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शुक्रवार, 16 मार्च 2012

इसके लिए हम जिम्मेदार !






हम किसके लिए जिम्मेदार हैं ये हमें पता होना चाहिए लेकिन हम अपनी जिम्मेदारियों से दो चार कब होते हैं और जिम्मेदार होकर भी उन्हें समझते कब है? ये रोज की घटनाएँ हैं जो हमारे सामने आती हैं, वे कुछ प्रतिशत ही होती है क्योंकि जो इसके शिकार हो रहे हें उनमें आवाज उठाने की ताकत ही नहीं है और उनकी आवाज गले में ही घुट कर रह जाती है।
आज हमारे देश में सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों गाँव ऐसे हें जहाँ शौचालयों की व्यवस्था नहीं है और घर की बहू बेटियाँ इसके लिए गाँव के बाहर खेतों में जाने के लिए मजबूर होती हैं । वे अपनी इज्जत और शर्म के कारण इस कार्य के लिए मुँह अँधेरे ही घर से निकल जाती है , कभी वे दो चार के समूह में होती हें और कभी अकेले ही। बीमारी की हालात में या फिर समय असमय भी जाने के लिए मजबूर हो जाती हें। (वैसे शहर भी इसके अपवाद नहीं है, कानपुर शहर की ही बात करती हूँ कि यहाँ पर सुबह मोर्निंग वॉक पर जाते समय खुले प्लाटों में, अधबने मकानों में या फिर पार्कों में महिलायें और पुरुषों को दैनिक क्रिया से निवृत्त होते हुए देखा जा सकता है ) लेकिन गाँव में तो ये आम बात है , और उससे अधिक आम बात है कि वहाँ के बिगड़े हुए, दबंग और आवारा लड़कों को जिनके पास कोई काम नहीं होता है या फिर वे मानसिक तौर पर बीमार ही कहें जायेंगे ऐसे मौके की तलाश में रहते हैं कि कोई अकेली लड़की उनको मिल जाए तो वे अपनी हवस पूरी करने में नहीं चूकते हें। उसके बाद मुँह बंद रखने की धमकी, उनके खिलाफ सर उठाने की किसी में हिम्मत नहीं होती है क्योंकि उनकी जड़ें कहीं ओहदेदार या फिर रसूख वाले लोगों से जुड़ी होती हैं. उन्हें पता होता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता है। कभी कभी ऐसी खबरे अखबार में दिखाई दे जाती हैं कि 'शौच जाते समय युवती दुराचार का शिकार " या "खेत में अकेला पाकर दुराचार का शिकार" कई बार तो ऐसा भी होता है कि नाबालिग लड़कियाँ भी शिकार बना ली जाती हें। यहाँ उम्र का कोई बंधन नहीं होता सिर्फ उसको स्त्री होना चाहिए। वे स्त्रियाँ जो आवाज उठाना ही नहीं जानती हैं और अगर किसी ने साहस किया भी तो उसे घर वालों के जीवन का वास्ता देकर उनको गूंगा बनाने पर मजबूर कर दिया जाता है। किसी तरह से अगर पुलिस तक पहुँच भी गयी तो पुलिस ही उनको टकरा देगी या फिर उन दबंगों के दबाव में उल्टा उन्हें फंसाने की धमकी देकर बिठा देगी।
महज नित्य क्रिया के लिए जाने के लिए औरत की अस्मत हमेशा ही खतरे में रहती है। हमारी सरकार विकास के नाम पर लम्बे चौड़े इस्तहार और अखबारों में विज्ञापन छपवाती रहती है, लेकिन इस दिशा में शायद सरकार की सोच पहुँच ही नहीं पाती है। जो सांसद या विधायक चुने जाते हें उनको चुनती तो ये महिलायें भी हें लेकिन कभी किसी भी गाँव में किसी भी मंत्री या नेता ने एक भी महिला सुलभ शौचालय बनवाने की बात सोची है या प्रयास किया गया है। इसकी चिंता किसे है क्यों कि गाँव की राजनीति के ये कर्णधार ही तो ऐसे काम करके प्रकाश में आते हें और फिर बनते हें पार्टी के दायाँ हाथ। महिला और बाल विकास आयोग क्या करता है? कभी ऐसी दैनिक और अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए सुविधा उपलब्ध कराये जाने पर सोचा गया है। दूर हम क्यों जाएँ? गाँव में स्थानीय प्रशासन के हाथ में कुछ अधिकार होते हें और ये भी अपने विवेक से खर्च करने वाली निधि भी उनके हाथ में होती है. लेकिन क्या कभी किसी भी गाँव में ऐसा सोचा गया है कि वहाँ पर महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय की व्यवस्था की गयी है। गाँव का निर्धन वर्ग ये सुविधा अपने आप से नहीं प्राप्त कर पाता है तो फिर उसे पूरा करवाने का काम स्थानीय शासन का होता है।
गाँवों में ऐसी व्यवस्था न होने के कारण ही वहाँ पर कितने बलात्कारों का कारण बनती ये हमारी कमी और कितने ऐसे बलात्कारों को रोका जा सकता है। ग्राम पंचायतों के द्वारा इन घटनाओं को रोका जा सकता है. अगर वे आगे बढ़कर इस तरह की व्यवस्था कर सकें। वे इस कार्य में सक्षम है और ऐसा करवाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं । आजादी के इतने दिन बाद भी अगर हम अपने देश के नागरिकों को उनके दैनिक क्रियाओं के लिए सुविधा न जुटा सके तो इससे बड़ी लानत कुछ नहीं है और उससे बड़ी लानत ये हें कि हम ऐसी घटनाओं के जिम्मेदार भी होंगे।