

डॉ डंडा लखनवी:
घटना सन १९६० की है। उस समय मेरी आयु लगभग दस वर्ष की थी। प्रायः इस आयु में बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति के कारण वे संसार को अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जानना , समझना और परखना चाहते हैं। इससे उनका अनुभव बढ़ता है और जिज्ञासाएं शांत हो जाती हैं। प्रयोग करके सीखने की प्रवृत्ति अन्य बच्चों की तरह मेरे मन में भी थी। उन दिनों लखनऊ में मलेरिया का प्रकोप फैला और घर में कई लोग ज्वर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने सलाह दी कि रोगियों का बुखार नाप कर उसके बारे में उसको बताया जाय। इसी लिए पिताजी एक अच्छा सा थर्मामीटर खरीद कर घर लाये। उसे मुख में डाल कर शरीर का ताप नापा गया। मैंने ताप नापने की क्रिया को बड़े ध्यान से देखा। मेरे बाल मन में जिसे देख कर एक कौतूहल जाग उठा कि इससे शरीर के ताप की तरह दीपक की लौ का ताप भी नापा जा सकता है। अतः दीपक की लौ का ताप नापने की इच्छा मन में घर कर गयी। उपचार के बाद थर्मामीटर घर के अन्य सामानों की तरह से सभाल कर रख दिया गया। इसी बीच गर्मियों की छुट्टियाँ आ गयी और एक दिन दोपहर में जब घर के अन्य सदस्य आराम कर रहे थे। मैंने चुपके से थर्मामीटर निकला , एक मोमबत्ती जलाई और उसकी लौ से थर्मामीटर स्पर्श करवा दिया। थर्मामीटर चट की आवाज के साथ तुरंत टूट गया। मैं इस परिणाम से बेखबर था। अतः जो होना था सो हो ही गया। उसके अन्दर भरा हुआ पारा ओस की बूंदों की तरह से फर्श पर बिखर गया। मैं ज्यों ज्यों उन्हें समेटने का प्रयास करता वे त्यों त्यों और छोटे छोटे कणों में बिखरती चली गयीं। मेरा समेटने का प्रयास व्यर्थ चला गया। इस प्रयोग से मैं हक्का बक्का रह गया। इस घटना की जानकारी जब पिताजी को हुई तो बड़ी डांट पड़ी थी।
उस घटना से मुझे ये सबक मिला की प्रयोग से पहले सावधानियों की पूरी जानकारी पहले से कर लेनी चाहिए।
