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गुरुवार, 19 मई 2011

"आरक्षण" में दलित !




"आरक्षण " फ़िल्म में सैफ अली खां ने एक दलित के किरदार को निभाया है और उनके इस चरित्र कोनिभाने के लिए उत्तर भारत के दलितों ने विरोध किया कि एक शाही परिवार का इंसान दलित के बारे में क्याजानता है."
ये तो बही हुआ कि अगर फिल्मों में कोई तवायफ का किरदार निभाता है तो उसके लिए उसका तवायफ होना जरूरी है। ये तो हुआ अपने लेबल को भुनाने वाली बात। दलित भी इंसान है और ये कोई जन्मजात उपाधि नहीं है, इसको अगर अर्थ में देखा जाय तो यही कहना है की जो आर्थिक रूप से निम्न स्थिति में जी रहे हैं वेदलित है न कि जाति के आधार पर एक प्रशासनिक अधिकारी भी अपने को दलित कहते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी अपनेजन्म को भुनाता रहे।
कुछ दिन पहले यही बात उ प्र की मुख्यमंत्री ने भी उठाई थी कि अन्ना की समिति में कोई दलित नहींहै और अब ये बात फ़िल्म में भी उठने लगी है। मैं पूछती हूँ कि सरकारें जब दलितों के लिए आरक्षण की सीमाबढाती है या फिर उनके हित के लिए सोचती है तो क्या सारे सोचने वाले दलित ही होते हैं? अगर नहीं तो फिर उससमय चुप क्यों रहते हैं? तथाकथित दलित जो आज उच्च पदों पर काबिज हैं क्या कभी उन लोगों ने ये सोचा हैकी हम आज सक्षम हो चुके हैं और अपने परिवार को भी सक्षम बनाने में समर्थ हैं तो अपने को आरक्षण की सीमासे अलग करते हुए उनको अवसर दें जो की गाँव में रह रहे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है अगर उनका एक बेटा याबेटी इससे लाभान्वित होते हुए कुछ बन सका तो एक दलित परिवार अपने को समाज में सम्मान से खड़ा करनेलायक हो सकेगा।
दलित विधायक , सांसद कितने प्रयत्नशील हैं कि वे गाँव में रहने वाले दलितों के लिए कुछ कर सकें। हाँअगर मौका मिला तो जरूर ही वे उन सुविधाओं को अपने घर वालों के नाम कर देंगे। ये दलितों की जंग तब तकचलती रहेगी जब तक की इसको पुनर्परिभाषित करके इसका आधार सामाजिक और आर्थिक न बना दियाजायेगा। दलितों की स्थिति में सामान्य वर्ग के लोग जी रहे हैं लेकिन वे जन्म से तो ब्रामण या वैश्य बन कर आयेहैं तो वे दलित हो ही नहीं सकते हैं भले ही वे किसी के घर में झाडू , पौंछा और बर्तन साफ कर रहे हों। वे लोग जोरिक्शा खींच रहे हैं, जो बोझा ढो रहे हैं या फिर मजदूरी कर रहे हैं - उनके लिए क्या परिभाषा है? वे दलित नहीं हैक्योंकि जन्म तो उन्होंने किसी उच्च कही जाने वाली जाति में लिया है न। उनके बच्चे कहाँ से पढ़ें? पेट की रोटियोंका ठिकाना नहीं है, उन्हें कोई सुविधा नहीं मिल सकती है क्योंकि ये दलित का लेबल जो खड़ा है मुँह बाए उसे वेकहाँ से लायेंगे? फिर कैसा सुधार और कैसी प्रगति? वे तो पीढ़ियों तक ऐसे ही जियेंगे।
ये दलित का तमगा क़ानून की नजर में भी वजन रखता है क्योंकि अभी हाल ही में उ प्र में हुए शशिहत्याकांड में तीन अभियुक्तों में एक दलित हैं "सीमा आज़ाद" । उनके जुरमाना में कमी कर दी गयी क्योंकि वेदलित हैं। क्या न्याय और क़ानून की नजर में भी अपराध का भार जाति और जन्म से कम हो जाता है। ये अपराधमें छूट किस लोकतंत्र की ओर इशारा करता है ? वाह रे हमारे कानून, लाभ की स्थिति में भी लाभ इस से अच्छाऔर क्या हो सकता है ? पहले तो उत्पीड़न की एक छड़ी थमा दी गयी जिससे वाकई उत्पीडित तो लाभ नहीं ले पाएऔरों ने इसे हथियार बना कर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और खूब किया और किया जा रहा है। क़ानून औरदंड भी जन्म से जुड़ गए तो फिर न्याय कैसा रह जायेगा? फिर अब तो सिया भये कोतवाल अब डर काहे का। पहले तो राजनीति में जुड़े हैं तो अपराध सिद्ध ही नहीं होगा और अगर हो भी गया तो फिर क्या? अधिक से अधिकपार्टी से निकाल दिए जायेंगे। फिर वही से चुनाव लड़ लेंगे सुरक्षित सीट से और जीत कर राजा बेटा। अगली पीढ़ीतक पेंशन तो मिलती ही रहेगी। हम जेल गए भी तब भी बाल बच्चों को रोटी का धोखा तो नहीं रहेगा।
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