आतकी हमलों को रोकने की बात तो बहुत बादi में आती है , आज तक किसी भी हमले की गुत्थी को तो सुलझाया नहीं जा सका है। आतंकी हमलों को रोकने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि इससे देश की आबादी अपने आप काम हो रही है, आतंकियों को अगर पकड़ भी लेंगे तो उन्हें सुरक्षित और शानदार जीवन देने का बीमा तो आपके विभाग ने कर रखा है। अगर अदालत किसी प्रकार से इनपर अपना फैसला सुना भी देती है तो
फिर फाइल तो आपके मंत्रालय में दबा कर रखी जानी है। आपको इन्तजार होता किसी कंधार काण्ड का जिससेa कि उसे सुलझा कर आप देश के नाम पर खुद कलंक बन जाएँ। नहीं तो फाइल तब तक दबी रहेगी जब तक कि आतंकवादी जीवनदान के अधिकारी न बन जाएँ। अधिक समय होने पर राजीव गाँधी के हत्यारों की तरह से तमिलनाडु विधायिका उनके जीवनदान के लिए सिफारिश करने लगी है तो कल इनको भी कोई न कोई पैरोकार मिल ही जाएगा। हमले में हें रिक्शेवाले, फलवाले और आम आदमी - कभी कोई मंत्री या नेता भी मरा है?
ये मरेंगे ही क्यों? क्योंकि बाहर रहे तो उनके आका हैं ही उनके लिए और अगर पकड़ भी गए तो सरकारी मेहमान बनकर जीना भी काम आरामदायक नहीं है. देश के आम आदमी से अधिक सुख -सुविधापूर्ण जीवन उनको दिया जाता है , इसलिए मंत्री जी बोलने से पहले सोच लीजिये कि ऐसा वक्तव्य किसी मंत्री को शोभा नहीं .
