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सोमवार, 25 नवंबर 2013

अंतर्राष्टीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस २५ नवम्बर !

             सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि महिला हिंसा आज इतने विकराल रूप में सामने आ रही है कि  विश्व  पटल पर लाने वाली समस्या बन  खड़ी हो चुकी है . बड़े बड़े प्रगतिशील देश , आधुनिकता और समानता  हुंकार भरने वाले देश और इसी के लिए आगे बढ़कर भाषण देने वाले बड़े बड़े लोग इस काम को करने में पीछे नहीं रहते हैं।
                         डॉक्टर , वकील , जज , नेता, साधू-संत और मंत्री तक महिला हिंसा में लिप्त पाये जा रहे हैं।  ऐसा तब हो रहा है जब कि हमारे जैसे देश की नारी चुप रहना अधिक पसंद करती है कि व्यर्थ में उसकी ही बदनामी होगी।  वह चुपचाप सब कुछ सहती रहती है।  ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ गाँव , गरीब और अशिक्षित महिलाओं के बीच होने वाली भावना है बल्कि ये बड़े बड़े परिवारों में , अच्छा खासा कमाने वाली , समाज में अपना एक अलग रुतबा रखने वाली , उच्च  शिक्षित महिलायों के साथ भी हो रहा है . वह अपने संस्कारों के चलते , अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए और फिर पति की प्रतिष्ठा को ठेस लगेगी - ये सब  सोच कर सारी  हिंसा सहन करती रहती है।
                        महिला  हिंसा से मतलब सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं  है बल्कि बल्कि इसके अंतर्गत आती कई स्थितियां और जिनको आज भी नारी सह रही है क्योंकि हमारा समाज भी इस हिंसा को सहते रहने वाली महिला को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता है और इसमें पुरुषों से अधिक महिलाएं भी शामिल होती है।  ये जरूरी नहीं कि महिला हिंसा सिर्फ ससुराल में , पति से या  कार्यक्षेत्र में ही सह रही हो।  वह सिर्फ महिला होने के भी रूप में भुगत सकती है।
                       महिला हिंसा  अंतर्गत किसी भी प्रकार की हिंसा या प्रताड़ना को शामिल किया गया है फिर चाहे  वह शारीरिक , मानसिक , भावात्मक या फिर आर्थिक किसी भी रूप में  क्यों न हो ? उसे महिला हिंसा ही कहा जाएगा। हमारे समाज की जो भावनाएं महिलाओं के प्रति है , वे कितनी ही प्रगतिशील होने के दावे का ढिंढोरा क्यों न पीटें , वह इसमें सबसे पहले कारक बनती हैं। हमारी सामाजिक व्यवस्था ( पता नहीं कौन इसके जिम्मेदार  है ?) प्रताड़ित , परित्यक्त , तलाकशुदा , संतानहीन या फिर सिर्फ लड़कियों की माँ के प्रति अपना एक अलग रुख रखता है।  इस काम के लिए जिम्मेदार भी वही है और फिर महिला आयोग , महिला संगठन के प्रति लोगों के विचार सुने हैं - वे इनको महिलाओं को भड़काने वाला ,  घर तोड़ने वाला और समाज विरोधी करार देते हैं।  क्योंकि औरत की अपनी कोई पहचान नहीं होती - वह तो जिस कुलबहू बनती है उसी कीबन जाती है उसी के नाम से जानी जाती है।  फिर उसका अपना स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ है ?
                        हम विश्व की नहीं सिर्फ भारत की बात करें तो आज भी ३५ प्रतिशत महिलायें ( इसमें बचपन से लेकर बात की जा रही है ) अपने माता-पिता के घर में भी हिंसा का शिकार होती हैं।  एक तो जन्म से ही उनको परिवार में दोयम दर्जे का स्थान देना अभी भी ८० प्रतिशत परिवारों की परंपरा में शामिल है। लड़कों की तुलना में उनकी जो उपेक्षा होती है वह उनको भावात्मक रूप से आहात करती है।  बड़े होने पर भी शिक्षा की दृष्टि से उनकी शिक्षा पर कम खर्च करने की सोची जाती है।  घर के अंदर के कामों में साडी जिम्मेदारी उनके सिर पर डाल  दी जाती है। उनके जन्म से ही परिवार वाले ही नहीं बल्कि  दूसरे लोग भी पराया धन , परायी अमानत कह कर परिचय करते हैं।
                    इस महिला हिंसा को सहने के लिए मजबूर क्यों है आज की नारी क्योंकि हमारी सामाजिक व्यवस्था और उसकी आर्थिक परतंत्रता या फिर अगर वह कमाती भी है तो जरूरी नहीं कि वह अपनी कमाई को अपने मन से खर्च कर ले।  ऐसा नहीं है कि आत्मनिर्भर महिलायें को प्रताड़ित नहीं किया जाता।  अभी तक तो एक सोच थी कि ज्यादातर घरों में काम करने वाली महिलाओं के पति ही उनके पैसे छीन कर उनको प्रताड़ित करते हैं लेकिन ऐसा नहीं है -  नौकरी वाली लड़की से शादी करना पसंद करते हैं क्योंकि उनके घर में दोहरी कमाई आएगी और एक कामधेनु उन्हें मिल रही होती है लेकिन कुछ घरों में तो सिर्फ कामधेनु ही समझी जाती है।  उसकी कमाई पर पति और सास ससुर का हक़ होता है।
                            एक अध्ययन के अनुसार ५० प्रतिशत महिलायें पति के द्वारा मार खा चुकी हैं।  रोज न सही लेकिन उनके मन का काम न होने पर हाथ उठाने में गुरेज नहीं करते और इसको वे सामान्य बात मानती है फिर इस हिंसा का तो कोई उपाय नहीं नहीं है। ५० प्रतिशत महिलायें और पुरुष इस बात को बुरा नहीं समझते हैं।
                           ये सब बातें तो तब की हैं जब कि वह एक परिवार में उसके सदस्य होने के नाते सह रही होती है और जी रही होती है।  ऐसा नहीं है कि उसकी आत्मा इस हिंसा के बाद रोती नहीं है लेकिन कभी बच्चों का मुंह देख कर , कभी माता पिता की इज्जत का हवाला देने के बाद और कभी छोटे भाई बहनों के भविष्य को देख कर आपने आंसुओं के गले के नीचे उतार कर सब कुछ सह लेती हैं।
                         इसके अलावा भी परित्यक्ता होने पर वह जिस हिंसा का शिकार होती है उसका जिम्मेदार भी हमारा समाज अधिक जिम्मेदार है।  उसके दर्द को समझने के स्थान पर उस पर परोक्ष रूप से लांछन लगाये जाते हैं क्योंकि पुरुष हर हाल में सही समझा जाता है।  इस का उन्मूलन कैसे हो सकेगा ? इस पर विचार भी होना चाहिए।
                        संतानहीन महिला भी समाज की दृष्टि में पूर्णरूप से दोषी समझी जाती है बगैर से जाने की इसका कारण क्या है ? ससुराल में उसका विकल्प लाने की बात भी सोची जाने  लगती है .  वंश तो उसको ही बढ़ाना होगा।  इस कारण के उन्मूलन की बात सोचने की पहल होनी चाहिए।  चाहे गोद लेकर या फिर और आधुनिक विकल्प भी सोचे जा सकते हैं और उस मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सकता है।
                         सिर्फ लड़कियों की माँ और लडके की माँ को अलग अलग तरीके से व्यवहृत होती है . इसके लिए भी परिवार वाले उनके प्रति विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करने के अवसर खोजते रहते हैं और कभी कभी तो लड़की होने पर घर से भी निकाल देते है।
                        घर से लेकर बाहर तक किसी भी जगह वह यौन शोषण का शिकार तो बनती ही रही है और जैसे जैसे हमारे समाज ने प्रगति की है वैसे वैसे उसकी असुरक्षा जा रही है।  वह सिर्फ एक सामान समझी जाती है।  घर में पुरुष सदस्यों में अब कोई सीमा रेखा नहीं रह गयी है , पास पड़ोस में चाचा और भाई कहे जाने वाले लोग , स्कूल में सहपाठी ,   कार्य स्थल पर बॉस , सहकर्मी , इसके बाद उसके लिए संसार की कोई भी जगह महफूज़ नहीं है।  रोज रोज घटने वाली घटनाओं ने एक आतक का भाव उसके मन में भर दिया है।  अब पुरुष वर्ग इतना उदंड और वहशी हो चूका है कि उसके न उम्र का लिहाज रहा है और न ही किसी का खौफ बचा है।  जैसे जैसे क़ानून सख्त होने का प्रयास कर रहा है वैसे वैसे ही अपराधों की संख्या बढ़ रही है।  इसके पीछे एक कारन यह भी है कि अब निर्भीक होकर महिलायें अपने प्रति होने वाले हिंसा के मामलों को सामने लाने लगी हैं और इससे जो बेनकाब हो रहे हैं वे दुनियां में बहुत प्रतिष्ठित और सम्मानीय व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं .
                             आज के दिन हम अपने नारी वर्ग से जो इस बात के प्रति सजग है , न हिंसा को सहन करें और न औरों के सहते हुए देखें।  जरूरत बगावत की ही नहीं है बल्कि शांत और सौम्य तरीके से उससे जुड़े हुए लोगों को समझने की भी है।  अगर लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आएगा तो वास्तव में महिला हिंसा उन्मूलन की दिशा में एक सफल कदम कहा जाएगा।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

सावधान हो जाइये !

                   सावधान हो जाइये बगैर आपकी जानकारी के और आपके डिटेल्स कहीं  से भी प्राप्त करके कोई भी आपके नाम से बैंक में अकाउंट खोल सकता है।  मनचाहा पता और मनचाही जगह पर और  फिर उसके आधार पर क्रेडिट कार्ड भी ले सकता है और  लाखों की खरीदारी भी कर सकता है। पता तब चलेगा   चलेगा जब बैंक के रिकवरी नोटिस आपके पास आएगा।  
                                     कल मेरे पास एक फ़ोन दिल्ली से आया कि आपकी बेटी प्रज्ञा श्रीवास्तवा के ऊपर स्टेट बैंक का दो लाख सत्तर हजार  लोन है और मैं तीस हजारी कोर्ट से रोहित त्यागी बोल रहा हूँ।  रिकवेरी के लिए उनका वारंट निकला हुआ है।  मैंने डिटेल जानना चाहा तो उसके द्वारा दिया गया वर्किंग प्लेस और रेजिडेंस एड्रेस गलत था।  मैंने कहा कि  बेटी ने कभी यहाँ पर जॉब नहीं की और न ही वह इस एड्रेस पर रही है।  फिर उसने उसका पेन कार्ड नंबर और नॉमिनी में माँ का नाम रेखा देवी (जबकि मैं अपना नाम सिर्फ रेखा श्रीवास्तव ही प्रयोग करती हूँ ) और पिता का नाम आदित्य श्रीवास्तव बताया।  फिर बताया कि उसने इतने रुपये की खरीदारी की है। 
                                     मैंने उसको बताया कि मेरी बेटी यहाँ पर नहीं रहती है वह पुर्तगाल में है और न ही उसने कोई खरीदारी की है।  जो डेट्स खरीदारी की थी उस समय वह इंडिया में भी नहीं थी।  फिर भी वह बेटी का कांटेक्ट नम्बर मांग रहा था जो मैंने नहीं दिया।  लेकिन एक प्रश्न मेरे सामने छोड़ गया कि क्या ऐसे भी सम्भव है।  इस को किस क्राइम में रखा जा सकता है।  लेकिन हो बहुत कुछ सकता है इसलिए आप लोग भी सावधान रहिये।  पेन कार्ड नं हम कई जगह इस्तेमाल करते हैं और  माता पिता के नाम तो हर जगह पर इस्तेमाल होते हैं।  फ़ोटो आपकी नेट से किसी भी तरीके से ली जा सकती है।  इससे कैसे बचा जा सकता है ? 
ठीक वैसे ही जैसे अकाउंट हैक करके रुपये निकले जा सकते हैं वैसे ही नकली अकाउंट खोल कर कुछ भी किया जा सकता है।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (7)

                  हम कम लिखें या नियमित लेकिन ब्लॉग की अपनी एक अलग जगह है , जो स्थायी है और संचित रखने वाली भी है।  उससे अगर हम सिर्फ इसा लिए किनारा कर रहे हैं कि फेसबुक पर तुरंत प्रतिक्रिया प्राप्त होती है या फिर बहुत थोडा समय लेकर अपडेट  पढ़कर सिर्फ लाइक करके भी है लेकिन कभी कभी  कि लाइक  न भी लिखा हो , किसी के निधन की खबर हो उसको लाइक करके हम क्या साबित करते है? ये अपने अपने विचार हैं आगे आगे देखिये कोई  सोचता है क्या ?





भई सबसे पहली बात तो यह है कि अपने से कम शब्दों में सीधी बात कही नहीं जाती। या यूं कह लो, कि हमको यह कला आती ही नहीं है। शायद यही वजह है कि अब जैसे-जैसे फेसबुक  जैसे सोशल साइट पर सभी ब्लॉगर का ध्यान ब्लॉग से ज्यादा लगने लगा है। वैसे-वैसे हमारे ब्लॉग पर कमेंट आना बंद होते जा रहे हैं। और यह केवल हमारी समस्या नहीं है, अपितु बहुत से ब्लॉगर इस समस्या से जूझ रहे हैं, जिसके कारण अब उन्हें ब्लॉग से ऊब होने लगी है। इसके पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि ब्लॉग की अपेक्षा फेसबुक  पर ज्यादा जल्दी रिसपोन्स मिलता है। इसलिए अब ज्यादतर ब्लॉगर फेसबुक पर ज्यादा लिखना पसंद करते हैं और ब्लॉग पर
कम, मुझे तो कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि ब्लॉग पर लिखने की सुविधा होने कि वजह से अब ब्लॉग लिखने वाले बहुत ज्यादा हो गए हैं और पढ़ने वाले बहुत कम, यह मैं अपने गूगल चाचा की मैहरबानी के तहत कह रही हूँ । क्यूंकि गूगल प्लस पर और मेल पर मुझे लगभग हर रोज़ 20 से 25 मेल आते हैं। जहां मुझ से अपने अपने ब्लॉग लिंक के साथ कमेंट लिखने का अनुरोध किया जाता है। मगर मेरे कमेंट कर देने पर भी, वह
सभी लोग कभी मेरे ब्लॉग पर नज़र नहीं आते और ऐसा एक बार नहीं बहुत बार हो चुका है। इसलिए मैंने अब ऐसे मेल पर कमेंट करना बंद कर दिया है।


इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे कमेंट का कोई लालच है। मगर इस बात से भी तो इंकार नहीं किया जा सकता ना कि एक सार्थक कमेंट ही एक ब्लॉगर की ऊर्जा है, उसका हौसला  है, कुछ और अच्छा लिखने और ज्यादा लिखने की प्रेरणा है। आज मुझे ब्लॉग लिखते हुए 3 साल से ज्यादा का समय हो गया है। पर मैंने अपने इस ब्लॉग के सफर में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 60 कमेंट ही देखें हैं और अब तो संख्या दिन प्रति दिन गिरती ही जा रही है। जिसके कारण अब ना तो लिखने में मन
लगता है और ना ही पढ़ने में, हालांकी अच्छे ब्लॉगर का लिखा मैं आज भी ज़रूर पढ़ती हूँ। मगर अब उन सभी की संख्या भी धीरे धीरे कम हो चली है। अब उनके भी ब्लॉग पोस्ट महीनो में एक बार दिखाई देते हैं।


ऐसे में शायद फेसबुक  ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जहां लोग तुरंत लिखकर तुरंत टिप्पणी पा जाते हैं। सो वहाँ बने रहने का ज्यादा फायदा महसूस होता है। हालांकि  मेरा मानना तो यह है कि फेसबुक  एक सोशल साइट के साथ-साथ एक सोशल  क्लब के जैसा माध्यम हैं। जहां लोग हर रोज़ आकर अपने अपने मन की बात सांझा करते हैं ,बतियाते हैं और चले जाते हैं। यानि मनोरंजन का मनोरंजन और साथ में तुरत  फुरत
ज्ञान फ्री :-) यहाँ तक के कभी-कभी तो कोई समस्या होने पर यहाँ उस समस्या का समाधान भी आसानी से मिल जाता है। फिर भला अब ब्लॉग पर कोई क्यूँ आयेगा या जाएगा। ऊपर से राजनीति ने तो यूं भी कोई क्षेत्र नहीं बक्शा है। मैंने सुना है यहाँ भी राजनीति चलती है, जिसका असर ब्लॉगर पर साफ दिखाई देता है। जो पहले रेगुरल टिप्पणी करते थे वह अचानक ही शांत बैठे हैं। अब तो कभी भूले भटके भी उन ब्लॉगर की कोई प्रतिक्रिया अपने ब्लॉग पर देखने को नहीं मिलती।  कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अचनाक ही आना प्रारम्भ किया और फिर एकदम से गायब हो गए जैसे किसी ने उनका हाथ पकड़ लिया हो कि अरे तुम वहाँ कैसे चले गए, वहाँ जा कर टिप्पणी लिखोगे तो समझो हमारे समूह से बाहर हो जाओगे :-)


ऐसे में केवल फेसबुक ही एकमात्र ऐसा माध्यम साबित हुआ है जहां किसी से किसी को कोई बैर नहीं है। सब अपनी मन मर्ज़ी के मालिक है। लेकिन इस सबके बावजूद भी मेरा सभी ब्लॉगर मित्रों से नम्र निवेदन है कि यदि आप सभी को अपने-अपने ब्लॉग  से प्रेम है, तो कृपया एक बार फिर अपने साथ-साथ दूसरों के ब्लॉग पर जाकर भी उन्हें पढ़िये उस पर अपने बहुमूल्य विचार प्रस्तुत कीजिये। ताकि एक बार फिर ब्लॉगर और ब्लॉग के बीच के आपसी संबंध पुनः मधुर होकर जीवित हो सके एवं सार्थक
विचारों का टिप्पणी के माध्यम से आदान प्रदान हो सके और उन्हें एक नयी दिशा के साथ-साथ न्याय मिल सके। याद रखिए हर ब्लॉगर अनमोल है। क्यूंकि कमियाँ सभी में होती हैं, किन्तु गुणों से भी इंकार नहीं किया जा सकता जय हिन्द ....   
-- पल्लवी सक्सेना
                                                                                                                                                   (क्रमशः )                                                                                                       
                                                                                                                                   

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग लेखन पर सक्रियता कम हो रही है ! (6 )

                               ये ये विषय बहुत  ज्वलंत बन  चुका  है क्योंकि  कहीं न कहीं हमारा  ब्लॉग लेखन प्रभावित अवश्य ही हो  रहा है। ……………… ! चलें  कुछ और साथियों के विचारों को जानें। 

                         इसमें कुशवंश जी का  चित्र उपलब्ध नहीं हो सका है। 

पुस्तकों के बाद यदि कहा जाए तो ब्लॉग लेखन साहित्य का एक शशक्त माध्यम बन के उभरा है और इसमे दो राय नाही है की इसने सभी को भरपूर सहयोग दिया उभारा और प्रशशा भी दी। ब्लॉगर ने भी इसे गंभीरता से लिया और ले रहे है। बस समय की कमी के चलते अब लोग फेस्बूक की ओर रुख कर रहे है और झटपट प्रतिक्रिया से अपनी साहित्यिक अभिरुचि प्रदर्शित कर रहे है । दोनों का महत्व इस एक वाक्य से समझा जा सकता है ।जो जिसमे खुश रहे वो ठीक। मगर एक बात तो बेहद महत्वपूर्ण है ब्लॉग से फ़ेस बूक की ओर गए लोग दोनों ही ओर हाथ पैर मार रहे है और गंभीर लोग निश्चित तौर से ब्लॉग की ओर लौटेंगे और ब्लॉगिंग को निरंतर समृध्ध करेंगे ।

-- कुश्वंश



 Rachna Singh

२००७ से हिंदी ब्लॉग जगत में हूँ , यहाँ पर ब्लॉग लेखन से ज्यादा नेट वर्किंग हैं और इसीलिये यहाँ पर फेस बुक पर ज्यादा लोग हैं। हाँ उनमे से कुछ पहले ब्लॉग भी लिखते थे पर वो सब ब्लॉग भी केवल और केवल एक दुसरे से अपने अपने नेटवर्क बढाने के लिये ही लिखते थे
ब्लॉग लेखन हिंदी में अब ज्यादा बेहतर हैं क्युकी वही लोग पढते और कमेन्ट देते हैं जो किसी मुद्दे से जुड़े हैं या ब्लॉग को एक निजी डायरी की तरह लिखते हैं
पहले हिंदी ब्लॉग में ग्रुप थे जो अब कम हो गए हैं क्युकी वो ग्रुप काल एक नेटवर्क के लिये बन जाते थे
अब ब्लॉग लेखन पहले से बहुत बेहतर और फेस बुक और ब्लॉग लेखन दो अलग अलग विधाए हैं और अलग अलग मकसद हैं

  -- रचना





आप सच कह रही हैं , धीरे धीरे लोग ब्लॉग से दूर हो गए फिर फेसबुक पर आ तो गए लेकिन लाइक कर के चल देते हैं या फिर टॉपिक को आगे पीछे हो जाते हैं।  विषय कहीं से शुरू होता है और कहीं पहुँच जाता है।  बहुत से महत्वपूर्ण विषय दरकिनार हो जाते हैं।   फेसबुक पर ये तो हैं कि बिना ज्यादा मशक्कत किये काफी लोगों की पोस्ट दिख जाती हैं जिनमें ज्वलंत मुद्दों पर भी आसानी से वक्तव्य दिए जा सकते हैं।  लेकिन उन विषयों का समय या यूँ कहिये की लाइफ़ एक या  रह पति है।   आने पर पोस्ट पिछड़ जाती है।  ब्लॉग ही एक ऐसा माध्यम है जिस पर विस्तृत और  वार्तालाप की जा सकती है।  
 -- अनामिका जी 


Aparna Sah 


ब्लॉग लिखना या फेसबुक के वाल पे लिखना एक विधा होते हुए भी दो चीज है। ब्लॉग भी अपना निजी होता है और वाल भी---पर वाल पे आप कुछ भी २-४ लाइन्स हल्का सा लिख सकते हैं पर ब्लॉग के साथ हीं गंभीरता,सार्थकता,मौलिकता की बात सामने आ जाती है। ब्लॉग की दुनिया काफी विस्तृत है,जितना अन्दर जाइये कम है पर कहा पैठ हो पाती है। फेसबुक के नशा के आगे ब्लॉग पे ज्यादा ध्यान लोग नहीं दे पातें हैं। लाइक-कमेंट की भी अपनी महत्ता है। कुछ लोग दोनों पे सामान रूप से पोस्ट डालते हैं। पर हाँ ये जरुरी है की ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया जाय क्योंकि ये आपके व्यक्तित्व और निजता की पहचान है। पुराने लोगों को भी नए को ग्रहण करने और सिखलाने की आवश्यकता है। नए-नए ब्लॉग को खूब पढने के लिए समय तो देना ही पड़ेगा--गहरे नहीं पैठने से मोती कहा से पायेंगे।

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (5)

                  कहने को तो फुरसतिया जी नाम से लगते हैं  कि  बड़ी फुरसत में रहते होंगे,  लेकिन विषय पर उन्होंने अपने ब्लॉग से कथन उठाने  की अनुमति दी है।  सो विषय के अनुरूप हमने उनके विचारों को  लिया।
सफाई इसा लिए पेश कर रही हूँ कि  चोरनी का लेबल न लग जाय !



                 संकलक के अभाव में यह कहना मुश्किल है कि ब्लॉग बनने की गति क्या है और प्रतिदिन छपने वाली पोस्टों की संख्या क्या है लेकिन यह तय बात है कि ब्लॉग धड़ाधड़ अब भी बन रहे हैं और लोग पोस्टें भी लिख रहे हैं। फ़िर यह बात कैसे फ़ैली कि ब्लॉगिंग कम हो गयी है।
           हुआ शायद यह कि कुछ लोग जो पहले से लिख रहे थे और जिनके पाठक भी काफ़ी थे उनमें से कुछ लोगों का लिखना कम हुआ।  ब्लॉग पर अभिव्यक्ति थोड़ा ज्यादा मेहनत मांगती है। इसलिये और इसके अलावा और कारणों से भी लोग फ़ेसबुक पर ज्यादा सक्रिय दिखते हैं। इससे यह धारणा बना लिया जाना सहज ही है कि फ़ेसबुक/ट्विटर के चलते ब्लॉग लिखना कम हो गया है। थोड़ा कठिन है।
        आम आदमी की अभिव्यक्ति के लिये ब्लॉग जैसी सुविधायें और किसी माध्यम में नहीं है। आपकी बात अनगिनत लोगों तक पहुंचती है। जो मन आये और जित्ता मन आये लिखिये। अपने लिखे को दुबारा बांचिये। तिबारा ठीक करिये। लोग आपके पुराने लिखे को पढ़ेंगे। टिपियायेंगे। आपको एहसास दिलायेंगे कि आपके अच्छा सा लिखा है कभी। फ़ेसबुक और ट्विटर की प्रवृत्ति केवल आज की बात करने की है। बीती हुयी अभिव्यक्ति इन माध्यमों के लिये अमेरिकियों के लिये रेडइंडियन की तरह गैरजरूरी सी हो जाती है!
                 
               कुछ लोगों के न लिखने से यह सोचा जाना कि ब्लॉगिंग के दिन बीत गये शायद सही नहीं है। ब्लॉगिंग की प्रवृत्ति ही शायद ऐसी है कि लोग लिखना शुरु करते हैं ,उत्साह होने पर दनादन लिखते हैं, फ़िर किसी कारण कम लिखते हैं और फ़िर कम-ज्यादा लिखना चलता रहता है। अगर कुछ लोगों ने लिखना कम किया है तो ऐसे भी हैं जो कि एक-एक दिन में तीन-तीन,चार-चार पोस्ट लिख रहे हैं और सब एक से एक बिंदास! किसी माध्यम जुड़े कुछ लोगों की क्षमताओं को उस माध्यम की क्षमतायें मानना सही नहीं होगा।
मुझे नहीं लगता कि ब्लॉगिंग कि अभिव्यक्ति के किसी अन्य माध्यम से कोई खतरा है। फ़ेसबुक और ट्विटर से बिल्कुलै नहीं है। इन सबको ब्लॉगर अपने प्रचार के लिये प्रयोग करता है। इनसे काहे का खतरा जी! :)
ब्लॉगिंग आम आदमी की अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। आम आदमी इससे लगातार जुड़ रहा है। समय के साथ कुछ खास बन चुके लोगों के लिखने न लिखने से इसकी सेहत पर असर नहीं पड़ेगा। अपने सात साल के अनुभव में मैंने तमाम नये ब्लॉगरों को आते , उनको अच्छा , बहुत अच्छा लिखते और फ़िर लिखना बंद करते देखा है। लेकिन नये लोगों का आना और उनका अच्छा लिखने का सिलसिला बदस्तूर जारी है- पता लगते भले देर होती हो समुचित संकलक के अभाव में।
! :)

--अनूप शुक्ला



बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (4)



                        विषय अच्छा है और इस पर  का भी उतना ही महत्व है जितना की इसको महसूस कर मन में रखने वालों में - अरे भाई आप भी  अपनी सोच को शब्दों में ढल कर हमें भेज दीजिये।  हम उसे  पढ़ाएंगे।  



vandana A dubey's profile photo 
अच्छा विषय उठाया है रेखा दी...
हिंदी ब्लॉगिंग ने अपने दस साल पूरे कर लिये....
तमाम उतार-चढाव के बीच. हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआती दिक्कतें, फिर उनसे निजात पाना..सब हम लोग पढते रहे हैं. कैसे-कैसे प्रयोग किये गये, ये भी. हिंदी ब्लॉगिंग अपने शुरुआती दौर से लेकर शायद 2010 तक अपने शबाब पर थी, लेकिन पिछले लगभग दो सालों से तमाम सक्रिय ब्लॉगर्स ने अपना ध्यान ब्लॉगिंग से हटा के फेसबुक पर केन्द्रित कर लिया है, ऐसा मुझे लगता है ( क्योंकि मेरे साथ खुद ऐसा हुआ) बीच-बीच में पोस्ट लिखी भी गयीं तो उन्हें उतने पाठक नहीं मिले, जितने पहले मिलते थे. पहले जहां एक-एक पोस्ट पर पचास-साठ कमेंट आते थे, वे दस-पन्द्रह में सिमट गये. वो भी अगर लिंक फेसबुक पर शेयर किया गया है तो. वरना इससे भी कम. 
तो मुझे लगता है कि हिंदी ब्लॉगिंग को सबसे ज़्यादा नुक्सान फेसबुक से हुआ. लोगों को फेसबुक ब्लॉग से कहीं अधिक सुविधाजनक लगने लगा. पोस्ट लिखी और फेसबुक पर शेयर कर दी . कमेंट्स करने वाले भी सुकून में आ गये. अब टिप्पणी करने की बजाय वे बस "लाइक" का बटन दबाने लगे. पोस्ट पढी हो या नहीं, लाइक करने में क्या जाता है? अगले को ओब्लाइज़ भी कर दिया..... पोस्ट पढने की मेहनत से भी बच गये. वरना पहले ध्यान से पोस्ट पढो, फिर उस पर सार्थक टिप्पणी लिखो.... अब ज़्यादा भला. लाइक करो और अधिक से अधिक लिख दो, " जा रहे हैं पढने..." अब पढो चाहे न पढो. 
फेसबुक की लोकप्रियता के आगे ब्लॉगिंग विवश सी नज़र आने लगी....... आखिर हम सब लिखने-पढने वाले लोग फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रति इतने आकर्षित क्यों हुए? क्या वजह है जो इस साइट ने पोती से लेकर दादी तक, सबको बांध रखा है? क्यों नियमित रूप से ब्लॉग लिखने वाले अब फेसबुक पर रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करते भर नज़र आ रहे? बहुत ज़ाहिर से कारण हैं. 
१) तात्कालिक रूप से मुलाकात और बात
२) तात्कालिक सवाल-जवाब
३) एक लाइव बहस जैसा माहौल निर्मित हो पाना.
४) लाइक की सुविधा उपलब्ध होना
५) सबसे बड़ी सुविधा है, नोटिफ़िकेशन की.
नोटिफ़िकेशन की सुविधा के चलते हम अगर किसी का ज़िक्र करते हैं, तो उसे हायपर लिंक करने की सुविधा होती है वहां, जिससे चिन्हित व्यक्ति के पास सूचना पहुंच जाती है, और वो तत्काल उस जगह पर पहुंच के अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देता है. ज़िक्र करने वाले को भी अच्छा लगता है, और उस व्यक्ति को भी, जिसका ज़िक्र किया गया. जबकि ब्लॉग में ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. मुझे लगता है, कि अगर ब्लॉग को भी नोटिफ़िकेशन की सुविधा उपलब्ध हो जाये तो फेसबुक पर अतिसक्रिय ब्लॉगर्स तत्काल ब्लॉग की ओर लौटेंगे. लोग अक्सर अपनी पोस्ट में अन्य साथियों का ज़िक्र करते हैं, कमेंट्स में भी पोस्ट लेखक जवाब देता है,लेकिन टिप्पणीकर्ता को खबर नहीं हो पाती.  अगर नोटिफिकेशन  की सुविधा ब्लॉग पर होगी, तो टिप्पणीकर्ताओं को तत्काल जानकारी होगी कि उन्हें पोस्ट लेखक ने या अन्य किसी ने कोई जवाब दिया है. चिट्ठा-चर्चा जैसे मंच को तो इस सुविधा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी चर्चा की जाती है, तो उसमें तमाम लिंक्स शामिल किये जाते हैं, लेकिन कितनों को पता चल पाता है कि उनकी चर्चा की गयी? नोटिफ़िकेशन की सुविधा होगी तो चर्चाकार को भी अभी से अधिक आनन्द आयेगा चर्चा करने में. फिर देखियेगा, कैसे तमाम निष्क्रिय बैठे चर्चाकार कैसे सक्रिय होते हैं .. और वे सारे ब्लॉग-लेखक हरकत में आ जायेंगे जो फ़िलहाल पोस्ट लिखने से जी चुराने लगे हैं, और जिन्हें छोटे-छोटे स्टेटस रास आने लगे हैं. 
वैसे भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की लोकप्रियता को ,  उनमें  सुविधाओं पर नज़र डालनी ही चाहिए।  और ब्लॉग को अधिक सुविधा- संपन्न बनाए जाने पर  विचार किया ही जाना चाहिए, जब  साइट्स की तरह ब्लॉग भी क्यों न संपन्न हो , आधुनिक तकनीक से ?

 --- वंदना अवस्थी दुबे                                                                          
                                                                                                                                                 (क्रमशः )

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? ( 3 )

                           बहुत महत्वपूर्ण विषय  है ये और इसके विषय में मैं  सोचती हूँ और इसा के बारे में हमारे ब्लॉगर मित्र जो कहते हैं वो उनके अपने विचार और अपनी सोच है।  फिर भी वे भी इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि ऐसा हो रहा है वजह उसकी कोई भी हो।  आपके अपने जो भी विचार हों अगर हमें अवगत कराएँगे तो  प्रस्तुत करके अपने ब्लॉग और अपने प्रयास को सफल मानूंगी।  इन्तजार में ………… !




ब्लॉग और फेसबूक दोनों ही आम आदमी को अपने सृजन क्षमता, सोच को दिखाने का जरिया है जो मानसिक संतुष्टि देती है, जब वो अपनी सृजनता पर प्रत्युतर पता है, बेशक सराहा जाए या गलतियाँ निकली जाए। हाँ ये अलग बात है की फेसबूक अगर एक रफ कॉपी के तरह है तो ब्लॉग एक शानदार डायरी है। फेसबूक पर आप कुछ भी लिखें, उस पोस्ट से तुरंत जुड़ जाते हैं एक संपर्क उसपर कमेंट करने वाले के साथ बनता है, जिस से वो थोड़ी खुशी देती है, पर उसको सहेजना मुश्किल है, क्योंकि कुछ दिनों मे ही वो पोस्ट कहीं विलीन होती दिखने लगती है, इसके उलट ब्लॉग पोस्ट आपके लिए सहेजा हुआ रहता है, उसके कोमेंट्स को कभी भी पढ़ कर आप खुश हो सकते हैं। फिर ब्लॉग पर चूंकि हम सोच समझ कर एक विशेष पोस्ट डालते हैं तो उस से ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। अतः बेशक फेसबूक की लोकप्रियत जितनी भी हो, एक सृजनकर्ता रचनाकर के लिए ब्लॉग ज्यादा अहम है, और ब्लॉग पर समय ज्यादा देना चाहिए।

 मुकेश कुमार सिन्हा 



 Photo: दिसंबर २००७ मे '' दिल्ली आज तक '' पर -- यह रौशनी उन्ही के स्टूडियो की है !

 सोशल मीडिया प्रेमियों के लिये ब्लॉगिंग और फ़ेसबुक मे उतना ही अंतर हैं जितना क्रिकेट प्रेमियों के लिये टैस्ट मैच और टी ट्वेंटी मे. ब्लॉगिंग विचारों की अभिव्यक्ति का एक गंभीर माध्यम है. साथ ही मनोरंजन का भी उत्तम साधन है . यहाँ लेखक सभी तरह के विषयों पर गंभीर चर्चा कर सकते हैं. एक बार लिखी गई पोस्ट सदा के लिये अमर हो जाती है . वर्षों बाद भी किसी विषय विशेष पर लिखी गई पोस्ट को ढूंढ कर पढ़ा जा सकता है . यह रचनात्मकता को प्रोत्साहन देती है . लेकिन टैस्ट मैच की तरह ब्लॉगिंग मे भी समय की खपत ज्यादा होती है . शायद इसीलिये अधिकांश ब्लॉगर्स का ध्यान अब फ़ेसबुक की ओर मुड़ गया है . फ़ेसबुक तुरंत फुरंत माध्यम है जहां एक स्टेटस की उम्र क्षणिक ही होती है . साथ ही यहाँ गंभीर विचार विमर्श के लिये कम ही जगह है .फ़ेसबुक पर लोग मौज मस्ती ज्यादा करते हैं , काम की बातें कम . यहाँ अक्सर स्वमुग्धता ज्यादा देखने को मिलती है. अभिव्यक्ति से ज्यादा अपनी उपलब्धियों का प्रचार ज्यादा होता है. अक्सर कोई कवि , लेखक , कलाकर या अन्य विशेष योग्यता रखने वाला अपनी उपलब्धियों का गुण गान करता ज्यादा नज़र आता है . पता चला है कि फ़ेसबुक पर रहने से कई लोगों को अवसाद होने लगता है. लेकिन सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तो फ़ेसबुक जैसा माध्यम सामाजिक जागृति पैदा करने मे बहुत sahayak siddh हो सकता है .

-- तारिफ दराल




फेसबुक ने ब्लागिंग की सक्रियता को बढाने का कार्य किया है।  यह एक मिथ है कि फेसबुक की  ब्लाग लेखन कम हो गया है।  अगर फेसबुक न होता तो भी ब्लॉग लेखन में सचुरेशन की स्थिति आती।  ब्लागिंग में धीमापन उसका सहज स्वभाव है जबकि फेसबुक त्वरित ढंग से कार्य करता है। नए  ब्लागरो  में लेखन का उत्साह कुछ ज्यादा रहता है सो उनकी पोस्टे फटाफट आती रहती है और जब  व्यक्ति लम्बे समय तक लिखता रहता है तो उसे लेखन कार्य से थोड़े समय के लिए ऊबन होने लगती है और वह कुछ 'रिक्रियेशन' के लिए करता है इसका मतलब यह नही की वह लेखन छोड़ कर 'रिक्रियेशन' को लेखन का विकल्प बना लेगा।  ब्लाग पर देरी से पोस्ट का आना और फेसबुक पर उपस्थित रहना दोनों में कोई सम्बन्ध नही है।  लोग जो फेसबुक पर होते है मैंने उनको भी फेसबुक को छोड़ कर जाते देखा है।  ब्लागिंग का शानदार और चौकस  भविष्य है।  

--- पवन  मिश्रा

                                                                                                                              ( क्रमशः )