"हम भारत के नागरिक, लोकतंत्र में अपनी पूर्ण आस्था रखते हुए यह शपथ लेते हें कि हम अपने देश की लोकतांत्रिक परम्पराओं की मर्यादा को बनाये रखेंगे तथा स्वतन्त्र , निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण निर्वाचन की गरिमा को अक्षुण रखते हुए , निर्भीक होकर धर्म , वर्ग, जाति, समुदाय, भाषा अथवा अन्य किसी भी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना सभी निर्वाचनों में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।"
२५ जनवरी २०१२ को राष्ट्रीय मतदाता दिवस घोषित करने का उद्देश्य मतदान में नजर आ रही उदासीनता को दूर करना है । आज युवा पीढ़ी की सोच पुरानी पीढ़ी से बदल रही है। अगर हम सिर्फ विद्याथियों की सोच को देख रहे हें तो एक स्वर में सभी की मांग यही सुनाई पड़ रही है कि प्रत्याशी जाति , वर्ग, धर्म , भ्रष्टाचार और आरक्षण का पोषक न हो , उसका समर्थक न हो। विकास के लिए प्रतिबद्ध हो।
सरकार भी मतदाताओं को उनके अधिकार प्रति जागरूक बनाने के लिए कार्य कर रही है। इसके लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हें। वैसे भी भारत विश्व में सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जन जाता है और एक ऐसे लोकतंत्रीय शासन वाले राष्ट्र में मतदाता इसकी कार्यपालिका, विधायिका के सदस्यों के चुनाव के लिए एक महत्वपूर्ण अंश हें। उनका एक मत किसी को भी पराजित या विजयी बना सकता है। अपने वोट के महत्व को समझाने के लिए ही यह सब किया जा रहा है। पिछले कई चुनाव से मतदान के प्रतिशत ४० से ६० प्रतिशत से अधिक कभी भी नहीं हो सका है । इसके लिए उदासीन वर्ग सिर्फ एक कोई तबका नहीं नहीं है बल्कि इसमें प्रबुद्ध वर्ग की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पढ़े लिखे लोग चुनाव के लिए मिली छुट्टी को घर में रहकर एन्जॉय करना चाहते हें और बाहर जाकर चाहे बूथ कितने ही पास क्यों न हो पसंद नहीं करते हें। वे लोकतंत्र की सभी सुविधाओं को लेना चाहते हें। चुनाव में होने वाली धांधली कि आलोचना करेंगे लेकिन खुद अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखेंगे कि हम कितने आलोचना के पात्र हें।
इस विधान सभा चुनाव में हम आशा करते हें कि मतदान का प्रतिशत बढेगा। अगर हम मतदान नहीं करते हें तो फिर हम योग्य या फिर मनचाहे प्रतिनिधि के चुन कर आने की आशा कैसे कर सकते हें?
ऐसा नहीं मतदान के बहिष्कार की बात भी लोग कर रहे हें कि अगर सफाई और सड़क की व्यवस्था में सुधार नहीं होगा तो हम मतदान का बहिष्कार करेंगे लेकिन ये तो उनकी सबसे बड़ी भूल होगी क्योंकि उनका मतदान न करना तो किसी को भी चुनकर लाने में सहायक होगा फिर वे जो जागरूक नहीं है या फिर जो जाति धर्म वर्ग के आधार पर समर्थन दे रहे हें उनके मतदान का प्रतिशत अधिक होगा और फिर वही चुन जाएगा जो इस भावना का पोषक होगा वही लोगों को इस आधार पर भ्रमित करके अपने पक्ष में मतदान के लिए उकसा सकता है फिर वह चाहे योग्य , ईमानदार हो या फिर बेईमान या अयोग्य - आप उसको अगले पांच वर्षों के लिए ढोने के लिए बाध्य होंगे। आपको अपने मत को सही और योग्य व्यक्ति के समर्थन में देना होगा और अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी अगर मतदान के प्रति उदासीन हें तो unhen इस बारे में समझना होगा। इस वंशवाद और जातिवाद की परंपरा को हटाकर दल के समर्थन नहीं करना है बल्कि व्यक्ति का चुनाव करना है। दल का चुनाव प्रदेश को सिर्फ बर्बादी ही दे पाया है। किसी भी दल के मिट्टी के माधो को चुनने से अच्छा है कि एक योग्य व्यक्ति को चुनें। विधान सभा में उसके भी वही अधिकार होंगे जो अन्य के होंगे और अपने क्षेत्र के विकास के लिए अगर वह प्रयत्नशील होगा तो विकास भी अवश्य ही होगा।
इस मतदाता दिवस के महत्ता को समझाने की जरूरत है ये आप और हमें सबको जगाने के लिए है कि अब आने वाले सत्ताधारियों को चुनने के लिए सजग होइए और इसके चुनाव आयोग ने बहुत हद तक दलों के प्रचार और लोगों को बरगलाने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगा दिया है। दलों के घोषणा पत्रों में दिए वादों से भ्रमित मत होइए बल्कि अपने विकास की दिशा से खुद परिचित होइए और फिर अपने प्रत्याशी में अगर वे संभावनाएं दिखलाई दे रही हें तो आप अपने विवेक के अनुसार ही मतदान करें।
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बुधवार, 25 जनवरी 2012
मंगलवार, 11 जनवरी 2011
चुनाव आयोग की नजर में प्रत्याशिता !
हमारा चुनाव आयोग अपनी सीमा में रहते हुए चुनावों की शुचिता को बनाये रखने के लिए वर्षों से प्रयत्नशील है. इस दिशा में सबसे अधिक सख्त और अनुशासन के लिए टी. एन. शेषन चर्चित हुए. इसके बाद से चुनाव आयुक्तों ने इसकी शुचिता को बनाये रखने में अपना प्रयास जारी रखा. हर बार चुनाव में सीमाओं को ऐसे निर्धारित किया जाने लगा की लोकतंत्र की अपेक्षाओं पर प्रश्न चिह्न कम लगें.
वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने जो सुझाव प्रस्तुत किया है - वह जन सामान्य की इच्छा को एक अधिकृत व्यक्ति द्वारा सामने लाया गया है और उनकी बात मायने रखती है. राजनीति का अपराधीकरण पूर्णतया हो चुका है, यह था तो वर्षों से किन्तु जो स्वरूप आज सामने आ रहा है - वह इतने खुले रूप में पहले न था. अपराधियों को टिकट सिर्फ इस आधार पर दल के द्वारा दिया जाता है कि अभी अपराध साबित नहीं हुआ है और सत्ता में आने के बाद उसको साबित होना भी नहीं है. ऐसे लोगों को शरण देने वाले दल खुद प्रश्न-चिह्न के लायक बन जाते हैं किन्तु वे सशक्त दल है और संसद में उनकी छवि भी बहुत सशक्त होने की है. फिर कौन बोल सकता है? उनके लंबित मामले हमेशा ही लंबित रहेंगे. कितने अमरमणि त्रिपाठी संसद में भी बैठे होंगे लेकिन उन तक पहुंचना आसान नहीं है.
प्रमुख चुनाव आयुक्त ने कोलकाता में एक वक्तव्य में कहा - 'यह विडम्बना है कि जेल में बंद व्यक्ति मुकदमा लंबित रहने के दौरान चुनाव लड़ने के आजाद है जबकि वह मतदान का हक़दार नहीं है. किसी को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं बल्कि संसद को है. मौजूदा क़ानून के तहत दोष साबित होने पर ही व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जा सकता है. गंभीर आरोपों का सामना कर रहे लोगों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर करने के लिए तत्काल कदम उठाये जाने चाहिए. '
'हत्या, बलात्कार, जबरन उगाही सरीखे आरोपों का सामना कर रहे लोगों को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए. '
देश का हर नागरिक राजनीति को साफ सुथरा देखना चाहता है और इसको साफ सुथरा बनाये बिना देश की प्रगति की आशा करना निरर्थक ही है. संसद अपनी गरिमा को बनाये रखने के लिए स्वस्थ मानसिकता , चरित्रवान और सुसंस्कृत सदस्यों की अपेक्षा करती है. स्वयं संसद को इस दिशा में पहल करनी चाहिए, भले ही अनुभवी कहे जाने वाले दागी सांसदों को तिलांजलि देनी पड़े. आज जो पौध लगाई जायेगी वह कल परिपक्व होगी और देश की बागडोर संभाल कर इसके स्वरूप को अधिक विकसित और खुशहाल बनाये रखने में सक्षम होगी.
राजनैतिक दलों के साए तले अपराधियों को शरण क्यों मिलती है? क्योंकि चुनाव परिणामों का निर्णय बन्दूक कि नोक पर ऐसे ही लोग किया करते हैं. वे मतदाता जो अभी तक चुनाव और मतदान के अधिकारों से अनभिज्ञ है - वे ऐसे ही लोगों के द्वारा कभी धमाका कर, कभी लालच देकर और कभी बरगला कर भ्रमित किये जाते हैं. तभी तो छोटे स्तर के चुनाव में कलंकित इतिहास वाले भी निर्विरोध चुन लिए जाते हैं. १८ वर्ष के अपरिपक्व युवा कभी नौकरी के लालच में, कभी छात्रवृत्ति के लालच में और कभी घर के लालच में बगैर ये जाने कि उनके मत का मूल्य क्या है? दे आते हैं और इसमें भी प्रलोभन देने वाले दल स्वच्छ छवि वाले तो नहीं ही हो सकते हैं. अब ऐसे कानूनों की सख्त आवश्यकता है कि गंभीर अपराधों में वांछित व्यक्ति चुनाव में प्रत्याशिता से वंचित कर दिए जाएँ.
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