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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

क्या फेसबुक से ब्लॉग पर सक्रियता कम हो रही है ? (4)



                        विषय अच्छा है और इस पर  का भी उतना ही महत्व है जितना की इसको महसूस कर मन में रखने वालों में - अरे भाई आप भी  अपनी सोच को शब्दों में ढल कर हमें भेज दीजिये।  हम उसे  पढ़ाएंगे।  



vandana A dubey's profile photo 
अच्छा विषय उठाया है रेखा दी...
हिंदी ब्लॉगिंग ने अपने दस साल पूरे कर लिये....
तमाम उतार-चढाव के बीच. हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआती दिक्कतें, फिर उनसे निजात पाना..सब हम लोग पढते रहे हैं. कैसे-कैसे प्रयोग किये गये, ये भी. हिंदी ब्लॉगिंग अपने शुरुआती दौर से लेकर शायद 2010 तक अपने शबाब पर थी, लेकिन पिछले लगभग दो सालों से तमाम सक्रिय ब्लॉगर्स ने अपना ध्यान ब्लॉगिंग से हटा के फेसबुक पर केन्द्रित कर लिया है, ऐसा मुझे लगता है ( क्योंकि मेरे साथ खुद ऐसा हुआ) बीच-बीच में पोस्ट लिखी भी गयीं तो उन्हें उतने पाठक नहीं मिले, जितने पहले मिलते थे. पहले जहां एक-एक पोस्ट पर पचास-साठ कमेंट आते थे, वे दस-पन्द्रह में सिमट गये. वो भी अगर लिंक फेसबुक पर शेयर किया गया है तो. वरना इससे भी कम. 
तो मुझे लगता है कि हिंदी ब्लॉगिंग को सबसे ज़्यादा नुक्सान फेसबुक से हुआ. लोगों को फेसबुक ब्लॉग से कहीं अधिक सुविधाजनक लगने लगा. पोस्ट लिखी और फेसबुक पर शेयर कर दी . कमेंट्स करने वाले भी सुकून में आ गये. अब टिप्पणी करने की बजाय वे बस "लाइक" का बटन दबाने लगे. पोस्ट पढी हो या नहीं, लाइक करने में क्या जाता है? अगले को ओब्लाइज़ भी कर दिया..... पोस्ट पढने की मेहनत से भी बच गये. वरना पहले ध्यान से पोस्ट पढो, फिर उस पर सार्थक टिप्पणी लिखो.... अब ज़्यादा भला. लाइक करो और अधिक से अधिक लिख दो, " जा रहे हैं पढने..." अब पढो चाहे न पढो. 
फेसबुक की लोकप्रियता के आगे ब्लॉगिंग विवश सी नज़र आने लगी....... आखिर हम सब लिखने-पढने वाले लोग फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट के प्रति इतने आकर्षित क्यों हुए? क्या वजह है जो इस साइट ने पोती से लेकर दादी तक, सबको बांध रखा है? क्यों नियमित रूप से ब्लॉग लिखने वाले अब फेसबुक पर रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करते भर नज़र आ रहे? बहुत ज़ाहिर से कारण हैं. 
१) तात्कालिक रूप से मुलाकात और बात
२) तात्कालिक सवाल-जवाब
३) एक लाइव बहस जैसा माहौल निर्मित हो पाना.
४) लाइक की सुविधा उपलब्ध होना
५) सबसे बड़ी सुविधा है, नोटिफ़िकेशन की.
नोटिफ़िकेशन की सुविधा के चलते हम अगर किसी का ज़िक्र करते हैं, तो उसे हायपर लिंक करने की सुविधा होती है वहां, जिससे चिन्हित व्यक्ति के पास सूचना पहुंच जाती है, और वो तत्काल उस जगह पर पहुंच के अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा देता है. ज़िक्र करने वाले को भी अच्छा लगता है, और उस व्यक्ति को भी, जिसका ज़िक्र किया गया. जबकि ब्लॉग में ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. मुझे लगता है, कि अगर ब्लॉग को भी नोटिफ़िकेशन की सुविधा उपलब्ध हो जाये तो फेसबुक पर अतिसक्रिय ब्लॉगर्स तत्काल ब्लॉग की ओर लौटेंगे. लोग अक्सर अपनी पोस्ट में अन्य साथियों का ज़िक्र करते हैं, कमेंट्स में भी पोस्ट लेखक जवाब देता है,लेकिन टिप्पणीकर्ता को खबर नहीं हो पाती.  अगर नोटिफिकेशन  की सुविधा ब्लॉग पर होगी, तो टिप्पणीकर्ताओं को तत्काल जानकारी होगी कि उन्हें पोस्ट लेखक ने या अन्य किसी ने कोई जवाब दिया है. चिट्ठा-चर्चा जैसे मंच को तो इस सुविधा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. जब भी चर्चा की जाती है, तो उसमें तमाम लिंक्स शामिल किये जाते हैं, लेकिन कितनों को पता चल पाता है कि उनकी चर्चा की गयी? नोटिफ़िकेशन की सुविधा होगी तो चर्चाकार को भी अभी से अधिक आनन्द आयेगा चर्चा करने में. फिर देखियेगा, कैसे तमाम निष्क्रिय बैठे चर्चाकार कैसे सक्रिय होते हैं .. और वे सारे ब्लॉग-लेखक हरकत में आ जायेंगे जो फ़िलहाल पोस्ट लिखने से जी चुराने लगे हैं, और जिन्हें छोटे-छोटे स्टेटस रास आने लगे हैं. 
वैसे भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की लोकप्रियता को ,  उनमें  सुविधाओं पर नज़र डालनी ही चाहिए।  और ब्लॉग को अधिक सुविधा- संपन्न बनाए जाने पर  विचार किया ही जाना चाहिए, जब  साइट्स की तरह ब्लॉग भी क्यों न संपन्न हो , आधुनिक तकनीक से ?

 --- वंदना अवस्थी दुबे                                                                          
                                                                                                                                                 (क्रमशः )

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (१०)



वंदना ए दुबे :

जिन्दगी के किस पक्ष में हम संघर्ष करते हें ये हमारे लिए अलग मायने रखता है । संघर्ष तो संघर्ष है कभी अपने सपनों को पूरा करने के लिए , कभी खुद को स्थापित करने के लिए और कभी कभी अपने वजूद को तलाशने और उसको दूसरों की नजर में एक स्थान दिलाने के लिए। ये हमारी लड़ाई है और इसको हम ही लड़ते हैं, जब जीत जाते हैं तो फिर लगता है कि हमें मंजिल मिल गयी और संघर्ष करके पायी हुई वस्तु या मुकाम पर खड़े होकर जब हम पीछे देखते हैं तो लगता है कि क्या वाकई हम इतना सब झेल कर यहाँ खड़े हैं। आज का संस्मरण है वंदना अवस्थी दुबे का:

सच्ची लगन हो तो मंजिल मिलती ही है.....

बचपन से लेकर आज तक, मेरे बुज़ुर्गों और ईश्वर के आशीर्वाद से संघर्ष तो मुझे नहीं करना पड़ा, लेकिन अपनी संस्था को खड़ा करने के लिये मैने जो मेहनत की है, उसे शायद संघर्ष की श्रेणी में रखा जा सके. तो आज मैं अपने उसी वक्त को याद करूंगी, जब मैने अपना विद्यालय संचालित करने का सपना देखा.
१९८९ से लेकर २००१ तक मैं जिस प्रतिष्ठित अखबार में उपसम्पादक के रूप में कार्य कर रही थी, मैनेजमेंट की तमाम खामियों के चलते उस अखबार पर सन २००१ में ताला पड़ गया. पहले रेडियो में और फिर अखबार में काम करने की वजह से किसी और काम को करने की मेरी इच्छा ही नहीं होती थी. शिक्षण-कार्य तो मैं बिल्कुल करना ही नहीं चाहती थी. कारण? मेरे घर में मेरे माता-पिता मेरी बड़ी बहने सभी अध्यापन-कार्य से जुड़े हैं. इस क्षेत्र की बिडम्बना ये है कि आप चाहे प्राचार्य हों या प्राध्यापक, कहलायेंगे मास्टर ही इतना ही नहीं "बेचारे’ का तमगा भी साथ में लोग लगा देते थे, सो मेरा मन एकदम उचाट था. दूसरा कारण मेरी खुद की दिलचस्पी मीडिया में होने का भी था. मेरे ग्रैजुएशन के बाद पापाजी बी.एड. का फ़ॉर्म ले आये थे कि पहले बी.एड. कर लो फिर पीजी करना, लेकिन मैने वो फ़ॉर्म अखबारों के बंडल के नीचे गहरे छुपा दिया ताकि पापा का ध्यान उस पर से हट जाये. मुझे मालूम था कि बी.एड. करने के बाद शिक्षक बन ही जाना था :) खैर मैने बी.एड नहीं किया बल्कि आकाशवाणी में अस्थायी उद्घोषिका बन गयी.
शादी के बाद पत्रकारिता का काम किया ये भी मेरी पसंद का काम था. लेकिन दुर्भाग्य से उस नामचीन अखबार पर ताला पड़ गया. हमेशा व्यस्त रहने वाली मैं अब बेहद खाली हो गयी थी. विधु मेरी बेटी उस वक्त ५ साल की थी. स्कूल जाने लगी थी. निजी विद्यालयों की भारी-भरकम फ़ीस और शिक्षा का स्तर देख के मेरा मन एक ऐसा स्कूल खोलने का होने लगा था, जहां आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चे भी अंग्रेज़ी माध्यम की बेहतर शिक्षा पा सकें. अखबार के बन्द होने के बाद मैने अपनी इस इच्छा को उमेश जी के सामने ज़ाहिर किया. उन्होंने सहर्ष सहमति जतायी. स्कूल शुरु करने जैसा बड़ा काम बिना उमेश जी की मदद के हो भी नहीं सकता था. अब मैने इस दिशा में काम शुरु किया. मेरे घर के बाजू में रहने वाली तारा आंटी (सुश्री तारा तिवारी) जो कि खुद भी प्रधानाध्यापिका थीं, ने मेरा उत्साह बढाया और स्कूल की जानकारी लोगों तक पहुंचाने का जिम्मा भी उठाया. स्कूल के पम्पलेट छपवाये गये और अखबार के साथ घर-घर पहुंचाये गये. कुछ जगहों पर मैं खुद तारा आंटी के साथ गयी.
इतना सब करने के बाद भी नतीजा कुछ बहुत संतोषजनक नहीं था. ले दे के पांच एडमिशन हो सके. उमेश जी ने ढांढस बंधाया और मैने मन को मजबूत किया कि आज नहीं तो कल, बच्चे तो आयेंगे ही. हमारे घर के ऊपर ही लम्बा-चौड़ा एरिया खाली पड़ा था, वहां केवल एक हॉल था, मैने इस एक कमरे में ही अपना स्कूल नर्सरी क्लास से लगाना शुरु कर दिया. साल के मध्य तक कुल दस बच्चे हो गये. एक टीचर, मैं और एक आया बस. हमने खूब मेहनत शुरु की बच्चों के साथ. बच्चे भी बहुत खुश हो के घर जाते. लेकिन बहुत से लोग ऐसे थे, जो मज़ाक बनाने से नहीं चूकते. व्यंग्य के लहजे में पूछते- और, आपका कॉलेज कैसा चल रहा है? कुछ कहते- कहां मुसीबत मोल ले रही हैं, कुछ नहीं होगा. इतने स्कूल हैं, बच्चे मिलेंगे ही नहीं. लगभग रोज़ कोई न कोई हतोत्साहित करने वाला मिल ही जाता. लेकिन इतनी बातों के बीच भी उमेश जी बराबर मेरा हौसला बढाते रहते थे. मैंने भी ठान लिया था कि अब इस स्कूल को खड़ा करके दिखाउंगी ही.
अगले सत्र में दस और एडमिशन हो गये, ये सारे बच्चे मेरे पुराने बच्चों के अभिभावकों द्वारा की गयी तारीफ़ के चलते ही आये थे और एडमिशन करा गये.अगले ही साल हमने ऊपर तीन कमरे और बनवाये. बस. उसके बाद निरन्तर बच्चों की संख्या बढती गयी. आज हमारा स्कूल कक्षा आठ तक हो गया है यानि माध्यमिक स्तर तक. .मैने अपने स्कूल की पढाई के स्तर से कभी समझौता नहीं किया न ही बच्चों को भर्ती करते चले जाने की परम्परा को अपनाया. निर्धन छात्रों को नि:शुल्क पढाने का अपना सपना भी अब मैं पूरा कर पा रही हूं.
दस बच्चों और नर्सरी कक्षा से शुरु होने वाले इस विद्यालय में आज ढाई सौ बच्चे और १८ लोगों का स्टाफ़ है. जिनमें से चालीस बच्चे नि:शुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.
तो बस इतना ही. मुझे लगता है कि यदि किसी काम के प्रति लगन हो, और हम हौसला रख सकें तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है. हां दृढ इच्छाशक्ति ज़रूरी है. अध्यापन के कार्य से दूर भागने वाली मैं, आज पूरे दिन अध्यापन कार्य ही करती हूं और बहुत खुश हूं बच्चों के साथ.