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रविवार, 18 मई 2014

माँ तुझे सलाम ! (६)


मुकेश कुमार सिन्हा    





वैसे तो मम्मी पापा का सान्निध्य मुझे अब तक मिल रहा है, और ता-जिंदगी उनका प्यार प्राप्त हो, ऐसी ही उम्मीद है । पर जब भी माँ की बात होती है तो मुझे समय नजर के सामने मुझे मेरी मैया नजर आती है। मैंने शायद अपने पहले शब्द मे मैया का ही उच्चारण ही किया था, मैया मेरी दादी थी। सच कहूँ तो मैया ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो मैंने उसके त्याग, आदर्श या उसकी दी हुई शिक्षा के लिए याद करूँ। पर फिर भी मेरे लिए मेरी मैया का प्यार अविस्मरणीय था, उसकी वो छोड़ी हुई ग्लास में चाय का सुगंध अब तक महसूसता हूँ । उसका प्यार मेरे लिए ता-जिंदगी मेरी थाती है, जो उसके जाने के बावजूद मेरे लिए बहुत कुछ है, जो मेरे हर शब्द मे झलकता है। उसकी की हुई बहुत सी छोटी छोटी बातें, जो अहम थी, जो मुझे इंसान बनाती है, मैंने कविताओं मे कई बार लिखी है। ये एक कविता उसके लिए ......
मैया !! मैं बड़ा हो गया हूँ.
इसलिए बता रहा हूँ
क्यूंकि तू तो बस
हर समय फिक्रमंद ही रहेगी....
.
याद है तुझे 
मैं देगची में 
तीन पाव दूध लेकर आया था
चमरू यादव के घर से
..... पर मैंने बताया नहीं था
कितना छलका था
लेकिन तेरी आँखे छलक गयी थी
तुमने बलिहारी ली थी
मेरे बड़े होने का...
.
एक और बात बताऊँ
जब तुमने कहा था
सत्यनारायण कथा है
..राजो महतो के दुकान से
गुड लाना आधा सेर...
लाने पर तुमने बलाएँ ली थी
बताया था पत्थर के भगवान को भी
गुड "मुक्कू" लाया है !!
पर तुम्हें कहाँ पता
मैं बहुत सारा गुड
खा चूका था रस्ते में
पर बड़ा तो हो गया हूँ न....!

मैया याद है ...
मेरी पहली सफारी सूट
बनाने के लिए तुमने
किया था झगडा, बाबा से
पुरे घर में सिर्फ
मैंने पहना था नया कपडा
उस शादी में...
पर मुझे तो तब भी बाबा ही बुरे लगे थे
उस दिन भी
आखिर बड़े होने पर फुल पेंट जरुरी है न...
.
मैया मैं जब भी
रोता, हँसता, जागता, उठता
खेलता पढता
तेरे गोद में सर रख देता
और तू गुस्से से कहती
कब बड़ा होगा रे.....
अब तू नहीं है !!!
पर मैं सच्ची में बड़ा हो गया...
मेरा मन कहता है
एक बार तू मेरे
गोद में सर रख के देख
एक बार मेरी बच्ची बन कर देख
मेरी बलिहारी वाली आँखों में झांक
कर तो देख..
देखेगी.............??????

(मैया बाबा... मेरे माँ-पापा नहीं मेरे दादा-दादी थे, और मुक्कू ..मैं !!!)

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (८)

मुकेश कुमार सिन्हा

रास्ते जिन्दगी के सुगम तो नहीं होते लेकिन कभी वो सिर्फ कांटे ही कांटे दिखलाता है और कभी डूब से भरी जमीन सुखद अहसास लिए होता है और कभी उससे उतरते ही काँटों की चुभन भी अनुभव होती है। फिर भी हम जीते हें और हर पल को उतनी ही शिद्दत से जीते हें। ऐसे पलों से दो चार होते रहे मुकेश कुमार सिन्हा के अनुभव प्रस्तुत हें


जिंदगी के सफ़र में आगे बढ़ते गए, बहुत सारी रुकावट आयी.....सिर्फ आयी ही नहीं, आज भी साथ ही है......संघर्ष! देखा ही नहीं, अनुभव किया... जिंदगी के हर पल.. !! रेखा दी ने कहा, अपने कुछ उस खास पल के लिए लिखो जिसको तुम समझते हो, उस रुकावट को तुम्हें बहुत बेहतर ढंग से पार किया हो, पर शायद मुझे ऐसा कुछ नहीं दिख रहा जो लगे कि सिर्फ इस पल में मैंने जिंदगी को जलते देखा हो, सच कहता हूँ.. आज तक ऐसा कभी भी नहीं आया, जब मुझे लगा हो............. क्या मस्त जिंदगी है.... हर कुछ दिनों बाद कुछ न कुछ बड़ी सी कठिनाई मुह बाये खड़ी हो जाती है... बेशक ये अलग बात है, उस से लड़ने कि आदमी इच्छा कहूँ या भगवान कि दी हुई ताकत... जो कठिनाई आते ही अपने आप उड़ भी जाती है ... मुझे नहीं लगता ये कभी कम होगा.... ये आगे भी जारी रहेगा ...

पर अगर पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है , बहुत कुछ पाया मैंने... ये अलग बात है कि वो जो पाया वो अपने परिवार और दोस्तों का सिर्फ प्यार है..!
शुरू की जिंदगी खुबसूरत थी, मेरा बचपन अपने दादा दादी के प्यार में पला बढ़ा, वो सरकारी मुलाजिम थे, और अपने साथ ही मुझे रखा, मैंने दादी में ही माँ को पाया, उसको मैया कहता था... फिर धीरे धीरे बचपन से आगे बढे... छः भाई बहनों में सबसे बड़ा हूँ, और मेरे पिताजी के पास कोई खास नौकरी भी नहीं ...जो थी वो भी बराबर बदलती रही... मेट्रिक के बाद से ही मैं आर्थिक रूप से खुद पे निर्भर रहा, पहले टूयुशन, प्राइवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य, फिर दुकानदारी, एक छोटी सी फैक्ट्री में उनके account का काम, medical representative , insurance consultant , नॉन-बैंकिंग सहारा इंडिया में मैंने लगातार दस साल तक field जॉब में रहा....... सामान्यतः एक माध्यम वर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग आर्थिक बदहाली के कारण सिर्फ अय्यासी वाली जिंदगी जी नहीं पाते, पर हमने अपने आर्थिक बदहाली के कारण जीने कि सबसे अहम् जरुरत खाना में कमी भी देखा है.... फिर आदमी जब मुश्किल हालातों से गुजरता है तो धीरे धीरे उसकी आदत हो जाती है... ......... और जब आदत होने लगी तो अंत में नौकरी मिल गयी...:)
फिर एक एक छोटे से शहर का छोरा दिल्ली पहुँच गया...और सबसे पहले पोस्टिंग मिली अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्री कार्यालय में ..फिर मनमोहन सिंह के साथ. उनके मातहत में रहे... फिर कृषि मंत्रालय में स्थानांतरण हुआ और फिर अब ..कृषि राज्य मंत्री के साथ सम्बद्ध है...| धीरे धीरे जिंदगी संवरती गयी... पर कठिनाइयों से मेरा चोली दामन का सम्बन्ध रहा... शादी करके आये तो सोचा तो ... बहुत सारी खुशियाँ देंगे.. पर कुछ दिनों में अक्ल ठिकाने आ गए, किराये के मकान में जब बेड तक नहीं था... मुझे याद है, हम उस समय टी.वी. लेना चाहते थे.. पर दूकानदार consumer loan देने को तैयार नहीं था, क्योंकि मेरी पोस्टिंग प्रधानमंत्री कार्यालय में थी, उन्हें लगता था.. हम नहीं लौटाए तो वो क्या कर लेंगे...!!, फिर जिंदगी पटरे में आने लगी तो मेरे से दस साल छोटे भाई का दोनों किडनी ख़राब हो गया... ! उसके लिए transplant अब कैसे और किस तरह हुआ ये अलग बात है..| fir अपनी दीदी को अपने सामने आँख मूंदते हुए देखा... अनुभव किया.... | २०१० में अपने शादी के वर्षगांठ के दिन ही अपने हाथ और पैर दोनों तुडवा लिए.. !! अब आप ही बताओ, कैसे कहूँ कि कोई खास पल था, जब मैंने कठिनाई के सबसे उच्च स्तर को झेला हो... .. और भी बहुत सारी रुकावटें आयी, और आज भी कुछ न कुछ लगा रहता है... पर जिंदगी है तो दर्द है... और दर्द को दूर करने कि कोशिश भी जारी है.......


जिंदगी के सफ़र में आगे बढ़ते गए, बहुत सारी रुकावट आयी.....सिर्फ आयी ही नहीं, आज भी साथ ही है......संघर्ष! देखा ही नहीं, अनुभव किया... जिंदगी के हर पल.. !! रेखा दी ने कहा, अपने कुछ उस खास पल के लिए लिखो जिसको तुम समझते हो, उस रुकावट को तुम्हें बहुत बेहतर ढंग से पार किया हो, पर शायद मुझे ऐसा कुछ नहीं दिख रहा जो लगे कि सिर्फ इस पल में मैंने जिंदगी को जलते देखा हो, सच कहता हूँ.. आज तक ऐसा कभी भी नहीं आया, जब मुझे लगा हो............. क्या मस्त जिंदगी है.... हर कुछ दिनों बाद कुछ न कुछ बड़ी सी कठिनाई मुह बाये खड़ी हो जाती है... बेशक ये अलग बात है, उस से लड़ने कि आदमी इच्छा कहूँ या भगवान कि दी हुई ताकत... जो कठिनाई आते ही अपने आप उड़ भी जाती है ... मुझे नहीं लगता ये कभी कम होगा.... ये आगे भी जारी रहेगा ...

पर अगर पीछे मुड़ के देखता हूँ तो लगता है , बहुत कुछ पाया मैंने... ये अलग बात है कि वो जो पाया वो अपने परिवार और दोस्तों का सिर्फ प्यार है..!
शुरू की जिंदगी खुबसूरत थी, मेरा बचपन अपने दादा दादी के प्यार में पला बढ़ा, वो सरकारी मुलाजिम थे, और अपने साथ ही मुझे रखा, मैंने दादी में ही माँ को पाया, उसको मैया कहता था... फिर धीरे धीरे बचपन से आगे बढे... छः भाई बहनों में सबसे बड़ा हूँ, और मेरे पिताजी के पास कोई खास नौकरी भी नहीं ...जो थी वो भी बराबर बदलती रही... मेट्रिक के बाद से ही मैं आर्थिक रूप से खुद पे निर्भर रहा, पहले टूयुशन, प्राइवेट स्कूल में अध्यापन का कार्य, फिर दुकानदारी, एक छोटी सी फैक्ट्री में उनके account का काम, medical representative , insurance consultant , नॉन-बैंकिंग सहारा इंडिया में मैंने लगातार दस साल तक field जॉब में रहा....... सामान्यतः एक माध्यम वर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने वाले लोग आर्थिक बदहाली के कारण सिर्फ अय्यासी वाली जिंदगी जी नहीं पाते, पर हमने अपने आर्थिक बदहाली के कारण जीने कि सबसे अहम् जरुरत खाना में कमी भी देखा है.... फिर आदमी जब मुश्किल हालातों से गुजरता है तो धीरे धीरे उसकी आदत हो जाती है... ......... और जब आदत होने लगी तो अंत में नौकरी मिल गयी...:)
फिर एक एक छोटे से शहर का छोरा दिल्ली पहुँच गया...और सबसे पहले पोस्टिंग मिली अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्री कार्यालय में ..फिर मनमोहन सिंह के साथ. उनके मातहत में रहे... फिर कृषि मंत्रालय में स्थानांतरण हुआ और फिर अब ..कृषि राज्य मंत्री के साथ सम्बद्ध है...| धीरे धीरे जिंदगी संवरती गयी... पर कठिनाइयों से मेरा चोली दामन का सम्बन्ध रहा... शादी करके आये तो सोचा तो ... बहुत सारी खुशियाँ देंगे.. पर कुछ दिनों में अक्ल ठिकाने आ गए, किराये के मकान में जब बेड तक नहीं था... मुझे याद है, हम उस समय टी.वी. लेना चाहते थे.. पर दूकानदार consumer loan देने को तैयार नहीं था, क्योंकि मेरी पोस्टिंग प्रधानमंत्री कार्यालय में थी, उन्हें लगता था.. हम नहीं लौटाए तो वो क्या कर लेंगे...!!, फिर जिंदगी पटरे में आने लगी तो मेरे से दस साल छोटे भाई का दोनों किडनी ख़राब हो गया... ! उसके लिए transplant अब कैसे और किस तरह हुआ ये अलग बात है..| fir अपनी दीदी को अपने सामने आँख मूंदते हुए देखा... अनुभव किया.... | २०१० में अपने शादी के वर्षगांठ के दिन ही अपने हाथ और पैर दोनों तुडवा लिए.. !! अब आप ही बताओ, कैसे कहूँ कि कोई खास पल था, जब मैंने कठिनाई के सबसे उच्च स्तर को झेला हो... .. और भी बहुत सारी रुकावटें आयी, और आज भी कुछ न कुछ लगा रहता है... पर जिंदगी है तो दर्द है... और दर्द को दूर करने कि कोशिश भी जारी है.......