माँ सिर्फ जन्म ही नहीं देती है , वह एक मानव को तन , मन दोनों से गढ़ती है। वह संस्कार देती है और हम उसको ग्रहण करते हैं, कितना करते हैं ये हमारे जीवन में परिलक्षित होता है। कोई भूल नहीं पाता है उसको जीवन के शेष काल में और कोई उसके जीते जी त्याग देता है। जिन्होंने माँ को खो कर भी अपने में समेट लिया है वे हैं नासवा जी - माँ के चले जाने से लेकर आज तक न जाने कितनी रचनाएँ गढ़ ली हैं माँ पर ,फिर भी अभी शेष हैं। आज की प्रस्तुति -- दिगंबर नासवा जी !
यकीनन तू मेरी यादों में अम्मा मुस्कुराती है
तभी तो खुद ब खुद होठों पे ये मुस्कान आती है
दिगंबर नाम की पहचान तेरी देन है फिर भी
सफेदी आ गई तू आज भी लल्ला बुलाती है
में घर से जब निकलता हूँ बड़े ही प्यार से मुझको
लगे कोई नज़र ना आज भी काजल लगाती है
बुरी आदत कभी जो देख लेती है मेरे अंदर
नहीं तू डांटने से आज भी फिर हिचकिचाती है
कभी बचपन में मैं कमजोर था पर आज भी अम्मा
फकीरों की मजारों पर मुझे माथा टिकाती है
रफ़ी आशा लता गीता सुरैया या तलत सहगल
पुराने गीत हों तो साथ अम्मा गुनगुनाती है
बढा कर हाथ अपना थाम लेती है तु चुपके से
मेरी कश्ती भंवर में जब कभी भी डगमगाती है
यकीनन तू मेरी यादों में अम्मा मुस्कुराती है
तभी तो खुद ब खुद होठों पे ये मुस्कान आती है
दिगंबर नाम की पहचान तेरी देन है फिर भी
सफेदी आ गई तू आज भी लल्ला बुलाती है
में घर से जब निकलता हूँ बड़े ही प्यार से मुझको
लगे कोई नज़र ना आज भी काजल लगाती है
बुरी आदत कभी जो देख लेती है मेरे अंदर
नहीं तू डांटने से आज भी फिर हिचकिचाती है
कभी बचपन में मैं कमजोर था पर आज भी अम्मा
फकीरों की मजारों पर मुझे माथा टिकाती है
रफ़ी आशा लता गीता सुरैया या तलत सहगल
पुराने गीत हों तो साथ अम्मा गुनगुनाती है
बढा कर हाथ अपना थाम लेती है तु चुपके से
मेरी कश्ती भंवर में जब कभी भी डगमगाती है

