्यक्त महाशक्तियों की आराधना की जाती है। 
                     नवरात्रि भी वर्ष में दो बार मनाई जाती है।  प्रथम वासंतिक नवरात्रि - जिसके प्रथम दिन से नवसंवत्सर आरम्भ होता है और वह हिंदी पंचांग के नववर्ष का प्रारम्भ कहा जाता है।  दूसरी नवरात्रि आश्विन मास में होती हैं , जिन्हें  शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।  नवरात्रि का अर्थ है नौ रातों तक नौ रूपों में देवी दुर्गा की आराधना। शक्ति की उपासना का पर्व प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि , नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता है।  सर्वप्रथम श्री रामचंद्र जी ने इस शारदीय नवरात्रि की पूजा का आरम्भ समुद्र तट  पर किया था और विजय प्राप्त की। दशमी को विजयादशमी इसी लिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन श्रीरामचंद्र्र जी ने रावण का वध किया था।  
  भारत के सभी राज्यों में नवरात्रि का पर्व विभिन्न तरीकों से इसे मनाया जाता है।   इस समय नौ दिनों तक महिलाएं एवं पुरुष व्रत रखते  हैं।घर पर व्रत का खाना बनता है और सभी इसका आनंद उठाते हैं। दुकानों में  के व्रत दौरान खाए जाने वाले खाध पदार्थों की भरमार होती है। सजे धजे मंदिरों में पूजा ,भजन,कीर्तन ,जगराता होता है। कुल मिलाकर हर शहर का वातावरण उत्सव के रंग में रंगा होता है ।  हां पूजा के रस्मों में अंतर अवश्य होता है।  

                    उत्तरप्रदेश , मध्य प्रदेश और बिहार :--उत्तर भारत के इन राज्यों लगभग समान रूप से पूजा की जाती है और इसके नौ दिन नौ देवियों के नाम को समर्पित होते हैं।  पहले दिन कलश की स्थापना कर देवी का आह्वान किया जाता है और क्रमशः प्रथम - शैलपुत्री , द्वितीय- ब्रह्मचारिणी , तृतीय चंद्रघंटा , चतुर्थ - कूष्माण्डा , पंचम स्कंदमाता , षष्ठ - कात्यायनी , सप्तम - कालरात्रि , अष्टम - महागौरी , नवम - सिद्धिदात्री देवियों के नाम से पूजन और इनके मन्त्रों का जप भी किया जाता है। 
               नवरात्रि  में प्रथम दिन ही कलश स्थापना की जाती है और अखंड ज्योति जला कर रखी जाती है, जो नौ दिनों तक लगातार जलती रहती है।  व्रत रखने वाले शुद्धता से साथ अधिकतर भूमि शयन करते हैं।  अष्टमी या नवमी के दिन पूजन, हवन के बाद व्रत का परायण किया जाता है। 
                 नवरात्रि में अष्‍टमी और नवमी के दिन निकलने वाले ज्वारों पर भक्तों की अटूट आस्था है। माना जाता है कि ज्वारों में सांग लगवाने से मन्‍नतें पूरी होती है। कानपुर में ज्वारों का अलग ही महत्व है। यहां पर बच्चे, बड़े और महिलाएं जुलूस में शामिल होकर सांग* लगाकर देवियों के मंदिर जाते हैं , कानपुर में सिद्ध देवी मंदिरों के दरबार में जाते हैं। नवरात्रि  के पर्व पर शहर के सभी जगहों से ज्वारे निकलते हैं। इसमें कुछ लोग तो 40 सालों से ज्‍वारे निकाल  रहे हैं। लोगों का मानना है कि ज्वारे में शामिल होने मात्र से लोगों की सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं।

क्‍या होता है ज्‍वारा -  नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में जौ डालकर ज्वारे बोए जाते हैं। इसमें नौ घड़े होते हैं और जहां पर ज्वारे बोए जाते हैं, वहा पर शुद्ध जल का कलश भी रखा जाता है। इस कलश के ऊपर नौ दिनों तक ज्‍योत जलाई जाती है। नवमी के दिन महिलाएं माता के दरबार के लिए ज्वाराअपने सर पर रख कर मंदिर की और प्रस्थान करती हैं और उनके साथ गाजे बाजे भी होते हैं।   बच्चे-पुरुष सांग लगवाते हैं।
                 इस क्षेत्र में नवरात्रि के व्रत में सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुरूप पूजा और व्रत करते हैं।  कुछ लोग निर्जल नौ दिन का व्रत  करते हैं और कुछ लोग सिर्फ एक लौंग खाकर रहते हैं।  फलाहारी व्रत अधिकतर लोग रखते हैं।समय और श्रद्धा के अनुसार कुछ लोग एक समय व्रत रह कर शाम को एक बार खाना ग्रहण कर लेते हैं।  नवरात्रि के पुरे नौ दिन कन्याओं की कुछ लोग विशेष पूजा करते हैं।  उनको घर बुला कर उनके पैर धोकर और टीका लगा कर पूजा करके भोजन कराते  हैं और दक्षिणा देकर उनको विदा करते हैं।
               इसके अतिरिक्त नवरात्रि में रामचरित मानस का पाठ भी नवाह्न परायण के अनुसार नौ दिन में रामायण का सम्पूर्ण पाठ पूर्ण कर लेते हैं।
तमिलनाडु
दक्षिण के इस राज्य में नवरात्रि  का त्यौहार अलग  अंदाज में मनाया जाता है। नवरात्रि  की नौ रातें देवी दुर्गा ,देवी लक्ष्मी एवं देवी सरस्वती को समर्पित हैं।अय्यर  समुदाय की महिलाएं शाम को सुहागिनों को अपने घर पर बुलाती हैं तथा सुहाग की निशानियां जैसे चूड़ी ,कान की बाली आदि उपहार में देती हैं। एक नारियल , पान ,सुपारी एवं रूपये भी इन महिलाओं को दिये जाते हैं। मसूर और अन्य दालों से बने विशेष व्यंजन आमंत्रित लोगों के लिए प्रतिदिन बनता है। कुछ लोग घर में गोलू बनाते हैं।गोलू में अस्थाई रूप से नौ सीढ़ी बनाई जाती है जिस पर सजावटी सामान , देव देवी की मूर्तियां रखी जाती हैं। यह मूर्तियां पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं 
आंध्र प्रदेश 
                                 यहां नवरात्रि  के दौरान विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में  बटुकम्मा पाण्डूगा मनाया जाता है।  इसका अर्थ देवी मां का आह्वान  करना है। महिलाएं बटुकम्मा तैयार करती हैं। इसमें मौसमी फूलों की सात परतें होती हैं। यह देखने में फूलों का फूलदान जैसा लगता है। तेलगू में बटुक का अर्थ है जीवन और अम्मा का अर्थ है मां। इस दौरान महिलाएं सोने के जेवर और सिल्क की साड़ी पहनती हैं। बटुकम्मा बनाने के बाद महिलाएं शाम को रस्म निभाती हैं। बटुकम्मा को बीच में रखकर देवी शक्ति  को समर्पित गीतों पर नृत्य करती हैं। इसके बाद बटुकम्मा का विसर्जन पानी में कर दिया जाता है।
केरल
                 यहां अंतिम तीन दिन ही नवरात्रि  मनाई जाती है अष्टमी ,नवमी एवं विजया दशमी। केरल में शिक्षा प्रारंभ करने के लिए इन तीन दिनों को शुभ माना जाता है। अष्टमी के रोज किताबें और वाद्य यंत्र देवी सरस्वती के समक्ष  रखकर उसकी पूजा का जाती है। ऐसा ही बसंत पंचमी के दिन पश्चिम बंगाल में होता है । दशमी के दिन किताबों को निकालकर पढ़ा जाता है। 
कनार्टक
                  कर्नाटक में नवरात्रि मनाने की परंपरा आज भी पुरातन काल से चली आ रही है  , उसे ही मानते हैं। सन  1610 ई..में राजा वाडयार के समय से यह त्यौहार मनाया जाता है। विजयनगर साम्राज्य में जिस तरह से नवरात्रि  मनाई जाती थी आज भी यहां के लोग उसी तरह से इसे मनाते हैं। अधिकांश स्थानों की तरह यहां भी नवरात्रि  मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाई जाती है।महिषासुर मैसूर का निवासी था। मैसूर का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है।आज भी यहाँ पर भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां सड़क पर सजे धजे हाथियों का जुलूस निकलता है।इसके अलावा प्रदर्शनी और मेले तो आम बात है।
गुजरात
                यहां धरती पर जीवन का स्रोत मां के गर्भ का प्रतीक मिटटी का कलश नवरात्रि  का मुख्य आकर्षण है। कलश में पानी ,सुपारी एवं चांदी का सिक्का डाला जाता है। सबसे ऊपर एक नारियल रखते हैं। महिलाएं इसके चारों ओर नृत्य करती हैं। इसे ही गरबा कहते हैं। डांडिया रास भी गुजरात में नवरात्रि  का आकर्षण है।गुजरात में नवरात्रि  के दौरान गरबा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। पारंपरिक गुजराती ड्रेस में सजे लड़के-लड़कियां जोड़े के साथ गरबा पंडालों में गीत-संगीत की धुन पर डांस करते हैं। गरबा पंडालों को खासतौर पर सजाया जाता है।   इस महोत्सव के दौरान देवी  दुर्गा की आराधना की जाती है। गरबा में हिस्सा लेने के लिए लोग खास तौर पर तैयारी करते हैं। करीब एक महीने पहले से ही ट्रेनिंग क्लास ज्वाइन करते हैं। आजकल गरबा का क्रेज देश के कई शहरों में बढ़ता जा रहा है।
महाराष्ट्र
            यहां के निवासियों के  लिए नवरात्रि  नई शुरूआत करने का समय है जैसे नया घर ,नया वाहन इत्यादि खरीदना। महिलाएं एक दूसरे को अपने घर पर आमंत्रित करती हैं और उन्हें नारियल ,पान ,सुपारी भेंट करती हैं। सुहागिनें एक दूसरे के माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं।महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई में नवरात्रि  गुजरात जैसा ही मनाया जाता है। प्रत्येक इलाके में गरबा और डांडिया खेला जाता है और सभी इसका भरपूर मजा लेते हैं।
हिमाचल प्रदेश
                यहां का नवरात्रि  अनोखा है। नवरात्रि  में यहां के लोग रिश्तेदारों के साथ मिलकर पूजा करते हैं। अन्य राज्यों में जब यह पर्व खत्म होता है तब यहां कुल्लू दशहरा प्रारम्भ होता है। यह भारतवर्ष की शान है। लोग भक्ति  को व्यक्त करने के लिए नाचते गाते हैं। दशमी के दिन मंदिर  की मूर्तियों का जुलूस निकाला जाता है। 
पंजाब
        यहां के निवासी पहले सात दिन व्रत रखते हैं। यहां जगराते  विशेष महत्व मन जाता है। जगराते  का अर्थ है  - पूरी रात जागकर देवी के भजन गाना। अष्टमी के दिन व्रत तोड़ने के लिए नौ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है । भंडारे में पूरी , हलवा और भिगोकर और फिर चने को चौंक कर खिलाया जाता है ।कन्याओं को लाल चुनरी उपहार में दी जाती है। इन कन्याओं को कंचिका  भी कहते हैं । नवरात्रि  पूरे देश में मनाई जाती है। मनाने की विधि में अंतर है। परंतु पूजा हर जगह पर देवी के शक्ति  रूप की ही होती है और लोगों का जोश ,उमंग और उल्लास भी एक जैसा ही होता है।
पश्चिम बंगाल 
                बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां काफी पहले ही शुरू हो जाती हैं। यहां पंचमी से दुर्गोत्सव की शुरुआत होती है। महाकाली की नगरी कोलकाता में तो पांच दिनों तक श्रद्धा और आस्था का ज्वार थमने का नाम ही नहीं लेता है बल्कि पूरे साल में सबसे उत्साह से इसे मनाने की तैयारी करते हैं।
                  पूजा के इन चार दिनों में सभी लोग खुशियां मनाते हैं। जिस प्रकार लड़की विवाह के बाद अपने मायके आती है, उसी प्रकार बंगाल में श्रद्धालु इसी मान्यता के साथ यह त्योहार मनाते हैं कि दुर्गा मां अपने मायके आई हैं।
               दुर्गोत्सव से पहले तो देवी मां की सुन्दर और मनोहारी मूर्तियां बनाई जाती हैं। प्रमुख रूप से कोलकाता के कुमोरटुली नामक स्थान पर कलाकार मूर्तियों को आकार देते हैं। बंगाली मूर्तिकार द्वारा देवी दुर्गा के साथ साथ लंबोदर गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी और कार्तिकेय की भी मूर्तियां बनाई जाती हैं। देश के बहुत से प्रांतों में बंगाली मूर्तिकारों की खूब मांग रहती है। यहां निर्मित मूर्तियां देश के अन्य स्थानों के साथ ही दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में विशाल पंडाल सजाए जाते हैं। शहर और दूर गांवों से आकर शिल्पकार पंडालों का निर्माण करते हैं। इन भव्य पंडालों को बनाने में आने वाली लागत लाखों रुपए में होती है। वहां के निवासी इन दिनों खूब खरीदारी करते हैं। 

                    फुटपाथ पर लोग सजावट की बहुत सारी सामग्री बेचते हैं। दुकानों से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह भीड़ का रेला दिखाई पड़ता है। सभी अपनी-अपनी पसंद की चीजें खरीदते हैं। लोग अपने परिजनों, संबंधियों को वस्त्र आदि उपहार स्वरूप देते हैं। विजयादशमी के दिन मां का विसर्जन होता है।
                      कुल मिला कर सम्पूर्ण देश में चाहे वह किसी भी भाग में हो , नवरात्रि शक्ति स्वरूपा देवी के लिए ही मनाया जाता है और सभी में पूर्ण श्रद्धा और भक्ति का भाव भरा होता है। 
 *सांग : या लोहे का भरी सा भाला जैसा होता है , जिसे सांग लेकर चलने वाले अपने एक गाल से डालते हुए मुंह के अंदर से दूसरे गाल से निकाल कर चलते हैं।  भारी होने के कारण दोनों तरफ लोग उसे भाले को हाथों का सहारा देते हुए चलते हैं।  यह लोग ज्वारों के साथ साथ चलते हुए मंदिर तक जाते हैं।

शनिवार, 21 सितंबर 2019

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

ब्लॉगिंग के 11 वर्ष !

                                     वह साल 2008 का था जब मेरा ब्लॉगिंग से परिचय हुआ था और वहीँ से दिशा मिली थी खुद को अपनी मर्जी से प्रकाशित करने की सुविधा।  इसमें ये कोई चिंता नहीं थी कि कोई पढ़ेगा या नहीं फिर भी धीरे धीरे लोग पढ़ने लगे और उस समय चल रहे ब्लॉग की सूचना देने वाले एग्रीगेटर थे और आज भी है जो  ब्लॉग के लिखने और उसके प्रकाशित होने की सूचना सबको देते थी। "हमारी वाणी" ने बहुत काम किया।
                      कई वर्षों तक ब्लॉग अपने चरम पर थे, हमारे पास समय भी था और सब  नियमित लिखते थे।  आलोचना , समालोचना , बहस से लेकर सब कुछ होता था फिर भी वह एक मंच है , जहाँ पर सब एक दूसरे को पढ़ते थे और नहीं भी पढ़ पाते थे तो कोई शिकायत जैसी  बीच नहीं थी।  एक परिवार की तरह से थे हम और आज भी ब्लोगर्स के बीच वही भावना है।  कभी भी किसी को पुकारों उत्तर जरूर देता है।  वह रिश्ते क्यों इतने गहरे थे क्योंकि उसे समय तू मुझे दे और मैं तुझे दूँ ऐसा नहीं था।  जब जिसको जहाँ समय मिला पढ़ लिया और नहीं मिला तो नहीं पढ़ पाए।  फेसबुक का मंच आया तो इसने सेंध लगा दी ब्लॉग में।  तुरंत लिखना और तुरंत पाठकों की प्रतिक्रिया मिलाने का खेल सबको अधिक भाया और फिर वही मंच पकड़ लिया।  हजारों की संख्या में मित्र बन गए लेकिन वे कितना आपसे जुड़े हैं इसके लिए आप अंदाज नहीं लगा सकते हैं।  नाम के मित्रों का मजमा लगा रहता है। उससे बड़ा झटका तब लगा जब हर हाथ में स्मार्ट फोन आ गया और फिर उसमें हिंदी लिखने की सुविधा भी मिल गयी।  इस हालत में ब्लॉग पर कौन जाए ? एक बार में फेसबुक खोली और चेप दिया।  हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में फेसबुक ने ब्लॉग को बुरी तरह से झटका दिया।  ब्लॉग पर सभी अर्थ पूर्ण पढ़ने के आदी थे और वहां लिखा भी वही जाता था। सही अर्थों में ब्लॉग में फेसबुक ने सेंध लगायी और हम उससे खुद ब खुद दूर होते गए।  कुछ समर्पित ब्लॉगर आज भी उतनी ही लगन से अपने ब्लॉग को चला रहे हैं और फेसबुक को भी भी दे रहे हैं।
                         अरे मैं फेसबुक की आलोचना करने में लग गयी।  हमारे ब्लॉग ने हमें जितना बड़ा संसार दिया उसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ।  डायरियों में बंद पड़ी रचनाएँ , जो खो चुकी थी पन्नों के ढेरों में, फिर से मंच पर आ गयी।  सबने मुझे दिशा दी , सिखाया क्योंकि मैं काम जरूर कंप्यूटर साइंस विभाग में थी और सारे दिन सिर्फ डेस्कटॉप पर होते थे और तब हमें नेट सुविधा उपलब्ध नहीं थी।  ईमेल आई डी जरूर थी और मैं से काम चल जाता था।  बाद में नेट सुविधा मिलने पर जुडी , लेकिन इस ब्लॉग के टिप्स से मैं अपरिचित थी।  धीरे धीरे हमारी मित्रों ने मुझे दिशानिर्देश दिया और फिर धीरे धीरे सब तो नहीं हाँ कुछ तो करना आ ही गया।
                         बीच में साथ छूट गया था लेकिन फिर उस मंच की गरिमा और उसके महत्व को स्वीकार करते हुए , उस पर लिखना शुरू कर दिया है।  बहुत सारी  सामग्री है जिसको अभी लिखना शेष है। अपने ब्लॉग का महत्व समझें तो ये एक ऑनलाइन डायरी है , किताब है जो सबके लिए उपलब्ध है।  जो ब्लॉग़र बंधु और बहने इससे दूर हैं वो वापस आ  जाय और फेसबुक को मंच बनाने वाले भी अपने को इसा पर संचित रख सकते हैं।
                       ग्यारह वर्ष में एक काम २०१२ में किया था और वह भी अपने सभी ब्लॉगर साथियों के सहयोग से , उसको पुस्तकाकार देने का कार्य चल रहा है , जो मेरे ब्लॉगर होने के नाते ब्लॉगर साथियों के संस्मरण को संचित कर सबके सामने लाने का प्रयास है।  "अधूरे सपनों की कसक " विषय को लेकर अंदर पलने वाली कसक को उजागर किया है।  भले ही वो कसक अब कोई मायने नहीं रखती लेकिन जीवन के लिए देखे सपने एक धरोहर तो हैं ही इस जीवन के।  मेरे उस सपने को साकार करने में भी हमारे ब्लॉगर साथियों का सहयोग है और उनकी मैं शुक्रगुजार हूँ।

रविवार, 15 सितंबर 2019

बेटियों का दंश (५) !

        लोगों ने जीना हराम कर दिया।  तरह तरह के सवाल कभी कभी हमें खुद अपराधबोध कराने लगे थे।
--पांच पांच लड़कियां है कब  करेंगे शादी ?
--अरे बेटियों की कमाई खा रहे हैं पैसा किसे बुरा लगता है ?
--हमें लगता है कि इन लोगों के पास पैसा नहीं है , लड़कियां कमा कर इकठ्ठा कर लेंगी तो कर देंगे।
-- इन लोगों को रात में नींद कैसे आती है ? जवान लड़कियां घर में बैठी हैं। 

                 कोई किसी से कहता तो दूसरा आकर हमें बताता या फिर खुद अपने मन से गढ़ कर बताता।  जो भी हो हम बहुत शांत भाव से सुन लेते और कह देते कि कुछ चीजें इंसान के वश में नहीं होती , जब भाग्य साथ देगा तो सब हो जाएगा। अंदर ही अंदर ये बातें सुन मन कभी कभी खुद को दोषी ठहराने लगता.।
                 फरवरी २०१० में बड़ी  बेटी की शादी पक्की हुई। अंतर्जातीय थी कर्नाटक के रहने वाले थे।   प्रश्न उठे और सिर  पटक कर दम तोड़ गए। हमने वहीँ जाकर शादी की थी और फिर अनुभव किया कि हमारे उत्तर भारत में जैसे लड़की का पिता और उसके पक्ष के लोग "बेचारे " बने लडके  वालों के नखरे उठाया करते हैं।  वहां ऐसा कुछ भी न था।  सारा इंतजाम उन्होंने ही किया था और सम्मान भी पूरा किया।

बड़ी बेटी ऋतु  और दामाद विनय केशव

                अभी तो चार बाकी हैं , फिर वही एक से गिनती गिनना शुरू करना था।  दूसरे नंबर की बेटी लम्बे समय के लिए यू एस में रही  कंपनी के काम से , और लोगों को लगा कि हम चुपचाप बैठे हैं।  खोज जारी थी दूसरे और तीसरे नंबर की बेटियों के लिए।  तीसरी भी तब तक  अपनी पढाई पूरी करके दिल्ली में जॉब करने लगी थी।शायद विवाह की कोई भी ऐसी साइट नहीं थी जिस पर मैंने उसका विज्ञापन न दे रखा हो।  आज भी वह डायरी मेन्टेन करके रखी है। 
             इसी बीच मेरी छोटी बेटी का चयन भी IPH   दिल्ली में ही हो गया और उससे बड़ी वाली की इंटर्नशिप चल रही थी । 
                    दिल्ली में लडके देखने की जिम्मेदारी मैंने अपने मानस पुत्र हरीश को दे रखी थी। चूँकि वह दिल्ली में जॉब कर रही थी तो मेरी प्राथमिकता यही थी कि वही एनसीआर में कोई लड़का मिले तो अच्छा है। फिर हरीश ने एक लड़का बताया जो महाराष्ट्रीय था और ये बात मेरे पतिदेव को बिलकुल भी पसंद न थी। हरीश ने बहुत समझाया क्योंकि वह कई रिश्तों के लिए दौड़ रहा था और हर जगह कभी मेरी बेटी की पांच फुट लम्बाई और कभी उसका रंग आड़े आ रहा था।  कोई बीस लाख की शादी करने पर समझौता करने को तैयार था।  पहली दो चीजों को तो हम बदल नहीं सकते थे।हमारे पास इतने सारे पैसे भी नहीं थे कि हम लाखों दहेज़ में देकर शादी कर पाते।  
                     वह लड़का उसके पापा के विभाग एनपीएल से डॉक्ट्रेट करके पुर्तगाल में पोस्ट डॉक्ट्रेट फ़ेलोशिप लेकर काम कर रहा था।  उससे भी हरीश ने संपर्क साध रखा था और फिर हम लोगों से कहा।  किसी तरह से पतिदेव नागपुर लडके के घर वालों से मिलने को तैयार हुए।  उससे पहले उन्होंने अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों से इस पर चर्चा कर ली और सब से पॉजिटिव उत्तर मिलने के बाद वह तैयार हुए।  
                         उसके बाद  सब कुछ ठीक रहा और शादी पक्की हो गयी।  शादी की तिथि हमने करीब ग्यारह महीने  के बाद रखी क्योंकि इससे पहले पवन को छुट्टी भी न मिलती और हमारी दूसरे नंबर की बेटी के लिए वर खोजने समय भी मिल जाता क्योंकि संयुक्त परिवार में बड़ी बैठी रहे और छोटी की शादी जो जाए एक बड़ा प्रश्न बन जाता है।  उसको यूएस से वापस आने को कहा गया और फिर खोज शुरू हुई।  भाग्य ने साथ दिया और उसकी भी शादी पक्की हो गयी। 
                 मेरी बेटी की शादी के लिए पवन के परिवार ने हमें पूरा पूरा सहयोग किया बल्कि वहां पर मेरे चचेरे भाई के होने से सारी जिम्मेदारी उसने संभाल रखी थी। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ और बड़े सुखद अनुभव भी हुए और अहसास हुआ कि लड़की वाले भी इज्जत पाने के हक़दार होते हैं।  हमें कहीं न लगा कि हम निरीह बेटी वाले हाथ जोड़े खड़े हैं ।
      दहेज़ हमारे पास देने को न था और न उन्होंने कुछ माँगा। मन से बड़े ही सहृदय लोग हमने पाये। शादी हम दोनों की रस्मों के अनुसार नवम्बर 2011 सम्पन्न हो गयी। दूसरे नं की बेटी की फरवरी 2012 में हुई ।
                         तीन बेटियों की शादी दो साल के अंदर हो गयी तो लोगों के मुंह बंद हो गए।  बाद की दोनों छोटी थी अभी पढ़ रही थीं सो कुछ दिन के लिए सब कुछ शांत हो गया।  एक बात और कि तीनों बड़ी के बीच दो दो साल का अंतर था और चौथी पाँच साल छोटी थी

             चौथी बेटी की शादी 2014 फरवरी में हो गई । सब कुछ ऊपर वाले की मर्जी से हो रहा था । उसकी जॉब भी दिल्ली में ही थी और दामाद की गुड़गांव में । बस अब एक रह गई थी । वह मुम्बई के सरकारी संस्थान से BSLP .का कोर्स कर रही थी । उसके वहीं से मास्टर्स के दौरान ही डॉक्टर लड़का मिल गया और उसकी पढ़ाई पूरी होते है 2016 में उसकी भी शादी हो गई ।

     आज बड़ी अपने पति व बेटे के साथ यूएस में , उससे छोटी अपने परिवार के साथ आस्ट्रेलिया , तीसरी नागपुर , चौथी दिल्ली और पाँचवी झाँसी में अपना क्लीनिक चला रही है । हमें बेटियाँ देकर दामाद नहीं पाँच बेटे मिले और पाँच नाती भी मिल गये । 
            जमाने का दंश जी लिया , अब चिंतामुक्त हूँ।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

राजभाषा हिंदी का सफर : संविधान से प्रयोग तक !

                                       हिंदी को संविधान में राजभाषा का स्थान प्राप्त हुए 69 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और अगर हम गंभीरता से इस बार विचार करें तो ये पायेंगे कि इतने वर्षों में अगर इस लक्ष्य की और हमने एक कदम भी बढ़ाया होता तो मंजिल के बहुत करीब होते।  हमने तो सिर्फ दशकों में उसे अधिनियम में परिवर्तन किया और कुछ परिवर्तन भी नहीं किया बल्कि उसको गोल गोल घुमा कर वहीँ ला कर रख दिया गया।  हमने इसको इतने वर्षों में इस दिशा में कार्य करने सितम्बर माह की 14 तारीख , प्रथम पखवारा , अंतिम पखवारे तक सीमित कर दिया है।  प्रयास चाहे सरकारी हों या  संस्थानीय , अगर निरंतर प्रयास किया गया होता या फिर हम आज भी करें तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।  अच्छे कार्य  के लिए देर कभी भी नहीं होती है।  अब भी सिर्फ राजभाषा के लिए नहीं अपितु हिंदी भाषा के लिए प्रगति और उसको गतिमान बनाये रखने की दिशा में हम बहुत काम कर चुके होते।
                       सरकार ने नीतियां बनाई लेकिन राजभाषा के साथ अंग्रेजी को हमेशा जोड़े रखा , आखिर क्यों ? अंग्रेजी हमारी देश की किसी भी राज्य की मातृभाषा नहीं है।  इसको तमिलनाडु की राजभाषा घोषित क्यों गया ? वहां की अपनी मातृभाषा है।  संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं पास करके   समस्त  राज्यों से अधिकारी बनते हैं तो फिर उन समस्त विषयों के साथ राजभाषा की परीक्षा अनिवार्य क्यों नहीं रखा गया क्योकि नौकरशाही और राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिंदी को उसका   समुचित स्थान देने के लिए प्रतिबद्ध हुए ही नहीं है।
                           
                  हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में १४ सितम्बर सन् १९४९ को स्वीकार किया गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद ३४३ से ३५१ तक राजभाषा के साम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये १४ सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। केंद्रीय स्तर पर भारत में दूसरी सह राजभाषा अंग्रेजी है।

धारा ३४३(१) के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपिदेवनागरी है। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप (अर्थात 1, 2, 3 आदि) है।

              हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत का संविधान में कोई भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया था।[2][3] संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। {संविधान का अनुच्छेद 120} किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
        
हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किये जाने का औचित्य

हिन्दी को राजभाषा का सम्मान कृपापूर्वक नहीं दिया गया, बल्कि यह उसका अधिकार है। यहां अधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है, केवल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा बताये गये निम्नलिखित लक्षणों पर दृष्टि डाल लेना ही पर्याप्त रहेगा, जो उन्होंने एक ‘राजभाषा’ के लिए बताये थे-

(१) अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।(२) उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार हो सकना चाहिए।(३) यह जरूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।(४) राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।(५) उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्प स्थायी स्थिति पर जोर नहीं देना चाहिए।

इन लक्षणों पर हिन्दी भाषा बिल्कुल खरी उतरती है।
           
अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा

(१) संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।(२) खंड (१) में किसी बात के होते हुए भी, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा जिनके लिए उसका ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रपति उक्त अवधि के दौरान, आदेश द्वारा, संघ के शासकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के अतिरिक्त देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।(३) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, संसद उक्त पन्द्रह वर्ष की अवधि के पश्चात्‌, विधि द्वारा(क) अंग्रेजी भाषा का, या(ख) अंकों के देवनागरी रूप का,

ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जो ऐसी विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं।

अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

राजभाषा संकल्प, 1968

भारतीय संसद के दोनों सदनों (राज्यसभा और लोकसभा) ने १९६८ में 'राजभाषा संकल्प' के नाम से निम्नलिखित संकल्प लिया-

1. जबकि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी भाषा का प्रसार, वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एंव विकास की गति बढ़ाने के हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायों एवं की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद की दोनों सभाओं के पटल पर रखी जाएगी और सब राज्य सरकारों को भेजी जाएगी।

2. जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है , और देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाए किए जाने चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें।

3. जबकि एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रि-भाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूर्णत कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए :

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा के, दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए, और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

4. और जबकि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संघ की लोक सेवाओं के विषय में देश के विभिन्न भागों के लोगों के न्यायोचित दावों और हितों का पूर्ण परित्राण किया जाए

यह सभा संकल्प करती है कि-(क) कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्त्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों जैसी कि स्थिति हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाए, संघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यत होगा; और(ख) कि परीक्षाओं की भावी योजना, प्रक्रिया संबंधी पहलुओं एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केन्द्रीय सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी।
                  
                    
संगोष्ठी के उद्देश्य - 
• राजभाषा को दस्तावेजों से उठाकर वास्तव में प्रयोग करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार करना
• ‎प्राथमिक स्तर से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक हिंदी की अनिवार्यता पर विचार किया जाय।
• ‎शिक्षा के स्तर का समय समय और परीक्षण होना ज़रूरी है।
• ‎प्राथमिक शिक्षकों के हिंदी के ज्ञान के स्तर का परीक्षण के पश्चात नियुक्ति की जाय। अथवा नियुक्ति से पहले एक परीक्षा हिंदी व्याकरण आदि के ज्ञान पर आधारित पास करना अनिवार्य हो।
• ‎अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी स्कूलों में हिन्दी का पाठ्यक्रम सतही ना होकर सभी शिक्षा बोर्डों में समान हो, ताकि हिंदी को दोयम दर्जे का ना समझ जाये।
• ‎राजभाषा को इतने वर्षों में पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है, संविधान में परिभाषित इसके सफर को इतने वर्ष बाद गति देने के विषय में विमर्श किया जाए।
• ‎अंग्रेजी को हिन्दी के स्थान और कुछ वर्षों तक रहने का प्राविधान किया गया था लेकिन आज भी अंग्रेजी ऊपर और हिन्दी नीचे है।
• ‎हिन्दी को समुचित स्थान पर लाने का प्रयत्न करना है।
• ‎अभिजात्य वर्ग की राजभाषा को उसके स्थान से चित्त रखने में भूमिका पर विचार।
• ‎विश्व के पटल पर छायी रहने वाली हिन्दी और देश में प्रयोग होने वाली हिन्दी का स्थान सुनिश्चित कैसे हो। सोशल मीडिया द्वारा हिन्दी को विकृत करने की दिशा में उसकी भूमिका पर विमर्श एवं अंकयश पर प्रस्ताव।
• ‎राजभाषा को मिलने वाले अनुदान पुरस्कार तथा अन्य सहायता का समुचित प्रयोग।

   इतने वर्षों में यदि शिक्षा के स्तर पर हिंदी को देखा जाय तो मीडिया , मोबाइल और नेट से उपलब्ध सामग्री ने गहन ज्ञान में सेंध लगाई है । हिंदी का स्वरूप बिगड़ रहा है । न स्कूली शिक्षा में , न कार्यालयीन कार्यों में । जितने वर्ष हमने  हिंदी माह , पखवाड़ा, सप्ताह और दिवस मना रहे हैं , उतना ही हिंदी को प्राथमिकता देते तो ये दिवस बेमानी हो चुका होता ।
            

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

ओणम्

ओणम्
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       भारत भूमि पर अनेक धर्म और मतों के लोग रहते हैं और सबके अपने अपने त्यौहार हैं । कुछ त्यौहार सम्पूर्ण देश में मनाये जाते हैं और कुछ राज्य विशेष में अपनी अपनी आस्था के अनुरूप भी मनाये जाते हैं । ओणम् एक ऐसा ही त्यौहार है , जो केरल राज्य में मनाया जाता है और जो प्राचीन पौराणिक कथा के कथानक को जीवंत करते हुए मनाते हैं ।
        ओणम् मलियाली पंचांग के अनुसार वर्ष के पहले महीने चिंगम में जब थिरुवोनम नक्षत्र आता है तभी मनाया जाता है । यह दस दिनों का त्यौहार होता है और इसमें दीपावली के समान ही कुछ परम्परायें होती हैं । 
      वैसे तो इसको किसानों और नयी फसल से जोड़ कर भी माना गया है लेकिन यह सम्पूर्ण प्रदेश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है । इसकी महत्ता देखते हुए इसे केरल राज्य का राष्ट्रीय त्यौहार घोषित किया गया है और इस अवसर पर चार दिनों की छुट्टी होती है । यह अगस्त और सितम्बर के मध्य दस दिन का पर्व होता है और प्रत्येक दिन को अलग नाम दिया गया है और विशिष्ट रूप से उसकी तैयारी होती है । इसे चावल की फसल और वर्षा के फूलों का त्यौहार भी माना जाता है ।
   
   पौराणिक कथा 
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          इससे जुड़ी पौराणिक कथा राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है । तभी वामन देव ने महाबली का सारा राज्य दान में माँग कर उसे पातालवासी बना दिया था । यही मान्यता है कि ओणम् के दौरान राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने और उनकी खुशहाली देखने के लिए आते हैं । उन्हीं के सम्मान में यह मनाया जाता है ।
        ओणम् के दस दिनों को विशेष नामों से जाना जाता है और प्रत्येक दिन अलग अलग कार्य सम्पादित किये जाते हैं । 

ओणम् के दस दिनों के नाम --

ओणम् के दस दिनों को विशेष नामों से जाना जाता है और प्रत्येक दिन अलग अलग कार्य सम्पादित किये जाते हैं । 
1. अथं - यह पहला दिन होता है , जब राजा महाबली पाताल से केरल आने के लिए तैयार होते हैं ।
2 - चिथिरा - फूलों का काली बनाना शुरू किया जाता है ,जिसे पूवक्लम कहते हैं ।
3 - चोधी - पूवक्लम में विभिन्न फूलों की अगली परत चढा़ते हैं ।
4 - विशाका - इस दिन से विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं शुरू होती हैं ।
5 - अनिज्हम - नौका दौड़ की तैयारी शुरू होती है ।
6 - थ्रिकेता - छुट्टियाँ आरम्भ हो जाती हैं ।
7 - मूलम - मंदिरों में विशेष पूजा शुरू होती है ।
8 - पूरादम - महाबली और वामन की प्रतिमा स्थापित की जाती हैं ।
 9 - उठ्रादोम - इस दिन महाबली केरल में प्रवेश करते हैं ।
 10 - थिरुवोनम - मुख्य त्यौहार होता है ।
ओणम मनाने की पद्धति --
                इस पर्व की मुख्य धूम कोच्चि के थ्रिक्कारा मंदिर में रहती है । इसके विशेष आयोजन पूरे दस दिन तक होते रहते है , जिनमें नाच गाना , पूजा आरती , मेला आदि होता है । इसको देखने के लिए देश - विदेश से सैलानीआते हैं ।
    ओणम में फूलों का विशेष कालीन बनाया जाता है  - जिसे पूवक्लम पहते हैं , इसमें फूलों की परत रोज चढ़ाई जाती है ।
      इसमें विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है । इनमें केरल के लोक नृत्यों जैसे -- थिरुवातिराकाली , कुम्मात्तिकाली,कथकली , पुलिकाली आदि का विशेष आयोजन होता है ।
    इस त्यौहार में नौका दौड़ प्रतियोगिता  , जिसे वल्लाम्काली कहते है, की तैयारी जोर शोर से होती है । यह ओणम के बाद होती है लेकिन तैयारियाँ शुरू हो जाती है । यह विश्व प्रसिद्ध नौका दौड़ सिर्फ केरल में होती है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र होती है ।
        ओणम्  चावल के घोल से घर के बाहर सजाया जाता है , घर को दीपावली की तरह रोशनी से सजाया जाता है ।
       ओणम चूंकि महाबली से जुड़ा त्यौहार है इस लिए दान का विशेष महत्व होता है । गरीबों को दान दिया जाता है ।
      ओणम के आठवें दिन महाबली और वामन की प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं । उनकी पूजा अर्चना की जाती है ।
       ओणम के आखिरी दिन बनने वाले व्यंजनों को 'ओणम सद्या' कहते हैं , इसमें 26 प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं और केले के पत्तों में परोसे जाते हैं ।
             वैसे तो ओणम दस दिनों का त्यौहार होता है किन्तु इसके बाद दो दिन और मनाया जाता है । इन दिनों में पहले दिन महाबली और वामन की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है और दूसरे दिन पूवक्लम को साफ किया जाता है ।
             

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

जरा याद उन्हें भी कर लो ...!

1957 की क्रांति की कानपुर की वीरांगनाएँ !


                        हमारा देश सिर्फ वीरों का ही नहीं अपितु वीरांगनाओं की भी कर्मस्थली रहा है । उसने माँ बनकर, बेटी बनकर, शासक बनकर और वीरांगना बनकर प्रत्येक क्षेत्र में विजय पताका  फहराई है। अगर विजयश्री न पा सकीं तो संघर्ष करते करते अपने को मातृभूमि पर न्योछावर करके इतिहास में पृष्ठों पर अपना नाम  अंकित कर गयीं। नव जागरण काल से लेकर संघर्ष की पूरी स्वातंत्र्य अवधि में भारतीय नारियाँ सुधी एवं मनीषी पुरुषों के दिग्दर्शन में उनके कंधे से कन्धा मिलाकर देश की गुलामी के विरुद्ध लड़ती रहीं.
                          कुछ  ऐसी वीरांगनाएं भी हैं, जिन्हें हम आमतौर पर अपने अब तक के अध्ययन में किसी भी विषय के पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ सके हैं और यह कार्य यदि शोध की दृष्टि से न किया गया होता तो शायद आज भी मैं अनभिज्ञ होती. हम लोगों में कुछ कुछ इतिहासकारों को इसका ज्ञान अवश्य ही होगा क्योंकि जिनका ये शोध विषय रहा है - वे मनीषी ही इस दिशा में मुझे वहाँ तक पहुँचने में सहायक सिद्ध हुए.
                         इस दिशा में पहल करने के लिए १८५७ की क्रांति में महारानी लक्ष्मी बाई का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा है । उन पर कुछ भी लिखना कुछ नया नहीं होगा. वे स्वयं इतिहास है. इस क्रांति का सूत्रपात जब १८५७ में मेरठ में हुआ तब मेरठ छावनी में अंग्रेजों द्वारा प्रयोग करने के लिए दिए गए कारतूसों के प्रयोग को लेकर हुए विरोध पर ८५ सैनिकों का कोर्ट मार्शल हुआ और उनको १०-१० वर्ष का कठोर कारावास हुआ। उन्हें बेड़ियाँ डालकर कारगर में बंद कर दिया गया. उसी शाम कुछ सैनिक मेरठ बाजार में घूमने गए तो मेरठ की महिलाओं ने उनको इस शब्दों में धिक्कारा - आपके भाई जेल में है। आप यहाँ मक्खी मार रहे हैं. आपके जीने को धिक्कार है." ( इन शब्दों का प्रयोग एक अंग्रेज ने अपनी डायरी में किया था.) ये गुमनाम किन्तु देशभक्ति  से भरी नारियाँ इस क्रांति कि एक सुलगती हुई चिंगारी थीं.
                          इस काल की कुछ वीरांगनाओं की, जो उत्तर प्रदेश से ही थीं, भूमिका प्रस्तुत करने कि इच्छा है। अगर इस विषय को आप लोगों ने सार्थक समझा तो इससे जुड़े और गुमनाम व्यक्तित्वों  से परिचय अवश्य कराऊंगी  अन्यथा फिर कभी प्रस्तुत करूंगी।

                                         
कुमारी मैना बाई


                     स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं में नाना साहब की अल्पवयस्क दत्तक पुत्री मैना को भी नहीं भुलाया जा सकता है. चिता में जिन्दा जल जाने के बावजूद उसने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इंकार कर दिया और बिना चिल्लाये स्वतंत्रता की वेदी पर बलि चढ़ गयी।
                      मैना शरणागतों को लेकर और एक अंगरक्षक माधव को लेकर गंगातट पर पहुँची , जहाँ उसे खबर मिली कि अंग्रेज कानपुर में महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ कर रहे हैं और दुधमुंहे बच्चों तक को नहीं बक्श रहे हैं.  मैना का यह सुनकर खून खौल उठा , वह फिरंगियों से बदला लेने की सोचती ही रहती थी। उसको अपने पिता का ये आदेश कि 'शरणागतों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना है.' याद आ गया। वह कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहती थी और वे फिरंगियों कि परवाह किये बिना अपने काम को अंजाम देने में लगी रही। इस बात की खबर अंग्रेजों को भी लग गयी और अंग्रेज भी वहाँ पंहुच गए। अंग्रेजों ने मैना के अंगरक्षक माधव को मारकर मैना को गिरफ्तार कर लिया। उनको  मैना  से  स्वतंत्रता  सेनानियों  के  बारे  में  जानकारी  चाहिए थी। इसके लिए उसे पेड़ से बाँध कर भीषण यातनाएँ  दी गयीं। लेकिन मैना को देश के साथ जीने और मरने की शहादत याद थी और पिता की हिदायत भी। जब अंग्रेज इससे संतुष्ट न हुए तो  उसको उन्होंने  जिन्दा चिता में जलाया और अधजला शरीर  निकाल कर फिर पूछताछ की लेकिन भारत माँ की  उस पुत्री ने अपना मुँह नहीं खोला और उसको पूरा ही जल दिया गया।
                        मैना चिता में जल गयी लेकिन अंग्रेजों को ये सबक सिखा गयी कि भारतीय युवतियाँ भी किसी से पीछे नहीं है। भारत को इस बहादुर बेटी पर सदा गर्व रहेगा।


 महारानी तपस्विनी


                  महारानी लक्ष्मी बाई की भतीजी  और उनके  एक सरदार पेशवा नारायण राव की पुत्री महारानी तपस्विनी का भी योगदान अविस्मरनीय है.   उन्होंने सांसारिक मोहमाया का त्याग कर पूजापाठ में लीन रहने वालों को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रेरित  किया और उनके हाथ में अस्त्र-शस्त्र पकडाए।
                 बाल विधवा होने के बावजूद उन्होंने योगासन के साथ साथ शस्त्र  चालन , घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण लिया. पेशवा खानदान की होने के कारण ही उनको देशप्रेम विरासत में मिला था। अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की इच्छा  ने उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण बनाया।
                        अंग्रेजों को धोखा देने के लिए वे संत गौरीशंकर की शिष्या बन गयीं और शांति और प्रेम के भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ साथ देशभक्ति का उपदेश भी दिया करती थी। उन्होंने विद्रोह का प्रतीक लाल कमल दे कर क्रांतिकारी साधुओं का दल बनाया। इन्होंने लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति करने के लिए सोयी हुई भावनाओं  को जगाने का कार्य सम्पन्न करना शुरू कर दिया। ये साधु दल अस्त्र शस्त्रों से पूरी तरह से लैस होते थे । युद्ध के समय  तपस्विनी घोड़े पर सवार होकर मुठभेड़ों से जूझते हुए सारी व्यवस्था का निरीक्षण  स्वयं ही देखती थीं। अंग्रेजों की योजनायें जब असफल होने लगीं तो अंग्रेज हाथ धोकर महारानी के पीछे पड़  गए। वह नाना साहेब के साथ नेपाल चली गयीं लेकिन वे वहाँ भी निष्क्रिय नहीं रहीं और वहाँ भी अंग्रेजों के खिलाफ देशप्रेम की भावना पैदा की और वहाँ पर  'महाकाली पाठशाला' खोल दी । वहीं से स्वतन्त्रता यज्ञ आरम्भ किया। जब तक जीवित रहीं क्रांति योजना की बार बार असफलता के बावजूद इसे जारी रखे रहीं। १८५७ की क्रांति असफल होने के बाद भी क्रांति के ज्वाला जलाये रखने वाली महारानी तपस्विनी का नाम भारत की वीरांगनाओं  में अग्रणी रहेगा.


                                                         *अजीज़न बाई*


                   जैसा इस नाम से अनुमान लगाया जा सकता है कि ये नाम किसी नाचने वाली से सम्बन्ध रखता होगा। घुंघरुओं की झंकार  से  लेकर  तलवार  की  खनक  तक अजीज़न का जीवन इस प्रकार का रहा जो अपने आप में देशभक्ति और राष्ट्र की स्वतंत्रता का एक बहुत बड़ा पथ है।
                  जब कानपुर पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया तो कानपुर की  हिन्दू और मुस्लिम महिलायें अपने घरों से निकल कर गोला बारूद इधर से उधर ले जाने  और सैनिकों को भोजन पहुँचने एवं और भी प्रकार की  सहायता का काम ठीक अंग्रेजी किले की  दीवार के नीचे कर रहीं थीं। इन सब स्त्रियों में कानपुर की महान स्वतंत्रता सेनानी, कूटनीतिज्ञ   एवं समर दक्ष अजीज़न ने वीर महिलाओं का एक दल संगठित किया और वीरांगनाओं की इस टुकड़ी का नेतृत्व किया। वीरांगना अजीज़न का यह संगठित दल मरदाने वेश में हाथ में तलवार लेकर घोड़े  पर सवार होकर नगर में लोगों को क्रांति का सन्देश सुनाता  हुआ घूमता  था। युद्ध के समय यह दल अपने सिपहियों को दूध , फल, मेवा, मिठाई  बांटता, घायलों की  सेवा करता था, समय पड़ने पर यह दल अपने साथियों को हथियार , गोला बारूद पहुंचता था। अजीज़न सैनिक वेशभूषा में तथा हाथ में पिस्तौल लिए अंग्रेजी सैनिकों को रौंदती चली जाती थी। उनके वीरत्व के कारण ही कानपुर की महिलाओं में चेतना जाग्रत हुई।
                    नाना साहब की  पराजय का समाचार पाते ही अजीज़न प्रतिशोध की  भावना से प्रेरित होकर मोहम्मद के होटल से ५ कातिल ले आई और बीबीघर  के अंग्रेज कैदियों को मारकर कुँए में डलवा दिया। यह कुआँ आज नाना राव पार्क में तात्या टोपे की प्रतिमा के समक्ष वृत्ताकार चबूतरा बना  हुआ है। अजीज़न इस कांड से शांत नहीं बैठी वरन उसने अंग्रेजी सेना से अपनी टुकड़ी और क्रांतिकारी सेना के साथ मिलकर छापामार युद्ध आरम्भ कर दिया।
                   एक बार हैरी और वाटसन नामक सैनिक इस लड़ाई में अपनी टुकड़ी से बिछुड़ कर  पानी की  खोज में जंगल में भटक गए थे और एक कुँए की  ओर बढे। इधर अजीज़न  भी इनकी ताक  में पिस्तौल लिए पेड़ की  आड़ में खड़ी थी. इन दोनों को बढ़ता देखकर उसने गोली चलाई  परन्तु गोली चलते ही दोनों जमीं पर लेट गए और अजीज़न की  गोलियां बेकार गयी. हैरी और वाटसन शस्त्रास्त्रों से लैस थे और उन्होंने इन सैनिकों को पकड़ना चाहा। आदमी समझ कर धर दबोचा उससे अजीज़न की  पिस्तौल दूर जा गिरी, सिर का साफा  खुल गया और वह जमीन पर गिर पड़ी। तब वे समझे कि जिसे वे युवक समझ रहे थे वह तो वीरांगना नारी अजीज़न है। अजीज़न ने जमीन से उठने का प्रयास किया तो पुनः गिर पड़, किन्तु पिस्तौल उनके हाथ में आ गयी। हैरी पानी पीने गया था। अजीज़न वाटसन के सीने में गोली उतार दी। हैरी जब तक कुछ समझे तब दूसरी गोली उसके सीने में उतार दी और वह परलोक सिधार गया.
                  अजीज़न निश्चिन्त होकर आगे बढ़ना चाह रही थी किन्तु वह सैनिकों से घिर चुकी थी। इस पर भी उसने साहस का परिचय दिया और एक सैनिक की बन्दूक छीन कर उस पर कुंदों से प्रहार कर दिया, किन्तु इतने सैनिकों से निपटना आसन नहीं था। अतः पकड़ी  गयीं फिर हैवलाक  के पास लाई गयीं। हैवलाक  ने अजीज़न से कहा कि क्षमा मांग लो तो तुम्हारे प्राणों कि रक्षा हो  सकती  है। अजीज़न  ने  उत्तर  दिया  - "अत्याचारी  से  क्षमा  माँगने के लिए मैं तैयार नहीं ।"
फिर हैवलाक ने पूछा - "तुम क्या चाहती हो?"
उसने कहा कि "अंग्रेजी राज्य का विनाश।" इस पर हैवलाक के संकेत पर एक गोली उसके सीने पर जा लगी और गोली लगते ही वह "नाना साहब की जय" चिल्ला उठी। गोलियां चलती रहीं और वह अंतिम साँस तक नाना साहब की जय बोलती रहीं और अंत में वीरगति को प्राप्त हुई।

शनिवार, 10 अगस्त 2019

कहाँ आ गये हम ?

                       सदियों से चली आ रही सृष्टि और उसकी संस्कृति  को हम बरकरार  न रख पाए। हमने छोड़ते छोड़ते सब छोड़ दिया पर दिखाई किसी को न दिया।  आज जब खाली हाथ इंसान जानवर से भी बदतर होकर इंसानियत और खून  रिश्तों का लिहाज भी भूल गया। क्या बहन , क्या बेटी और क्या माँ ? सिर्फ और सिर्फ एक औरत उसमें दिखलाए देने लगी है। और उसकी सोच रोज किसी न किसी बेटी को दुष्कर्म का शिकार बना डालता है और हम बार बार सिर मारते हुए सोचते है कि इसमें गलत कहाँ हुआ ? इंसानी सोच अब उम्र  की मुहताज नहीं रही है। अपनी नानी दादियों के मुँह से सुना था  कि जब बाप बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बनाने लगेगा और इंसान इंसान को खाने लगेगा तब घोर कलयुग समझना कि आ गया । सब कुछ हो रहा है लेकिन कहीं कलयुग की पराकाष्ठा को देखा है और प्रकृति  सका ह्रास हम देख रहे हैं । अब प्रलय में क्या शेष है ? हर साल प्रकृति अपना भयावह रूप दिखा देती है । 

        हमारे बुजुर्गों में जो संस्कार और संस्कृति थी , उसमें सिर्फ और सिर्फ मानवता थी , तब हर इंसान चाहे गरीब हो , चाहे अमीर हों -- एक सम्मान , एक अदब और एक रिश्ते का नाम दिया गया था।  सारा गाँव एक परिवार था क्योंकि तब हम गाँव में ही बसते थे।  उससे आगे आने वाली पीढ़ी घर से बाहर निकली शिक्षा के लिए और ज्ञान के लिए।  वह तो उन्होंने ग्रहण की लेकिन वो अपनी संस्कृति से दूर होते गए और उन्होंने उन संस्कारों को अपनी सहूलियत के अनुसार ग्रहण किया।  सब कुछ न ले पाए क्योंकि उनमें कुछ शिक्षित हुए तो उन्हें वे संस्कार बेमानी लगने लगे। हमारे घर में काम करें और हमसे ही पैसे लेकर गुजारा करें और हम उन्हें काका और बाबा का दर्जा दें। ये तो नयी सभ्यता ने सिखाया ही नहीं है।  बुजुर्गों को दुःख हुआ कि ये नयी पीढ़ी हमारे बनाये संस्कारों को छोड़ती जा रही है लेकिन उन पर बस किसी का भी नहीं चल सकता है।
                            वह  पीढ़ी शहर में आ बसी और गाँव आती रही क्योंकि अभी संस्कारों का असर बाकी था और तीज त्यौहार घर और गाँव में ही मनाने का मन बना रहता था क्योंकि उनकी दूरी गाँव से बहुत अधिक दूर तक न बन पायी थी ,  लेकिन  आधुनिकता के रंग में रंगी यह पीढ़ी गाँव वालों को भी प्रभावित करती रही। वे शिक्षा के लिए गाँव से दूर हुए थे और नए बच्चों ने उनकी चमक धमक से प्रभावित होकर शहर का रुख कर लिया।  शहर में कुछ तो काम करने को मिलने लगा और शहर की ओर दौड़ लगने लगी संस्कारों की कमी क्या हुई ? वहां भी रिश्तों की गरिमा ख़त्म होने लगी।  जब ऊपर की पीढ़ी विदा होने लगी तो कुछ ही घरों पर छतें रह गयी बाकि ढह गयी और कुछ सालों बाद वो खंडहर बन बिकने लगे। जो संस्कार गाँवों से लाये थे वे चुकने लगे थे।  शिक्षा की चमक दमक ने संस्कारों पर कुठाराघात किया और उनकी आने वाली पीढ़ी डैड और ममी वाली रह गयी। सारे  रिश्ते अंकल और आंटी में सिमट गए।  मामा , मामी , बुआ , चाचा चाची दादी बाबा सब ख़त्म हो गए।  नयी पीढ़ी के हाथ क्या आया ? फ़िल्टर किये हुए संस्कार और रिश्ते और वे भी इतना कम थे कि अगली पीढ़ी को देने के लिए कुछ बचा ही नहीं था और क्या पता सृष्टि इन्हीं के लिए आगे चलकर दम तोड़ देगी ।
               यौन विकृतियों ने किशोर , युवा , वयस्क और प्रौढ़ों तक को अपनी गिरफ्त में ले लिया । कन्या शब्द खत्म हो चुका है क्योंकि इन लोगों को सिर्फ औरत और भोग्या नजर आने लगी ।
            माँएंं चिंतित हैंं कि बेटियों को कैसे बचायें ? बेटे को इस हवा से कैसे बचायें ? अबशिक्षित माँँओंंं की यही चिंता है । आओ मंथन करें और खोजें संस्कृति के पुनर्स्थापन की राह । तभी बच सकेगी ये सृष्टि, अन्यथा बिना प्रलय के नाश निश्चित है ।

शुक्रवार, 14 जून 2019

मौत के सौदागर !



            वह कथोक्ति है न कि जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है ईश्वर उनके लिए खाई खोद कर तैयार कर देता है, लेकिन  ये कहावतें त्रेता , द्वापर या सतयुग में चरितार्थ होती होंगी। अब तो दूसरों को मौत बेचने वाले किसी जेल में नहीं बल्कि मखमली सेजों पर सोते हैं । उनपर हाथ डालने की हिम्मत किसी नहीं है । बड़े बड़े व्यापारी , ठेकेदार , इंजीनियर , विधायक और सांसद आदि इसमें आते है ।
            ..ये मौत के सौदागर कैसे है ? कहीं पुल गिरते हैं , कहीं फ्लाईओवर बनने से पहले ढह जाते हैं। उनमें होने वाली मौतों से प्रभावित लोग उन्हें दुआ तो नहीं देते होंगे । बड़े बड़े ठेके दिये जाते हैं । टेण्डर निकलने से पहले सौदेबाजी हो जाती है और भुगतान से पहले अलग चढ़ौती चढ़ानी पड़ती है । ठेकेदार मिलावट नहीं करेगा तो बच्चों को क्या खिलायेगा ? लेकिन ये कितने जीवन ले जाता है कोई नहीं जानता है ।
अब आते हैं खाने वाली चीजों में होने वाली मिलावट पर और फल और सब्जियों में प्रयोग होने वाले रसायनों पर ।
                         कुछ दिन पहले पढ़ा कि CSIR के एक अधिकारी की मृत्यु  लौकी का रस पीने से हो गयी । ये आयुर्वेद चिकित्सा की औषधि है और इसमें गलत कुछ भी नहीं है,  हाँ कुछ ऐसी मानसिकता वाले लोगों ने इसे दूषित करने की कसम खाई है.  जो प्राकृतिक चिकित्सा की औषधियों को भी जहर बना रहे हैं ।
                      कानपुर में गाँव से दूध वालों के डिब्बों  को पकड़ा गया तो सब डिब्बे  छोड़ कर भाग गए क्योंकि उस दूध में यूरिया, सर्फ और फार्मोलीन   मिला हुआ होता है, जो किसी विष से कम घातक नहीं है । ये भी मौत परोस रहे है। दूध वाले जानवरों को ऑक्सोटोसिन इंजेक्शन लगा कर दूध की एक एक बूँद निचोड़ लेते है तो क्या उस दूध को प्रयोग करने वाले  उस रसायन का दुष्प्रभाव से बचे रहेंगे ।
       हम सभी इस बात से वाकिफ हैं कि हरी सब्जियों में विशेष रूप से लौकी, तरोई , खीरा, तरबूज, और खरबूजे में किसान ऑक्सीटोसिन  के इंजेक्शन लगाकर रातोंरात बड़ा करके  बाजार में लाकर बेच लेते हैं। ये ऑक्सोटोसिन भी जहर ही है। हरी  और मुलायम सब्जियां सबको आकर्षित करती हैं और हम  सभी उस जहर को जज्ब करते रहते हैं और फिर एक दिन  -

*बहुत दिनों से पेट में दर्द की शिकायत थी , पता चला की कैंसर है।

*भूख नहीं लगती थी, पेट भारी रहता था लीवर सिरोसिस निकला।

*इसी से पीलिया, आँतों में सूजन और पता नहीं कितनी घातक बीमारियाँ एकदम प्रकट होती है. फिर
उनका अंजाम कुछ भी होता है ।

                  सिर्फ यही क्यों? परवल , भिण्डी हरे रंग से रंगे हुए मिलते है । मसालों में बराबर मिलावट पकड़ी जाती है । आटा , तेल , घी , खोया जैसे खाद्य पदार्थों में मिलावट  एक आम बात हो चुकी है और उसको जहरीला बनाने वाले लोग हम में से ही तो होते हैं। सिर्फ धनवान बनने की चाहत में जहर बो रहे हैं और इन  चीजों से दूर रहने  वाला आम आदमी इस जहर को अपने शरीर में उतार रहा है और उसके दुष्परिणामों को भी झेल रहा है .
           फलों की बात करें त़ो केले , आम कार्बाइड से पका कर बेचने की जल्दी किसी के लिए मौत जल्दी बुला देते हैं । सेब को अधिक ताजा दिखाने के लिए मोम की परत चढ़ा कर चमकीला और ताजा दिखाया जाता है । उसको आम इंसान ही खाता है और फिर धीरे धीरे अपनी रोगों से लड़ने की क्षमता खोने लगता है । मैं स्वयं इसको देख चुकी हूँ - एक तरबूज लेकर आयी और घर में उसको काटा तो उसमें से लाल की बजाय सफेद पानी निकल रहा था और तरबूज से बदबू आ रही थी , इंसान तो क्या जानवर को भी देने लायक नहीं था?
                       वे जो ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगा कर जानवरों से दूध निकाल  रहे हैं या सब्जियां उगा रहे हैं , फलों को जल्दी बड़ा करके बाजार में ला रहे हैं। वे इस ख्याल में हैं कि  अपनी चीजों को प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन यह भूल जाते हैं कि सारी वस्तुएं वे ही नहीं बना सकते हैं और उनके भाई बन्धु उनके लिए भी जहर परोस रहे हैं ,  जिसको  वे निगल रहे हैं। इस बात से अनजान  तो नहीं हो सकते हैं, फिर क्यों मानव जाति के दुश्मन अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ये जहर  खा और खिला रहा है। वह क्या सोचते हैं कि  इस जहर से बच जायेंगे? क्या धनवान बनने से  वे दूसरों के खिलाये जा रहे जहर से ग्रसित होकर खून की उल्टियाँ नहीं करेंगे?
क्या वे  कैंसर से ग्रसित नहीं होंगे?
पक्षाघात या हृदयाघात का शिकार नहीं होंगे?
हमारे बच्चे क्या इसकी पीड़ा नहीं झेलेंगे?
                      अगर वे इस बात से इनकार कर रहे हैं या अनजान हैं तो कोई बात नहीं. लेकिन ऐसा कोई भी चोर नहीं होता कि अपने किये अपराध की सजा न जानता हो. जब तक नजर से बचा हैं तो सफेदपोश और जिस दिन ये भ्रम टूट गया तो इससे बच वे भी नहीं सकते .हाँ ये हो सकता है कि पैसे के बल पर वे इन रोगों से लड़ सकते हैं लेकिन उस पीड़ा को उनकी तिजोरियों में रखा हुआ धन नहीं झेलेगा और क्या पता वह भी मौत से हार जाये और आप खुद अपने ही हाथों मौत परोस कर खुद ही उसके शिकार हो जाएँ.
                    इस जहर से कोई नहीं बच सकता है. अगर हम नहीं बचेंगे तो ये मौत के सौदागर भी नहीं बचेंगे.

मंगलवार, 4 जून 2019

विश्व पर्यावरण दिवस !

विश्व पर्यावरण दिवस !

   विश्व पर्यावरण दिवस की आवश्यकता संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस की और इसी लिए प्रतिवर्ष 5 जून को इस दिवस को मनाने के लिए निश्चित किया गया । विश्व में लगभग 100 देश विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं । धरती से हरियाली के स्थान पर बड़ी बड़ी बहुमंजिली इमारतें दिखाई दे रहीं हैं ।
         नेशनल हाईवे के निर्माण के नाम पर मीलों लंबे रास्ते एक कतरा छाँव से रहित है। पथिक पहले तो पैदल ही चलते थे पेड़ों के नीचे सुस्ताकर कुँए का शीतल जल पीकर आगे की रास्ता लेते थे । अब तो कुछ शेष नहीं तो अगर हम उन्हें नहीं रहने देंगे तो वह हमें कैसे जीने देंगे?

      *मानव सुख की कीमत*

                               दिन पर दिन बढ़ती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं, लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं। हाँ हम ही घोल रहे हैं। प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं, लेकिन उस ए सी  से निकलने वाली विपरीत दिशा में जाने वाली गैस के उत्सर्जन  से पर्यावरण को और प्रदूषित कर रहे हैं। सभी तो एसी नहीं लगवा  सकते हैं। लेकिन इससे उत्सर्जित होने वाली गैसें दूर दूर तक लगे पोधों को सुखाने के लिए बहुत है । पेड़ों पर शरण न मिली तो पक्षी कहाँ जायेंगे । इस भयंकर गर्मी से और वृक्षों के लगातार कम होने से पशु और पक्षी भी अपने जीवन से हाथ धोते चले जा रहे हैं।

   *खेतों का व्यावसायिक प्रयोग*

    जिन खेतों में लहलहाती फसलें ,
     अब उन पर इमारतें उग रही हैं ।
                                   - अज्ञात
          ये पंक्तिया हमें आइना दिखा रही हैं ।
                        हम  लम्बे लम्बे भाषणों को सुनते चले आ रहे हैं और सरकार भी प्रकृति को बचाने के लिए मीटिंग करती है , लम्बे चौड़े प्लान बनाती है और फिर वह फाइलों में दब कर दम तोड़ जाते है क्योंकि शहर और गाँव से लगे हुए खेत और बाग़ अब अपार्टमेंट और फैक्ट्री लगाने के लिए उजाड़े  जाने लगे हैं।  अगर उनका मालिक नहीं भी बेचता है तो उनको इसके लिए विभिन्न तरीकों  से मजबूर कर दिया जाता है कि वे उनको बेच दें और मुआवजा लेकर हमेशा के लिए अपनी रोजी-रोटी और अपनी धरती माँ से नाता तोड़ लें. कुछ ख़ुशी से और कुछ मजबूर हो कर ऐसा कर रहे है। ऊंची ऊंची इमारतें और इन इमारतों में जितने भी हिस्से या फ्लैट बने होते हैं उतने ही ए सी लगे होते हैं , कभी कभी तो एक फ्लैट में दो से लेकर चार तक एएसी होते हैं । उनकी क्षमता के अनुरूप उनसे गैस उत्सर्जित होती है और वायुमंडल में फैल जाती है । हम सौदा करते हैं अपने फायदे के लिए, लेकिन ये भूल रहे है कि हम उसी पर्यावरण में  विष घोल रहे है ,जिसमें उन्हें ही नहीं बल्कि हमें भी रहना है। उन्हें गर्मी से दो चार नहीं होना पड़ता है क्योंकि घर में एसी , कार में एसी और फिर ऑफिस में भी एसी । गर्मी से बचने के लिए वे ठंडक खरीद सकते हैं लेकिन एक गर्मी से मरते हुए प्राणी को जीवन नहीं दे सकते हैं ।
               
    *मोबाइल टावर*

         मोबाइल के लिए टावर लगवाने का धंधा भी खूब तेजी से पनपा  और प्लाट , खेत और घर की छतों पर काबिज हो गए लोग बगैर ये जाने कि इसका जन सामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है ? उससे मिलने वाले लाभ को देखते हैं और फिर रोते भी हैं कि  ये गर्मी पता नहीं क्या करेगी ? इन टावरों निकलने वाली तरंगें स्वास्थ्य के लिए कितनी घातक है ? ये भी हर इंसान नहीं जानता है लेकिन जब इन टावरों में आग लगने लगी तो पूरी की पूरी बिल्डिंग के लोगों का जीवन दांव पर लग जाता है . इन बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में पेड़ पौधे लगाने के बारे में कुछ ही लोग सोचते हैं और जो सोचते हैं वे छतों पर ही बगीचा  बना कर हरियाली  फैला रहे है।

      *जैविक चिकित्सकीय कचरा :-*     
          पर्यावरण को दूषित करने वाला आज सर्वाधिक जैविक चिकित्सकीय कचरा बन रहा है । जिस तेजी से नर्सिंग होम खुलते चले जा रहे है , उतना ही कचरे का निष्कासन बढ़ रहा है । उसके निस्तारण के प्रति कोई भी सजग नहीं है । सिर्फ कुछ सौ रूपयों के पीछे ये कचरा निस्तारण करने वाली संस्थाओं को न देकर अस्पतालों के पीछे या थोड़ी दूर पर फेंक दिया जाता है । इसमें घातक बीमारियों के फैलाने वाले तत्व भी होते हैं । जानवर इनको इधर उधर फैला देते हैं और वह वाहनों में फँस कर मीलों तक फैला होता है ।

                     हम औरों को दोष क्यों दें ? अगर हम बहुत बारीकी से देखें तो ये पायेंगे कि  हम पर्यावरण को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं और इसको कैसे रोक सकते हैं ? सिर्फ और सिर्फ अपने ही प्रयास से कुछ तो कर ही सकते हैं . यहाँ ये सोचने की जरूरत नहीं है कि  और लोगों को चिंता नहीं है तो फिर हम ही क्यों करें? क्योंकि आपका घर और वातावरण आप ही देखेंगे न . चलिए कुछ सामान्य से प्रयास कर पर्यावरण दिवस पर उसको सार्थक बना ही लें ------

* अगर हमारे घर में जगह है तो वहां नहीं तो जहाँ पर बेकार जमीन दिखे वहां पर पौधे लगाने के बारे में सोचें . सरकार वृक्षारोपण के नाम पर बहुत कुछ करती है लेकिन वे सिर्फ खाना पूरी करते हैं और सिर्फ फाइलों में आंकड़े दिखने के लिए . आप लगे हुए वृक्षों को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास कर सकते है .
* अगर आपके पास खुली जगह है तो फिर गर्मियों में ए सी चला कर सोने के स्थान पर बाहर  खुले में सोने का आनंद लेना सीखें तो फिर कितनी ऊर्जा और गैस उत्सर्जन से प्रकृति और पर्यावरण को बचाया जा सकता है .
*  डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि  पहले की तरह से धातु बर्तनों का प्रयोग किया जाए या फिर मिट्टी से बने पात्रों को , जो वास्तव में शुद्धता को कायम रखते हैं,  प्रयोग कर सकते हैं . वे प्रयोग के बाद भी पर्यावरण के लिए घातक नहीं होते हैं .
* अगर संभव है तो सौर ऊर्जा का प्रयोग करने का प्रयास किया जाय, जिससे हमारी जरूरत तो पूरी होती ही है और साथ ही प्राकृतिक ऊर्जा का सदुपयोग भी होता है।
* फल और सब्जी के छिलकों को बाहृर सड़ने  के लिए नहीं बल्कि उन्हें एक बर्तन में इकठ्ठा कर जानवरों को खिला दें . या फिर उनको एक बड़े गमले में मिट्टी  के साथ डालती जाएँ कुछ दिनों में वह खाद बन कर हमारे हमारे पौधों को जीवन देने लगेगा .
* गाड़ी जहाँ तक हो डीजल और पेट्रोल के साथ CNG और LPG से चलने के विकल्प वाली लें ताकि कुछ प्रदूषण को रोक जा सके .  अगर थोड़े दूर जाने के लिए पैदल या फिर सार्वजनिक साधनों का प्रयोग करें तो पर्यावरण के हित में होगा और आपके हित में भी .
* अपने घर के आस पास अगर पार्क हो तो उसको हरा भरा बनाये रखने में सहयोग दें न कि  उन्हें उजाड़ने में . पौधे सूख रहे हों तो उनके स्थान पर आप पौधे लगा दें . सुबह शाम टहलने के साथ उनमें पानी भी डालने का काम कर सकते हैं .
          इस पर्यावरण दिवस को सार्धक बनाने के लिए जल संरक्षण दिवस , पृथ्वी दिवस , प्राकृतिक संपदा संरक्षण , वृक्षारोपण , कृषि योग्य भूमि की बिक्री निषेध को भी अपनाना होगा ।

गुरुवार, 30 मई 2019

आपदा प्रबंधन !

                            सूरत में घटी कोचिंग में लगी आग के कारण २० बच्चों का उसे हादसे में मौत के मुंह में चला जाना कोई हंसी खेल नहीं है।  भले ही वह मानवीय भूल नहीं थी लेकिन मानवीय लापरवाही तो थी ही और उस लापरवाही की कीमत चुकाई उन माता-पिता ने जिनके घर का चिराग बुझ गया और माँ की गोद सूनी हो गयी।  लोग खड़े वीडिओ बनाते रहे , शायद उन्हें मासूमों की चीखें नहीं सुनाई दे रही थीं या फिर वे बहरे हो चुके थे क्योंकि उन तड़पते हुए बच्चों में उनका कोई अपना बच्चा नहीं था। जो जरा से भी संवेदनशील थे उन्होंने प्रयास किया और बचाया भी।  अपनी जान की परवाह न करते हुए युवाओं ने उनको बचाया।  उस वक्त थोड़ी दूर पर स्थित फायर ब्रिग्रेड को आने में इतना समय लग गया और फिर  अधूरे साधनों के साथ आ पहुंचे। आपदा के लिए उनका चयन किया गया है और क्या आपदा में सिर्फ आग को बुझाना ही होता है , उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने के लिए कोई दूसरी वैकल्पिक  व्यवस्था भी होनी चाहिए।

आपदा प्रबंधन कहां पर हो ? :- जब हम एक तरह की आपदा से दो-चार होते हैं चारों तरफ चर्चा आरंभ हो जाती है कि आपदा प्रबंधन की शिक्षा अत्यंत आवश्यक है,  लेकिन अगर इसको स्कूल या विश्वविद्यालय स्तर पर रखा जाता है तो इसका ज्ञान प्राप्त करने वाले सिर्फ वही लोग होंगे जो वहां पर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।  मेरे अनुसार आपदा प्रबंधन की शिक्षा समय-समय पर सरकार के द्वारा या फिर जन सेवार्थ काम करने वालों वाली संस्थाओं के द्वारा हर जगह दी जानी चाहिए क्योंकि हादसे कब कैसे हो जाए यह कोई नहीं जानता। पहले हम सुनामी आने पर बहुत जोर शोर से इस बात की चर्चा कर रहे थे कि आपदा प्रबंधन हर स्तर पर होनी चाहिए। उसके चंद दिन बाद ही हम यह भूल गए। आपदा प्रबंधन की आवश्यकता सुनामी, केदारनाथ आपदा , भूकंप , बाढ़ के बाद ही नहीं होती बल्कि यह कभी भी और किसी भी स्थान पर हो सकती है.
                      सूरत की घटना आम आदमी आपदा प्रबंधन से किसी न किसी तरीके से उसमें फंसे हुए लोगों को बचाने का सामूहिक प्रयास कर सकते थे और जो हादसे में जीवन गए हैं उनमें से पूरे नहीं तो कुछ और को भी बचाया जा सकता जबकि हमारी सरकारी सेवाएं फायर बिग्रेड अपनी  आवश्यक चीजों में लंबी सीढ़ी आपातकालीन साधन लेकर नहीं चलती। उनको सिर्फ आग नहीं बुझाना होता है बल्कि जीवन बचाना भी होता है ।
मानकों की अनदेखी :- शहरों में ऊंची ऊंची इमारतें तो बनाई जा रही है , चाहे होटल , क्लब , ऑफिस , मॉल या रहने के लिए बने भवन हों।  न अग्निशमन के साधनों का पूरी तरह से नियोजन किया जाता है और न ही वहाँ आग बुझाने के साधन होते हैं।  इस घटना के बाद सभी शहरों में ध्यान दिया जाना चाहिए।  ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर जहाँ कि जन समूह इकठ्ठा होता हो।  कहीं कहीं तो अग्नि शमन यन्त्र लगे होते हैं लेकिन वहां के कर्मचारी उनको प्रयोग करना नहीं जानते हैं या फिर उनका प्रयोग कभी करने की नौबत नहीं आयी हो तो वे जाम हो जाते हैं और आपदा के वक्त वह कार्य ही नहीं करते हैं।
आपदा प्रबंधन की शिक्षा :- आपदा प्रबंधन की शिक्षा भी शिक्षा के स्तर के अनुरूप देनी चाहिए । आपदा से प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को अवगत कराया जाना चाहिए । फिर धीरे धीरे कक्षाओं के अनुरूप विस्तार से उनके पाठ्यक्रम में समाहित करना चाहिए । समय और पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण के कारण कौन सी आपदा कब आ सकती है इसका कोई निश्चित समय नहीं रहा । आज सर्दी तो नाममात्र के लिए दिनों में सिमट गई हैं और शेष भीषण गर्मी में झुलसती पृथ्वी किसी भी आपदा के लिए हमें पूर्व संकेत दे रही है ।
         .      पाठ्यक्रम में आकर इसे एक विषय का रूप दिया गया है लेकिन ये हमारी औपचारिक शिक्षा है । जनसामान्य को इससे अवगत होना चाहिए। समय समय पय प्रशिक्षण कैंप लगा कर शिक्षित किया जाना चाहिए । प्राथमिक जानकारी बचाव के लिए सहायक होगी ।
बहुमंजिली इमारतों के मानक :-  बहुमंजिली इमारतों के लिए निश्चित मानकों का सख्ती से पालन होना चाहिए । इंसान भेड़ बकरी नहीं है कि उन्हें रहने की जगह देकर जीवन को जोखिम में डाल दिया जाता है । हम खुद भी दोषी हैं जो आश्वासनों के ऊपर रहने चले जाते हैं , वह भी अपने जीवन की पूँजी लगाकर । इन इमारतों में रहने के लिए अधिकृत करने से पहले अनापत्ति प्रमाणपत्र संबंधित विभाग को जारी करना चाहिए ।
             हम विदेशों के चलन का अनुकरण तो करने लगे हैं लेकिन इस दिशा में उनके उपकरणों और तरीकों के प्रति सदैव उदासीन रहे हैं । हमारी ये उदासीनता लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का कारण बन जाता है ।
              भविष्य के लिए हमें स्वरक्षा और पररक्षा दोनों के लिए प्रशिक्षित होना चाहिए ताकि सूरत जैसी दूसरी घटनाएं न हों । हम नेट के प्रयोग का काला पक्ष बहुत जल्दी सर्च करके दुरुपयोग करने लगते हैं लेकिन कभी उसके सदुपयोग को भी सीखें तो बहुत सारी आपदाओं से बचने का रास्ता जान सकते हैं । हमारी जानकारी हमारी ही नहीं बल्कि और कितनों का जीवन बचा सकती है । हमें स्वयं सीख कर मानवता की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे ।

मंगलवार, 14 मई 2019

विश्व परिवार दिवस !

परिवार के स्वरूप :                   
                  
          परिवार संस्था आदिकाल से चली रही है और उसके अतीत को देखें तो दो और चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थीपारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता थाउनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भीधीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गयाजब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे। वे वापस गाँव जाना या और रहना या खेती करना पसंद नहीं करते , परिणाम कि घर वालों के बीच में दूरियां आनी शुरू हो गयीं और परिवार के विखंडन की प्रक्रिया यही से शुरू हो गयी।  आरम्भ में ये सब बहुत अच्छा लगा नयी पीढ़ी को लेकिन बाद में या कहें आज जब एकल परिवार के परिणाम सामने आने लगे हैं।
टूटते परिवार :
                 आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढती महत्वाकांक्षाएं, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है। वह भी आज कल भय के साये में जी रहा है।  बच्चों को लेकर माता पिता निश्चिन्त नहीं हैं। आज अधिकांश दंपत्ति दोनों ही लोग नौकरी करते हैं और इस जगह पर  बच्चे या तो आया के साथ रहते या  फिर किसी 'डे केअर सेंटर' में.छोटे बच्चे इसी लिए माता-पिता के प्रति उतने संवेदनशील नहीं रह जाते हैं।  वे नौकर और आया के द्वारा शोषण के शिकार भीकिये जाते हैं और कभी कभी तो माता पिता की स्थिति के अनुसार अपहरण तक की साजिशें तक रच दी जाती हैं।  
 एकाकी परिवार में भय :
                इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे  और बच्चे उनकी अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघट की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं . बच्चे भी स्वयं को असुरक्षा की भावना में घिरे जी रहे हैं। एक तो बच्चों को परिवार का सम्पूर्ण संरक्षण मिल पता है और साथ ही वह पढाई के लिए बराबर माता-पिता के द्वारा दबाव बनाया जाता है क्योंकि वे अच्छे स्कूल में भारी भरकम फीस भर कर पढ़ाते हैं और उनसे पैसे के भार के अनुसार अपेक्षाएं भी रखते हैं। 

विखंडित परिवार का परिणाम :
                   एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहेंइससे बेहतर है कि मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '                           आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैंआत्मनिर्भर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे                 एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर करने की भावना से ग्रस्त हो जाता हैदूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं हैजब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?                   परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगने लगेगाऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक कि  उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है।  अगर अपनी सोच को विकसित करें और उसको परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा    इसके लिए हमें अपनी सोच को 'मैं' से निकल कर 'हम' पर लाना होगाये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी
'
मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'
'
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें? '           तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक हैइसके लिए प्रौढ़ और युवा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगाघर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहेवैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उन्हें बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजियेयही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैंदो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नमक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा


          कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थींआज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा हैफिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैंइसको बचाने में ही सभ्यता , संस्कृति और समाज की भलाई है।