
सभी के संस्मरण ऐसे हैं जिनमें की आम के पेड़ों और आमों के खाने की बात न उठी हो। एक तो गर्मी का फल फिर गाँव हों और आम के बगीचे न हों ऐसा तो हो ही नहीं सकता है। अरे शहर में भी गर्मियों में आम के बिना तो काम चलता ही ही नहीं है। गाँव में मांगो शेक न सही काम से काम आप का घर का बना शरबत और पाना तो सही स्वाद लेकर पीते रहे होंगे। ये आम का पेड़ मासूम भाई ने भेजा था तो इसको लगाना भी जरूरी था। अप सभी को आम का स्वाद मिला या नहीं। अगर मिला है तो फिरबचपन के स्वाद को याद करके भेजें।

एस एम मासूम :
भूले न भुलाये वो बचपन के पल :
कल जब अपने बहन रेखा जी हुक्म हुआ के अपने बचपन में झांक कर कैसे आप गर्मियों की छुट्टी बिताया करते थे इस बारे में अपने संस्मरण मुझे लिख कर भेज दीजिये तो अचानक ना जाने कितनी भूली बिसरी बातें याद आ गयी, वो गर्मी के ,छुट्टी के आज़ादी के दिन, वो गाँव मैं जाना , वो आम के बगीचे , वो नंदन, चम्पक,चाचा चौधरी की कहानियां ,वो कैरम और व्यापार के खेल, वो नानी का प्यार ,वो हम लोगों का गाँव मैं जाने का इंतज़ार करना , वो तैयारियां करना.
यह मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ जब मैं ८-१० साल का था और लखनऊ चारबाग मैं माता पिता भाई बहनों के साथ रहा करता था. पिताजी पढाई के मामले मैं बहुत सख्त थे इसलिए सारी आज़ादी गर्मिओं की छुट्टियों के दिनों मैं ही मिला करती थी. इसलिए बड़ी बेसब्री से इंतज़ार होता था इन छुट्टियों का. छुट्टियों मैं हम लोग अपने ननिहाल के गाँव गाजीपुर नानी के यहाँ जाया करते थे. और जितने दिन वहाँ ना जा पाते, नंदन, चम्पक और तेलानी राम को पढने का मज़ा लेते या फिर पड़ोस भटनागर जी के बच्चों के साथ कैरम , व्यापार खेलते.
हमारा ननिहाल गाजीपुर एक छोटे से गाँव मैं पड़ता था. नानी हमारे आने की तैयारी, गुड की भेली, सत्तू, चना, आम, तरबूज और खरबूजे के इंतज़ाम के साथ किया करती थी. नाना के खुद के आम के बाग थे. यह सब चीजें हम शहर मैं रहने वालों के लिए नायाब तोहफा हुआ करती थीं. सुबह ५ बजे उठाना, गाँव की गुलाबी दही का नाश्ता, और फिर निकल जाना गाँव के दोस्तों के साथ आम के बगीचे में. वंही ट्यूबवेल पे नहाना , ताज़े आम खाना ,बेल खाना और मस्ती करना. बहुत बार दूसरों के बाग मैं चोरी छिपे आम तोड़ लाना और शाम को शिकायत आने पे नाना की डांट सुनना. बड़ा मज़ा आता था.
दोपहर मैं खाना कम हम बच्चे कम ही खा पाते थे. शाम के ४ बजते सत्तू का शरबत, तरबूज इत्यादि का मज़ा लेते और फिर पानी भारी बाल्टी मैं ठन्डे किए आम को खाने बैठ जाते . शाम को सात बजे ही खाना खा के ,नानी से जिन्न और परी की कहानिया सुनते कब आँगन मैं नीद आ जाती पता ही नहीं चलता था.
२ महीने कैसे कट जाते पता ही नहीं चलता था, ना गर्मी का एहसास होता ना बिजली और पंखे की कमी का एहसास होता था. जब वापस लखनऊ लौटने के दिन करीब आते ,तो बहुत बुरा लगता था. नानी के पास से ना जाने क्या क्या ,गुड की भेली, सत्तू, आम इत्यादि बाँध के साथ मैं लाते और बहुत दिनों तक गाँव को याद करते. फिर शुरू हो जाती पढ़ाई और साथ मैं इंतज़ार अगली गर्मी की छुट्टियों का.
यकीन जानिए ये पैसा, यह शहरों की दौड़ यह आराम और एयर कंडीशन की ठण्ड सब बेकार है उन बचपन की छुट्टियों के दिनों के सामने. आज भी दिल करता है उन दिनों मैं वापस लौट जाने का.

साधना वैद :
"हाय रे वो दिन क्यों ना आये"
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बचपन और शरारतों का वैसा ही रिश्ता होता है जैसा पतंग और डोर का ! और इस संयोग को और दोबाला करना हो तो कुछ हमउम्र संगी साथी और भाई बहनों का साथ मिल जाये और गर्मियों की छुट्टियों का माहौल तो बस यह समझिए कि सातों आसमान ज़मीन पर उतार लाने में कोई कसर बाकी नहीं रह जाती ! और तब घर के बड़े बुजुर्गों को भी बच्चों को अनुशासन में रखने के लिये जो नाकों चने चबाने पड़ जाते हैं उसका तो मज़ा ही कुछ और होता है !
सालाना इम्तहान समाप्त होते ही हम बड़ी बेसब्री से अपने मामाजी और चाचाजी के परिवारों से मिलने के लिये अधीर हो जाते थे ! कभी हम तीनों भाई बहन मम्मी बाबूजी के साथ उन लोगों के यहाँ चले जाते तो कभी वे सपरिवार हम लोगों के यहाँ आ जाते ! पाँच बच्चे मामाजी के, पाँच बच्चे चाचाजी के और हम तीन भाई बहन और साथ में आस पड़ोस के बच्चों की मित्र मण्डली, बस पूछिए मत कितना ऊधम, कितना धमाल और कितना हुल्लड़ सारे दिन होता था ! लड़कियों का ग्रुप अलग बन जाता और ज़माने भर के लोक गीतों और फ़िल्मी गीतों के ऊपर सारे-सारे दिन नाच-नाच कर कमर दोहरी कर ली जाती ! उधर लड़कों का ग्रुप अलग बन जाता जो कभी तो छत पर चढ़ कर पतंग उड़ाने में और पेंच लड़ाने में व्यस्त रहते तो कभी इब्ने सफी बी.ए. के जासूसी उपन्यासों से प्रेरणा ले विनोद हमीद की भूमिका ओढ़ झूठ मूठ के केसों की छानबीन में लगे रहते ! दिन में धूप में बाहर निकलने की सख्त मनाही होती थी ! उन दिनों कूलर और ए सी का ज़माना नहीं था ! खस की टट्टियाँ दरवाजों पर और खिड़कियों पर लगा कर कमरों को ठंडा रखा जाता था ! दिन भर कमरे में हम लोग या तो कैरम, साँप सीढ़ी, लूडो और ताश आदि खेलते या फिर मम्मी सब लड़कियों को कढ़ाई करने के लिये मेजपोश या तकिये के गिलाफों पर डिजाइन बना कर दे देतीं कि जब तक बाहर का मौसम अनुकूल ना हो जाये कमरे रह कर कुछ हुनर की चीज़ें भी लड़कियों को सिखा दी जायें ! सबसे सुन्दर कढ़ाई करने वाले के लिये आकर्षक इनाम दिये जाने की घोषणा भी की जाती ! बस फिर क्या था हम सभी बहनें स्पर्धा की भावना के साथ जुट जातीं कि यह इनाम तो हमें ही जीतना है ! दिन भर बच्चों के लिये कभी फालसे या बेल का शरबत तो कभी कुल्फी और आइसक्रीम या कभी आम और खरबूजे के खट्टे मीठे पने का चुग्गा डाल कर मम्मियाँ हम लोगों को कमरे में ही टिकाये रखने के लिये सारे प्रयत्न करती रहतीं ! बीच-बीच में बच्चों की ड्यूटी बाहर जाकर खस के पर्दों की तराई करने के लिये भी लगा दी जाती ! कमरे में खूब हो हल्ला मचा रहता ! कभी अन्त्याक्षरी का शोर मचता तो कभी कोरस में नये पुराने फ़िल्मी गीतों को फूल वॉल्यूम पर गाने का शोर मचता ! कभी-कभी बड़े लोग भी हमारे इस खेल में शामिल हो जाते अन्त्याक्षरी के खेल में हारने वाली टीम के कानों में गाने बता कर उन्हें जीतने में मदद करने लगते ! उस समय ‘चीटिंग-चीटिंग’ का बड़ा शोर मचता और ‘शेम-शेम’ की गगन भेदी चीत्कारों के साथ खेल वहीं समाप्त कर दिया जाता !
यूँ तो लड़के अपना ग्रुप अलग ही बना कर रखते थे लेकिन जब उन्हें अपनी पतंगों के लिये 'माँझा' बनाने की ज़रूरत होती थी तो उन्हें हमारे सहयोग की बड़ी ज़रूरत होती थी ! 'माँझा' बनाना कोई आसान काम नहीं होता था ! उसके लिये घर के कबाड़े में से पुरानी काँच की शीशियों को जमा कर, तोड़ कर, कूट पीस कर और कपड़े से छान कर उसका पाउडर बनाना पड़ता था ! उसके बाद काँच के उस महीन पाउडर को गोंद में मिला कर उसका लेप तैयार करना पड़ता था ! फिर बगीचे के किसी एक पेड़ से धागे के एक सिरे को बाँध कर दूसरा सिरा सबसे दूर वाले पेड़ से बाँधा जाता था ! फिर गोंद में मिले उस लेप को धागे पर अच्छी तरह से लपेटा जाता था ! निगरानी भी करनी पड़ती थी कि जब तक धागा पूरी तरह से सूख ना जाये कोई बच्चा उसके पास जाकर घायल ना हो जाये ! अपने इस बहुमूल्य सहयोग की मोटी कीमत भी वसूलते थे हम अपने भाइयों से ! वे बड़े थे तो कभी हम लोगों को मम्मी बाबूजी की इजाज़त लेकर बाहर पार्क में घुमाने ले जाते थे जहाँ पूरी शाम हम लोग झूलों, शूट, सी सौ आदि पर जमे रहते थे और ‘आई स्पाई’ और ‘बोल मेरी मछली कितना पानी’ खेला करते थे या कभी-कभी वे लोग हमें पिक्चर हॉल में बच्चों की कोई फिल्म दिखाने के लिये ले जाते थे ! कई अच्छी फ़िल्में जैसे 'जागृति', 'मासूम', 'प्यार की प्यास', 'बूट पॉलिश', 'हम पंछी एक डाल के', 'कैदी नंबर नौ सौ ग्यारह' आदि हमने इसी तरह देखी थीं ! शाम होते ही आँगन में पानी का छिड़काव और छिड़काव के बहाने एक दूसरे को पानी से सराबोर करने की शरारतें तो अंतहीन होती थीं ! जब तक ठन्डे पानी से बदन काँपने नहीं लगता था और मम्मी बाबूजी की डाँटने की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती थी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता था !
कितने सुहाने दिन थे वे ! जहाँ सिर्फ मस्ती थी, मौज थी, बेफिक्री थी और थीं ढेर सारी खुशियाँ ही खुशियाँ ! उन्हें याद करके आज भी मन यही कहता है !
‘हाय रे वो दिन क्यों ना आये !’
