महात्मा ! तुमने आदमी को
प्यार, अहिंसा और सद्भावना देनी चाही
कैसी जुर्रत की तुमने गाँधी ?
कैसा था दुह्साहस ?
ऐसा ही दुह्साहस किया था यीशु
फिर यीशु से इतर तुम्हारी परिणति क्या होती?
यह अंत कितना अपूर्व है,
कितना मोहक?
क्या मौत इतनी मेहरबान होती है?
अगर ऐसी मौत मिलनी हो तो
मैं आज ही
आज ही नहीं अभी इसी क्षण मरना चाहूँगा।
मृत्यु इतनी श्लाघ्य !
मृत्यु इतनी वरेण्य !
ऐसी ही मृत्यु मुझे भी देना मेरे अंतर्यामी ।
प्यार, अहिंसा और सद्भावना देनी चाही
कैसी जुर्रत की तुमने गाँधी ?
कैसा था दुह्साहस ?
ऐसा ही दुह्साहस किया था यीशु
फिर यीशु से इतर तुम्हारी परिणति क्या होती?
यह अंत कितना अपूर्व है,
कितना मोहक?
क्या मौत इतनी मेहरबान होती है?
अगर ऐसी मौत मिलनी हो तो
मैं आज ही
आज ही नहीं अभी इसी क्षण मरना चाहूँगा।
मृत्यु इतनी श्लाघ्य !
मृत्यु इतनी वरेण्य !
ऐसी ही मृत्यु मुझे भी देना मेरे अंतर्यामी ।
