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शनिवार, 4 जून 2011

गर्मियों की छुट्टियाँ और अपना बचपन (९)




मुकेश कुमार सिन्हा :


एक
तो बचपन ...उसमे भी गर्मी के छुट्टियों के दिन....!! कितना अनोखा दिन हुआ करता था...!!
मेरा वो बचपन जो मुझे याद है, बिहार में बेगुसराय जिला के जिनेदपुर गाँव में ..... मेरी मैया के पल्लू के तले बीता .....मैया मैं अपने माँ को नहीं अपनी दादी को कहता था...और वो मेरे लिए माँ से बढ़ कर थी..! मम्मी पापा के साथ रहने पे भी ...मेरा बचपन मैया के सान्निध्य में ही गुजरा....जो भी कठिनाई हो, जो भी अच्छी बात हुई हो....सब उसके साथ ही साझा किया, उसके साडी में छिप कर...जो भी नखरे करने थे...यहाँ तक की मम्मी पापा ने धुलाई की तो उनको डांट भी दिलवाई...!!!
बचपन की वो गर्मी की छुट्टियों के दिन...........एक वाकया याद है...मेरी उम्र १०-११ साल की थी, एक तो हमारी गरीबी कुछ जायदा ही सर चढ़ कर बोल रही थी...दादाजी सरकारी सेवक रहे थे...पर पापा जायदा कुछ नहीं कर पाए..और हमारी जिंदगी बस ऐसे ही भागी जा रही थी...पापा ने एक छोटी से परचून की दुकान खोली थी...और मेरी शाम वहां गुजरती थी...क्योंकि मैं अपने छः भाई बहनों में सबसे बड़ा था....तो काहे का बचपन...इतना तो बनता है....:(....बेशक हम जैसे भी थे...हमारे रिश्तेदार बेहद अमीर हुआ करते थे...और उनमे से कुछ गर्मी की छुट्टियों में जरुर गाँव आते थे....उस बार मेरे दूर के चाचा के यहाँ पुरे बच्चो की टोली आयी थी....मेरा भी दिन खूब मजे से कट रहा था...उस दिन दोपहर के बाद दुकान में बैठा था....अधिकतर सामानों के दाम का पता होता था...पर एक डब्बे में "किशमिश" करीब एक किलो था....और मुझे ये पता ही नहीं था....ये और वस्तुओं के तुलना में कुछ महंगा होता है....तो चाचा के यहाँ से एक बच्चा एक रूपये का किशमिश लेने आया....मेरे को लगा कम से कम १०० ग्राम तो होंगे ही...मैंने तुरंत बिना सोचे समझे १०० ग्राम किसमिस दे दिया उसे......ओह!! फिर तो लाइन लग गयी......एक घंटे के अन्दर वो ८ बच्चे पहुच गए...जो चाचा के यहाँ आये थे...मैंने भी पूरा डब्बा ख़त्म कर डाला...उफ़!! शाम में पापा जब सामान लेकर दुकान पहुचे और जैसे ही उन्हें पता चला की ये कर डाला मैंने.....ओये होए...फिर तो मेरे पे दुकान पे ही जुल्म शुरू हो गया....वो पिटाई पड़ी की क्या बोलूं...अब बताओ मेरी क्या गलती थी....!! उस दिन के बाद पापा ने हर सामान पे एक चिट लगाई और दाम लिख कर जाने लगे...:D

एक और बात, दुकान में बैठता था...तो इतना तो पता चल गया था की पैसा क्या होता है..तो कुछ पैसे अपने जेब में डालने की आदत भी हो गयी थी...ये अलग बात है, वो ५० पैसे से जायदा कभी नहीं हुआ...तो सामान्यतः हर दिन ५० पैसे तो मुझे मजदूरी समझ कर मिल ही जाते है.....बिना पापा को बताये...!! मुझे न तो कंचा खेलना आता था और न ही पतंग उड़ना आता था..पर शौक बहुत था...और मेरे इस शौक को पूरा करता था मेरा अभिन्न दोस्त अश्वनी...!! याद है मुझे मैं उन चोरी के पैसो से कंचे और पतंग खरीद कर उसको देता ...और उसके पीछे दौड़ते रहता.......क्रिकेट का भी शौक था...पर खेलने से जायदा स्कोरिंग करने मुझे मिलता ...क्योंकि मेरे खेल से बेहतर मेरी लिखावट थी....:)


यादें तो बहुत हैं....फिर कभी बताऊंगा....!!

तो ये कुछ लम्हे थे, जो उस समय तो परेशान करते थे, लेकिन आज , आन्तरिक ख़ुशी देते हैं...अच्छा लगता है ...!!

प्रवीण त्रिवेदी:










अध्यापक
पिता की संतान की गर्मियों की छुट्टियाँ कैसी बीत सकती होंगी .....शायद आप सब को समझने में ज्यादा मुश्किल ना हों |
जैसे ही छुट्टियाँ हुई नहीं कि दूसरे या तीसरे दिन ही अगली कक्षा का किताबों का ढेर हाजिर .....सोचता कब और कैसे मुक्ति मिल सकती मुझे ?
कुछ दिनों पहले ही हम लोगों की पढ़ाई के नाम पर ही तो परिवार को शहर में लाया गया था .....तो उस कर्म से बचने का तो कोई जुगाड़ था ही नहीं |
हम दो भाई-बहन के बीच उम्र का अंतर करीब दो -ढाई वर्ष का होगा .....जिसे अक्सर मैं भूल कर शैतानियां करता ......और माँ बाप की डांट खाता
और ...खेलने का समय भी तभी ......जब पिता का रौबीला चेहरा घर से बाहर ही हो |....जैसे ही आहट होती पिता के आने की तो .......इस डर से कि कहीं पापा यह ना सोंच लें कि अब तक उनके ना रहने में कहीं घूम ही ना रहे हों .....फिर जम जाते पढ़ने की मेज पर |


आज जब गर्मियों की छुट्टियों में जब किसी बच्चे को बाहर जाते देखता हूँ ....तो अचरज ही होता है कि ऐसा भी होता था क्या ? पिता का मानना यह था कि बच्चे रिश्तेदारी (विशेषकर मामा के गावं ....मतलब ममाने ) में जाकर बिगड जाते हैं ....और ढीठ हो जाते हैं .....तो कभी ऐसा उस समय आया भी नहीं ....और कभी सोचा भी नहीं तो बहुत अफ़सोस भी नहीं हुआ .....ज्यादा से ज्यादा गए तो अपने पैत्रक गाँव जाते ......घूमते और आम खाते ........आम खाना ही तो एक उद्देश्य होता था ......और सच कहूँ तो आम खाना मुझे बहुत पसंद भी था|...उस समय हम दो बहन भाई और माता पिता के साथ मेरी छोटी मौसी भी रहती थी ........जिनके साथ हम बिलकुल दोस्ताना और लड़ाकू अंदाज में हमेशा पेश आते ......और वह हमारे ऊपर हमेशा माँ की नजर से नजर रखती |
तो भैये ...रेखा जी की मदद से आप इत्ता तो जान ही गएँ होंगे कि इस प्राइमरी के मास्टर में अपनी गर्मियों की छुट्टियाँ केवल पढ़ाई और आम और अपने गाँव के चक्कर में ही बिताई हैं |.....हो रहा है आप को अचरज .....अरे भैये ऐसा भी हो सकता है ........और शायद हुआ भी हो ?